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Dr.B.R.Ambedkar

Thursday, January 1, 2015

हमरे अधूरे इतिहास ज्ञान के लिए संघियों के सबक का मतलब बहुतै हैरतअंगेज असली कम्युनिस्ट और असली अंबेडकर,एक देह में दुई जान थे नाथुराम गोडसे,संघी दावा! तो उनकी आराधना भारतवासी हिंदू बहुजनों का परम कर्तव्य हुआ,बलि। पलाश विश्वास

हमरे अधूरे इतिहास ज्ञान के लिए संघियों के सबक का मतलब बहुतै हैरतअंगेज

असली कम्युनिस्ट और असली अंबेडकर,एक देह में दुई जान थे नाथुराम गोडसे,संघी दावा!

तो उनकी आराधना भारतवासी हिंदू बहुजनों का परम कर्तव्य हुआ,बलि।

पलाश विश्वास

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा केसरिया कारपोरेटजनसंहारी उत्सव मनाने म्हारा देश पधारने वाले हुए कि घने कोहरे और सनसनाती सर्दियों में राजधानी नई दिल्ली और बाकी सारा देश अमेरिकी इजराइली सुरक्षा गेरे में हो गयो रे।ड्रोन का पहरा है और आतंक के खिलाफ रेड एलर्ट है।सीआईए,मोसाद और एफबीआई के मतहत है तमाम सुरक्षा प्रणालियां।राजकाज के जरिये अध्यादेश मार्फते तमाम सुधार लागू करने के वास्ते कल्कि अवतार के धर्म निरपेक्ष कमलमुख चमकाने में लगा है एफडीआई खोर मीडिया।शत प्रतिशत हिंदुत्व के घर वापसी मुहिम पर भी अंकुश लगा है बलि।


हम तो बुरबक ठहरे जी कि भारतयात्रा खारिज करने को ओबामा भाया से गुहार लगा बैठे।जैसे संविदान दिवस मनाने की अपील कर दी थी।तब तो महाराष्ट्र की सरकार ने हमारी नाक बचा लियो।ओबामा को चिट्ठी लिखने की जो अपी करी ठैरी,उसके जवाब में एको चिट्ठी व्हाइटहाउस को रवाना हुई कि नी,पत्त नी।


हम तो बुरबक ठहरे जी कि कारपोरेट फंडिंग की राजनीति से संघ परिवार को कश्मीर का बंटाधार रोकने की गुजारिश कर बैठे और नतीजा यूं कि फांसी का फंदा गला में लटताये मुफ्ती साहेब संघ परिवार की कदमबोशी करने लग गयो और मीडिया हिंदुत्व बल्ले बल्ले।


अजब खेल अजब तमाशा है।घर वापसी वापस तुणीर में है तो पीके पर बवंडर।ससुरे ाम आदमी और औरत के बुनियादी मसले पर किसी का ध्यान है ही नहीं।


हिंदुत्व का ब्रह्मास्त्र रिवर्स गिअर में है जब देखो तब, और जब देखो तब गजब का पिकअप,एकदम टाप गिअर पर।हमारे लोगों की समज में आता नहीं है कि कैसे गला काटने की यह समृद्ध सनातन कला है।


आइकनों की बहार,अम्ताभो फूल ब्लूम


मुक्त बाजार में आइकनों की बहारे बहार है।चुनांचे कि गोआ कि अमिताभ बच्चन अब फिर गुजकराती अंबेसडर रोल में फुल ब्लूम है जबकि जया बच्चन समाजवादी खेमे है,जिनके राजकाज यूपी में पीके टैक्स फ्री है।


हमने अमलेंदु से गुजारिश की थी कि इस पीके हवा को तूल मत देना ।यह नयका एनैस्थिसिया है।


संघ परिवार के लोग बेहदै कलाकार,बेहदे मीठे और बेहदे विद्वान और बेहदै तकनीशियन वैज्ञानिक वगैरह हैं और बाकी जनता घोंचूमल बुरबकौ है।


हम सगरे प्रजाजन पीके पीके गुहार लगाते जायेंगे और हिंदू साम्राज्यावाद की बजरंगी दुर्गे गुरिल्लासेना घात लगाकर मौके की ताक में होगी,कब कहां गरदनिया तोड़ दें,ऩइखे मालूम।


पिर वही बगुला आयोग


योजना आयोग अब नीति आयोग ठैरा।बलि मतबल यूं कि शंग परिवार की नीतियां लागू करने वाला अमेरिकी इजराइली हिंदुत्व आयोग ज्यादा खुलासा हुआ रहता नाम जो यूं होता कि यूं न होता जो कि मतबल समझायो दीखै।


मसलन,नए साल की शुरुआत के साथ ही सरकार ने योजना आयोग का नया नाम तय कर दिया है। करीब 60 साल पुराना योजना आयोग अब नीति आयोग के नाम से जाना जाएगा। नीति का फुल फॉर्म होगा नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया। हालांकि इसके काम-काज और ढांचे में किस तरह का बदलाव किया जाएगा, इसका औपचारिक ऐलान नहीं किया गया है।


योजना आयोग का नया नाम सरकार ने तय कर दिया है और अब इसका नया नाम नीति आयोग होगा। इसके कामकाज और ढांचे का ऐलान कर दिया गया है और इसके चेयरमैन प्रधानमंत्री होंगे। नीति आयोग के वाइस चेयरमैन को प्रधामंत्री मनोनीत करेंगे। नीति आयोग के जरिए संघीय ढांचे को और मजबूत किया जा सकता है।


नीति आयोग के तहत एक नेशनल काउंसिल होगा और 5 रीजनल काउंसिल होंगे। रीजनल काउंसिल में मुद्दों के आधार पर राज्यों का समूह होगा। इस आयोग में राज्यों के मुख्यमंत्री सदस्य होंगे।


जाहिर है कि बगुला अर्थशास्त्रियों,बगुला पत्रकारों और बगुला समाजशास्त्रियों की बहारे बहार है।



नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में देश की स्थिति आपातकाल से भी बदतर हो गई है।


इसी के मध्यबंगाल के खड़गरपुर से गरजी हैं ममता बनर्जी,लेकिन बाकी तमाम क्षत्रपों के मुंह तालाबंद है।हम ममता के समर्थक न भये।उनके जनसमर्थन अभी अटूटै है और उनन को फालती समर्थक परामर्शदाता जरुरी नहीं है।शारदा मामले में गिरफ्तारी के खिलाफ उनके सिपाहसालारों ने बंगाल में आग लगा देने की धमकी दी है और हमऊ तो लत वानी हैं,मई दो हजार सोलह के बाद बंगाल को टाटा बायबाय।यहां अपना ठौर ठिकाना नहीं टैरा अउर हमनी उनन के नजरिये से बंगाली भी नइखे।


मगर ममता की तारीफ करनी ही होगी जो सगरे भारत में वहीं दो टुक बोली कि  पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लिया हैं| उन्होंने दावा किया कि नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में देश की स्थिति आपातकाल से भी बदतर हो गई है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बंगाल में भूमि अधिग्रहण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों को लागू नहीं करेगी।


तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने लोगों से अनुरोध किया कि वे उस काले अध्यादेश को जला डालें, जिसे मोदी की कैबिनेट ने सोमवार को मंजूरी दी है। दरअसल, राष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण संबंधी प्रक्रियात्मक कठिनाइयों को दूर करने के उद्देश्य से भूमि अधिग्रहण अधिनियम में संशोधन किया गया है। साथ ही प्रभावित परिवारों से संबंधित प्रावधानों को भी मजबूत किया गया है।


ममता ने कहा कि केंद्र भूमि अधिग्रहण में ऐसे संशोधन कर रही है, जिससे बंदूक के बल पर आपकी जमीनें छीनी जाएंगी। लेकिन मैं उनकी चुनौती स्वीकार करती हूं। जबतक मैं जीवित हूं किसी की भी जमीन जबर्दस्ती नहीं छीनने दूंगी। मेरी लाश पर ही वे भूमि अधिग्रहण कर सकेंगे।


उन्होंने कहा कि आपके भूमि के अधिकार को छीनने की हिम्मत सरकार कैसे कर सकती है? मैं पश्चिम बंगाल में इस तरह के कानून को लागू करने की मंजूरी नहीं दूंगी। मैं आप सभी से अनुरोध करती हूं कि आपलोग उस अध्यादेश की एक-एक कांपी लें और उसे जला डालें। इस काले अध्यादेश को जला डालिए। हम बंगाल में जबर्दस्ती जमीन अधिग्रहण की मंजूरी नहीं देंगे।


भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के माध्यम से देश को बेचने का आरोप लगाते हुए उन्होंने लोगों से केंद्र की लोक विरोधी नीतियों के खिलाफ खड़ा होने का अनुरोध किया।


तनिको समझा भी करो जानम कि खेल जो दीखता है,वो दरअसल होता नहीं है।विदेशी पूंजी की बहार बहाल रखने को दसों दिशाओं में पतझड़ का आयोजन है कि मसलन रियल इकोनॉमिक्स डॉटकॉम के पी के बसु का कहना है कि 2014 के मुकाबले 2015 में दुनियाभर के बाजारों में उतनी तेजी की उम्मीद नहीं है। लेकिन 2015 के लिए भारतीय बाजारों पर तेजी का नजरिया है। भारतीय बाजारों में 2015 की तेजी सरकार के रिफॉर्मस से जुड़े कदमों पर निर्भर करेगी।


रिफार्मस से बाजार में तेजी का चोली दामन का रिश्ता,कोनो वर्नविटा होइबे करे


सरकार के रिफार्मस से बाजार में तेजी का चोली दामन का रिश्ता है और इसीलिए यह अध्यादेश का राज है।अब बूझै आप कि यह ससुरा कौन ब्रांडे का बोर्नविटा हारलिक्स है कि जनगण की रीढ़ की हड्डियां मजबूत हुआ  करै है सांढ़ों के बेलगामो उछल कूद से।


बहरहाल एंड्र्यू हॉलैंड का कहना है कि अब तक भारत में छोटे-मोटे रिफॉर्म देखने को मिले हैं, लेकिन आगे भारत को रिफॉर्म के लिए कड़े कदम उठाने पड़ेंगे। भारतीय प्रधानमंत्री की अमेरिकी कंपनियों के सीईओ के साथ हुई बैठक इस लिहाज से काफी अहम माना जा सकता है।


बहुतै कड़े रिफार्म के खातिरो जे शत प्रतिशत हिंदुत्व का जिहाद है कि धर्मांध मंदमति प्रजाजन में जय रामजी की गुहार हो और राम जी पार लगा दे ओबामाराम की नैया।


अमेरिका में निष्द्ध गुजरात नरसंहार कारणे हिंदुत्व समुनामी मध्ये कल्क अवतरण उपरांते जो मोदी महाराजज्यू पांच दिनों की अमेरिकी यात्र पर गये थे,तभी से हिंदुत्व का यह एजंडा अब रघुकुल रीति है।प्राण जाई पर वचन न जाई,आख्यान है यह रामायणी पाठ है और रामलीला उत्तरआधुनिक बाबरी विध्वंसोत्तर भी है।


नई सरकार बनने के बाद विदेशी निवेशक, भारत के बारे में क्या नजरिया रखते हैं और निवेश के लिए उनकी नजर अब कहां पर है।यह तभी बता दिया गयाथा और अमल अब हो रहा है।


पीके  भारत में निवेश बढ़ाने के लिए सरकार को तेजी से फैसले लेने होंगे। साथ ही महंगाई घटाने के लिए सरकार को आरबीआई को पूरा सहयोग देना होगा। साथ ही सरकार को बड़े आर्थिक सुधारों को जल्द अमल में लाना चाहिए।पीके  नई सरकार को बड़ी योजनाओं को लागू करने के लिए सही माहौल बनाने की जरूरत है। दरअसल, चीन के मुकाबले भारत काफी पीछे छूट गया है। ऐसे में भारत में संभावनाओं का पूरा फायदा उठाया जाना चाहिए। सरकार का मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने पर फोकस जारी रहना चाहिए।


जो दरअसल मोदी का मेडइन विसर्जन और मेकिंग इन गुजरात,मेकिंग इन बांग्लादेश कश्मीरमध्ये है।


बहरहाल पी के बसु के मुताबिक यूरोप की इकोनॉमी के लिए या ईसीबी के लिए जनवरी या फरवरी में क्यूई लाना बेहद अहम होगा। क्योंकि क्यूई के बाद ही ईसीबी काफी ठोस कदम उठाने की जरूरत होगी।  


पी के बसु का कहना है कि 2014 के मुकाबले 2015 में एफआईआई के निवेश में थोड़े धीमेपन का अनुमान है। एफआईआई का निवेश आने में लगभग एक तिमाही का समय लगेगा। वित्त वर्ष 2016 में भारतीय इकोनॉमी में मजबूत रिकवरी देखने को मिल सकती है। पी के बसु को 8 फीसदी तक की जीडीपी ग्रोथ होने का अनुमान है। 2015 में एफआईआई का निवेश आने में एक तिमाही का समय लगेगा।

अर्थव्यवस्था में मुनाफे के लिए धर्म कर्म के दातव्य आयोजन

अर्थव्यवस्था में मुनाफे के लिए धर्म कर्म के दातव्य आयोजन हमारी गौरवशाली सनातन परंपरा है और टैक्स बचाओं काला सफेद करु धर्मार्थ का आशय भी यही है।


सत्तावर्ग का संकट जितना गहराओ है उतना ही हिंदुत्व का रिवर्स टाप गियर विमानौ उड़ो है।उतना ही प्रवचन,योग,समागम,मेला इत्यादि इत्यादि है।धर्मांतरण और घरवापसी के लिए ढेरो वक्त ठैरा।राजधरक्म बी तो अटलजी माफिके निभे चाहिए जी।


क्रेडिट सुईस के हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटेजी नीलकंठ मिश्रा का कहना है कि आने वाले 5-10 सालों में दूसरे उभरते हुए देशों के मुकाबले भारत की ग्रोथ बेहतर रहेगी। वहीं भारतीय बाजारों में विदेशी निवेशकों का पैसा आना जारी रहने का अनुमान है। लेकिन ग्लोबल मार्केट से जोखिम और अनिश्चिचतता की स्थिति अब भी बरकरार है।


धर्मांतरण और सौ फीसद हिंदुत्व का असल मतलब


धर्मांतरण और सौ फीसद हिंदुत्व का असल मतलब यह ठैरा कि  पी के बसु का कहना है कि ईसीबी की कल की बैठक में काम कम और बातें ज्यादा की मंशा साफ हुई है। यूरोजोन में डिफ्लेशन का खतरा लगातार बढ़ता चला जा रहा है।


कच्चे तेल के दाम में कमी से यूरोप, भारत जैसे देशों के लिए बहुत बड़ी राहत मिली है। डिफ्लेशन के खतरे और और पिछली 2-3 तिमाहियों से बेहद खराब ग्रोथ से यूरोप में क्यूई की बहुत बड़ी जरूरत है। क्यूई को 1 महीने के लिए भी टालना यूरोजान के लिए बहुत बड़ी दिक्कत हो सकती है।


पी के बसु के मुताबिक पिछले 6 महीने से जर्मनी लगातार क्यूई के लाने के पक्ष में नहीं है। जर्मनी जैसे संकुचित विचारधारा वाले सेंट्रल बैंकर्स होने से यूरोजोन की इकोनॉमी में बड़ी दिक्कत की आशंका है। यूरोजोन के अलावा चीन को लेकर भी चिंताएं बढ़ रही हैं और वहां भी आर्थिक मोर्च पर दिक्कतें आ रही हैं। अगर अगले साल चीन 5 फीसदी की भी ग्रोथ दिखाता है तो ये काफी ज्यादा होगा। वहीं जापान का सेंट्रल बैंक काफी अच्छे कदम उठा रहा है इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अच्छा असर पडे़गा।


हालांकि पी के बसु का मानना है कि अगले कुछ सालों में भारतीय इकोनॉमी सबसे ज्यादा बढ़ने वाली इकोनॉमी रहेगी। भारत की ग्रोथ अगले साल और आने वाले सालों में कच्चे तेल में कमी और रिफॉर्म के चलते स्थिति काफी मजबूत रहेगी।

अभिषेकवा लिख्यो है



अपना अभिषेकवा मौके बेमौके कुछ चुटीले मंतव्य करके मातम के माहौल को खुशनुमा बना देने में उस्ताद है,ऐसी ठैरी उसके गमछे की महिमा।


एक बानगी देखेंः


अभी पान बंधवाने बाहर निकला था। सड़क पार एम्‍बुलेंस खड़ी थी। पता चला कि सामने वाली सोसायटी में एक सज्‍जन नया साल मनाते-मनाते खुदा को प्‍यारे हो गए।

चैन से रहिए। भात-दाल खाइए। मन करे तो रेवड़ी भी खा लीजिए। पान दबाइए। ज्‍यादा शराब मत पीजिए।

अगला दस साल ऐतिहासिक बुरा रहने वाला है। लड़ने के लिए देह-दिमाग को बचाकर रखिए। बाकी देश में लोकतंत्र है, कुछ भी करने के लिए आप आज़ाद तो हइये हैं। क्‍या?


Abhishek Srivastava,अपने उसी अभिषेकवा ने यह लिंक वाल पर टांगा है।जो हम लिख रहे हैं,उसके खुलासे के लिए क-पया इसे भी पढ़ लें।

लीजिए साहेबान, 2014 का सबसे बढि़या ईयर एन्‍डर शिवम विज का लिखा हुआ... थोड़ा अतिरंजित लग सकता है लेकिन पूरा पढ़ें तो शायद इसके तर्क से आप मुतमईन हो जाएं।

2014, the year India became a Hindu state

The Indian secularism debate is over. How grave will the assault on minorities be?

SCROLL.IN




Krish Chattar ने खूब लिखा हैः

मैं inderjeet barak एक किसान होकर कैसे मनाऊं नया साल??

मैं कहता हूं "मुझे यूरिया चाहिये?"

वो कहते हैं " पीके हमारे धर्म के खिलाफ है।"

मैं कहता हूं -" स्वामीनाथन रिपोर्ट लागु करो।"

वो कहते हैं " जम्मु कशमीर में सरकार बनानी है।"

मैं कहता हूं " फसलों के सही दाम दो।"

वो कहते हैं-" पढाई में ' गीता' लागु कर दी।"

अब तुम ही बताओ कि मैं एक किसान होकर नया साल कैसे मनाऊं????



मुझे नये साल के तोहफा बतौर संघी विद्वतजनों के सुभाषित मंतव्य मिलने लगे हैं।गौरतलब है कि संघी भाई बंधु अब मेरे अधकचरे ज्ञान का नोटिस भी लेने लगे हैं।


अपने संप्रदाय के लोग तो पूछते भी नहीं हैं और न नोटिस लेते हैं।


उनका आभार।


कल अंग्रेजी में लिखे आलेख कश्मीर में संघ परिवार के बांग्लादेश दोहराने की मुहिम के बारे में हैं।हिंदी में नहीं लिखा क्योंकि कश्मीर में लोग अमूमन हिंदी नहीं पढ़ सकते।


घनघोर मोदी कैंपेन और मीडिया बमवर्षकों के बावजूद कश्मीर गाटी में सिर्फ तीन फीसद वोट मिलिले संघ परिवार के पंडिताऊ राजकाज के हक में।संघ परिवार फिर भी हर कीमत में कश्मीर में सकरार बनाना चाहे है जबकि दिल्ली में चालीस फीसद वोट बी उसके लिए नाकाफी है।यह पहेली बेहद मुस्किल है जो शायद वैदिकी गणित है।


घाटी की जनता ने भाजपा को सिरे से खारिज कर दिया है।


जाहिर है कि कश्मीर सिर्फ जम्मू नहीं है,जैसा संघ परिवार की हिंदुत्व के मुताबिक समझाया जा रहा है।


क्समीर घाटी ही दरअसल असली कश्मीर है जहां खारिज है संघ परिवार और उसका हिंदुत्व का पंडिताऊ एजंडा।


इसी तरह 1970 में पाकिस्तान में हुए पहले आम चुनाव में पश्चिमी पाकिस्तान के  इस्लामी  धर्मांध हुक्मरान ने बांग्ला अस्मिता को खारिज करके मुजीब को भारी बहुमत के बावजूद सत्ता से वंचित कर जेल में डाल कर फौज के दम पर बाांग्लादेश की आत्मा कुचल देने का  अभियान चलाया था।


बाकी इतिहास है।


कश्मीर घाटी के जनादेश और कश्मीरियत के विरुद्ध पंडितो के वर्चस्व  थोंपने और यहां तक कि कश्मीर और जम्मू के विभाजन की संघी रणनीति का इस आलेख में भारत विभाजन और दो राष्ट्र सिद्धांत में संघ परिवार और खासतौर पर हिंदू महासभा की भूमिका के मद्देनजर पड़ताल की गयी है और भारत और कश्मीर की राजनीति से कश्मीरियों के साथ बांग्लादेश दोहराने से बाज आने को कहा गया है।


आलेख में संघ परिवार के नाथूराम गोडसे  से लेकर अमित शाह तक के भारत रत्नों की चर्चा की गयी है।


जबाव में कहा जा रहा है कि हमें इतिहास की तमीज है नहीं और ज्ञान हमारा अधूरा  है और यह भी कि हम वामपंथ को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं कि बलि,नाथुराम गोडसे के बारे में हम कुछ भी न जानै हैं।वे महान क्रांतिकारी भये जो जात पांत मिटाने के मिशन में लगे थे।


बलि असल अंबेडकर भी वही तो असली मर्द कम्युनिस्टभी वही नाथूराम गोडसे हुआ करै है।बाकी सारे संशोधनवादी।

संदर्भः

Rejecting Kashmir Valley RSS is making in Bangladesh, Be Aware! RSS has to install a Kashmiri Pundit Raj in Kashmir

http://www.hastakshep.com/english/opinion/2014/12/31/rejecting-kashmir-valley-rss-is-making-in-bangladesh-be-aware



मुलाहिजा फरमायेंः


Soibal Dasgupta #palash_biswas I am an atheist and not a supporter of Hinduism or RSS... but I must say u r not spreading awareness but a collection of self assumed facts... this kind of act only builds foundation for people to believe in RSS propaganda more...


Your way of thinking is far bourgeois you need to study history and detailed observations are needed... regarding Godse... (yes he assassin gandhi) but do u know he faught against Casteism and untouchability along with veer savarkar... if u consider ur self to be a writer then u must know the facts and mention them without any kind of partiality!


Secondly you wrote about your communist ancestry but your way of writing is far influenced by the revisionist CPs...


Do u know how many kashmiri pandits are there.?

Not even 10% of the kashmiri population. You formed a story, wrote it and started spreading...

Could the naxals rule the states where there is their presence? The number of naxals in any state is far more than the kashmiri pundits...

Because of people like you... the real fact pamphlets of real communists don't reach the people... believe me after reading this dreamlike stuff none is going to read anything against Hindutva... because even the real facts would be compared to ur fantasies...


दलील उनकी सही होगी क्योंकि गांधी रामराज्यकी बात करते थे और जाहिर है कि संघ परिवार मनुस्मृति शासन चाहता है तो इसलिए गांधी की हत्या भी इस तरह से संघ परिवार के लिए जायज है।


अगर नाथुराम गोडसे बाबासाहेब के मुकाबले ज्यादा जाति तोड़क क्रांतिकारी रहे हैं,तो यह हमारी सरासर बदतमीजी मानी ही जानी चाहिए कि हम नाथूराम गोडसे  की शान में उलट पुलट मंतव्य करें।


दूसरी दलील यह है कि कश्मीर में पंडितों की जनसंख्या दस फीसद से कम है तो उनकी हेजेमनी की बात फेंटेसी है।जाहिर है कि ब्राह्मणों की जनसंख्या बंगाल में तीन फीसद है और बंगाल में लागू शत प्रतिशत वैज्ञानिक वर्चस्व की हेजेमनी भी फैंटेसी है।हमारी इस बुरबकई से वामपंथियों को खास नुकसान हुआ ठैरा कि वे तो इसी हेजेमनी को मजबूत करते रहे पैंतीस साल के वाम राजकाज में।


संघियों के मुताबिक हेजेमनी बहुसंख्य की होती है तो यह बहुजन समाज के माफिक ही ठैरा।


हो सकता है कि इसी लिहाज से सारे के सारे बहुजन राम केसरिया भये क्योंकि भारत में हिंदू ही बहुजन हैं ,हिंदुत्व ही पहचान है और संघ परिवार का एजंडा शत प्रतिशत हिंदुत्व है।


हमरे अधूरे इतिहास ज्ञान के लिए संघियों के सबक का मतलब बहुतै हैरतअंगेज है कि असली कम्युनिस्ट और असली अंबेडकर,एक देह में दुई जान थे नाथुराम गोडसे,तो उनकी आराधना भारतवासी हिंदू बहुजनों का परम कर्तव्य हुआ,बलि।


आज बांग्ला दैनिक एई समय के संपादकीय पेज पर एक काम का आलेख छपा है,चाहे तो वामपंथ के सिमपैथाइजर जो संघी हैं,वे  उसे पढ़ लें।


शीर्षक हैःवामपंथिरा शुधु सेमीनार कोरेछे,आरएसएस गोढ़े तुलेछे एकटिर पर एकटि शिक्षाकेंद्र।


मेरी समझ से अनुवाद की जरुरत नहीं है।


शायद यह आलेख कष्ट करके बांग्ला में भी पढ़ने की जरुरत नहीं है क्योंकि यही मौजूदा सामाजिक यथार्थ है,जो आंख कान खोलकर देखने समझने की चीज है कि सारा देश अब सरस्वती शिशु मंदिर है।


तनिको गौर करें जी।


केसरिया कारपोरेटसरका के हिंदुत्व का आशय यही है कि एफआईआई निवेशक ज्यादा दिन तक भारतीय बाजारों से दूर नहीं रहें।


रिकॉर्ड तेजी के बाद बाजार में दिखी गिरावट से थोड़ा घबराहट का माहौल पैदा हो गया है। वैसे एक जोरदार तेजी के बाद थोड़ा करेक्शन तो संभव ही होता है, लेकिन इस बार वैश्विक बाजार से दबाव बढ़ रहा है। लिहाजा बाजार की चाल को लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसे में बाजार की आगे की चाल पर जानते हैं एंबिट इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्सके सीईओ एंड्र्यू हॉलैंड की राय।


एंड्र्यू हॉलैंड का कहना है कि क्रूड में गिरावट भारत के लिए पॉजिटिव साबित होगी। दरअसल, अभी ग्लोबल हालात ठीक नहीं हैं और विदेशी बाजारों में बिकवाली का असर भारत पर संभव है। ऐसे में बाजार में जनवरी की शुरुआत तक गिरावट जारी रहने की आशंका है।


एंड्र्यू हॉलैंड के मुताबिक आगे भी ग्लोबल चिंताओं के कारण एफआईआई निवेशकों की बाजार में बिकवाली जारी रह सकती है। लेकिन एफआईआई निवेशक ज्यादा दिन तक भारतीय बाजारों से दूर नहीं रहेंगे। ग्लोबल डिमांड के हालात खराब हैं और आगे ग्लोबल बाजारों पर दबाव बना रहेगा।

रेल किराया बढ़ाने का मित्तल कमेटी का सुझाव



नए साल में रेल किराया बढ़ सकता है। रेलवे की कमेटी ने खासकर उपनगरीय रेल सेवा के किराए बढ़ाने की सिफारिश की है। सरकार ने रेलवे की आय बढ़ाने के तरीके सुझाने पर डीके मित्तल कमेटी का गठन किया था। मित्तल कमेटी के मुताबिक उपनगरीय ट्रेनों का किराया अभी भी बस किराये से 60 फीसदी कम है। इस किराए को धीरे धीरे बढ़ाया जा सकता है। कमेटी ने पैसेंजर ट्रेन में यात्रा करने की कम से कम दूरी 10 किलोमीटर से बढ़ाकर 20 किलोमीटर करने की सिफारिश भी की है।


इसी तरह मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में भी कम से कम यात्रा की दूरी 50 किलोमीटर से बढ़ाकर 100 किलोमीटर की सिफारिश भी की है। मित्तल कमेटी ने पीएसयू को प्रोजेक्ट लिए फंड जुटाने की पूरी छूट का सुझाव भी दिया है।

रक्षा खरीद नीति में होगा बदलाव

अब रक्षा सौदों का भ्रष्टाचार खत्म है कि जो भ्रष्टाचार होगा,वह वैध होगा और कानून हिंदुत्व की सरकार यह इंतजमाम खूब कर रही है।कालाधन खत्म करने का नायाब नूस्खा यह है कालाधन सफेदो कर दिया जाये।यह सर्फ एक्सल एक्साइल की सरकार है।सफेदी झकाझक।

सरकार रक्षा क्षेत्र की विदेशी कंपनियों को नए साल का तोहफा देने जा रही है।

सरकार की रक्षा खरीद नीति में बदलाव की तैयारी है और रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर के मुताबिक सरकार फरवरी में रक्षा खरीद नीति में बदलाव करेगी। इसके तहत विदेशी कंपनियों के प्रतिनिधियों से बातचीत को कानूनी तौर पर वैध बनाया जाएगा। हालांकि प्रतिनिधियों को कमीशन या सौदे के मुनाफे में हिस्सेदारी की इजाजत नहीं होगी।


साथ ही सरकार ने टाट्रा ट्रकों के स्पेयर पार्ट्स टाट्रा से लेने पर लगा प्रतिबंध हटा दिया है। रक्षा मंत्री के मुताबिक इसके लिए फरवरी में बदलाव किए जाएंगे।

हमारी औकात आप बूझै लो महाराज,आपकी मदद के लिए पुनश्च बसंतीपुर इतिकथा


नीला आसमान से बहता लावा कि पकी हुई जमीन दहकने लगी,हमसे कोई न  कहें नया साल मुबारक!


मेरे बचपन से लेकर डीएसबी तक के सफर में शामिल दीप्ति के पांव हमारे डेरे में पहली दफा पड़ें।कल घर में संगीत सभा जैसी समां थी।


सविता के संगीत गिरोह नें दीप्ति और उसके बेटे द्विजेंद्र लाल को घरकर रवींद्र,नजरुल, द्विजेंद्र,लोक से लेकर सूफी संगीत की नदियां बहा दीं।


दीप्ति और हमारे दौरान किसी संवाद की गुंजाइश भी कायदे से बन नहीं सकी।करीब एक दशक बाद मिले हम।


मैं दिनभर अपने पीसी के सामने बैठे लिखता रहा और कानों में उनके संगीत को देखता रहा।


दीप्ति के साथ हमारी संगत के बारे में लिखा नहीं है अबतक ।


कोई संदर्भ नहीं मिला।


उसकी और हमारी दुनिया हमेशा अलहदा जुदा जुदा रही है।


वह हमेशा बचपन से संगीत में निष्णात है और उसका पूरा परिवार संगीतबद्ध है जबकि मैं हद दर्जे का बेसुरा हूं।


मेरे भाई सुभाष और मेरी दीदी मीरा,बहन वीणा और सविता सुर साधने वाले आस पास रहे हैं।घर में संगीत शिक्षक भी बचपन में ब्रजेन मास्टर थे,लेकिन मुझमें सरगम साधने का धीरज कभी नहीं बना।


कहीं कोई बिंदू होती अगल बगल तो हम भी भोलू बनने की शायद कोशिश भी कर लेते।


हम तो अब सविताबाबू के हवाले हैं,जिनके सुर ताल पर नाचखूबै नाच्यौ।अब अधबीच लेखन उठाकर ले गयी दुकान कि कंबल खरीदना है,हमें जो विदर्भ जाना है और सर्दियां सनसनाती हुई हैं।


अब पहले जैसा पोयटिक मामला जमेगा अब नहीं।अब विशुद्ध गद्य है।चस्मा और मफलर खोने के बाद अग्रिम चेतावनी मिली है कि कंबल कहीं छोड़ न आउं।


इस व्यवधान के लिए खेद है।यू समझ लीजिये कि कामर्शियल ब्रेक है।


बहरहाल किस्सा यह है कि दीप्ति हमेशा संगीतकारों के साथ तो मैं हमेशा बेसुरा लोगों की सोहबत में,जो गाते कम,चीखते ज्यादा हैं,उनमें से अकेले गिरदा ही विरले थे,जिनके सुर ताल बेहद सधे रहते थे,जिसकी समझ मुझे आज भी नहीं है।


अब तो सारे के सारे लोग सुर साधे दीखते हैं।सारे लोग जश्न में ताल पर ठुमके लगाये दीखे हैं।गिरदा गैंग तो शायद नैनीताल में भी न हो अब कहीं,पहाड़ में कुछ बचा खुचा है कि नहीं,केदार जलआपदा में वे भी कहीं डूब में शामिल हो गये या नहीं,पत्त नी।


बलि,चीखने चिल्लाने वाले लोग अब इस हिंदुस्तान मे मारे डर के पीके हो गये ठैरे।जी,वही सेंसर का झमेला।डीएक्टीवेट कर दिये जाने का सिलसिला कि बलि जिंदड़ी डिलीट ठैरी।


डीएसबी पहुंचने के बाद भी बंगाल होटल में  दीप्ति और हरेकृष्ण और कपिलेश भोज बारी बारी से मेरे रूम पार्टनर रहे हैं।सीनियर कालीपद मंडल भी हमारे साथ साल भर थे।लेकिन तब हम गिरदा के गैंग में शामिल हो गये और दीप्ति संगीत समारोहों,कार्यक्रमों में ही फंसा रहा और अब भी वह रूद्रपुर में संगीत शिक्षक है।उस जमाने में डा.डैंग का अता पता नहीं था।


जीआईसी में हमारे तमाम मित्र कामन थे।


हरीश मिश्रा,किरण अमरोही,निरंकार आल सेंटस,सेंटजोजफ्स लेकर नैनीताल की संगीत सभाओं से जुड़े लोग हमारा मित्रमंडल में थे तब।


दीप्ति अब भी उसी दुनिया में मस्त है।


हमारी दुनिया डीएसबी से जो बदल गयी,वह लेकिन फिर बदली नहीं है।न बदले,मरते दम यही कोशिश रहेगी।


ताराचंद्र त्रिपाठी,आनंदस्वरुप वर्मा,पंकज बिष्ट,वीरेन डंगवाल, शेखर ,गिरदा, राजीवदाज्यू, पवनराकेश, हरुआ दाढ़ी, विपिनचाचा, जागनाथज्यू, नवीन, कमल जोशी,राजीवनयन बहुगुणा,पीसी माइनस प्रदीप टमटा,कपिलेश भोज, बटरोही, फ्रेडरेक स्मेटचेक,शमशेरदाज्यू, निर्मल,जहूर, महेशदाज्यू,उमा भाभी, चंद्रेश शास्त्री से लेकर जो दिवंगत अब भी जीवित लोगों की टीम युगमंच पहाड़ और नैनीताल समाचार की है,आखिरतक मेरी पहचान वही है,वजूद भी वहीं।बाकी हमारी गुलामी की दास्तां है।


मुझे खुशी है कि  दीप्ति भी संगीतबद्ध बना हुआ है अब भी। बाकी किसी धंधे में है नहीं वह।वह उतना ही सरल सीधा है,जैसा बचपन में हुआ करता था।


बाईपास सर्जरी हो गयी।न्यूरोटिक प्राब्लम है,कदम कदम चलेने मेंतकलीफ है।घुटने की हड्डियां गायब है दुर्घटना के कारण।


फिर भी दिल वही बेकरार है।जवानी दीवानी अब भी उतनी ही। अब भी उतना ही जिंदादिल।जैसे बचपन में वह मेरी ऊर्जा का स्रोत था,ठीक वैसा ही साबूत है।हालांकि उसने कहा नहीं कि फिर वही दिल लाया हूं।


अपने दोस्त को मुश्किलों के पार आग की दरिया का सफर तय कर लेते देखना भारत रत्न पुरस्कार से बड़ी उपलब्धि है शायद।


दीप्ति से घोड़े पर सवार आते जाते बरसों से मुलाकात न होने के बाद हुई मुलाकात से जैसे कोई अनबंधी नदी, जैसे कोई पवित्र फल्गुधार स्वरग से पाताल तक बह निकली और इस नश्वर मर्त्य में फिर हम जात्रा में अभिनय करने मंच पर उतरने ही वाले हों।और तालियों की गड़गड़ाहट का बस इंतजार ही बाकी हो।


मुझे और खुशी है कि दीप्ति का बेटा द्विजेंद्र लाल,जो मशहूर बांग्ला गीतकार डीएल राय के नाम है,संगीत से एमए कर रहा है और बेहतरीन म्युजिक एरेंजमेंट का मास्टर है।


उसने मुझे हैरत में डाला ,जब उसने कहा कि वह मेरा फेसबुकिया मित्र भी है।


कल सूफी संगीत से वह सविता के सुरगिरोह को मंत्रमुग्ध कर गया।

बसंतीपुर की इतिकथा


दीप्ति का गांंव पंचानननपुर और उसके बगल का गांव उदयनगर के साथ बसंतीपुर का जन्म हुआ था।1956 में।हमारे सारे  लोग विजयनगर के शरणार्थी तंबुओं में त्रिशंकु हालात में थे।दिनेशपुर के बाकी तैतीस गांव 1952  और 1954 के बीच बस गये थे।


1956 में जिन शरणार्थियों का पुनर्वास नहीं हुआ,उनके पुनर्वास और स्कूल, अस्पताल, आईटीआई जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग लेकर शरणार्थियों का हुजूम जुलूस निकाल कर नौ मील पैदल चलकर बीच घनघोर तराई के जंगल रुद्रपुर जा पहुंचा।


तराई बंगाली उद्बास्तु कमिटी के तत्वाधान में उसके नेता अध्यक्ष पौंड्र क्षत्रिय समुदाय के सुंदरपुर गांव के राधाकांत बाबू और बिन गांव के नमोशूद्र पुलिनबाबू की अगुवाई में उनने ढिमरी ब्लाक से भी पहले तराई के जंगल में पहले जनांदोलन का अलख जलाया।


तब महिलाओं का नेतृत्व कर रही थीं फूलझूरी मंडल जिनके बेटे श्रीकृष्ण और रामकृष्ण मेरे सहपाठी रहे हैं।फूलझूरी भी दिवंगत हैं।


उन आंदोलनकारियों को उठाकर तब बाघों के जंगल किलाखेेड़ा में ट्रकों में ले जाकर फेंक दिया गया था,लेकिन आंदोलन की लहर रुकी नहीं और हमारे उन पुरखों की नियामत आज का दिनेशपुर है।


मेरे दीप्ति,हरेकृष्ण,टेक्का, सुधीर जैसे हमारे तमाम दोस्तों और हमारे जनम से पहले निकले उस जुलूस में तराई के तमाम स्त्री पुरुष,बच्चे बूढ़े शामिल थे,जिसके चश्मदीद अब बिरंची पद राय,कार्तिक साना,सुधाकांत राहा,पीयूष विश्वास,रोहिताश्व मल्लिक और शायद राधाकांत बाबू के भाई हेमनाथ जैसे इन गिने लोग ही जिंदा हैं।


आलम तो यह है कि अभी एमएलए रहे दो दो बार हमारे भाई प्रेमानंद महाजन,जिनके भाई नारायण महाजन दिनेशपुर हाईस्कूल से हमारे दोस्त रहे हैं हालतक।नारायण को रुद्रपुर में हमने फोन पर बुलाया उनकी छोटी बहन के घर से,वे न आये और न उनने दोबारा फोन किया।सविता साथ थी,उसे भी झटका लगा।


उनकी बहन और बहनोई पंचाननपुर के गांव के ही थे और बहनोई पुलिन गोलदार हमारे खासमखास रहे हैं जबकि उनके पिता मेरे पिता के खास दोस्त रहे हैं।


उनके घर में नदियां पार करके मेला देखने और दूसरे तमाम मामूली से मामूली वजह से हम बचपन में चले जाया करते थे।


एमएलए होने के बाद वे प्रेमानंद महाजन हमें पहचानने से इंकार कर रहे हैं।जबकि उत्तराखंड विधानसभा और मंत्रिमंडल में अनेक मंत्री हमारे पुरातन मित्र हैं।


एमएलए होने के बाद वे प्रेमानंद महाजन हमें पहचानने से इंकार कर रहे हैं।जबकि प्रदीप टमटा खास दोस्त हैं।काशी सिंह ऐरी भी।महेंद्र सिंह पाल दाज्यू सीनियर हैं,जबभी मिलते हैं बहुत ही प्यार से मिलते हैं। वयोवृद्ध नारायण दत्त तिवारी भी हमें पहचानने से इंकार नहीं करते हैं।केसी पंत की बात अलग थी।हम तो डूंगर सिंह बिष्ट,इंदिरा हरदयेश और प्रताप भैया को देखते रहे हैं।


मुख्यमंत्री हरीश रावत से हमारा कोी परिचय नहीं है और न किशोरी उपाध्याय हमें जान रहे थे।वे हमारे दाज्यू राजीवनयन बहुगुणा और शमशेर दाज्यू के मित्र हैं और मेरे दावे का उनने खंडन नहीं किया है।


इसलिए दीप्ति का मेरे घर इस तरह बरसना उस झटकेदार अनुभव से जिसके साथ दो परिवारों के करीब छह दशक की मित्रता कुर्बान हो गयी,बेहद सुखद है जैसे बेमौसम नैनीताल में हिमपात है।


हरेकृष्ण सुंदरपुर गांव के हैं और उस गांव के बच्चे बच्चे के साथ हमारी दोस्ती रही है सत्तर अस्सी के दशक में। तो बाकी तमाम गांवों का,बंगाली गांवों का ही नहीं,ढिमरी ब्लाक के तमाम सिखों,पहाड़ियों, बुक्सा,पूरबियों के गांवों के हर परिवार के परिजन की हैसियत से में उनमें शामिल रहा हूं मैं।


हमारे प्यार और वजूद का ,हमारे साझा चूल्हे का सिलसिला लेकिन उसी 1956 के आंदोलन के साथ शुरु हुआ।उस साझे चूल्हे की विरासत भूल रहे हैं लोग।जैसा बाकी देश में हो रहा है।


1956 के शरणार्थी आंदोलन और ढिमरी ब्लाक आंदोलन के वक्त भी बरेली के पीटीआई और पायोनियर के संवाददाता मुखर्जी दादा यानी एन एम मुखर्जी  के अलावा आस पास के जिलों में कोई पत्रकार थे नहीं।मुखर्जी दादा पिताजी के घनघोर मित्र थे जो तजिंदगी उनके साथ रहे। बरेली में अमरउजाला दौर में उनके परिजनों से भी हमारी मुलाकात हो गयी थी।नैनीताल के कामरेड हरीश ढौंढियाल और बरेली के एनएम मुखर्जी पिता के खास दोस्त रहे हैं।


हमारे घर सारे कागजात हमने पीटीआई के लिफाफे में देखे हैं,इतना घना रहा है वह रिश्ता।


पीटीआई से हमारा उम्रभर का साथ भी उसी रिश्ते की वजह से हुआ कि नहीं कहना मुश्किल है।


1956 के आंदोलन की वजह से बसंतीपुर,पंचाननपुर औक उदयनगर के गांव बने।स्कूल,अस्पताल,पशु चिकितच्सालय,आईटीआई बने।जिनमें से नारायण दत्त तिवारी ने अपने दिवंगत दर्जामंत्री चित्तरंजन राहा के नाम इंटर कालेज और अब हरीश रावत ने पिता पुलिनबाबू के नाम अस्पताल कर दिये।


शायद आगे राधाकांत बाबू और हरिपद विश्वास को भी याद करें लोग।जो हमारे पिता के कामरेड थे,जिनने तराई के किसानों की जमीन की लड़ाई लड़ी।


आज भूमि अधिग्रहण आर्डिनेंस से जो मेरे दिलोदिमाग में रक्तपात हो रहा है,उसमें मतुआ आंदोलन के जख्मी लहूलुहान हो जाने का अहसास जितना है,उससे ज्यादा तकलीफ हमारे आदिवासी परिजनों और पुरखों की हजारों साल की लड़ाइयां बेकार हो जाने की वजह से है।तमाम किसान आंदोलनों को गैरप्रासंगिक बना दिये जाने की वजह से है।1956 और 1958 की तराई की लड़ाइयां,ढठे और सातवें दशक के सारे जनांदोलनों के बेमतलब हो जाने का मातम मना रहा हूं मैं।


अब भूमि अधिग्रहण अबाध है।

अब विदेशी पूंजी और कालाधन अबाध है।यही है गीता महोत्सव।

यही है नये साल के जश्न का मतलब।


किसी की सुनवाई,किसी की सम्मति की कोई जरुरत नहीं है।


नियमागिरि की आदिवासी पंचायतों की राय अब बेमतलब है।


बेमतलब है,संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूचियां,वनाधिकार कानून,पंचायती राज कानून ,पर्यावरण कानून,समुद्र तट सुरक्षा कानून वगेैरह वगैरह।


1956 के बाद पुनर्वास के बावजूद बेदखल जमीन का दखल हासिल करने की  मेरे गांव के लोगों,मेरे पिता, बसंतीपुर में मेरे दोस्त कृष्णो के पिता गांव के शाश्वत प्रेसीडेंट मांदार बाबू,शाश्वत सेक्रेटरी अतुल शील और शाश्वत कैशियर शिशुवर मंडल की लड़ाई के बेमतलब हो जाने का दर्द है।

अब शायद,शायद बसंतीपुर को मैं बचा नहीं सकता।यह आशंका होने लगी है।


दिनेशपुर बेदखल है,तराई बेदखल है,उत्तराखंड बेदखल है।देश बेदखल हैं।


मैं असहाय देखता ही रहा।


अब मैं अपने गांव बसंतीपुर को बचा नहीं सकता।

शायद मेरा मिशन फेल हो गया है।

शायद मैं मर ही गया हूं।


दिल्ली में कड़कती सर्दियों में वे लोग खून जमा देने लवाली सर्दियों में श्मशान घाट में मुर्दों के साथ रात काटते हुए भी आखिरकार बसंतीपुर गांव मुकम्मल बसाने में कामयाब रहे। जिनमें मेरे पिता तो कमीज वगैरह भी नहीं पहनते थे।


सिर्फ गांधी की तरह धोती लपेटे पुलिन बाबू प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच जाते थे और उसी तरह हमारे डीएसबी कालेज और हम जिन अखबारों में काम करते रहे,खासकर  आवाज, प्रभात खबर,जागरण और अमर उजाला संपादकीय में भी वे जब तब दाखिल होचाते थे।नैनीताल समाचार में तो मेरी गैरहाजिरी में भी तजिंदगी वे आते जाते रहे हैं।जनसत्ता तक हालांकि वे कभी नहीं पहुंचे।


बसंतीपुर सिर्फ गांव नहीं है,सिर्फ रूपक नहीं है,जमीन के हक हकूक की लड़ाई का जीता जागता दस्तावेज भी है बसंतीपुर,जिसमें साझा चूल्हे की गर्मी और रोशनी दोनों है।



फिरभी उम्मीद है। वह साझा चूल्हा सलामत रहा तो हमारी मौत के बावजूद जिंदा रहेगा बसंतीपुर,जैसे वरदाकांत मंडल,हरि ढाली,मांदार मंडल,ललित गुसाई,राामेश्वर ढाली,चेचान मंडल,भुवन चक्रवर्ती,विष्णुपद दास,दुर्गापद अधिकारी ,गौरांग मंडल,अतुल शील,निवारण विश्वास,भोलानाथ मंडल,गणेश मंडल,निबारण साना जेसे पुलिनबाबू के साथियों के निधन के बावजूद.उनके बाद की पूरी एक पीढ़ी में सिर्फ कार्तिक साना,विधू अधिकारी और पुलिन गायेन के बचे रहने और हमारी पीढ़ी के सभापति मेरे हमदम मेरे दोस्त कृष्णो के असवान के बावजूद भी बचा हुआ है बसंतीपुर।


दीप्ति सुंदर मल्लिक का नाम स्कूल कालेज में दीप्ति सुंदर रहा है सिर्फ और लोग इस नाम से उसे अक्सर लड़की समझते रहे हैं और हम बचपन से इसका मजा भी लेते रहे हैं।


जात्रा में वह नारी पात्रों के लिए अभिनय करता रहा है।मैं हीरो हुआ तो हिरोइन का रोल उसका होता रहा है।इस चमत्कार से तो जीआईसी में दाखिला के वक्त हमारे गुरुजी दिवंगत हरीशचंद्र सती भी चकमा खा गये।बोले,यहां लड़कियों का एडमिशन नहीं होता।


दीप्ति को उठकर खड़ा होकर स्पष्ट करना पड़ा कि वह लड़की नहीं है।


वह बेहतरीन बाल कलाकार रहा है।लोक उत्सवों में वह बचपन से तराई में मुख्य आकर्षण रहा है।


बसंतीपुर,पंचानन पुर और उदयनगर के संबंध गर्भनाल का संबंध रहा है।इन गांवों के हर परिवार से हर परिवार का रिश्ता रहा है।


इसे यूं समझिये कि विवाह के बाद परंपरागत द्विरागमन की रस्म सविता और मैंने दीप्ति के घर पंचाननपुर में निभाय़ी थी,उसके मायके बिजनौर में नहीं।


सर्दी इतनी कड़क हो गयी है कि सारा देश शुतूरमुर्ग है


सिनेमा कानून बदल रहा है।सारे बागी ईमेल आईडी डीएक्टिवेट कर दिये जायेंगे।फेसबुक दीवाल पर रोने चीखने से इस गैस चैंबर की दीवाले नहीं टूटने वाली है।सर्दी इतनी कड़क हो गयी है कि सारा देश शुतूरमुर्ग है और कोई कहीं अपने दड़बे से निकलकर सड़क पर नहीं उतरने वाला है।केसरिया उन्माद निरंकुश है।


पाकिस्तान से आये सिखों और हिंदुओं को महज नागरिकता,पूर्वी बंगाल के विभाजन पीड़ित हिंदू 15 अगस्त , 1947 से बेनागरिक लेकिन अपने ही देश में  विस्थापित कश्मीरी पंडितों को न सिर्फ  चालीस चालीस लाख के प्लेट बांटे जा रहे हैं,न सिर्फ उनके पुनर्वास के लिए पांच सौ करोड़ एक मुश्त ,कश्मीर घाटी में  तीन फीसद तक ठहरी मोदी सुनामी को कश्मीरी पंडितो की सरकार में बदलने के लिए कश्मीर को बांग्लादेश बनाने में लगी है भारत की शत प्रतिशत हिंदुत्व की सरकार।



हिंदू साम्राज्यवादी इतिहास दृष्टि से हमारी इतिहास दृष्टि जाहिर है कि भिन्न है जो वामपंथी नजरिये से खरी हो यह जरुरी भी नहीं है।


मसलन खासकर आज के दिन वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता S.r. Darapuri  ने फेसबुक दीवाल पर यह आम जो पोस्ट शेयर किया है,बहुजन अपढ़ अधपढ़ समाज  की भाषा ही मैं लिख पढ़ रहा हूं और कुलीनत्व का दावा हरगिज मेरा है नहीं।

कोरेगांव का स्मारक दलितों की शौर्यगाथा का प्रतीक है. 1 जनवरी 1818 को 500 महार सैनिकों ने अंग्रेजों की तरफ से लड़ते हुए 28,000 पेशवाई सैनिकों को हराकर आततायी पेशवा हिन्दू राज का अंत किया था.

डॉ. आंबेडकर पहली जनवरी को दलितों की शौर्य गाथा का स्मरण करने और शहीद दलित सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए कोरेगांव जाया करते थे.

भिमा कोरेगाव की लडाई सन १ जनवरी १८१८

Bheem Sangh with Tarun Kumar Gautam

भिमा कोरेगाव की लडाई सन १ जनवरी १८१८

"भीमा नदी" के तट पर बसा, गाँव 'भीमा – कोरेगांव', पुणे ( महाराष्ट्र ) 01 जनवरी 1818 का 'ठंडा' दिन, दो 'सेनाएं', आमने - सामने, 28000 सैनिकों सहित 'पेशवा बाजीराव – ( II ) 2', के विरूद्ध 'बॉम्बे नेटिव लाइट इन्फेंट्री' के 500 मूलनिवासी 'महार' सैनिक, 'ब्राह्मण' राज बचाने की फिराक में 'पेशवा', तथा दूसरी ओर 'पेशवाओं' के, पशुवत 'अत्याचारों' से 'बदला' चुकाने की 'फिराक' में, गुस्से से तमतमाए " 500 मूलनिवासी महार " घमासान 'युद्ध' और 'ब्रह्मा' के मुँह से 'जनित' ( पैदा हुए ) 'पेशवा' की शर्मनाक 'पराजय, इस युद्ध में वीरगती प्राप्त २२ सैनिको को तथा उन सभी मूलनिवासी 'महार' (पूर्वजों) को 'शत शत नमन, जिन्होंने गुलामी की जंजीरो को तोड़कर, मनुवादियों के सत्ता का खात्मा किया.

१)सोमनाक

२)कमलनाक नाईक

३)रामनाक येसनाक नाईक

४)भागनाक हरनाक

५)गोदनाक कोठेनाक

६)रामनाक येसनाक

७)अंबरनाक काननाक

८)गणनाक बालनाक

९)कालनाक कोंड्नाक

१०)रुपनाक लखनाक

११)वपनाक रामनाक

१२)विटनाक धामनाक

१३)गणनाक

१४)वपनाक हरनाक

१५)रेनाक वाननाक

१६)गणनाक धर्मनाक

१७)देवनाक आननाक

१८)रामनाक

१९)गोपालनाक बालनाक

२०)हरनाक

२१)जेटनाक धैनाक

२२)गणनाक लखनाक

1 ) उस 'हार' के बाद, 'पेशवाई' खतम हो गयी थी |

2 ) अंग्रेजो' को इस भारत देश की, 'सत्ता' मिली |

3 ) अंग्रेजो' ने इस भारत देश में, 'शिक्षण' का प्रचार किया, जो 'हजारो' सालों से, 'बहुजन' SC,ST,OBC समाज के लिए 'बंद' था |

4 ) महात्मा फुले' पढ़ पाए, और इस देश की जातीयता 'समज' पाऐ |

5 ) अगर 'महात्मा फुले' न पढ़ पाते, तो 'शिवाजी महाराज' की 'समाधी' कोण 'ढूँढ' निकलते |

6 ) अगर 'महात्मा फुले' न 'पढ़' पाते, तो 'सावित्री बाई' कभी इस देश की प्रथम 'महिला शिक्षिका' न बन सकती थी |

7 ) अगर 'सावित्री बाई', न 'पढ़' पाई होती तो, इस देश की 'महिला' कभी न पढ़ पाती |

8 ) शाहू महाराज', 'आरक्षण' कभी न दे पाते |

9 ) डॉ. बाबा साहब', कभी न 'पढ़' पाते , और मनुस्मुर्ति का दहन कर बहुजन हिताय बहुजन सुखाय, मानवतावादी "संविधान" हमें ना मिलता.

10 ) मा. कांशीरामजी नहीं हो पाते और वो SC,ST,OBC को एक सूत्र में नहीं जोड़ पाते.

11) अगर 1 जनवरी, 1818 को, 500 'महार' सैनिकों ने 28,000 'ब्राम्हण' (पेशवाओं ) को, मार न डाला होता तो .............. आज हम लोग कहा पे रहते.......

अगर मनुवादियों की गुलामी न होती तो मूलनिवासियो के हाथों में तलवार होती और भारत पर कोई भी कभी भी आक्रमण करने की कोशिश नहीं करता.

सम्राट अशोक से शिवाजी महाराज , शाहू महाराज तक हमारे मुट्ठी भर आदमी मनुवादियों पर भारी रहे, इसीलिए बाबासाहब ने कहा था "जो कोम अपना इतिहास नहीं जानती वो कोम कभी अपना इतिहास नहीं बना सकती।" अगर हम हमारे इतिहास को नहीं जानेंगे तो हमे कभी भी कुछ करने की प्रेरणा नहीं मिलेगी।

उन्हें मौका मिला था उन्होंने कर दिखाया, आज समय वही है पर हथियार बदल गया है, हमें मौका मिला है, हम खुद और अपने लोगो को ज्यादा से ज्यादा जागरूक करके समाज में शिक्षा, समानता और बंधुता को अपनाके अपने हुकमरान पैदा करे, और पूरी तरह समर्पित होकर मिशन का कार्य करे ,यही उन शहीदो को हमारे तरफ से सच्ची श्रद्धांजलि होगी.


मसलन

Siddharth Gaikwad का यह मराठी में लिखा पोस्ट

बौद्ध सम्राट अशोक - एक आदर्श धम्मप्रचारक....

सम्राट अशोक हा मौर्य घराण्यातील प्रसिद्ध सम्राट होता. त्याने भारतावर इ.स.पूर्व २७२ - इ.स.पूर्व २३२ च्या दरम्यान राज्य केले. आपल्या सुमारे ४० वर्षांच्या विस्तृत राज्यकाळात त्याने पश्चिमेकडे अफगाणिस्तानव थोडा इराण, पूर्वेकडे आसाम तर दक्षिणेकडे म्हैसूरपर्यंत आपला राज्यविस्तार केला. अशोकाला भारताच्या इतिहासात सर्वात महान सम्राटाचे स्थान दिले आहे. असे मानतात की प्राचीन भारताच्या परंपरेत चक्रवर्ती सम्राटाची पदवी फक्त महान सम्राटांना दिली ज्यांनी जनमानसावर तसेच भारताच्या मोठ्या भूभागावर राज्य केले. भारताच्या इतिहासात असे अनेक चक्रवर्ती सम्राट होउन गेले ज्यांचे उल्लेख प्राचीन ग्रंथांमध्ये (रामायण महाभारत इत्यादी) आहेत परंतु त्यांच्या अस्तित्वा बाबतची साशंकता आहे. ( नहुष, युधिष्ठिर इत्यादी). असे मानतात की प्राचीन चक्रवर्ती सम्राटांच्या पंक्तीतील अशोक हा शेवटचा चक्रवर्ती सम्राट झाला त्यानंतर कोणीही त्या तोडीचा राज्यकर्ता भारतात झाला नाही. अशोकाने भारताच्या बहुतांशी भागावर राज्य केले. पाकिस्तान अफगणिस्तान पूर्वे कडे बांग्लादेश ते दक्षिणेकडे केरळ पर्यंत अशोकाच्या साम्राज्याच्या सीमा होत्या. कलिंगाच्या युद्धातील महासंहारानंतर कलिंग काबीज झाला जे कोणत्याही मौर्य राज्यकर्त्यास पूर्वी जमले नव्हते. त्याच्या राज्याचे केंद्रस्थान मगध होते. ज्याला आजचा बिहार म्हणतात व पाटलीपूत्र त्याची राजधानी होती. ज्याला आज पटना नाव आहे. काही इतिहासकारांच्या मते यात साशंकता आहे. शोकाने कलिंगचे युद्ध पार पडल्यानंतर जिकलेल्या रणांगणाची व शहरांची पहाणी करायची ठरवली, व त्यावेळेस त्याने पाहिले ते फक्त सर्वत्र पडलेले प्रेतांचे ढीग, सडणाच्या दुर्गंध, जळलेली शेती, घरे व मालमत्ता. हे पाहून अशोकाचे मन उदास झाले व यासाठीच का मी हे युद्ध जिंकले व हा विजय नाहीतर पराजय आहे असे म्हणून त्या प्रचंड विनाशाचे कारण स्वता:ला मानले. हा पराक्रम आहे की दंगल, व बायका मुले व इतर अबलांचा हत्या कशासाठी व यात कसला प्रराक्रम असे स्वता:लाच प्रश्ण विचारले. एका राज्याची संपन्नता वाढवण्यासाठी दुसऱ्या राज्याचे अस्तित्वच हिरावून घ्यायचे. ह्या विनाशकारी युद्धानंतर शांती, अहिंसेचा, प्रेम दया ही मूलभूत तत्त्वे असलेला बौद्ध धर्मियांचा मार्ग अशोकाने अवलंबायचे ठरवले व तसेच त्याने स्वता.ला बौद्ध धर्माचा प्रसारक म्हणूनही काम करायचे ठरावले. या नंतर अशोकाने केलेले कार्य त्याला इतर कोणत्याही महान सम्राटांपेक्षा वेगळे ठरवतात. इतिहासातील एक अतिशय वेगळी घटना ज्यात क्रूरकर्मा राज्यकर्त्याचे महान दयाळू सम्राटात रुपांतर झाले. बौद्द धम्माचा जगभर झालेल्या प्रसारास खूप मोठ्या प्रमाणावर अशोकाने केलेले कार्य जवाबदार आहे.

कलिंगाच्या युद्धात झालेल्या मनुष्यहानी पाहून त्याने हिंसेचा त्याग केला व बौद्ध धामाचा स्वीकार केला व नंतरच्या आयुष्यात त्याने स्वता:ला बौद्ध धम्माच्या प्रसारास समर्पित केले. अशोकाच्या संदर्भातील हजारो शिलालेख भारताच्या काना कोपर्या्त सापडतात त्यामुळे अशोकाबाबतची ऐतिहासीक माहीती भारताच्या प्राचीन कालातल्या कोणत्याही ऐतिहासीक व्यक्तीपेक्षा जास्त आहे.

ह्या महान धम्मसम्राटाच्या सलाम....जय भीम.

बौद्ध सम्राट अशोक - एक आदर्श धम्मप्रचारक....    सम्राट अशोक हा मौर्य घराण्यातील प्रसिद्ध सम्राट होता. त्याने भारतावर इ.स.पूर्व २७२ - इ.स.पूर्व २३२ च्या दरम्यान राज्य केले. आपल्या सुमारे ४० वर्षांच्या विस्तृत राज्यकाळात त्याने पश्चिमेकडे अफगाणिस्तानव थोडा इराण, पूर्वेकडे आसाम तर दक्षिणेकडे म्हैसूरपर्यंत आपला राज्यविस्तार केला. अशोकाला भारताच्या इतिहासात सर्वात महान सम्राटाचे स्थान दिले आहे. असे मानतात की प्राचीन भारताच्या परंपरेत चक्रवर्ती सम्राटाची पदवी फक्त महान सम्राटांना दिली ज्यांनी जनमानसावर तसेच भारताच्या मोठ्या भूभागावर राज्य केले. भारताच्या इतिहासात असे अनेक चक्रवर्ती सम्राट होउन गेले ज्यांचे उल्लेख प्राचीन ग्रंथांमध्ये (रामायण महाभारत इत्यादी) आहेत परंतु त्यांच्या अस्तित्वा बाबतची साशंकता आहे. ( नहुष, युधिष्ठिर इत्यादी). असे मानतात की प्राचीन चक्रवर्ती सम्राटांच्या पंक्तीतील अशोक हा शेवटचा चक्रवर्ती सम्राट झाला त्यानंतर कोणीही त्या तोडीचा राज्यकर्ता भारतात झाला नाही. अशोकाने भारताच्या बहुतांशी भागावर राज्य केले. पाकिस्तान अफगणिस्तान पूर्वे कडे बांग्लादेश ते दक्षिणेकडे केरळ पर्यंत अशोकाच्या साम्राज्याच्या सीमा होत्या. कलिंगाच्या युद्धातील महासंहारानंतर कलिंग काबीज झाला जे कोणत्याही मौर्य राज्यकर्त्यास पूर्वी जमले नव्हते. त्याच्या राज्याचे केंद्रस्थान मगध होते. ज्याला आजचा बिहार म्हणतात व पाटलीपूत्र त्याची राजधानी होती. ज्याला आज पटना नाव आहे. काही इतिहासकारांच्या मते यात साशंकता आहे. शोकाने कलिंगचे युद्ध पार पडल्यानंतर जिकलेल्या रणांगणाची व शहरांची पहाणी करायची ठरवली, व त्यावेळेस त्याने पाहिले ते फक्त सर्वत्र पडलेले प्रेतांचे ढीग, सडणाच्या दुर्गंध, जळलेली शेती, घरे व मालमत्ता. हे पाहून अशोकाचे मन उदास झाले व यासाठीच का मी हे युद्ध जिंकले व हा विजय नाहीतर पराजय आहे असे म्हणून त्या प्रचंड विनाशाचे कारण स्वता:ला मानले. हा पराक्रम आहे की दंगल, व बायका मुले व इतर अबलांचा हत्या कशासाठी व यात कसला प्रराक्रम असे स्वता:लाच प्रश्ण विचारले. एका राज्याची संपन्नता वाढवण्यासाठी दुसऱ्या राज्याचे अस्तित्वच हिरावून घ्यायचे. ह्या विनाशकारी युद्धानंतर शांती, अहिंसेचा, प्रेम दया ही मूलभूत तत्त्वे असलेला बौद्ध धर्मियांचा मार्ग अशोकाने अवलंबायचे ठरवले व तसेच त्याने स्वता.ला बौद्ध धर्माचा प्रसारक म्हणूनही काम करायचे ठरावले. या नंतर अशोकाने केलेले कार्य त्याला इतर कोणत्याही महान सम्राटांपेक्षा वेगळे ठरवतात. इतिहासातील एक अतिशय वेगळी घटना ज्यात क्रूरकर्मा राज्यकर्त्याचे महान दयाळू सम्राटात रुपांतर झाले. बौद्द धम्माचा जगभर झालेल्या प्रसारास खूप मोठ्या प्रमाणावर अशोकाने केलेले कार्य जवाबदार आहे.  कलिंगाच्या युद्धात झालेल्या मनुष्यहानी पाहून त्याने हिंसेचा त्याग केला व बौद्ध धामाचा स्वीकार केला व नंतरच्या आयुष्यात त्याने स्वता:ला बौद्ध धम्माच्या प्रसारास समर्पित केले. अशोकाच्या संदर्भातील हजारो शिलालेख भारताच्या काना कोपर्या्त सापडतात त्यामुळे अशोकाबाबतची ऐतिहासीक माहीती भारताच्या प्राचीन कालातल्या कोणत्याही ऐतिहासीक व्यक्तीपेक्षा जास्त आहे.  ह्या महान धम्मसम्राटाच्या सलाम....जय भीम.

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Aam Aadmi Party

December 30, 2014 at 5:59pm ·

भाजपा की केंद्र सरकार दिल्ली में अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने से संबंधित अध्यादेश के बारे में लोगों को गलत सूचना दे रही है।

आज मीडिया के एक वर्ग में गलत जानकारी प्रकाशित हुई है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अनधिकृत कालोनियों को राहत देने के लिए संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी है।

जबकि सच्चाई यह है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा न तो किसी अध्यादेश को मंजूरी दी गई है और न ही किसी तरह के कानून को लागू किया गया है।

नरेंद्र मोदी सरकार ने भी पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार के स्वांग दोहराने की कोशिश की है। मौजूदा केंद्र सरकार ने भी केवल समय सीमा की तारीख बदलकर इन कालोनियों में रहने वाले गरीब लोगों को मूर्ख बनाने की कोशिश की है।

आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार को चुनौती देती है कि वह उन सभी अनधिकृत कालोनियों की सूची को सार्वजनिक करे जिन्हें नियमित करने की घोषणा की है और यह भी बताए कि वे कब तक नियमित होंगी।

सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है।

अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले इन तथ्यों पर गौर करना भी जरूरी है-

1) सबसे पहले, घर के मालिकों को कानूनन मालिकाना हक देने से पहले भूमि के उपयोग से संबंधित कानून में परिवर्तन किया जाना जरूरी है।

2) दिल्ली में ज्यादातर अनधिकृत कालोनियां डीडीए और एएसआई की भूमि के अलावा कृषि भूमि व वन भूमि पर बसी हैं। इन एजेंसियों के साथ भी इनकी जमीनों से संबंधित उपनियमों में परिवर्तन किया जाना जरूरी है। केंद्र सरकार ने क्या अब तक इस दिशा में किसी तरह के कदम उठाए हैं?

3) क्या केंद्र सरकार इसकी गारंटी दे सकती है कि उसकी इस घोषणाभऱ से इन कालोनियों में बिजली पानी के अलावा दूसरी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था भी हो जाएगी?

केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने ऐसा कोई रोडमैप भी तैयार नहीं किया है कि अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की उसकी घोषणा शीला दीक्षित सरकार से किस तरह अलग है? शीला दीक्षित सरकार ने भी अनिधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा की थी। लेकिन जिस तरह इऩ कॉलोनियों के बाशिंदो को उनके घरों के कानूनन हक दिए बगैर प्रोविजनल सर्टिफिकेट बांटे गए वह महज एक घोटाला ही साबित हुआ।

क्या शहरी विकास राज्य मंत्रालय बता सकता है कि इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की दिशा में उसकी क्या पहल होगी ? और क्या वह इस बात से इंकार कर सकता है कि इन कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा महज चुनाव के पहले की जनता को लुभाने की नौटंकी भर है।

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The BJP's central government has attempted to spread misinformation about the ordinance to regularise the unauthorised colonies in Delhi. It has been wrongly reported in a section of the media that the union cabinet approved an ordinance to provide relief to the unauthorised colonies.

The fact is that no ordinance has been approved by the union cabinet and its decision has no force of law to implement it. The Narendra Modi government has merely repeated the farce of former Sheila Dikshit government and has fooled the poor people living in these colonies by merely changing the deadline date.

The Aam Aadmi Party challenges the central government to make public the list of unauthorised colonies which it will regularise and till which date.

The fact is that the central government has not followed the proper procedure which was required before going ahead with the announcement to regularise these colonies.

The announcement had to be preceded with some of the mandatory measures which are:

1) First of all, change of land use was to be done to allow the house owners to become legal owners.

2) Unauthorised colonies in Delhi are mainly on agricultural land, forest land and land owned by the DDA and ASI. Changes in bye-laws dealing with these agencies will have to be done. Has the Central government taken any steps so far?

3) Can the Centre guarantee that its announcement will lead to provision of basic facilities in these colonies – which include electricity and water?

The union urban development ministry has so far not provided any roadmap of how its announcement is different from that of the Sheila Dikshit government, which eventually turned out to be a scam, since provisional certificates were distributed without providing legal ownership to the residents of unauthorised colonies.

Can the UD ministry state how will it proceed to regularise the unauthorised colonies and can it deny that its announcement is merely a pre-election gimmick ?

भाजपा की केंद्र सरकार दिल्ली में अनधिकृत कालोनियों को नियमित करने से संबंधित अध्यादेश के बारे में लोगों को गलत सूचना दे रही है।     आज मीडिया के एक वर्ग में गलत जानकारी प्रकाशित हुई है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अनधिकृत कालोनियों को राहत देने के लिए संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी है।  जबकि सच्चाई यह है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा न तो किसी अध्यादेश को मंजूरी दी गई है और न ही किसी तरह के कानून को लागू किया गया है।    नरेंद्र मोदी सरकार ने भी पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार के स्वांग दोहराने की कोशिश की है। मौजूदा केंद्र सरकार ने भी केवल समय सीमा की तारीख बदलकर इन कालोनियों में रहने वाले गरीब लोगों को मूर्ख बनाने की कोशिश की है।  आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार को चुनौती देती है कि वह उन सभी अनधिकृत कालोनियों की सूची को सार्वजनिक करे जिन्हें नियमित करने की घोषणा की है और यह भी बताए कि वे कब तक नियमित होंगी।   सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है।    अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा से पहले इन तथ्यों पर गौर करना भी जरूरी है-  1) सबसे पहले, घर के मालिकों को कानूनन मालिकाना हक देने से पहले भूमि के उपयोग से संबंधित कानून में परिवर्तन किया जाना जरूरी है।   2) दिल्ली में ज्यादातर अनधिकृत कालोनियां डीडीए और एएसआई की भूमि के अलावा कृषि भूमि व वन भूमि पर बसी हैं। इन एजेंसियों के साथ भी इनकी जमीनों से संबंधित उपनियमों में परिवर्तन किया जाना जरूरी है। केंद्र सरकार ने क्या अब तक इस दिशा में किसी तरह के कदम उठाए हैं?  3) क्या केंद्र सरकार इसकी गारंटी दे सकती है कि उसकी इस घोषणाभऱ से इन कालोनियों में बिजली पानी के अलावा दूसरी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था भी हो जाएगी?    केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने ऐसा कोई रोडमैप भी तैयार नहीं किया है कि अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की उसकी घोषणा शीला दीक्षित सरकार से किस तरह अलग है?  शीला दीक्षित सरकार ने भी अनिधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा की थी। लेकिन जिस तरह इऩ कॉलोनियों के बाशिंदो को उनके घरों के कानूनन हक दिए बगैर प्रोविजनल सर्टिफिकेट बांटे गए वह महज एक घोटाला ही साबित हुआ।     क्या शहरी विकास राज्य मंत्रालय बता सकता है कि इन अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की दिशा में उसकी क्या पहल होगी ? और क्या वह इस बात से इंकार कर सकता है कि इन कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा महज चुनाव के पहले की जनता को लुभाने की नौटंकी भर है।   ||  The BJP's central government has attempted to spread misinformation about the ordinance to regularise the unauthorised colonies in Delhi. It has been wrongly reported in a section of the media that the union cabinet approved an ordinance to provide relief to the unauthorised colonies.    The fact is that no ordinance has been approved by the union cabinet and its decision has no force of law to implement it. The Narendra Modi government has merely repeated the farce of former Sheila Dikshit government and has fooled the poor people living in these colonies by merely changing the deadline date.  The Aam Aadmi Party challenges the central government to make public the list of unauthorised colonies which it will regularise and till which date.    The fact is that the central government has not followed the proper procedure which was required before going ahead with the announcement to regularise these colonies.  The announcement had to be preceded with some of the mandatory measures which are:    1)  First of all, change of land use was to be done to allow the house owners to become legal owners.    2)  Unauthorised colonies in Delhi are mainly on agricultural land, forest land and land owned by the DDA and ASI. Changes in bye-laws dealing with these agencies will have to be done. Has the Central government taken any steps so far?    3) Can the Centre guarantee that its announcement will lead to provision of basic facilities in these colonies – which include electricity and water?    The union urban development ministry has so far not provided any roadmap of how its announcement is different from that of the Sheila Dikshit government, which eventually turned out to be a scam, since provisional certificates were distributed without providing legal ownership to the residents of unauthorised colonies.    Can the UD ministry state how will it proceed to regularise the unauthorised colonies and can it deny that its announcement is merely a pre-election gimmick ?



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