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Dr.B.R.Ambedkar

Tuesday, January 14, 2014

जो जीता वही मुक्त बाजार का सिकंदर। प्रधानमंत्री चाहे कोई बनें,वे मुक्त बाजार के ही प्रधानमंत्री होंगे,भारतीय जन गण मन के नहीं।हालात जनसंहारी नहीं बदलेंगे। AAP says no to FDI in multi-brand retail in Delhi

जो जीता वही मुक्त बाजार का सिकंदर। प्रधानमंत्री चाहे कोई बनें,वे मुक्त बाजार के ही प्रधानमंत्री होंगे,भारतीय जन गण मन के नहीं।हालात जनसंहारी नहीं बदलेंगे।


AAP says no to FDI in multi-brand retail in Delhi


पलाश विश्वास

मित्रों,   आप  सत्ता में आते ही आपको याद होगा कि हमने लिखा था कि अगर आप कारपोरेट राज के खिलाफ है तो वह कम से कम दिल्ली में कारपोरेट जनसंहार के मुख्य हथियार असंवैधानिक बायोमेट्रिक डिजिटल रोबोडिक सीआईए नाटो प्रिज्मिक ड्रोनतांत्रिक आधार प्रकल्प को फौरन खारिज कर दें। अमलेंदु ने इस हस्तक्षेप पर तुरंत लगा भी दिया था।हम क्या करें कि हस्तक्षेप के अलावा हम कहीं अपनी बात कह नहीं पा रहे हैं।लगता है कि सारे मित्र हमसे नाराज हैं।


जिस वेबसाइट के जरिये वे जनसुनवाई कर रहे हैं,वहां मैं अपने लिखे का हर लिंक दे रहा हूं जैसे बंगाल और देश के बारे में लिखे हर लिंक को मैं नेटपर उपलब्ध सत्ता विपक्ष के सिपाहसालारों मसलन ममता बनर्जी,अखिलेश यादव,शरद यादव ,लालू यादव,राम विलास पासवान से लेकर रामदास अठावले,उदित राज तक के वाल या संदेश बाक्स में रोज चस्पां करता हूं।इसके अलावा भारत सरकार,तमाम राज्य सरकारों,तमाम मुख्यमंत्रियों,पक्ष प्रतिपक्ष के नेताओं, सांसदों, सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग,तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं,संपादकों और पत्रकारों को अलग से समूचा दस्तावेज भेजता हूं रोज ईमेल से।


दरअसल यह हमारे पिताश्री के काम का तरीका है।स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय समस्याओं पर वे रोज मुझसे लिखवाते थे ,उनको रुद्रपुर से टाइप करवाते थे फिर रजिस्टर्ड एकनाजलेजमेंट डाक से उन्हें भेजने की रोज की कवायद होती थी।


हम पिताजी की उसी बुरी आदत को डिजिटल तरीके से दोहरा रहे हैं।उनको भारी लागत पड़ती थी,लेकिन यह मेरा रोजाने का निःशुल्क कामकाज है।खर्च केबल लाइन किराया और बिजली बिल का है। पिताजी के मुकाबले कम पेचीदा है यह मामला।बसंतीपुर से साइकिल दौड़ रोजाने की रुद्रपुर मंजिल की कष्टकारी नहीं है यह।जिन्हें मेरा मेल रोजाना मिलता है या जिन्हें अपने वाल की पवित्रता का ख्याल है,उन्हें जरुर कष्ट है।


लगभग दस साल से आप के मुख्य नीतिनिर्धारक योगेंद्र यादव जी से हमारा थोड़ा बहुत संवाद वाया याहू ग्रुप जमाने से लेकर अब तक रहा है।लेकिन आम आदमी के तमाम ऐप्पस पर दस्तक देते रहने के बावजूद आधार मामले में या दूसरे तमाम मुद्दों पर उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं है।अब तो आप टीम में बड़ी संख्या में हमारे रंग बिरंगे मित्रगण भी विराजमान हैं,जिनसे दशकों से हमारा संवाद रहा है।लेकिन हमारे लिखे या कहे पर उनकी ओर से सन्नाटा है।


बंगाल विधानसभा में आधार के खिलाफ सर्वदलीय प्रस्ताव पारित होने के बाद हमने गोपाल कृष्ण जी से निवेदन किया था कि हम लगभग पूरे पिछले दशक के साथ आधारविरोधी अभियान चलाकर इसे जनांदोलन बनाने में नाकाम रहे हैं और बिना राजनीतिक भागेदारी के इसे जनांदोलन बनाना भी असंभव है।


हमारा सुझाव था कि चूंकि बंगाल में पहला प्रतिवाद हुआ है और ममता बनर्जी भी इसके खिलाफ मुखर हैं तो दिल्ली में बंगाल के सांसदों नेताओं से संवाद करके कम से कम बंगाल में आधार को खारिज करने के लिए उनसे कहा जाये।इसके अलावा इस सिलसिले में भारतीय भाषाओं में अब तक उपलब्ध सारी सामग्री सोशल मीडिया मार्फत जारी कर दिया जाये।उन्होंने तब ऐसा ही करने का वायदा भी किया था।


कल रात ही हमें अपने सहकर्मियों के मार्फत मालूम चला कि बंगाल में अब कोलकाता और जनपदों में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के मार्फत आधार कार्ड बनवाने का अभियान चल रहा है।जो लोग कारपोरेट दुकानों से आधार हासिल कर चुके हैं,उन्हें भी स्थानीय निकायों से नोटिस मिल रहा है कि आधार के लिए अपनी अपनी दसों उंगलियां और पुतलियां सरकारो के हवाले कर दें क्योंकि यह अनिवार्य है।


देश भर में सुप्रीम कोर्ट की मनाही के बावजूद अनिवार्य नागरिक सेवाओं के साथ आधार को नत्थी कर दिया गया है।अब एनपीआर के तहत आधार अनिवार्यता के इस फतवे के बाद नागरिकों के लिए आधार बनवाये बिना युद्धबंदी हैसियत से रिहाई की कोई संभावना नहीं है।


आज सुबह भी गोपाल कृष्ण जी से लंबी बातचीत हुई और मैंने कहा कि अब तो हमें भी आधार बनवाने की नौबत पड़ सकती है कि क्योंकि बाजार दर पर तमाम नागरिक सेवाएं खरीदने की क्रयशक्ति हमारी नहीं है और महज जीवित रहने के लिए जो चीजें जरुरी है,वह अब आधार बिना मिलेंगी नहीं।जब दस साल तक आधार के खिलाफ अभियान चलाने के अनुभव के बावजूद हमारी यह असहाय युद्धबंदी जैसी स्थिति है तो पूरे तंत्र से अनजान नागरिकों का क्या विकल्प हो सकता है,समझ लीजिये।


गोपाल कृष्ण जी से बात करने से पहले सुबह का इकोनामिक टाइम्स देख लिया था और दिल्ली में मल्टी ब्रांड खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के निषेध संबंधी खबर और आप पर पोपुलिज्म आरोपित तमाम आलेखों को पढ़ चुका था।


हमने दोहराव और अनिवार्यता की सूचनाएं देने के बाद गोपाल जी से कहा कि अब हमारे हाथों से बालू की तरह समय फिसल रहा है और हम कोई प्रतिरोध कर नहीं सकते, जबतक कि आम बहुसंख्य जनता को हम जागरुक न बना लें।


यह बात हमने आज अमलेंदु से भी कहा कि मुद्दों को टाले बिना उन्हें तत्काल आम जनता तक संप्रिषित करने का हमारा कार्यभार है।कल आननंद तेलतुंबड़े से कम से कम चार बार इसी सिलसिले में विचार विमर्श हुआ तो मुंबई और देश के दूसरे हिस्सों के साथियों से यही बातें रोज हो रही हैं।कल भी हुईं और आज भी।लिखते हुए बार बार व्यवधान होने के बावजूद बहुपक्षीय संवाद का यह माध्यम मुझे बेहतर लगता है और तमाम मित्रों से लगातार ऐसा संवाद जारी रखने का आग्रह है।


गोपाल जी से हमने कहा कि बंगाल सरकार को आधार के खिलाफ कदम उठाने के लिए उनके सामने यह मामला सही परिप्रेक्ष्य में रखने की जरुरत है।फिर हमने कहा कि आप में जो लोग हैं और जो नये लोग पहुंच रहे हैं,हम उन्हें दशकों से जानते हैं।अगर वे मल्टीब्रांड खुदरा बाजार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का निषेध कर सकते हैं तो आधार का निषेध क्यों नहीं कर सकते।


इसके जवाब में उन्होंने जो कहा ,उससे हमारे तोते उड़ गये।उन्होंने कहा कि आधार मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल और योगेंद्र यादव समेत आप सिपाहसालारों से उनकी बातचीत हो गयी है और वे लोग आधार के पक्ष में हैं।


हालांकि यह आसमान से गिरने वाली बात नहीं है कोई क्योंकि तमाम एनजीओ के मठाधिकारी खास आदमी के कायकल्प से आम आदमी के अवतार बने लोगों के सामाजिक सरोकार के तमाम सरकारी कार्यक्रम,परियोजनाएं,अधिकार केंद्र सरकार के अनुदान और वैश्विक व्यवस्था के शीर्ष संस्थानों के डोनेशन और सामाजिक क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी थोक विनिवेश से चलने वाले हैं।ये ही उनकी राजनीति के कारपोरेट संसाधन के मुख्य आधार हैं।हमने अपने उच्च विचार गोपाल जी को बता दिये।


अब फेसबुक वाल पर अपने भाई दिलीप मंडल और मित्र रियाजुल हक ने इस सिलसिले में कुछ और प्रकाश डाला है,उसे भी साझा कर रहा हूं।


लेकिन इससे पहले एक सूचना बेहद जरूरी है।


कल रात हमारे एक सहकर्मी ने अंबेडकर का लिखा पढ़ने की इच्छा जतायी।हमने सीधे अंबेडकर डाट आर्ग खोल दिया तो पता चला वह साइट हैक हो गया। तो एन्निहिलिसन आफ कास्ट,प्रोब्लेम आफ रुपी, रिडल्स इन हिंदुइज्म जैसे पुस्तकनामों से गुगल सर्च से नेट पर उपलब्ध सामग्री खोजने की कोशिशें की तो पता चला अंबेडकर का लिखा कुछ भी नेट पर हासिल नहीं है। जैसे वीटी राजशेखर के दलित वायस का ह हुआ वैसे ही अंबेडकर साहित्य का।


तब रात साढे बारह बजे थे।हमें मालूम था कि आनंद तेलतुंबड़े रांची के लिए देर रात खड़गपुर से गाड़ी पकड़ने वाले हैं तो जगे ही होंगे।हमने उन्हें मोबाइल पर पकड़ा और स्थिति बतायी। उन्होंने कहा कि ऐसा तो होगा ही।लेकिन हमारे पास इसका तोड़ है।दस साल पहले हमने सारा साहित्य लोड कर दिया।उड़ गया तो एकबार फिर नेट पर लोड कर दिया जायेगा।दो तीन दिन का वक्त लगेगा।


गनीमत है कि हमारे पास आनंद तेलतुंबड़े जैसे आईटी विशेषज्ञ और प्रखर विचारक है।


अभी अभी स‌ातियो स‌े स‌ूचना मिली है कि स‌बकुछ है।

यह बड़ी राहत की बात है।

  • Ashok Dusadh नहीं सर नेट पर सब है .

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  • Ashok Dusadh अभी हमने चेक किया

  • about an hour ago · Like

  • Ashok Kumar Bharti AshokaFellow Kindly search the material carefully. You will get it. If not, please let me know to help you. Being a writer, you have no liberty to make erroneous comments.

  • about an hour ago via mobile · Like

  • Palash Biswas कल हमारे यहां अंबेडकर डाटआर्ग खोलने ककी तमाम कोशिशें हुई ौर बाबासाहेब के लिटरेटर को भी।लेकिन स‌भी स‌र्च के रिजल्टबतौर तुरंत दूसरे स‌ाइटखुलते चले गये। चूंकि दलित वायस के स‌ाथ ऎसा हो चुका है। और वैसे भी अंबेडकर स‌ाहित्य के प्रखासन के मामले में कई तरह की अड़चनें आ रही हैं तो हमने अपने अनुबव को स‌ाझा किया है ताकि आप जैसे स‌मर्थ लोग इसका इलाज खोज लें।अगर अंबेडकर स‌ाहित्य खोजने में दिक्कत न हो तो इससे ज्यादा स‌ुखद कोई दूसरी बात नहीं हो स‌कती। कल रात कम स‌े कम खुल नहीं रहा था।हमें खतरा लगा।आज हालांकि हमने देखा नहीं है।कल रात ही तेलतुंबड़े जी ने इस स‌मस्या के निराकरण का वायदा किया था।हमने जैसा पाया,वैसा लिखा है।इसमें ्शोक जी ,आपको गैर जिम्मेदारी वाली बात कैसे नजर आ गयी.यह हमारी स‌मझ स‌े परे हो।हो स‌कता है कि वह स‌्थानीय मामला है।लेकिन हमारे लिए यह बड़ा खतरा है।नेट का जो रोबोटिक बंदोबस्त है,मैटर क्या हम ाप भी उड़ाये जा स‌कते हैं।

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  • Palash Biswas हमारे लिए राहत की बात है कि नेट पर स‌बकुछ उपलब्ध है।



कल पहली बार हमारी मुलाकात हिंदी के लेखक विचारक एचएल दुसाध जी से हुई।वे आप के उत्थान से पहले ही दिन से उत्तेजित हैं।एनजीओ सत्ता के मुकाबले उन्होंने राजनीति में उतरकर सीधे मुकाबला करने के इरादे  से राजनीतिक दल बनाने का संकल्प लेकर दिल्ली से निकले,पटना में सम्मेलन किया और इंजीनियर ललन सिंह,जो दलित आदिवासी मुद्दों को भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में शामिल कराने की मुहिम चलाते रहे हैं और इसी सिलसिले में नेतृत्व से मतभेद के चलते उन्होंने भाजपा से इस्तीफा देकर दुसाध जी के साथ लग गये हैं,के साथ दोपहर बाद सोदपुर में हमारे डेरे पहुंच गये।


उनके विषय प्रस्तावना करते ही सविता बाबू ने बम विस्फोट कर दिया और मेरे कुछ कहने से पहले ही मुझे इंगित कह दिया कि अगर ये राजनीतिक विकल्प के बारे में सोचते भी हैं तो पहले तलाक लेंगे।उन्होंने दुसाध जी को बता दिया कि नैनीताल से अक्सर ऐसे प्रस्ताव आते रहे हैं और इस पर घर के लोग हमेशा वीटो करते रहे हैं।हमारा परिवार पुलिनबाबू के मिशन के अलावा किसी भी किस्म की राजनीति में नहीं है।


दरअसल दुसाध जी,अंबेडकरवादियों में एकमात्र व्यक्ति हैं तेलतुंबड़े के अलावा,जिनका पूरा विमर्श आरक्षण को गैरप्रासंगिक मानकर है । वे तेलतुंबड़े की तरह अकादमिक नहीं है और महज बारहवीं पास है। लेकिन हिंदी में लिखनेवाले और निरंतर छपने वाले एकमात्र दलित विचारक है।तेलतुंबड़े भी हिंदी में नहीं लिख सकते।मुझे कोई नहीं छापता.दुसाधजी हर कहीं छपते हैं।


दुसाध जी एकमात्र व्यक्ति हैं जो लगातार अंबेडकरी विमर्श में संसाधनों और अवसरों के न्यायपूर्ण बंटवारे की बात हिंदी में कहते और लिखते और छपते हैं।सहमति असहमति के आर पार हम जो लोग उन्हें जानते पढ़ते हैं,वे कतई नहीं चाहेंगे कि सत्ता में भागेदारी की लड़ाई में वे शामिल हों।


पहले तो हमने अपने युवा मित्र व प्रखर विश्लेषक अभिनव सिन्हा,जिन्होंने आप के उत्थान का सटीक विश्लेषण भी किया है,उनके शब्दों को उधार लेते हुए कहा कि भाववादी डृष्टि से हम सामाजिक यथार्थ को संबोधित नहीं कर सकते।भावनाओं से राजनीतिक लड़ाई नहीं होती।हमें वस्तुवादी नजरिये से देखना होगा।


फिर हमने कहा कि यह व्यवस्था जो पारमाणविक है।यह राष्ट्रव्यवस्था जो मुकम्मल जनसंहारी सैन्यतंत्र है,उसे धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद जैसे भाववाद से हम बदल नहीं सकते और वह नहीं बदलता तो चाहे मोदी बने,चाहे केजरीवाल,चाहे ममता या मुलायम या बाजार के पुरअसर समर्थन से कोई दूसरा यहां तक कि मायावती,वामन मेश्राम या एच एल दुसाध भी भारत का प्रधानमंत्री बन जायें,हालात बदलने वाले नहीं है।


हालात तो ऐसे हैं कि इस व्यवस्था में जो भी बनेगा प्रधानमंत्री वह केइंस, मनमोहन, नीलिकणि और मंटेक का नया अवतार ही होगा।इसको बदलने की मुकम्मल तैयारी के बिना हम कोई राजनीतिक पहल कर ही नहीं सकते।ुस तैयारी के सिलसिले में भी विस्तार से बातें हुईं।


कल ही इकोनामिक टाइम्स के पहले पेज पर बामसेफ के 2014 के नये राजनीतिक खिलाड़ी के शंखनाद की खबर कैरी हुई है।


मूलनिवासी का विसर्जन करके वामन मेश्राम ने मायावती का आधार को गहरा आघात देते हुए और कांग्रेस के साथ बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के पैट्रियट प्रक्षेपास्त्र को मिसाइली मार से गिराते हुए ऐलान कर दिया है कि बामसेफ दलित मुसलिम गठबंधन के मार्फत उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र और पश्चिम बेगाल जैसे राज्यों को फोकस में रखकर चार सौ लोकसभा सीटों पर लड़ेगा और इनमे अस्सी उम्मीदवार मुसलमान होंगे।


कितने उम्मीदवार आदिवासी होंगे या कितने ओबीसी, इसका उन्होंने खुलासा किया नहीं है।न ही बहुजनमुक्ति पार्टी,जो राजनीतिक दल है उनका,उसका कहीं नामोल्लेख किया है।


कैडरबेस बामसेफ के संगठन ढांचे के दम पर ही उन्होंने ऐसा दावा करते हुए बामसेफ को निर्णायक तौर पर तिलांजलि दे दिया।इसके साथ ही उन्होने खुद यह खुलासा किया कि बड़े कारपोरेट घरानों और कुछ क्षेत्रीय दलों ने उन्हें समर्थन देने का वायदा किया है।उनके इस विस्फोटक मीडिया आविर्भाव का मतलब बामसेफ के कार्यकर्ता समझे न समझे, बीएसपी कार्यकर्ताओं और बहन मायावती जी को जरुर समझ आया होगा।


बहरहाल जिस ईश्वर ने अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के बाद प्रधानमंत्रित्व का दावेदार भी बना दिया,जिस ईश्वर के भरोसे नरेंद्र मोदी संघपरिवार के हिंदू राष्ट्र के भावी प्रधानमंत्री है,उस ईश्वर की मर्जी हो गयी तो जैसे कि वामन मेश्राम जी ने संकेत किया है,तो संघ परिवार से भी विशाल सांगठनिक ढांचा का दावा करने वाले आदरणीय वामन मेश्राम जी भी भारत के प्रधानमंत्री बन ही सकते हैं।


हमें किसी को प्रधानमंत्री बनाने या किसी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के खेल में कोई दिलचस्पी नहीं है,ऐसा हमने दुसाध जी को साफ तौर पर बता दिया।


मौजूदा राज्य तंत्र में न लोकतंत्र है,न संविधान लागू है कहीं और न कहीं कानून का राज है। नागरिक और मानवाधिकार समेत तमाम अवसरों और संसाधनों पर भी सत्ता वर्ग का ही एकाधिकार वादी वर्चस्व।


प्रधानमंत्री चाहे कोई बनें,वे मुक्त बाजार के ही प्रधानमंत्री होंगे,भारतीय जन गण मन के नहीं।बहुसंख्य सर्वहारा सर्वस्वहारा आम जनों को इस वधस्थल से मुक्त कराने के लिए यह कारपोरेट राजनीति नहीं है।


कांग्रेस की साख चूंकि शून्य है,इसलिए कारपोरेट साम्राज्यवाद ने उसे खारिज कर दिया है और उसके साथ नत्थी मायावती का हिसाब भी कर दिया। बाकी बचे दो विकल्प नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल तो यूथ फार इक्विलिटी के नये कारपोरेट अवतार भ्रष्टाचार विरोधीअभियान के झंडेवरदार दो खोमे में बंटकर दोनों विकल्प मजबूत बनाने में लगे हैं।जो जीता वही मुक्त बाजार का सिकंदर।


हमें कोई तकलीफ नहीं है मोदी,राहुल, ममता,अरविंद या वामन मेश्राम से।सबके लिए हमारी बराबर शुभकामनाएं।भारतीय बहुसंख्य बहुजन राजनीतिक झंडों में आत्मध्वंस के महोत्सव में लहूलुहान हैं और हम खून के छींटों से नहा रहे हैं।इस महायुद्ध में तलवारें चलाने का हमें कोई शौक नहीं है,जिन्हें हैं बाशौक चलायें।


बहस लंबी चली और खास बात यह है कि बीच में आनंद तेलतुंबड़े का फोन भी आ गया।उन्होंने भी कहा कि राजनीति के शार्टकट से इस तिलिस्म से आजादी असंभव है।


सविता लगातार बहस करती रही।अंततः दुसाध जी और ललन जी मान गये।आज भी कई दफा फोन करके दुसाध जी ने कहा कि वे बहुजनों में घमासान तेज करने की मुहिम में नहीं हैं और हमारे देश जोड़ो अभियान के साथ हैं।ललन बाबू भी हमारे साथ हैं।


अब इस पर भी गौर करें जो रियाजुल ने लिखा है,खुदरा बाजार की कुख्यात कंपनी वालमार्ट पिछले सितंबर में इस कारोबार में आधे के साझीदार भारती ग्रुप से अलग हो गई थी, जिसके बाद दोनों कंपनियों द्वारा खुदरा बाजार में किया जाने वाला निवेश भी टल गया था. भारती ग्रुप ही एयरटेल नाम से संचार सेवा मुहैया कराता है, जो अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के अभियानों में करीबी सहायक रहा है. क्या दिल्ली में खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को रद्द किए जाने को वालमार्ट से भारती के अलगाव से और फिलहाल दिल्ली में खुदरा बाजार में वास्तविक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की संभावना के न होने से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए?

आगे दिलीप ने भी खुलासा कर दिया कि हो सकता है कि केजरीवाल के पास ज्यादा समय न हो. लेकिन वे कम समय में जो करना चाहते हैं, वह स्पष्ट हो चला है.

अभी तक उन्होंने अपने दो चुनावी वादे पूरे किए हैं. VAT का सरलीकरण, ताकि ट्रेडर्स (वैट छोटे दुकानदार जैसे सब्जी विक्रेताओं की समस्या नहीं है) को दिक्कत न हो और दूसरा रिटेल कंपनियों और बिजनेसमैन के हित में खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी यानी रिटेल में FDI के फैसले को पलटना.


इन दोनों मामलों में आप पक्ष या विपक्ष में हो सकते हैं, लेकिन केजरीवाल क्या कर रहे हैं और किन के लिए कर रहे हैं, इसे लेकर संदेह का कोई कारण नहीं है....सफाई कर्मचारी समेत दिल्ली के सवा लाख ठेका कर्मचारी अभी कतार में हैं. और कोटा का बैकलॉग पूरा करने का वादा? वह क्या होता है?

पहाड़ों से भी कुछ सनसनाते मंतव्य आये हैं जो नत्थी है।कृपया गौर जरुर करें।

AAP says no to FDI in multi-brand retail in Delhi


Aam Aadmi Party government writes to Centre to not allow MNCs to set up multi-brand retail stores in the national capital; former CM Sheila Dikshit had agreed to implement FDI in Delhi


Reuters

New Delhi: Reversing the earlier policy, the Aam Aadmi Party-led Delhi government has written to the Centre that it will not allow multi-national companies to set up multi-brand retail stores in the state.

In a letter to the Department of Industrial Policy and Promotion (DIPP), the newly-formed state government has asked the Centre to remove Delhi from the list of states which have conveyed their agreement to the policy of FDI in multi-brand retail trading.

"The DIPP has received the letter in this regard from the Delhi government and is looking into it," an official said.

Former state Chief Minister Sheila Dikshit had agreed to implement the policy in the national capital.

Last year, the central government permitted 51 per cent FDI in the multi-brand retail trading and left its implementation on the states.

Rajasthan, which is now being led by the BJP, is also expected to take a view on the policy on which the earlier government had given its consent.

"The DIPP is keeping its fingers crossed with regard to Rajasthan as the BJP had been opposing the policy strongly," the official added.

As many as 12 states, mostly Congress-led, including Delhi had agreed to allow global retailers to open super market chains. The other states include Maharashtra, Karnataka and Andhra Pradesh.

Delhi has become the first state to withdraw permission for FDI in retail sector.

The Aam Aadmi Party (AAP) in the party manifesto had expressed its opposition to the policy of FDI in multi-brand retail.

"The Walmart experience shows that farmers in the US were not benefited, but deprived besides being a very bad employer," Arvind Kejriwal, party's founder and now Delhi Chief Minister, had said earlier.

On the national level, the FDI in multi-brand retail had not evoked the expected response from the global retailers. Till now only one proposal of UK-based Tesco has been cleared by the central government.


Crisis with India ending, want to move relations forward: US

India-US relations plunged after the arrest of the senior Indian diplomat, Devyani Khobragade, on charges of visa fraud and misrepresentation of facts

PTI

Washington: The United States has voiced hope that a crisis with India over the arrest of a senior Indian diplomat last month would come to a closure and expressed its wish to get back to business and take bilateral ties forward.

"Clearly, this has been a challenging time in the US-India relationship... We just want to get back to business and we want to put this behind us, and we want both sides to work together to move the relationship forward," State Department Deputy Spokesperson, Marie Harf, told reporters at her daily news conference.

"We expect that this time will come to a closure, though -- I think we're increasingly getting towards that point -- and that together we will now take significant steps with the Indian government to improve our relationship and return it to a more constructive place," Harf said.

"What we're focused on is, is the situation coming to an end and moving forward?" Harf said.

India-US relations plunged after the arrest of the senior Indian diplomat, Devyani Khobragade, on charges of visa fraud and misrepresentation of facts.

Khobragade, who was asked by the United States last week to leave the country, is now in India.

India not only accused the US for violating the Vienna Convention, but in a retaliatory reaction, also withdrew a number of privileges extended to American diplomats in India and asked for the departure of a US diplomat from New Delhi.

Meanwhile, Rose E Gottemoeller, Acting Under Secretary of State for Arms Control and International Security, met Indian Ambassador to the US, S Jaishankar, at the State Department to discuss bilateral cooperation.

"She stressed that it is critical that both sides refocus our attention on the broad agenda before us and underscored the importance of increasing bilateral cooperation on nonproliferation, defense and arms control," Harf said.

Jaishankar, whose arrival in the US coincided with the crisis, has also been meeting the members of the Congress.

"So this is just an example of an issue we work together with each other on all the time, a routine issue. This is the kind of business we just need to get back to, quite frankly, now that this is hopefully coming to an end," the State Department spokesperson said.

Kejriwal defends minister over tampering of evidence

According to media reports, law minister Somnath Bharti is facing prosecution on corruption charges

PTI

New Delhi: Delhi Law Minister Somnath Bharti today came under attack from ally Congress and opposition BJP which demanded his removal over his being indicted by a court for "tampering of evidence" in a case in which he had appeared as a lawyer.

However, Bharti, who belongs to Aam Aadmi Party, and Chief Minister Arvind Kejriwal put up a stout defence saying the court was "wrong" in the matter.

The demand for his resignation came in the wake of reports on a ruling by Special CBI judge Poonam Bamba in a case in August, 2013 that the conduct of Pawan Kumar and his advocate (Bharti) "is not only highly objectionable and unethical but also amounts to tampering with evidence".

The CBI Judge had made these observations while cancelling the bail granted earlier to Bharti's client, facing trial in a graft case relating to bank fraud.

The court had taken strong exception to the fact that Bharti and his client Pawan Kumar had telephonically contacted one of the prosecution witnesses to extract his opinion on the matter. Leader of the Opposition in Delhi Assembly, Harsh Vardhan said, "It has been proved that he was caught tampering with evidence in Patiala House Court.

"Even the judge has observed this. In such a situation, I think the people of Delhi demand Somnath Bharti's resignation and if Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal talks about ethics, then he should sack his minister," he said.

Arvinder Singh Lovely, President of state unit of Congress which gives outside support to AAP government, said law protector has become a law breaker. A party that came to power on the basis of morality should question its own conscience.

"Are you such a big man that when there is a sting operation against you, then it is incorrect. If a court gives any verdict, then you raise question over that verdict. What you do is right and what others do is wrong?

"They should ask their conscience if they have one, what they are doing is just or not. Today the people of Delhi want to know whether is this ethical," said Lovely.

At a press conference, Bharti claimed he was not indicted by the court. He even faulted the court saying it was erroneous on the part of the judge to say "conversation" with prosecution witness amounts to tampering of proof.

"What is prohibited is intimidation. Conversation is not prohibited," he said. Kejriwal said they want the media to show the recording to the nation.

"You decide what evidence has been tampered with after watching the recording. We respect the court but in this matter the court is wrong. The judge called the sting operation as tampering of evidence. This is not tampering of evidence," Kejriwal said.

Information and Broadcasting Minister Manish Tewari said that the AAP had claimed to have set high standards of public morality and the nation was watching whether they would walk the talk. Explaining the case, the chief minister said: "We need to understand the entire case. This is almost a Rs 100-crore corruption case. It was a a fraud within the bank."

"Whenever anybody exports anything, a letter of credit is received against the consignment. False letters Of credit were raised and senior bank officials were involved," added Kejriwal. He also pointed out that the CBI made a junior level desk officer Pawan Kumar a scapegoat and arrested him.

"Everybody was talking in the bank and openly accepting that they had put him (Pawan Kumar) in the trap. Pawan Kumar did a sting operation and called all senior officers," Kejriwal said.

"Whatever, they were saying was recorded, there was no tampering of the evidence instead court was being given more evidence," he said.

Arvind Kejriwal's FDI move blows a hole in Manmohan Singh's efforts

The decision by the newly-formed Aam Aadmi Party government in Delhi to shut out foreign supermarkets could further dampen investor appetite

Reuters

New Delhi: The newly elected state government in New Delhi on Monday barred foreign supermarkets from setting up shop, a blow to Prime Minister Manmohan Singh's efforts to attract overseas investment and revive the economy.

Singh had thrown open the country's $500 billion retail industry to foreign investors in late 2012, allowing companies such as Wal-Mart Stores Inc and Tesco PLC to own a majority stake in local chains for the first time.

But the policy was pushed through in the teeth of fierce opposition from domestic retailers and political parties, who said it would cause mass job losses in a sector that is mostly dominated by small, family run shops.

Moreover, strict sourcing norms and a requirement that companies must ask permission from local state governments before opening stores have made most supermarket giants wary.

Last month, Britain's Tesco was the first to take the plunge, announcing it would buy a 50 percent stake in Trent Hypermarket Ltd, which is part of the Tata group.

The decision by the newly-formed Aam Aadmi (Common Man) Party (AAP) government in Delhi to shut out foreign supermarkets could further dampen investor appetite. The move overturned the stance of the previous, Congress-led administration.

"If one party reverses the decision of its rival dispensation upon change of guards, the policy and political risks for global investors would definitely increase in India, scaring them away," said D.S. Rawat, the director general of a business lobby group, ASSOCHAM.

The AAP's victory on an anti-corruption platform in Delhi in December shocked mainstream parties. The new chief minister, Arvind Kejriwal, had promised to scrap the state's existing retail policy during his campaign.

The Bharatiya Janata Party (BJP), which hopes to unseat Singh's Congress government in a general election due by May, has also threatened to block the entry of foreign supermarkets if it wins.

The political backlash against letting in foreign retailers means that only 11 out of India's 28 states have agreed to roll out the policy. Most are states where Congress is in charge.

India previously allowed 51 percent foreign investment in single-brand retailers and 100 percent for wholesale operations, a policy Wal-Mart, among others, had long lobbied to free up further.

Indian retailers have operated supermarket chains in India for years, but their expansion has been hampered by a lack of funding and expertise as well as poor infrastructure, which makes the cold storage of food transported around the country practically impossible.


Reyazul Haque

खुदरा बाजार की कुख्यात कंपनी वालमार्ट पिछले सितंबर में इस कारोबार में आधे के साझीदार भारती ग्रुप से अलग हो गई थी, जिसके बाद दोनों कंपनियों द्वारा खुदरा बाजार में किया जाने वाला निवेश भी टल गया था. भारती ग्रुप ही एयरटेल नाम से संचार सेवा मुहैया कराता है, जो अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के अभियानों में करीबी सहायक रहा है. क्या दिल्ली में खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को रद्द किए जाने को वालमार्ट से भारती के अलगाव से और फिलहाल दिल्ली में खुदरा बाजार में वास्तविक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की संभावना के न होने से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए?

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  • Harsh Vardhan, Musafir D. Baitha, Subhash Chandra Kushwaha and 7 others like this.

  • Reyazul Haque इसका मतलब ये भी हो सकता है कि जब तक वालमार्ट और/या भारती ग्रुप सक्षम नहीं हो जाते, किसी दूसरे समूह को कारोबार में घुसने से रोके रखा जाए.

  • 4 hours ago · Like · 2

  • Harsh Vardhan esi sambhavna se inkaar nhi kiya ja sakta

  • 4 hours ago via mobile · Like · 1

  • Subhash Chandra Kushwaha मैंने अपनी वाल पर आप की पूरी बात , आप के हवाले से संदर्भित की है . तार्किक है .

  • about an hour ago · Like · 1

  • Subhash Chandra Kushwaha रियाजुल जी जो बात कह रहे हैं , वाजिब है. दो साल पूर्व, एक अखबारी आलेख में मैंने यह आशंका जाहिर की थी कि कॉर्पोरेट समर्थित एन .जी. ओ . आन्दोलन से भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता है. क्योंकि कॉर्पोरेट का फैलाव ही भ्रष्टाचार का फैलाव है. फिर भी जब दूसरी ...See More

  • about an hour ago · Like

  • Palash Biswas खुलासे के लिए धन्यवाद रियाज।लेकिन हमें तुम्हारे हिंदी मंतव्यों की बारंबारता का बेसब्री स‌े इंतजार है।तुम जिन स‌ूचनाओं स‌े जूझते हो आम लोगों को उनके स‌ाझेदार बनाओगे ,तभी जनप&धर मोर्चा आकार लेगा।तुम ौर दूसरे तमाम स‌ाथियों स‌े हमें असली स‌ूचना महाविस्फोट की प्रत्याशा है और पूरा भरोसा भी है कि निराश नहीं करोगे।

  • a few seconds ago · Like


Palash Biswas

Yesterday at 1:00pm ·

  • भारत अमेरिका परमाणु संधि पर दस्तखत से पहले भारत सरकार के लिए अनास्था प्रस्ताव तक हो गया और वामदलों का कांग्रेस के साश मधुचंद्रउत्सव सहकर्म सहधर्म का औपचारिक पटाक्षेप भी हो गया। अब जबकि यह समझौता परमाणु उत्तरदायित्व कानून के तहत भारतीय जनता को रेडियोएक्टिव बनाने के चमत्कार के साथ लागू हो गया है और इस पर न मीडिया में,न सोशल मीडिया में और न राजनीति में कोई बहस हो रही है।
  • अमेरिकी ईरान परमाणु संधि भी 20 जनवरी से लागू हो जाने के बाद संपूर्ण एशिया में परमाणु वृत्त का निर्माण हो गया है और एक मुकम्मल परमाणु युद्धस्थल के बीचोंबीच हम खड़े हैं।
  • भारतीय महामनाओं के अमेरिका और भारत में अमेरिका तंत्र के हाथों निरंतर नंगा होते रहने के बावजूद प्रतिवाद तक न करने वाले भारतीय सत्तावर्ग के देवयानी प्रकरण को तुल देने का मसला इसीलिए जाहिर है कि महज कोई वोट बैंक समीकरण नहीं है। मध्यपूर्व के तेल खजाना को हथियाने से पहले जो तमाम सनसनीखेज किस्सों के जरिये विश्व जनमत को नयी वैश्विक एकध्रूवीय जायनवादी कारपोरेट धर्मोन्मादी व्यवस्था के लिए साम्यवादी विकल्प के विरुद्ध संगठित किया था अमेरिका ने,उस इतिहास की पृष्ठभूमि में अब भारत अमेरिकी छाया राजनय युद्ध के देखें तो हम परमाणु विध्वंस के कगार पर खुद को खड़ा पायेंगे।
  • कुड़नकुलम के बाद जैतापुर तक का परमाणु सफर और इस भारत पाक परमाणु संधि के बिना प्रतिरोध लागू हो जाने के तात्पर्य पर ईरान अमेरिकी संधि के परिप्रेक्ष्य में कुछ तो विचार मंथन होना चाहिए।
  • आइये,इस सिरे से भूले मुद्दे पर हम तनिक संवाद करें।बेखटके अपनी राय लिख धें कहीं भी।फेसबुक पर या गुगल प्लस पर या चाहे तो मुझे सीधे मेल कर दें।
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Himanshu Kumar

साहेब केजरीवाल की तस्वीर वाली पतंगों से भी डरता है . डरपोक शेर

'केजरीवाल' क्यों नहीं उड़ रहे अहमदाबाद में? - BBC Hindi - भारत

bbc.co.uk

गुजरात के अहमदाबाद में पतंग उत्सव के अवसर पर कई हस्तियों की तस्वीरों वाली पतंगे उड़ीं लेकिन इनमें केजरीवाल नहीं दिखे. उनकी तस्वीर वाली पतंगें गोदामों में पड़ी रह गईं. आख़िर क्यों, पढ़ें इस ख़ास रिपोर्ट में.

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Dilip C Mandal

हो सकता है कि केजरीवाल के पास ज्यादा समय न हो. लेकिन वे कम समय में जो करना चाहते हैं, वह स्पष्ट हो चला है.


अभी तक उन्होंने अपने दो चुनावी वादे पूरे किए हैं. VAT का सरलीकरण, ताकि ट्रेडर्स (वैट छोटे दुकानदार जैसे सब्जी विक्रेताओं की समस्या नहीं है) को दिक्कत न हो और दूसरा रिटेल कंपनियों और बिजनेसमैन के हित में खुदरा कारोबार में विदेशी पूंजी यानी रिटेल में FDI के फैसले को पलटना.


इन दोनों मामलों में आप पक्ष या विपक्ष में हो सकते हैं, लेकिन केजरीवाल क्या कर रहे हैं और किन के लिए कर रहे हैं, इसे लेकर संदेह का कोई कारण नहीं है....सफाई कर्मचारी समेत दिल्ली के सवा लाख ठेका कर्मचारी अभी कतार में हैं. और कोटा का बैकलॉग पूरा करने का वादा? वह क्या होता है?

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Vallabh Pandey

आटा चक्की, कोल्हू जैसी किसी छोटी औद्योगिक इकाई के लिए पर्यावरण विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेना हो तो उद्यमी को दिन में तारे नजर आने लगते हैं .... लेकिन करोड़ों की परियोजनाओं को मंजूरी झट से मिल जाती है, 1.5 लाख करोड़ से भी अधिक की परियोजनाओं पर पिछले 2-3 सप्ताह के अंदर मंजूरी दी गयी है .... चुनावी साल में पर्यावरण की चिंता कौन करे .... पर्यावरण दिवस तो जून में पड़ता है, मना लेंगे तब.

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Vallabh Pandey also commented on his photo.

Vallabh wrote: "Jit it is all due to pressure of corporates, unnecessary change in ministry clearly showing the game behind this... Ultimate goal is to oblige big industrialists to seek their donations and support for coming election and it is all on the cost of environment."




Rukhsana Maqsood

अमेठी लोकसभा सीट से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को चुनौती देने की कोशिश में जुटे 'आप' नेता कुमार विश्वास ने बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़े।

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Virendra Yadav likes a link on Daily Bhaskar.

'आप' का जनतंत्र सचमुच काबिले फ़िक्र है .मल्लिका साराभाई जिन्होंने पिछले चुनाव में नरेन्द्र मोदी को चुनौती दी थी ,अब 'आप' पार्टी में शामिल हैं .मल्लिका ने कुमार विश्वास से यह सवाल पूछ लिया है कि उन्हें मोदी की तुलना शिव से करने के लिए क्या पैसे मिले थे तो जवाब में कुमार विश्वास ने यह पूछ लिया कि ये मल्लिका साराभाई हैं कौन ? और यह भी कह दिया कि करोड़ों लोग 'आप' पार्टी में शामिल हो रहे हैं वे किस किस का जवाब देंगें ? यानि मोदी को चुनौती देने वाली मल्लिका एक गुमनाम हस्ती हैं और मोदी का प्रशंसक सरनाम 'आप' नेता . 'आप' पार्टी अब जनतंत्र के नए कीर्तिमान कायम कर रही है. नहीं ?

Cracks in AAP: Was Kumar Vishwas paid to compare Modi to Shivji, asks party colleague Mallika Sarabhai

Daily Bhaskar

Taking on Vishwas on multiple fronts, Sarabhai sought clarification from Vishwas over latter's glorifying remarks on the Gujarat CM in which he had been compared to a Hindu deity by the poet-turned-politician.

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  • Dr.Lal Ratnakar जो मल्लिका को नहीं जानता उसका क्या जवाब ! यानी लाजवाब 'उच्चक्का' !

  • 24 minutes ago · Like · 1

Aaj Tak

BREAKING NEWS: जो मोदी जी की तकदीर में हो, वो उनको मिलेः सलमान खान‪#‎Aajtak‬ ...http://bit.ly/Live_Breaking_News

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Aaj Tak

BREAKING NEWS: बेस्ट मैन को बनना चाहिए देश का पीएमः सलमान खान‪#‎Aajtak‬ ...http://bit.ly/Live_Breaking_News

India Today

Salman Khan meets Narendra Modi, fly kites in Ahmedabad



Read more at: http://indiatoday.intoday.in/story/salman-khan-meets-narendra-modi-in-ahmedabad-posts-photo-on-twitter/1/336124.html

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"आप" जल्दबाज़ी में और शामिल होने वाले समय से पहले लक्ष्य पाने की फिराक में

हर्ष रंजन

आप यानी आम आदमी पार्टी मे शामिल होने वाले खास टीवी पत्रकार आशुतोष ,अमेठी की रैली में कुमार विश्वासके डेप्यूटी के तौर पर कोई बड़ी छाप नहीं छोड़ पाये। राजनीतिक पार्टी में शामिल होने के बाद किसी भी दूसरे पेशे के प्रोफेशनल को सार्वजनिक मंच पर आने से पहले कूलिंग ऑफ पीरियड रखना चाहिये। राजनीतिक पार्टी ही क्यों, किसी भी पेशे के वरिष्ठ जब अपना धंधा बदलते हैं तो खुद को न्यूट्रलाईज़ करने के लिये थोड़ा वक्त लेते हैं। टीवी वाले भी जानते हैं कि एक विज़ुअल से दूसरे में जाने के बीच में एक ट्रांजिशन होता है। भारत सरकार के भी सचिव स्तर और बड़े अधिकारी रिटायर होने के तुरन्त बाद कोई दूसरी नौकरी नहीं कर सकते। चैनलों में भी वरिष्ठता के हिसाब से नोटिस पीरियड होता है। इसकी सिर्फ एक ही वजह है कि पेशे में आपसे कोई सरोकारी असन्तुलन न हो जाय।

बहरहाल, "आप" जल्दबाज़ी में है और इसमें शामिल होने वाले आदमी समय से पहले लक्ष्य को पाने की फिराक में। ऐसे में कहीं लोकसभा चुनावों से पहले आप का आभामंडल न खो जाय, ये डर आम आदमी को सताने लगा है। केजरीवाल को ये देखना होगा कि आम आदमी की जो बयार चली है, उसे लोग दूषित न कर सकें, भले ही उन्होंने पार्टी की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से मदद की हो।

कई बड़े जाने-माने खास लोग "आप" में शामिल हो रहे हैं, लेकिन किसको क्या, कब और कौन सी जगह मिले पार्टी इसे ज़रूर परखे, वरना भारत ही नहीं दुनिया मे कोई भी ऐसा राजनीतिक दल नहीं रहा है, जिसमें टूट न हुयी हो।

About The Author

हर्ष रंजन, लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं। आज तक व सहारा समय से जुड़े रहे हैं, आजकल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।

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Rajiv Nayan Bahuguna

आम आदमी पार्टी को सफ़ेद गांधी टोपी को अपना प्रतीक चिन्ह बनाने से बाज़ आना चाहिए . देश का आम आदमी यह टोपी नहीं पहनता . टोपी एक फजूल का वस्त्र है , और उस पर सफ़ेद टोपी तो मंहगी भी है , और मैली भी जल्द होती है . गांधी जी ने इसी लिए टोपी पहनना छोड दिया था . बाद में यह टोपी भ्रष्ट कांग्रेसियों की ढाल बनी . यह टोपी सर्दी से भी नहीं बचाती . हाँ मफलर ठीक है

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Rajiv Nayan Bahuguna

जिस लड़के को आम आदमी पार्टी ने राहुल गांधी को ज़मीन सुंघाने अमेठी भेजा है , आज उसे पहली बार टी वी पर देखा - सूना . उसे कवि कह कर प्रचारित किया जा रहा है , लेकिन सुनने पर पता चला की वह कोई कवि वबी नहीं , निरा तुक्कड़ है . वसीम बरेलवी के शेर बगैर उनका नामोल्लेख किये सुना रहा था . उच्चारण अशुद्ध था . बातें भी चीपड़ी कर रहा था , जैसे मंचीय तुक्कड़ करते ही हैं . ऐसे जीती जाती है क्या कठिन जंग ?

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Abhishek Srivastava

बनारस के खोजवां में एक लड्डू भइया हुआ करते थे.. मतलब, अब भी होंगे ही। खिचड़ी के दिन जब जनता चूड़ा-मटर-तिल भकोस कर छत्‍ते पर कन्‍नी बांध रही होती थी, तब लड्डूजी बिजली के तारों को जाने क्‍यों सुलझाने में उलझे रहते थे। उधर सारी छतों पर छोड़ैया दी जा चुकी है, इधर लड्डू भाई के आसपास गुड्डी-परेता-मांझे का नामोनिशान तक नहीं है। समझ नहीं आता कि आखिर उनकी छत पर हो क्‍या रहा है? ख़ैर, जब सारी पतंगें परवाज़ भर चुकी होती, तब अचानक आकाशवाणी की तरह एक आवाज़ किरहिया मोड़ से लेकर खोजवां वाया शंकुलधारा अचानक गूंज उठती, ''भाक्‍काटेsss''। जनता खोजती रह जाती थी कि कौन कटा, किसने काटा, लेकिन कुछ भी नज़र नहीं आता। जो जानते थे वो तो जानते ही थे, जो नहीं जानते थे वे पहली बार जान पाते कि लड्डू भाई अपनी छत पर एक लाउडस्‍पीकर लगाकर माइक में ''भाक्‍काटे'' चिल्‍ला रहे हैं।


दरअसल, बचपन में मांझे से एक बार हाथ कटने के कारण वे इतना हदस गए थे कि जिंदगी में कभी पतंग उड़ाना नहीं सीख पाए। तब उन्‍होंने मौज लेने की यह नायाब तरकीब निकाली। हर साल बिना गुड्डी-मांझा छुए ही वे सैकड़ों पतंगें हवा में दिन भर में काट डालते। मोहल्‍ले के कई लोग उनकी छत पर उनका साथ देने के लिए सब छोड़छाड़ कर पहुंच भी जाते थे। एक अच्‍छा-खासा ''लाउडस्‍पीकरिया'' समुदाय बन गया था जो दरअसल कुछ नहीं करता था, लेकिन नए लोगों को यही लगता कि सबसे ज्‍यादा पतंग लड्डूजी की छत से ही कट रही है। ऐसे में एकाध घंटे बाद ही जनता के ''भाक्‍काटे'' और लाउडस्‍पीकर के ''भाक्‍काटे'' का फ़र्क खत्‍म हो जाता था। मोहल्‍ले के बेरोजगारों के बीच लड्डूजी तब सर्वाधिक लोकप्रिय शख्‍स थे।


आज जब बाएं से दाएं तक हर कोई केजरी भइया की ओर चिहुंक कर देख रहा है, उनकी पार्टी ज्‍वाइन कर रहा है, तो मुझे जाने क्‍यों अपनी छत पर चढ़ कर चिल्‍लाने का मन कर रहा है, ''भाक्‍काटेsssss''। दिक्‍कत ये है कि मेरे सिर पर छत तब भी नहीं थी और अब भी नहीं है, जबकि लड्डू भइया की छत से मैंने कभी उत्‍तरायण नहीं किया है।


('आप' के लिए खिचड़ी स्‍पेशल वाया बनारस) विशेष ध्‍यानार्थ Panini Anand Atul Chaurasia Avtansh Chitransh Rangnath Singh Ashish Pandey Mohd Imran Avinash Kumar Singh Mitra Ranjan Aflatoon Afloo Lenin Raghuvanshi Shree Prakash Ajay Prakash Vivek Pathak Sanjay TiwariYashwant Singh Vijay Shankar Ramji Yadav

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  • Reyazul Haque, Panini Anand, Subhash Gautam and 21 others like this.

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  • Avinash Kumar Singh चांदमारा, डब्बूमारा.क्षड़िल्ला,अध्धा, परेता,सद्दी, छुडय्या, कन्नी, मांझा,ढील के, खींच के, ऊपरी पेंचा,नीचली पेंचा....भॉssssssssssssकssssssssssssssटे, गाली के उद्घोष के साथ..... ला बुजरो के निपुर गइला..... कहइले रहइली ना हथ्थन से काटब...आवा आवा....देखिला....के हऊए आसमाने का राजा? आजू के दिने सब कुछ याद आवे लगल, हमके बनारस सतावे लगल. करेजवा काट ले ला, जियारा में समा गइला....बनललल रहा और ऐही तरह चपल रहा.

  • 2 hours ago · Edited · Like · 3

  • Shree Prakash मतलब ये कि अगर 'बनारस में छत से पतंग उड़ा के भाक्काटे नहीं चिल्लाया तो क्या खाक संडे मनाया' के तर्ज पर आआपा के साथ लोकतंत्र की लीला में अपनी भूमिका नहीं निभायी तो क्‍या खाक जनता के काम आये!

  • 2 hours ago · Like · 1

  • Atul Chaurasia कहो मरदे अबहिन के याद आयल आज खिचड़ी हौ

  • 37 minutes ago · Like

  • Mitra Ranjan bahut khoob abhishek babu

  • 17 minutes ago via mobile · Like

  • Palash Biswas यार अभिषेक,मुझे मित्र मंडली स‌े खदेड़ दिया है क्या

  • a few seconds ago · Like

TaraChandra Tripathi

वृद्धावस्था यादों की पिटारी लेकर चलती है। बार-बार इस पिटारी को खोलने को मन करता है। पर खोलें किसके सामने? गाँवों में तो लोगों का साँझा जीवन होने के कारण यादें भी साँझी होती हैं। वृद्ध जन अपने समूह में अपनी यादों के साथ जीते हुए अगली पीढ़ी को परंपराओं की पिटारी भी सौंपते जाते हैं और इन्हीं यादों, अनुभूतियों और अनुभवों के सहारे लोक बनता चला जाता है।

आज स्थितियाँ बदल गयी हैं। मानव-समूहों ने, सहस्राब्दियों के अन्तराल में, सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक संबंधों के सुविन्यस्त सूत्रों से गाँव के रूप में जिस सुगठित इकाई का विकास किया था, वह औद्योगिकीकरण के झटकों से बिखर गयी है। रोजी, रोटी, सुविधाओं की चाह और छोटी बड़ी महत्वाकांक्षाओं की दौड़ में 'गाँव' बहुत पीछे छूट गया है। संसाधनों के संचयन की आपाधापी में लोगों के पास न अगली पीढ़ी के लिए समय बचा है और न पिछली पीढ़ी के लिए। फिर यादों को बाँटें तो किस से। जो जुड़े भी, उनका जुड़ाव केवल व्यावसायिक संबंधों तक ही सीमित है। बुढ़ापे में नाती-पोतों के बीच यादों, कथाओं परंपराओं की जुगाली करने का जो अवसर मिलता था, वह अवसर भी उनके प्रवासी हो जाने या साथ भी रहे तो दूरदर्शन ने छीन लिया। यादों को बाँटे तो किससे। कैथें कूनू दुख.सुख को देलो हुङुर (किससे अपने दुख-सुख कहें कौन उन को ध्यान से सुनेगा)। फिर भी क्या अपनी यादों को अपने अनुभवों चुपचाप अपने साथ ही समेट ले जाना उचित है?

यह देह, यह मन, विचार, धारणाएँ, दिग-काल और समाज को अपने ही ढंग से समझने की क्षमता, अभिव्यक्ति की सामर्थ्य, जैसी भी हो, पितरों और परिवेश का ही तो दाय है, जिसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाये बिना, मुक्ति कैसे मिलेगी?

लेखक की पुस्तक ' महाद्वीपों के आर-पार' की भूमिका से

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TaraChandra Tripathi

कम से कम अन्य कर्मचारी समाज में सम्मान कम होने का रोना तो नहीं रोते। कोई प्रणाम करता है या नहीं, इससे उन्हें कोई सरोकार तो नहीं होता, पर हम अध्यापक लोग सम्मान की अपनी ही परिभाषा करते हुए, उसके लिए हाय-तोबा मचाते रहते हैं। बाजार में चलते हुए हमारा ध्यान केवल इसी बात पर होता है कि कौन हमें प्रणाम करता है, कौन नहीं। कितने छोटे हैं हम। कितने हीनता बोध से ग्रसित हैं हम!

प्रायः देखा जाता है कि छात्र जिन शिक्षकों की कक्षाओं में अध्ययनरत होते हैं, उन्हें प्रणाम करते हैं। यदि उनका ध्यान कहीं और होता है तो वे सामने आकर पुनः.पुनः प्रणाम करते हैं। यदि अध्यापक प्रयोगात्मक परीक्षा का भी प्रभारी हुआ तो इस प्रणाम का कोण भी कम से कम पैंतालीस अंश झुक जाता है, पर जैसे ही छात्र परीक्षा उत्तीर्ण कर आगे बढ़ जाता है वह बेंत की तरह सीधा हो जाता है। इसका कारण यह है कि वह अब तक 'जो ध्यावे फल पावे' की प्रत्याशा में आराधना कर रहा था। इसी प्रत्याशा में वह आगे आने वाले अध्यापकों, नियोक्ताओं की भी आराधना करता रहेगा। यदि किसी ऊँचे पद पर पहुँच कर भी वह अपने छात्र जीवन के अध्यापक के समक्ष प्रणत होता है तो यह सम्मान अध्यापक की देह का नहीं उसके व्यक्तित्व और कृतित्व का होता है। इस सम्मान के लिए अध्यापक को भीख नहीं माँगनी पड़ती और न कोई दूसरा व्यक्ति इस सम्मान को पा सकता है।

मेरे विचार से अध्यापक को सम्मान के बदले श्रद्धा पाने के लिए प्रयास करना चाहिए और श्रद्धा कर्मों से अर्जित होती है और आप रहें या न रहें, लंबे अन्तराल तक मिलती रहती है। मोमबत्ती यदि जल कर प्रकाश दे रही हो तो लोग उसे प्रकाश मानने को विवश होते हैं। बुझी मोमबत्ती चाहे लाख सिर पटके कोई भी उसे प्रकाश नहीं कहेगा। हमारे युग के अधिकतर अध्यापक बुझी हुई मोमबत्ती की तरह हंै और रोते रहते है कि कोई उन्हें प्रकाश नहीं कहता।

प्रधानाचार्य के रूप में अपने अनुभवों पर आधारित मेरी पुस्तक 'ग्यारह वर्ष' का एक अंश

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TaraChandra Tripathi

अतीत में गुरु के जिस जिस 'उज्ज्वल' स्वरूप की झाँकी प्रस्तुत की जाती है, वह अधिकांशतः काल्पनिक है। तब भी ट्यूशन करने वाले अध्यापक प्रतिभाशाली सामान्य छात्र को नीचे गिराने में कम नहीं थे। द्रोणाचार्य ने तो एकलव्य को राजकुमार अर्जुन से आगे बढ़ता देख उसका दायाँ अँगूठा ही कटवा लिया था ( क्या पता कटवा दिया हो?) ताकि वह धनुष पर बाण चढ़ा ही न सके। गार्गी को अपने से अधिक मेधावी देख कर याज्ञवल्क्य जनकपुर की भरी राजसभा में उस का सिर फोड़ने को उद्यत हो गये थे। वशिष्ठ को अपने से अधिक विद्वान और प्रभावशाली देख कर विश्वामित्र ने उनके सौ पुत्रों की हत्या करवा दी थी। कण्व जैसे दो चार ऋषियों को छोड़ दें तो हमारे अधिकतर ऋषि हाथ में जल लेकर शाप देने की मुद्रा में ही दिखायी देते हैं। पाणिनि ने तो अपने युग में अनेक प्रकार के अध्यापकों की सूरत देखी थी। इनमें कुछ तो रटन्त विद्या खोदन्त पानी वाले थे तो कुछ छात्रों की देह को पीट.पीट इस्पात बनाने मेें प्रवीण थे। कुछ उदासीन थे तो कुछ को हवा उड़ा ले जाती थी।

जो गुरुकुल में आते थे, उन्हें और कुछ पढ़ाया जाता हो या नहीं, 'मैंने कुछ नहीं देखा' कहना तो सिखाया ही जाता होगा। नहीं तो दादा जी बैठे हों, गुरुदेव बैठे हों, तमाम कुल वृद्ध बैठे हों, एक परम प्रिय और सर्वाधिक अनुशासित माना जाने वाला शिष्य जुआ खेले और अपनी पत्नी को दाँव पर लगा दे, दूसरा भरी सभा में उसके कपड़े उतारने लगे, सब कुछ देख कर भी दस हजार योद्धाओं को एक साथ परास्त करने का दावा करने वाले दादा जी, चुपचाप उसकी अनदेखी करें। जपते रहो हम महान थे, हम महान थे। रूपक तैयार करते रहो, कारण ढूँढ्ते रहो। दुष्यन्त की तरह एक अबला को अपने जाल में फँसा कर उसके पिता की अनुपस्थिति में गंधर्व विवाह कर लो और जब वह गर्भवती होकर तुम्हें खोजती हुई घर आ जाए तो पहचानने से इनकार कर दो। तभी पहचानो जब दूसरा कोई वारिस ही न हो। कितने महान थे हमारे पूर्वज? हमारे ही क्या संसार के सारी सभ्यताओं के पूर्वज ऐसे ही थे।


प्रधानाचार्य के रूप में अपने अनुभवों पर आधारित मेरी पुस्तक 'ग्यारह वर्ष' का एक अंश

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चन्द्रशेखर करगेती

5 hours ago · Edited ·

  • ये दिल्ली की गली नहीं, उत्तराखंड है साहब ?
  • जो लोग उत्तराखंड में "आप" की राजनैतिक संभावनाएं देख नयी राजनीतिक परिभाषा गढ़ने का दावा कर रहे हैं, वे शायद ये भूल रहे हैं कि यहाँ दिल्ली की संकड़ी सीधी गलियां नहीं वरन दुर्गम पहाडियों पर आड़ी-टेड़ी पगडंडियाँ है, अब तो भविष्य बताएगा इन पर कौन "आप" वाला चल कर गाँव गाँव धुरे धुरे नाप पाता है । यह वही राज्य है और यहाँ के लोग भी वही है जिन्होंने कभी अपने वीर चन्द्र सिंह गढवाली जैसे नायक को पत्थर तक मारे थे, धर्म सिंह जैसे समर्पित ईमानदार लोकसेवक को खदेड़ बाहर किया था, यहाँ वही लोग अब भी है जो कांग्रेस भाजपा की लाख गलतियों को माफ कर देते है पर अपने तापियों की एक चूक पर उन्हें जीवन भर का दागी बना देते है ? क्या "आप" के नौसिखिए कर पायेंगे ऐसी मानसिकता का मुकाबला !
  • नि:संदेह दिल्ली में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन किसी चमत्कार से कम नहीं, मगर दिल्ली "आप" का होमग्राउंड था । दिल्ली में मन और मुद्दों पर "आप" की गहरी पकड़ थी, लेकिन वैसी पकड़ उत्तराखंड के मुद्दों पर आम आदमी पार्टी की होगी, इसके फिलहाल तो दूर-दूर तक आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं । आखिर उत्तराखंड में "आप" का कोई तो एजेंडा होगा जिसके दम पर वह सूबे की सियासत में तीसरी राजनीतिक ताकत बनने का ख्वाब देख रही है ?
  • दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले तक लोगों को इतनी पक्की उम्मीद नहीं थी कि आप सरकार बनाएगी । चुनाव के नतीजे आए और आप ने चमत्कार कर दिया, आज दिल्ली में आप की सरकार है । आप की राजनीति की शुरुआत दिल्ली से हुई और दिल्ली में ही आप का खासा जोर भी रहा है । चुनाव में भी दिल्ली ही आप का मुख्य केंद्र रहा । उत्तराखंड के लिए "आप" नेतृत्व भले ही यह सोच रहा हो कि यहां पर वह अपनी ताकत को बढ़ा पाएगी, यह सोचने में जितना आसान है,उतना धरातल पर आसान काम नहीं है ? उत्तराखंड व दिल्ली की भौगोलिक स्थिति अलग है, लोगो के आचार विचार, सामाजिक परिवेश, जातिगत मतभेद और बहुत सी विषमताएं है जो इस राज्य के लोगो की सोच को दिल्ली से अलग करती है ।
  • राज्य में मैदान की तुलना में पहाड़ी क्षेत्र ज्यादा है । जहाँ पिछले 13 भाजपा, कांग्रेस के अलावा क्षेत्रीय दल के कार्यकर्ता भी अपनी चूल्हे तक पहुँच बनाये हुए हैं । राज्य बनने के बाद से भाजपा व कांग्रेस में किसी एक की सरकार बनती रही है, और उसने अपने हर गाँव में मौजूद किटकिनदारों को लाभान्वित किया है, और वे हर गाँव में अपनी एक मजबूत उपस्थिति और प्रभाव रखते हैं । इस राज्य में भले ही क्षेत्रीय दल अपनी खास पकड़ नहीं बना पाए लेकिन आप के लिए राज्य की राजनीति में मौजूद तीसरे की जगह पर अपने को स्थापित कर लेना आसान नहीं है, "आप" के लिए भी जनता के बीच पकड़ बनाना आसान नहीं बल्कि एक मुश्किल काम है, जिसमें टूटन भी होगी और घुटन भी ।
  • दिल्ली में "आप" का प्रचार सोशल मीडिया में खासा हुआ था । इसके उलट उत्तराखंड में सोशल मीडिया केवल मैदानी इलाकों तक ही सीमित है । पहाड़ी क्षेत्र में कई जगहों पर फोन लाइन और मोबाईल टावर तो दूर सड़क तक नहीं तक नहीं है, और उपर से इस बार तो आपदा की मार अलग से रही, बड़ी बड़ी कारों में एक ही रात में कई शहरों को नाप देने वाले राज्य "आप" के पदाधिकारी क्या उन दुर्गम क्षेत्रों में भी पहुँच पायेंगे जहाँ राज्य का "आम" आदमी रहता है । आखिर राज्य के पहाड़ी क्षेत्र में आप का प्रचार सोशल मीडिया के बजाय पैदल चलकर कैसे होगा ?
  • जमीनी तौर पर देखा जाय उत्तराखंड मे "आप" के पदाधिकारियों की पकड़ भी जनता में वैसी नहीं है, जैसी कि अलग दिखने वाली पार्टी की होनी चाहिए । राज्य की राजधानी सहित मुख्य नगरों में जो "आप" के कार्यकर्ता एंव पदाधिकारी हैं, उनमे से अधिकतर ने आज तक किसी पार्षद का चुनाव तक नहीं भी लड़ा हैं या कभी किसी जन आंदोलन का हिस्सा भी नहीं रहें है, सिवाय अन्ना जैसे वक्त बे वक्त के आंदोलन के, जो आज अपने उद्देश्य के विपरीत कहीं खो सा गया है । राज्य कमेटी के पदाधिकारियों की भी कोई अपनी विशेष पहचान नहीं और ना ही वे किसी बड़े जन आंदोलन का हिस्सा रहें है, बस एक पार्टी बनाने के विचार आने के साथ वे अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के साथ हो लिए इसलिए आज राज्य पदाधिकारी बन गये, राज्य स्तर पर उन्हें आप के बड़े नेताओं में भी उन्हें गिना नहीं जाता है । अब तक राज्य में "आप" का न तो कोई सम्मेलन हुआ हैं और न ही कोई रणनीतिक बैठकें, जैसी दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया के नेतृत्व में हुआ करती थी । हालांकि दिल्ली में सरकार बनने के बाद आप के कार्यकर्ता राज्य भर में सक्रिय हो गए हैं, लेकिन इस सक्रियता के पीछे दिल्ली की सफलता की ऊर्जा है जिस दिन दिल्ली में एक दांव गलत पड़ा, उत्तराखण्ड के "आप" कार्यकर्ता भी मायूस नजर आयेंगे, क्योंकि पार्टी के नेताओं का ना कोई जनसंघर्ष है और ना ही वैचारिक लाइन ।
  • उत्तराखण्ड में "आप" के नये नवेले खेवनहार बने, नेताओं का परिचय कुछ इस प्रकार का कि पहले कोई किसी संस्था में काम करता था, तो कोई दुकान चलाता था, या फिर पहले किसी काँग्रेस-भाजपा टाईप पार्टियों के नेताओं का झोला बोकने वाले थे तो किसी का काम सुचना अधिकार का उपयोग कर अखबार के जरिये अपने नाम की सुर्खियाँ बटोरने तक था । उत्तराखंड में अभी तक जन संघर्षों का कोई बड़ा नेता आप में शामिल नहीं हुआ और न ही भाजपा व कांग्रेस से कोई पदाधिकारी पार्टी की नीति दुखी हो अपनी पार्टी छोड़कर आप में शामिल हुआ है, जैसा कि दिल्ली में हुआ था । राज्य में आप का अभी कोई एजेंडा भी देखने को नहीं मिला है । यही नहीं आप का अब तक किसी भी बड़े मुद्दे पर आंदोलन भी नहीं दिखा है और न ही बड़े मुद्दे को आप ने राज्य में कैस किया है । ऐसे में देखने की बात होगी कि आप राज्य में किस तरह का एजेंडा लेकर आती है । उस एजेंडे पर लोग कितना विश्वास करते हैं आगामी लोकसभा चुनाव से पहले आप की पकड़ राज्य में कितनी मजबूत होती है । फिलहाल जमीनी आंदोलनों के इस राज्य में "आप" के लिए अपनी राजनैतिक जमीन बनाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है ।
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    • Govind Raju, Umesh Tiwari, Pushkar Rawat and 55 others like this.

    • Dheerajpal Makhloga sahmat

    • 4 hours ago via mobile · Like

    • Pankaj Bhatt jaha UKD apni pakad nahi bana payi , jis ukd ne uttarakhand ke liye itna sangharsh kiya . To ye AAP kya pakad bana payegi

    • 4 hours ago via mobile · Like

    • Sonu Kanyal कोशिश कर लेने मैं कोई हर्ज नहीं। शायद कुछ भला हो ही जाए। आआप की देखा देखी बाकी दल भी कुछ सुधार लाये तो भला जनता का ही है। direct या इन डायरेक्ट।

    • 4 hours ago via mobile · Like · 3

    • Rajesh Pant Or kuch bhi na ho to bhi AAP k wajh sy uttrakhad main bhi achhy log chunav ladangy. kam sy kam itna asar to jarur hoga.

    • 4 hours ago · Like · 1

    • चन्द्रशेखर करगेती Sonu Kanyal जी कोशिशें चरित्र से हो दिखावे से नहीं......वैसे भी अभी जितने बड़े नाम राज्य में आप के साथ आये हैं उनके कारनामों की लिस्ट लंबी है...खोलो तो...

    • 4 hours ago · Like · 1

    • Surindra Singh Bhandari आप का चमत्कार उन लोगो के लिये।

    • जो वास्तविकता से अन्जान है।

    • जानकारो का मानना कि काँग्रेस की लीला चल रही है ।

    • 4 hours ago via mobile · Like · 2

    • चन्द्रशेखर करगेती Surindra Singh Bhandari जी "आप" के पीछे प्रत्यक्षत: काँग्रेस का हाथ है यह भाजपा नित कुछ लोगो का जनता को बरगलाने के लिए अच्छा विचार हो सकता है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है......इससे तो मैं आश्वस्त हूँ....लेकिन जिस चरित्र की बात आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता अपने स्वयं के लिए कर रहें है वे उतने सच्चरित्र है नहीं, हो सकता है एक वक्त के बाद वह सुचिता और साफगोई और चेतना उनके चरित्र में आ जाये ....

    • 4 hours ago · Like · 4

    • Rakesh Naugain AAP will soon become syndicate of frustrated, unwanted , unviable and rejected politicians.

    • 4 hours ago via mobile · Like

    • Sonu Kanyal आआपा को लोग short cut to power समझ रहे हैं। short cut to money n corruption जब तक ना समझे उम्मीद रखिये

    • 4 hours ago via mobile · Like · 1

    • Kamala Kant Pathak Ye sab UPER WALE KI MAYA H ..KUCH BHI HO SAKTA H UTTARAKHAND ME BS AAP SATH DO HAPPY GHUGUTIYA ...

    • 4 hours ago via mobile · Like

    • Ramesh Singh Bisht Sarkaar Koi Ho,Is AAP Ne 1 Raah To Dikha Hi Di Ki Ab Bhi RAJNITEE Me Kaafi Shuchita Ki Jaroorat Hai.....

    • 4 hours ago via mobile · Like · 2

    • Ajay Kanyal AAP ke pas uttrakhand me kejriwal nahi hai . Karan unhone dhunda hi nahi. Sab power aur ticket ke chakkar me lage hai. Jo niyat dilli me aap ki dikhayi padti hai uska ansh bhi nahi dikh raha hai filhal . Jyada achchhe log chahiye honge aap ko .

    • 4 hours ago via mobile · Like · 1

    • Rakesh Chamder Rayal आपने बिल्‍कुल सही कहा करगेती जी, मै तो कई दिनों से यही सोच रहा हूं, कि वे लोग क्‍यों अपना समय खराब कर रहे हैं, जो राजनीति महत्‍वकांक्षा के चलते 'आप' में शामिल हो रहे हैं, सुना कि कल उत्‍तराखण्‍ड के एक क्षेत्रीय दल ने 'आप' में विलय कर दिया। शायद उसके नेताओं के पास राजनीतिक महत्‍वकांक्षा की तो भरमार है लेकिन, उत्‍तराखण्‍ड के जनमानस भाव को समझने की शक्ति नहीं।

    • 4 hours ago · Like · 3

    • Surindra Singh Bhandari "आप" रोटी,पानी और बिजली की राजनीति कर सत्ता तक पहुँच जायेगी।

    • -क्या काँग्रेस देश को साप्रदायिक ताकतो से बचाने में सत्ता से दूर हो जायेगी ।

    • ये बजरंग दल,हिन्दू सेना,अलानादल,फलानिसेना ये सब क्या..

    • 3 hours ago via mobile · Edited · Like

    • Rajendra Bhatt आप की सदस्यता लेने वाले कुछ लोगों से मैंने सदस्यता लेने का कारण पूछा तो अधिकांश बोले ,,,,,, क्या पता भाई मै भी विधायक और मंत्री बन जाऊँ ।।।

    • 3 hours ago via mobile · Like · 2

    • Shashank Sharma Apna Ghar sudhra nahi... duniya ko sudharne pehle nikal gaye...I had very strong expectations from AAP, but it seems as if they have lost their agenda. Rather than concentrating on Lok sabha 2014 they first should focus and concentrate in solving problems of delhi, where the public has shown their trust on them. Kejriwal ji ko b siyasat ki gandi hawa akhir lag hi gayi!!! Sad but True...

    • 3 hours ago · Edited · Like · 1

    • आनन्द सकलानी और वैसे भी यहाँ अन्ना हजारे होने का भरम टूट ता जा रहा है भाई जी

    • 3 hours ago · Like · 1

    • Kamala Kant Pathak Hume nhi banna mantri vidhayak hum to sirf yeh chate h ki uttarakhand se kura kachara saf ho bhrastachar per jharu lage .... Su sasan ho ... Neta apni hi n soche . Kya esa ho payega AAP se

    • 3 hours ago via mobile · Like

    • Chuyal Chakdait Chakkarchal Chwara kal padhe likhe logo ki nagri kotdwar mai 2700 logo ne AAP ki membership li,iska matlab ab kotdwar wale bhi jamadar ka kam karenge,chalo sahi hai kuch logo ko rojgar to milega,

    • 3 hours ago via mobile · Like

    • Surindra Singh Bhandari फिर नये कुङे -करकट का क्या कीजिएगा...?

    • 3 hours ago via mobile · Like

    • Anand Patwal अब केंजरीवाल को पहले अपनी ही पार्टी पर झाड़ू मारना पड़ेगा क्योंकि काफ़ी कचरा उनकी पार्टी में सामिल हो गया है।

    • 2 hours ago via mobile · Like · 3

    • Surendra Singh Rawat sabhi ke vichar padke acha laga... or me vishes rup se kargeti da ko dhanyawad dena chahunga ki unhone is siyati pehel ki or apne ache viche rakhke logo ko awahan kiya...

    • uper se niche tak comment karne wale sabhi uttarakhandi hai or app sabhi thik se...See More

    • 2 hours ago · Like

    • दिनेश बेलवाल चाहे क्षेत्रीय दल हों या अब आप वाले जब तक यहाँ की जटिल मुद्दो पर कोई बड़े पैमाने पर लड़ाई नहीँ लड़ता तब तक किसी नये दल के लिए संभावना कम है

    • about an hour ago via mobile · Like · 2

    • Surendra Singh Rawat dinesh ji u r rite... problem ye hai ki hum ek nhi ho paa rahe hai kafi samay se.. hum sabhi chah ke v ek nh ho pa rahe hai. ye kaise hoga is pe koi nhi tarika nikalna padega or humare jankar mitr log koi aisa tarika nikal ke hume ek karne me sehyog kar sakte hai.

    • about an hour ago · Like · 1

    • Govind Prasad Bahuguna खंड खंड पाखण्ड -उत्तराखंड

    • about an hour ago · Like · 4

    • दिनेश बेलवाल जी बिल्कुल यह सत्य है,और जिसे हमारे कुछ बिसरे बुद्धिजीवी भी रोना रोते हैं यह तभी संभव है जब हम जैसे बंधुजन इन बुद्धिजीवियों के बिचारों पर चलके उन्हें आगे रखते हुए एक होने का संकल्प लें तभी कुछहोगा

    • about an hour ago via mobile · Like · 2

    • Surendra Singh Rawat agree with mr.belwal ji,,, Requested to Mr Govind prasad ji. please explain your humorous tpic( खंड खंड पाखण्ड -उत्तराखंड). because hume nhi pata ki apke is kathan ka matlab kya hai. hum v jannna chahte hai. taki kuch sachai apke vicharo se v hume mile,, please

    • about an hour ago · Like · 1

    • दिनेश बेलवाल दियर इज नो एण्ड नथिँग खण्ड खण्ड पाखन्ड ओन्ली प्राब्लम इज खण्ड खण्ड ह्यूमैन जिनके कभी बिचार ही नहीँ मिलते,दिस इज अवर ट्रेजडी

    • about an hour ago via mobile · Like

    • Surindra Singh Bhandari रावत जी।

    • शायद यू.के.डी. मैं (ईगो) का शिकार हो गयी।चाक (पहिये) का केन्द्र एक होता है जो स्थित रहता है,तभी पहिया गति से...यदि केन्द्र कमजोर हो...

    • about an hour ago via mobile · Like · 2

    • Surendra Singh Rawat yes bhandari ji apne satya kaha... agar aap Dev Bhumi Uttarakhand ke hit ke baare me sochte ho mujhe apne kathan ka ek chota sa or acha sa upchar bataye.. please

    • about an hour ago · Like · 1

    • Surindra Singh Bhandari हर उत्तराखणङी की तरह मैं भी यू के डी का पक्षधर रहा हूँ । और चाहता हूँ कि लाटा-काला जैसे भी हो उत्तराखण्ङ को खुद नेतत्व दें।कोई सिन्धि या गुजराती या कोई और कैसे....

    • 14 minutes ago via mobile · Like

    • Palash Biswas लेकिन करगेती जी,उत्तराखंड में केदार आपदा के बाद यह स‌बसे बड़ी स‌ुनामी है।हालांकि अभी जान माल के नुकसान की कोई खबर नहीं है।वैसे भी धीमे जहर का असर देर तक होता है।

    • a few seconds ago · Like

Panini Anand

हमारे समय के एक चारण हैं. आजकल वसीम बरेलवी साहेब का एक शेर चुराकर वाहवाही लूट रहे हैं. शेर यूं है कि-


मैं क़तरा होके भी तूफ़ा से जंग लेता हूं,

मुझे बचाना समंदर की ज़िम्मेदारी है.

दुआ करो कि सलामत रहे दुनिया मेरी,

ये एक चिराग कई आंधियों पे भारी है.


अभी एक मित्र चारण विश्वास के इस शेर की तारीफ़ कर रहे थे तो जनहित में यह पोस्ट अपरिहार्य लगा.

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Amalendu Upadhyaya

केजरीवाल और आप के खाते में विदेश से धन आए तो देशभक्ति का और मुजफ्फरनगर में मदरसा संचालक के खाते में आ जाए तो आईएसआई का !

धन्य है ऐसी देशभक्ति

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TaraChandra Tripathi

16 hours ago ·

  • निगरगंड
  • बचपन में दादी कभी-कभी डाँट देती थी। कहती थी निगरगंड सा कहाँ घूम रहा है, जरा पढ़ने.लिखने में मन लगा। यह निगरगंड जिन्दगी भर किसी न किसी रूप में साथ लगा रहा। कभी पुराने अवशेषों की खोज में तो कभी मौज मस्ती में।
  • बेचारे 'निगरगंड' से उसका परिचय पूछ ही नहीं सका। ब्रज साहित्य पढ़ा तो वहाँ निगोड़े और निगोड़ियाँ तो बहुत मिली पर दादी का निगरगंड कहीं नहीं मिला। उसके अंग्रेज सहपाठी वैगाबौंड से भेट अवश्य हो गयी। दीन दुनियाँ से बेखबर। कभी इस पहाड़ पर को कभी उस झरने के किनारे। कोई लक्ष्य नहीं। प्रवाह में पत्ते सा डूबता उतराता जीवन। करतल भिक्षा तरुतल वासः। ऐसा लगता है जैसे तुलसी दास के शब्दों में कह रहा हो- 'काहू की बेटी सों बेटा न व्याहब, काहु की जाति बरेखि न चैहों। तुलसी सरे आम गुलाम है राम को, जा को रुचे सो कहो ओउ.ओऊ। माँगि के खैबो, मसीत के सोइबो, लेवे को एक न देवे को दोऊ'।
  • मेरे विचार निगरगंडपने की व्यंजना करने वाले इन दोनों महापुरुषों में वास्तविक निगरगंडपना तो था ही नहीं। करतल भिक्षा तरुतलवासी शंकर के मन में तो मत-मतान्तरों के विद्वेष और नैतिक अधःपतन के गर्त में विलीन होती भारतीय धर्मसाधना को नया जीवन देने का संकल्प था। इसी लिए वह करतल भिक्षा और तरुतल वास का जीवन जी रहे थे। संसार को दावे के साथ मिथ्या घोषित कर देने के बावजूद, उन्हें लगता था, एक दिन भारतभूमि, शायद भौतिक और सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बँध जायेगी। आशा के इस पाश से वह मुक्त नहीं हो पा रहे थे। 'माँगि के खैबो मसीत के सोइबो' कह कर अपने निन्दकों का मुँह बन्द करने का प्रयास करने वाले राम के सरे आम गुलाम तुलसी भी सच्चे निगरगंड नहीं थे। यदि निगरगंड होते तो नाना पुराण निगमागम सम्मत और क्वचित अन्य को जोड़ कर रामचरित मानस की रचना ही क्यों करते?
  • मुझे लगता है कि अपने दायित्वबोध से लापरवाह, दिन भर गाँव के गली-कूचों में निरुद्देश्य इधर.उधर मुँह मारकर शाम को रोटी तोड़ने के लिए रसोई के आगे पालथी मार कर बैठ जाने वाले पुरुष के लिए ही निगरगंड शब्द का प्रयोग हुआ होगा। नहीं तो दादी ऐसा क्यों कहती?
  • हर्षचरित पढ़ते समय मुझे बार-बार लगा था कि यदि सम्राट हर्ष का इस निगरगंड से परिचय होता तो बाणभट्ट के साथ प्रथम परिचय के अवसर पर वे उनके लिए महानयंभुजंगः जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रयोग न कर केवल निगरगंडः कह कर अपने मन का आक्रोश व्यक्त कर देते।
  • फिर सोचा कि दादी के शब्द-समूह में यह निगरगंड आया कहाँ से? गंड, संस्कृत में है भी तो गालों के लिए । हाथी के गंडस्थल और आदमी के गले में आयोडीन की कमी से बलात् उभर कर झाँकने वाले गंड या घेघे के अर्थ में। ज्योतिष में है तो एक योग विशेष के अर्थ में। गंड से छोटा पर नाम में बड़ा एक शब्द है गंडा । आर्य परिवार का तो है नहीं, देशज होगा। पहलवानों के अखाड़े में अक्सर गुरु लोग किसी को चेला स्वीकार करते समय उसके गले में गंडा बाँधते हैं और गाँव घरों में बच्चों को कुदृष्टि और पे्रत बाधा से बचाने के लिए भी गंडा बाँधा जाता है। भिक्षाटन के लिए आने वाले फकीरों की कमाई का तो यह एक अच्छा खासा स्रोत है। काले कपडे़ में बँधा ताबीज। कभी भुजबन्ध की तरह तो कभी कंठहार की तरह। केवल गले पड़ने के अलावा इस गंडे में और हमारे निगरगंड में कोई संबंध नहीं है।
  • खैर छोड़िये । इस निगरगंड के मूल की बात करें।
  • मै यह बताना चाह रहा था कि मुझे, अपने गाँव देहात का यह निगरगंड अपने पूरे फार्म में कन्नड़ में मिला। निग्गेडिगंड। निर्लज्ज पति या पुरुष। तमिल कोडवन। इस हिसाब से घिसा.पिटा तो निगोड़ा और जगह भी था, पर यहाँ अपने ऐसे अनेक यार दोस्तों के साथ था जो कभी भटक कर हिमालय की पहाड़ियों में भी जा पहुँचे थे या बिलोचिस्तान में बोली जाने वाली द्रविड़ भाषा ब्राहुई की तरह ही कभी पहाड़ पर भी विद्यमान थे।
  • अच्छा लगना के लिए ब्रज में एक शब्द है नीक। 'मोहे लागत वृन्दावन नीको'। बेचारा कभी पहाड़ आया होगा। रास्ते भर कहीं नहीं रुका। सीधा गंगोलीहाट पहुँचा। थकान के मारे नीक का निक ही रह गया। ऐसा ही 'गट' है। कहते हैं 'बुरा' है। गंगोलीहाट की एक लड़की बहुत पहले बहू बन कर मेरे गाँव आयी थी। चाय के साथ मिठास के लिए सास ने उसे गट दिये। गट मीठे लगे। बोली गट.गट कुनान निक.निक हुनान ( इन्हें गट.गट या बुरा.बुरा कहते हैं पर लगते बडे़े अच्छे हैं) गंगोली में गट 'बुरे' का समानार्थक भले ही हो पर मेरे गाँव में तो शक्कर की गिट्टी का नाम था। उस बहू का गट.गट कुनान निक.निक हुनान, पीढ़ी दर पीढ़ी एक यादगार वाक्य बन गया। यह गट कहाँ से गंगोली पहुँचा इसका कुछ पता नहीं है।
  • सुबह अधूरी नींद में ही चाय की घूँट ली थी कि वह बहुत गरम लगी। पत्नी से कहा इतनी चुड़कन चाय क्यों देती हो? चुड़कन कह तो दिया। फिर सोचने लगा यह 'चुड़कन' आया कहाँ से ? संस्कृत मे चूडकः शब्द तो है पर कुएँ के अर्थ में और यदि चूड़ा है तो बालों की चोटी या शिखा के संबंध में। इसके साथ कर्म जुड़ा नहीं, कि सिर के बालों की शामत आ जाती है। पर चुड़कन तो केवल बहुत गरम द्रव से संबंधित है। संस्कृत के चूडकः या चूडा से दूर.दूर तक इसका कोई संबंध नहीं है। उत्तराखंड से बाहर हिन्दी प्रदेश में तो चुड़कन जैसा कोई शब्द है ही नहीं। लगा कहीं यह द्रविड़ भाषाओं से तो नहीं आया है। देखा तो महाशय तमिल भाषा के 'चुडु ( गरम) हैं और पता नहीं अपनी गरमी को कम करने के लिए कब से पहाड़ की ठंडी हवा खा रहे हैं.
  • मेरे मन को भी चैन नहीं है। चुड़कन का ठिकाना क्या पता लगा, चुडै़ल सताने लगी। स्वभाव से गरम नहीं होती तो चुडै़ल ही क्यों कहलाती ? पर यह नाम उसे स्वभाव से नहीं निवास.स्थान से मिला है। तमिल में श्मशान के लिए चुडल शब्द हैै। जिसका घर ही चुडल में हो और स्वभाव भी चुडु या गरम हो तो उसे चुड़ैल ही तो कहा जायेगा! यदि घर मेें ही ऐसा कुछ हो तो किसी को भी सत्यनारायण कविरत्न बनते देर नहीं लगती। 'भयो क्यों अनचाहत को संग।
  • तमिलनाडु से तो चुडै़ल कब की गायब हो गयी है, होगी भी तो राजनीति में होगी, लेकिन यहाँ अन्धविश्वासों और सामन्ती आतंक के अँधेरे में पलते.बढ़ते समाज में चुड़ैल का भय न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता।
  • ऐसा ही एक शब्द है टोट। टो पूरा नहीं अधूरा, ह्रस्व 'टो'। टोटा शब्द तो हिन्दी में भी किसी चीज की कमी होने का बोधक है पर पहाड़ में तो यह मलयालम तोट्र (छेद) की कार्बन कापी है तो इसका चचेरा भाई दु ( बिल) केरल में दुंक बना बैठा है। सुदूर केरल से ये शब्द हिमालय में कब आये या किसी जमाने में हिमालय में भी रह चुके द्रविड़ चिरुक (मलयालम)- कु. शिरु, (बिल्ली), कटेरि (तमिल) - कट्याड़ (पाड़ा), चुडु -गरम - चुड़कन, चुडै़ल के हेडक्वार्टर चुडल(तमिल) श्मशान जैसे ढेरों शब्द हिमालय में विचरण करते हुए दक्षिण पहुँचे, कहा नहीं जा सकता।
  • वैसे हमारे पूर्वज निगरगंड नहीं थे। उनका अपना कुल था, ग्राम थे, ग्रामों के अधिपति ग्रामणी थे, विश थे, विशपति थे, जन थे, जनों के अधिपति राजा थे। राजा को नियंत्रित करने के लिए सभा थी, समितियाँ थीं। एक सोची समझी व्यवस्था थी। यह अवश्य था कि द्यूत क्रीड़ा में अपनी पत्नी और घर-द्वार उजाड़ देने वाले लोगों की भी कमी नहीं थी। मौके.बेमौके युद्ध में थर-थर काँपने वाले को युघिष्ठिर, जुए में पत्नी को हार बैठने वाले और बहाने से अश्वत्थामा हतः नरो वा कुंजरो वा कह कर झूठ बोलने के आरोप से बचने की चेष्टा करने वाले को धर्मराज उपाधि देने और सत्ता से च्युत होकर विपक्ष में बैठने वाले सुयोधन को दुर्योधन बनाने में वे भी पीछे नहीं थे।
  • शब्दों का भी क्या । शब्दों से बड़ा निगरगंड कोई और मिलेगा क्या? किसके साथ आये कुछ पता नहीं। जहाँ मन आया वहीं रुक गये। रच बस गये। जिसके साथ आये थे वह कहाँ गया, कुछ अता.पता नहीं, लेकिन ये साहब हैं, जो यह बताने के लिए कि वे किसके साथ आये थे, अभी तक जमे बैठे हैं लोग हैं कि सुनते ही नहीं।
  • (मेरी प्रकाशनाधीन् पुस्तक 'शब्द, भाषा और विचार' के एक निबन्ध से)
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    • चन्द्रशेखर करगेती and 2 others like this.

    • Anil Joshi aisa hi ek aur Kumaui shabda hai :"anudwaan",jo hum par kai baar aropit kiya gaya

    • 16 hours ago · Like · 1

    • Ravi Pande शब्दों का भी क्या । जब भी मैं शाररत करता था!!!!! मेरी अमा यह कहना होता था।. ऐसा बेटा अक्ल का टापू!!!!! मथ में पत्थर!!!! मुन में आपु !!!!!! आज मैं जीवन के इस पायदान में भी इसका मतलब समझ न पाया !!!!!!

    • 16 hours ago · Like

    • TaraChandra Tripathi अनुड्वान संस्कृत साँड का पर्याय है. प्रथमा में इसके रूप अनुड्वान् अनुड्वांसौ, अनुड्वांस: हैं.

    • 16 hours ago · Like · 1

    • TaraChandra Tripathi पांडे जी!आमा के मायके जाकर् किसी बूढ़ी महिला से पूछिये तो. वैसे में भी इन् शब्दों के गोत्र का पता लगाने का प्रयास करूंगा. ऐसे और् भी शब्द हों तो बताइएगा.

    • 16 hours ago · Like · 1

    • TaraChandra Tripathi अनुड्वान तो निगरगंड का बिगडैल भाई है पता नहीं कब सींग मार दे!

Palash Biswas आप का स‌ारा लिखा,एक एक पंक्ति हम अपने ब्लागों में लगा रहे हैं।आपकी इजाजत के बिना।मुझे लगता है कि ापका कापीराइटहमारे पास है।



चन्द्रशेखर करगेती

Yesterday at 2:19pm · Edited ·

  • UKD को चाट गयी सत्ता की दीमक ! इससे कैसे निपटोगे ऐरी जी ?
  • उत्तराखंड की सियासी जमीन पर मजबूत पकड़ बनाने की सबसे ज्यादा संभावनाएं अगर किसी राजनीतिक दल की रही तो वह यूकेडी था । सूबे के बड़े तबके ने इसे क्षेत्रीय जनाकांक्षाओं के प्रतीक के तौर पर देखा । मगर इसके बावजूद राज्यवासियों ने मुख्य धारा की दो बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस पर ही भरोसा किया क्योंकि यूकेडी ने उसके भरोसे को बार-बार तोड़ा । यूकेडी नेताओं की सत्ता लिप्सा ने पार्टी को खोखला कर दिया । ऐसा नहीं कि यूकेडी की दुर्गति के बाद सूबे की सियासत में तीसरी धारा के लिये खालीपन न बचा हो । अब भी ये खालीपन बना हुआ है । इसे भरने के लिए सूबे में शायद ही किसी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीतिक दल ने उगने की कोशिश न की हो । मगर सबने छोटे स्वाथरें में फंसकर बड़े लक्ष्यों को गंवा दिया । आम आदमी पार्टी भी इस खालीपन को भरने के लिए मचल रही है ।
  • राज्य गठन के बाद जब यूकेडी को मुद्दों पर फोकस कर जनाधार को मजबूत करना था, तभी वह सरकारों की कठपुतली बन गया। राज्य के पहले विधानसभा चुनाव (वर्ष 2002) में यूकेडी ने चार सीटें जीतीं । यूकेडी राज्य की इस पहली निर्वाचित कांग्रेस सरकार का हिस्सा नहीं रहा, लेकिन सरकार के खिलाफ भी खड़ा नहीं हुआ । खांटी राजनीतिज्ञ व तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी समय-समय पर यूकेडी के विधायकों को पुचकारते रहे । लिहाजा यूकेडी सशक्त विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पायी । पूरे पांच साल तक जनसमस्याओं को लेकर सड़क से सदन तक यूकेडी का संघर्ष देखने को नहीं मिला । मिला भी तो महज दिखावे के रूप में । उसमें यूकेडी के आचार-व्यवहार के मुताबिक दूर-दूर तक गंभीरता नजर नहीं आयी । इसका परिणाम यह हुआ कि अगले विधानसभा चुनाव (वर्ष 2007) में यूकेडी को सिर्फ तीन सीट ही हासिल हो पाईं और वोट प्रतिशत भी कम हो गया । लेकिन इस बार यूकेडी खुद को सरकार में शामिल होने से नहीं रोक पाई और अपने मिजाज से मैच न खाने वाली भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने को तैयार हो गई । भाजपा ने यूकेडी को कैबिनेट मंत्री का एक पद दिया और यही पद उसके बिखरने का कारण भी बना । लगभग तीन वर्ष तक यह गठबंधन ठीक चला लेकिन दिसंबर 2010 में यूकेडी ने सरकार से सर्मथन वापस लिया ।
  • बस यहीं से यूकेडी का बिखराव भी शुरू हो गया । दल का एक धड़ा कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट के नेतृत्व में सरकार के साथ जमा रहा, जबकि दूसरा गुट सर्मथन वापसी के साथ ही सरकार से अलग हो गया । नतीजा यह हुआ कि पार्टी दो गुटों दिवाकर भट्ट यूकेडी (डी) और त्रिवेंद्र सिंह पंवार यूकेडी (पी) में बंट गई । मामला राष्ट्रीय चुनाव आयोग में पहुंचा । आयोग ने पार्टी के चुनाव चिह्न् कुर्सी को फ्रीज कर दिया। किसी भी गुट को यह चुनाव चिह्न् आवंटित नहीं किया । दिवाकर गुट के दोनों विधायकों दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल रावत ने वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव भाजपा के चुनाव चिह्न् पर लड़ा, लेकिन दोनों हार गए, जबकि पंवार गुट प्रीतम सिंह पंवार की जीत के साथ केवल एक सीट यमुनोत्री से जीतने में कामयाब रहा । एक मात्र विधायक के साथ यूकेडी (पी) ने एक बार फिर कांग्रेस की सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया । यूकेडी ने 9 मुद्दों पर भाजपा को सर्मथन दिया । सियासी समझौते के तहत कैबिनेट मंत्री का एक पद फिर से यूकेडी के हिस्से में आ गया । विधायक प्रीतम सिंह पंवार कैबिनेट मंत्री बने लेकिन यूकेडी ने एक साल के भीतर ही सर्मथन वापस ले लिया । यूकेडी (पी) संगठन ने राज्यपाल से मिलकर 13 मार्च 2013 को कांग्रेस से सर्मथन वापस ले लिया, लेकिन प्रीतम सिंह सरकार के साथ बने रहे । यूकेडी (पी) अध्यक्ष त्रिवेंद्र सिंह पंवार ने कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह पंवार को पार्टी से निलंबित कर दिया । उत्तराखंड आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने वाला उत्तराखंड क्रांति दल फिर बिखर गया ।
  • यानि, जब-जब यूकेडी सत्ता में शामिल हुआ, तब-तब सत्तालोलुपता उसकी टूट का कारण बना । दल का जो भी विधायक सरकार में मंत्री बना वो सरकार का ही होकर रह गया । पिछली बार भाजपा सरकार में शामिल दोनों विधायक दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल रावत ने तो बाद में अपने दल के चुनाव चिह्न् पर चुनाव लड़ना तक मुनासिब नहीं समझा और बीजेपी के चुनाव चिह्न् पर वे चुनाव मैदान में कूदे । अब देखना होगा कि इस बार सत्ता से जुड़े यूकेडी विधायक प्रीतम सिंह पंवार का क्या रुख रहता है । विधानसभा चुनाव से पूर्व वो यूकेडी में लौटते हैं या फिर कांग्रेस का दामन थामते हैं ।
  • वर्तमान में स्थिति यह कि उत्तराखण्ड का एक मात्र क्षेत्रीय दल यूकेडी एक नहीं कई गुटों में बंटा हुआ है । इनमें से मूल यूकेडी कौन सी है, फर्क करना बड़ा मुश्किल है । उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई में जिस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही हो, उसके नेताओं के बीच आपसी फूट और पूरे संगठन का ऐसा हश्र निश्चित ही बहुत दुखद और चिंतनीय है । बेशक उत्तराखंड आंदोलन की बागडोर यूकेडी के हाथ में रही, लेकिन पार्टी संघर्ष को वोट में नहीं बदल पाई । इस वक्त लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी इस पार्टी के पास न तो प्रत्याशी हैं और न कार्यकर्ता । अब ऐसी स्थिति में उत्तराखण्ड के लोग भी तीसरे विकल्प के लिये आम आदमी पार्टी की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं ।
  • साभार : दैनिक जनवाणी
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    • Govind Raju, Devki Nandan Bhatt, Dataram Chamoli and 55 others like this.

    • Rakesh Madhwal Filhal aapsi mar kutayi se iss party ka naam surkhiyon me rahra hai.

    • Yesterday at 2:26pm via mobile · Like

    • Govind Prasad Bahuguna व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं के चलते ये लोग पब्लिक सेंटिमेंट्स को use नहीं कर सके ,तीन सदस्य उनकी अपनी अपनी राहे

    • Yesterday at 2:46pm · Like · 6

    • Narendra Singh Kharayat BJP,Congress,AAP ke bajay ek regional party honi chahiye, isliye UKD ko pehal karni chahiye aur party ko punarjivit karne ki aawasyakta he. Narendra Singh Negiji jaise logon ko kamman sambhalni chahiye.

    • 22 hours ago · Like · 2

    • Pankaj Bhatt abhi bhi umeed hai ki ukd apni purani chhabi wapas layegi log abhi ukd saath dena chahte hain lekin ukd ke neta hain ki ye kisi ka saath nahi chahte . . . .

    • 22 hours ago via mobile · Like · 5

    • Mohit Pokhriyal jo jo party successful hui hai uske piche ek majboot "aalakamaan" ka haath hona bhi hai....UKD me bhi jarurat hai ek aise majboot "aalakamaan" ki, jiski baatein party ka har karyakarta ko manni pade...UKD aaj jis esthithi me hai iska jimmedar iss party me koi majboot aalakamaan na hona hi hai...sab yaha apni apni chalaate hai, koi kisi ki ni suntaaa....

    • 22 hours ago via mobile · Edited · Like · 2

    • D.s. Rawat सहमत

    • 22 hours ago via mobile · Like · 1

    • Pooran Pande Ji sahmat hu

    • 21 hours ago · Like · 1

    • Shyam Singh Rawat उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने की लड़ाई में जिस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, उसके नेताओं के बीच व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं के चलते आपसी फूट और पूरे संगठन का ऐसा हश्र निश्चित ही बहुत दुखद और चिंतनीय है।

    • 18 hours ago · Like

    • Rawat Birendra Singh भाई ukd nahe छुकेडी है  इनके पीछे क्यो पडे है आप ।

    • 17 hours ago via mobile · Like

    • Binod Singh Rautela maine aaj tak vipin da jaisa leader ni dekha.. Unhone is party ke bahut kuch kiya.. Par ek cheez jarur hai hum uttrakhandi kbi ek ho hi ni sakte.. Aur ye kahawat to mujhe humuttrakhandiyo pr hi sbse jyada fit hoti dikhti hai ki insan apne dukh se jyada dusrso ke sukh se dukhi hai..

    • 15 hours ago via mobile · Like · 2

    • Shastrisir Tiwari Hakikat bayan hui. Par Aam Aadmi Party ka uttarakhand rajya k liye kuchh b vishesh soch ab tak n dekhi gayi. Ha, ye baat alag hai ki election ne sabhi political parties SHRI RAM HI SE LEKAR RAWAN TAK Ki bhalai ki hi baat karti hai.

    • 13 hours ago via mobile · Edited · Like · 2

    • Dharmendra Chef Lal UKD hai kahaan ? uttarakhand ke bure haal ho gaye , uttarakhand ke ban'ne ke baad ukd ya to congress ya fir bjp mein vilay ho gai ,uttarakhand ka krantidal kranti kar kahaan rhaa hai ,vo to uttarakhand banjaane ke baad ukd ke kaaryakartaa to vyaktigat SWARTHON mein ghul milgaye , kranti agar jeevit hoti to uttarakhand ke itney bure haal nhi hote !!

    • 14 hours ago · Like · 4

    • Palash Biswas स‌हमत।बहुत स‌ामयिक विश्लेषण।

    • a few seconds ago · Like

Jagadishwar Chaturvedi

आम आदमी पार्टी का उभार देखकर अनेक लोग यह कहने लगे हैं कि अब तो अस्मिता की राजनीति का अंत हो गया है। जाति,धर्म,लिंग आधारित राजनीति के दिन लद गए हैं,हम इस तरह की धारणा रखने वालों से असहमत हैं। आम आदमी पार्टी तो अस्मिता की राजनीति का महाकुंभ है। इसके अंदर सभी अस्मितापंथी अपने टेंट लगाकर लोकतंत्र का कुंभ स्नान कर रहे हैं ।

Like ·  · Share · 3 hours ago near Calcutta ·

Jagadishwar Chaturvedi

हम मान लेते हैं मोदी पीएम बन गए हैं!! और ७रेसकोर्स में सपत्नीक रहते हैं !!लेकिन टीवी चैनल वालो ,ज़रा देश की ओर देखो पीएम मोदी क्या काम करेंगे या कर रहे हैं!! क्या नीति होंगी या कौन सी नीति लागू करेंगे ?

कम से कम थोड़ी शर्म करो और कहो कि मोदी पीएम के रुप में क्या काम कर रहे हैं ? ज़रा सर्वे करने वाली कंपनियाँ देश की समस्याओं पर भी नज़र लगाएँ और सर्वे लाएँ !!जब कल्पना में मोदी पीएम बनाए जा सकते हैं तो फिर कुछ सर्वे जनसमस्याओं पर मोदी के हंटरवाले मार्का एक्शनों की काल्पनिक कहानियों पर भी कुछ एपिसोड हो जाएँ तो मज़ा ही आ जाए !!!

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Sudha Raje shared JAN Sandesh Times's photo.

शुभकामनायें मकर संक्रान्ति की

aapka kya kahna hai ???

Unlike ·  · Share · 4 hours ago ·

जनज्वार डॉटकॉम with Yuva Bol Patrika

ये रूढ़ीवादी राजनीतिक सामंत 'भारत माता की जय' बोलकर विकेकानंद को हथिया रहे हैं और उनके जन्मदिवस पर उनकी तस्वीर के सामने गाना गा रहे हैं कि जागो हिंदू देश तुम्हें पुकार रहा है, इसे फिर से विश्व गुरु बनाना है...http://www.janjwar.com/janjwar-special/27-janjwar-special/4692-kabkaye-jane-lage-hain-ab-mahapurush-bhi-by-anurag-anant-for-janjwar

Like ·  · Share · Yesterday at 2:05pm ·

Dilip C Mandal

प्रश्न यह नहीं है कि आप किसी जाति को अपना मानते हैं या नहीं. सवाल यह है कि क्या कोई जाति है जो आपको अपना मानती है और आपकी जीत पर मिठाई बांटती है.... http://www.bhaskar.com/article/MAT-HAR-OTH-c-95-153172-NOR.html


केजरीवाल के सीएम बनने पर खुशी मनाई

bhaskar.com

भास्कर न्यूज -!- फतेहाबादअग्रवाल महासभा की बैठक अग्रवाल धर्मशाला में हुई। बैठक की अध्यक्षता प्रधान मदन बंसल ने...

Like ·  · Share · 22 minutes ago ·

Aam Aadmi Party

8 hours ago

Why the Arvind Kejriwal effect is growing?


In his first two weeks in office, the new broom sweeping through Indian politics seems to be proving the old rule that if everyone's attacking you, you must be doing something right.


Or to put it another way, the new Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal is showing just how much the established political order of the Congress Party and the opposition BJP is running scared.


Read more: http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-india-25724141 — with Sukhpal Yadav and 9 others.

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Aam Aadmi Party

12 hours ago

AAP govt says no to FDI in multi-brand retail in Delhi. Fulfills another manifesto promise!


Reversing the earlier policy, the Aam Aadmi Party-led Delhi government has written to the Centre that it will not allow multi-national companies to set up multibrand retail stores in the state.


Delhi has become the first state to withdraw permission for FDI in retail sector. The Aam Aadmi Party (AAP) in the party manifesto had expressed its opposition to the policy of FDI in multi-brand retail.


Read more: http://ibnlive.in.com/news/delhi-government-writes-to-dipp-for-not-allowing-fdi-retail-stores/445095-37-64.html — with Renjith Vilakudy Renjith and 22 others.

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Aam Aadmi Party

14 hours ago

"AAP does not believe in any '-isms'," - Yogendra Yadav


The Aam Aadmi Party's (AAP) fundamental concern is to devolve power to the people by ensuring direct participation in decision making. What is being called success is actually a very partial success. After all, we were technically the runners-up in Delhi. Normally, the party which gets this much of votes and seats should not draw this kind of attention.


The reason why we look successful is that more than an electoral...See More — with Sudhir Khimta and 9 others.

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Aam Aadmi Party

January 13

Helpline no for nursery admissions in Delhi: 011-27352525


नर्सरी में अपने बच्चों का एडमिशन कराने जा रहे अभिभावकों की सुविधा के लिए दिल्ली सरकार ने आज से एक हेल्पलाइन शुरू की है। हेल्पलाइन नंबर है- 011-27352525। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज दिल्ली सचिवालय में हेल्पलाइन नंबर का उद्घाटन किया।


यह हेल्पलाइन नंबर शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया की निगरानी में काम करेगी। अभिभावकों की सुविधा के लिए व...See More

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Aam Aadmi Party

January 13

Heartiest wishes for Lohri, Makar Sankranti and Pongal.

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आप सभी को लोहड़ी, मकर संक्रांति और पोंगल की शुभकामनाएं! — with Arora Classes Bathinda PB and 46 others.

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Aam Aadmi Party

January 13

Social activist Medha Patkar on Monday announced that the Narmada Bachao Andolan will back Aam Aadmi Party. She, however, refrained from clarifying whether she would contest elections for the party in the upcoming Lok Sabha elections.


Speaking about the new brand of politics introduced by Arvind Kejriwal's AAP, Patkar said that the party had shown that politics could be clean and corruption free.


"AAP has taken up the cause of common people. No equality in India even though the Constitution guarantees it. We have been fighting for justice, equality for many years," Medha Patekar.


When asked if she would join AAP, Patkar said, "We will need to consult a number of people leading various people's movement. We need to consult them." — with Ayush Jindal and 5 others.

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Aam Aadmi Party

January 13

AAP Rally in Amethi (5 photos)

AAP held a massive rally in Gandhi Family bastion Amethi and put out a challenge to the dynastic politics. Will BJP also dare to challenge this?

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Aam Aadmi Party

January 13 · Edited

Two former top government officials, including a bureaucrat, will help the Aam Aadmi Party (AAP) government in Delhi realise its promise of 'swaraj' and monitor the anti-corruption helpline for the people - at a token salary of Rs. 1 a month.


Former Madhya Pradesh chief secretary S.C. Behar, the man behind the successful concept of 'gram swaraj', that helped bring decision-making powers to the village level in the state, is to work at the token salary to help the AAP governm...See More — with Duvvuru Ashok Kumar Reddy and 11 others.

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Aam Aadmi Party

January 13

Huge crowd gathers at #AAP jansabha in Amethi.


"It is not the work of an MP to eat at the home of a dalit, instead, he should, while eating at his home, worry if all the dalits in his constituency have got food," Dr. Kumar Vishwas — with Abhinav Yadav and 11 others.

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Aam Aadmi Party

January 12

Delhi government's stand on reservations in colleges funded by Delhi government has more to do with our concern for the fate of the 2.65 lakhs students graduating from Delhi schools each year than with regionalism. We condemn regionalism and do not support it in any form.


Manish Sisodia explained he is working on a roadmap for the 2.65 lakh students who complete schooling in Delhi and that reservations are a part of the roadmap which will also consider other institutions of...See More — with Akhilendra Singh and 3 others.

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Aam Aadmi Party

January 12

Flying Sikh Milkha Singh's daughter joins AAP in Chandigarh. — with Raghvendra Choudhary and 23 others.

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