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Saturday, August 16, 2014

जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो पलाश विश्वास

जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो

जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो

पलाश विश्वास

खबर है कि उत्तराखंड में कई स्थानों पर हुई बारिश के कारण कई जगहों पर भूस्खलन हो गया। इससे चार धामों को जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों सहित कई सड़कों पर ट्रैफिक थम गया। नेपाल में पिछले तीन दिनों से बारिश जारी है इससे वहां बाढ़ का कतरा मंडरा रहा है। नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलन से अबतक 34 लोगों की जान जा चुकी है।  


खबर है कि दक्षिणी-पश्चिमी चीन के सिचुआन सूबे में हुई मूसलाधार बारिश के बाद वहाँ हुए भूस्खलन में फँसे क़रीब डेढ़ हज़ार लोगों को बचाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया गया है। चीन के सूखा और बाढ़ बचाव विभाग ने यह जानकारी दी है।


खबर है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की नई टीम का ऐलान कर दिया गया है। टीम में 8 महासचिव और 11 उपाध्यक्ष शामिल हैं। जेपी नड्डा, राजीव प्रताप रूडी, मुरलीधर राव, राम माधव, सरोज पांडेय, भूपेंद्र यादव, आरएस कटेरिया और राम लाल (संगठन) को महासचिव बनाया गया है। पार्टी के संविधान के अनुसार दो और नेताओं को महासचिव बनाया जा सकता है। लेकिन बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की टीम में महासचिव रहे वरुण गांधी का नाम अमित शाह की नई टीम से गायब है। जबकि उनके नाम को तय माना जा रहा था।


बीजेपी ने बी दत्तात्रेय, बीएस येदियुरप्पा, सतपाल मलिक, मुख्तार अब्बास नकवी, पुरुषोत्तम रुपाला, प्रभात झा, रघुवर दास, किरण माहेश्वरी, रेनू देवी, दिनेश शर्मा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है।

मुक्तबाजार का जलवा ऐसा कि धर्मप्राण भारत के मनुस्मृति अनुशासन को कृतार्थ करते हुए प्लेब्वॉय पत्रिका ने मॉडल शर्लिन चोपड़ा का न्यूड फोटो जारी किया है। यह फोटो शूट उन्होंने दो साल पहले करवाया था। इसके साथ ही वह भारत की ऐसी पहली मॉडल बन गईं हैं जिसका न्यूड फोटो प्लेब्वॉय में छापा गया है। शर्लिन कामसूत्र 3डी से चर्चा में आयीं थीं।


बाबा नागार्जुन की कविता से भी लोगों को एलर्जी होने लगी है।उनकी कविता पोस्ट करने से देशभक्ति के अजब गजब माहौल में व्यवधान पड़ता नजर आ रहा है केसरिया पहाड़ के लोगों को।चंद्रशेखर करगेती ने अपने पोस्ट के पक्ष में क्या कोट किया है।


जो धर्मप्राण आस्थासंपन्न लोग हैं,उन्हें केसरिया नवउदारवाद की भाषा समझ में नहीं आ रही है,वे आनंद तेलतुंबड़े को अवश्य पढ़ लें,तभी करगेती का कहा समझ में आयेगा।


समयांतर के ताजा अंक से ऐसी धर्मोन्मादी धार्मिक देवभूमि भूगोल के लोगों की मदद के लिए आनंद का नियमित स्तंभ शुरु किया गया है।जाहिर है कि हम उनकी तरह अवधारणाओं के स्तर पर गहराई से प्याज की परतें निकाल नहीं सकते।


बहरहाल करगेती का यह उद्धरण एक भुलाये हुए शख्स से जुड़ा है,जो हिंदी दुनिया में काफी बदतमीज माने जाते रहे हैं और हाल में दिवंगत होने के बाद किसी ने कायदे से उन्हें याद नहीं किया है।


समयांतर के ताजा अंक में आनंद तेलतुंबड़े के केसरिया नवउदारवाद वाला लेख और पंकज दाज्यू का संपादकीय जरुर पढ़ लेना।सुबह ही पंकज दाज्यू से लंबी बात हुई,उन्होंने कंटेट भेजा भी,खुल नहीं रहा है।फिलहाल आपका कोटः


आपको कुछ और अधिक समझने में आसानी होगी.......


नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम

बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

ज़िन्दाबाद इन्क़लाब – २


जहाँ आवाम के ख़िलाफ़ साज़िशें हो शान से

जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो

जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो

वहाँ न चुप रहेंगे हम

कहेंगे हाँ कहेंगे हम

हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

इन्क़लाब इन्क़लाब -२


यक़ीन आँख मूँद कर किया था जिनको जानकर

वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तान कर

उन्ही की सरहदों में क़ैद हैं हमारी बोलियाँ

वही हमारी थाल में परस रहे हैं गोलियाँ

जो इनका भेद खोल दे

हर एक बात बोल दे

हमारे हाथ में वही खुली क़िताब चाहिए

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

ज़िन्दाबाद इन्क़लाब


उन्ही की आह बेअसर उन्ही की लाश बेकफ़न

लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके

करें तो क्या करें भला जो जी सके न मर सके

स्याह ज़िन्दगी के नाम

जिनकी हर सुबह और शाम

उनके आसमान को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिए

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

ज़िन्दाबाद इन्क़लाब -2


तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर

निगाह डाल सोच और सोचकर सवाल कर

किधर गए वो वायदे सुखों के ख़्वाब क्या हुए

तुझे था जिनका इन्तज़ार वो जवाब क्या हुए

तू इनकी झूठी बात पर

ना और ऐतबार कर

के तुझको साँस-साँस का सही हिसाब चाहिए

घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

ज़िन्दाबाद इन्क़लाब


नफ़स-नफ़स, क़दम-क़दम

बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

घिरे हैं हम सवाल से, हमें जवाब चाहिए

जवाब दर-सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

जहाँ आवाम के ख़िलाफ साज़िशें हों शान से

जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

वहाँ न चुप रहेंगे हम, कहेंगे हाँ कहेंगे हम

हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

ज़िन्दाबाद इन्क़लाब


साभार : शलभ श्रीराम सिंह


दिखने में वामपंथी,लेकिन हिंदी के मौजूदा परिदृश्य पर  भीतर से घनघोर संघी अमेरिकापरस्त प्रतिष्ठानिक बाजारु जेएनयू वर्चस्व का यह नतीजा कि प्रेमचंद भी गैरप्रासंगिक करार दिये जा रहे हैं।


लगता है कि इस जेएनयू विशेषज्ञों की खबर भी लेनी पड़ेगी।हम भी शलभ श्रीराम सिंह या ओम थानवी से कोई कम बदतमीज नहीं हैं।यह बदतमीजी इस बदतमीज दौर के मुकाबले के लिए बेहद जरुरी है।


इतिहास बदल रहा है,साहित्य बदल रहा है,संस्कृति बदल रही है,समाज बदल रहा है,शहर बदल रहे हैं,देहात बदल गया है,बदलने लगे जल जंगल जमीन समुंदर घाटियां,उत्तुंग शिकर और हिमप्रवाह  और हिमालय साक्षी है कि भूगोल भी बदल दिया जा रहा है।


लगे रहो करगेती भाई।इस बहस से बचने की कोशिश न करना।क्योंकि सेज स्मार्ट सिटी नवधनाढ्य सांढ़ संस्कृति का पहला बलि हिमालय ही होगा।गंगा अब मैदानों में गंगा शुद्धिकरण के बावजूद कब तक बह सकेगी,इस पर विचार करना जरुर।


देहरादून में पुणे जैसी पहाड़ धंसने से अभी सात लोग मरे हैं और बचाव अभियान लाइव है।पुणे में कितने मरे,लोग बहुत जल्दी भूल गये जैसे केदार जलप्रलय की लाशों को भूल गया है देश।जैसे भूस्खलन,बाढ़,भूकंप,सुनामी से ध्वस्त विध्वस्त जनपदों के रेगिस्तान में होता है निर्माण विनिर्माण।


देहरादून फिर भी मुक्तबाजारी उत्तराखंड की राजधानी है।


बाकी पहाड़ के भूगोल में,हिमालय के अंतःस्थल में जो जलप्रलय जारी है,उसे बयां करने के लिए गौर्दा या कमसकम गिर्दा जैसी लोक विरासत के जानकार न हम हैं और न आप है।


बलि,गिर्दा को याद रखने वाले लोग अब भी पहाड़ में हैं।भास्कर उप्रेती में शैले हाल में एक आयोजन की खबर की है।गिर्दा को ब्रांड में तब्दील करना है तो दिल्ली मुंबई से उन्हें लांच करना बेहतर होगा।


वरना इस व्यवस्था पर थूकने वाले बेतरतीब महाबदतमीज गिर्दा की असली विरासत तो पहाड़ों और मैदानों में अविराम जारी विनाश लीला के खिलाप हुड़किया अलख जगाने का अविराम जागर  जनजागरण है।


गिर्दा आदमी नहीं,जिंदा आंदोलन है,जो मरा नहीं,राख के नीचे सुलग रहा है अब भी।गिर्दा को याद करे से पहले राख में खाक उस आग की तपिश को दिलो दमिमाग में महसूसे तो कोई बात बने।फिर बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी बातें।


हिमालयी यंत्रणा संसाधनों के अधिकतम उपयोग के मुक्तबाजार में कैसे कैसे अभिव्यक्त होनी है,इसकी कल्पना करने की तकलीफ उठाना भी जरुरी नहीं है।

यह ज्वलंत वास्तव है इस देश का,जिसेस हम पल छिन मुंह चुराने की कला में पारंगत अभ्यस्त हैं।क्योंकि यह वास्तव ने शर्लिन चोपड़ा है, नसनी लिओन और न ही करीना कैटरीना और न हालीवूडी बालीवूड फिल्में न जोधा अकबर है और न डीवी का महाभारत रामायण।


हिमाचल और उत्तराखंड देवभूमियों में हिंदू शास्त्रों के सकल देवदेवियों के साथ साथ गांव गांव में गोल्ल ज्यू महाराज और खासतौर पर हिमाचल में दैवी राजकाज,दैवी पंचायत की अटल उपस्थिति  के बावजूद प्रलयंकारी जो परिश्तितियां घनघोर है,उनसे निपटने के लिए वस्तुनिष्ठ अध्ययन,वैज्ञानिक दृष्टि और जनप्रतिब्धता के साथ ज्वलंत पर्यावरण प्रेम चिपको की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


चार धामों की यात्रा,माता वैष्मो देवी और बाबा अमरनाथ के पुण्यप्रताप, पशुपतिनाथ की सिंह गर्जना से अब इस हिमालय का बचे रहना मुश्किल ही है।


देहरादून तलक ढहते पहाड़ का मलबा आबादी को तहस नहस करने लगा है और फिर जलप्रलय की जद में है पहाड़।


केदार सुनामी में गायब जनपदों की लाशें लेकिन अभी लापता हैं और पहाड़ को मुर्दाघर बनाने की तैयारी है।


नवी मुंबई में सेज के उद्घाटन के मौके पर लबालब समुंदर के माफिक जनसैलाब से साफ जाहिर है कि बाजार मौत के सामान की तिजारत किस मुलम्मे के भरोसे कर रहा है।उस मुलम्मे को उतारना जरुरी है।


खबर यह भी है कि अच्छे दिनों की नई सौगात बतौर जल्द ही आप अपने ही बैंक के एटीएम का सीमित इस्तेमाल करने पर मजबूर हो जाएंगे। इस साल नवंबर से आप अपने बैंक के एटीएम से हर महीने सिर्फ 5 और अन्य बैंक के एटीएम से सिर्फ 3 ट्रांजैक्शन ही मुफ्त कर सकेंगे। इसके बाद एटीम से हर ट्रांजैक्शन पर आपको 20 रुपए की रकम चुकानी होगी। यह रकम आपके खाते से ही काट ली जाएगी। ट्रांजैक्शन में सिर्फ रकम निकालना ही शामिल नहीं है, बल्कि खाते की जानकारी, चेक बुक रिक्वेस्ट, पिन बदलना और मोबाइल रिचार्ज को भी लेन-देन माना जाएगा। नया नियम देश के 6 मेट्रो शहरों में इस साल नवंबर से लागू होगा।


खबर यह भी कि बीजेपी ने 16वीं लोकसभा चुनाव में अपने दम पर 282 सीटें जीतीं, लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का कहना है कि इसका श्रेय कांग्रेस को ज्यादा जाता है। आडवाणी ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी ने भी बीजेपी की जीत में अहम भूमिका अदा की, लेकिन इसमें सबसे बड़ा योगदान विपक्ष यानि कांग्रेस का रहा है। आडवाणी ने कहा कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चले विशाल अभियान ने भी जीत में योगदान दिया, लेकिन सबसे बड़ा योगदान हमारे विपक्ष का रहा।


उधर,नेपाल में पिछले तीन दिनों से बारिश जारी है इससे वहां बाढ़ का कतरा मंडरा रहा है। नदियों में आई बाढ़ और भूस्खलन से अबतक 34 लोगों की जान जा चुकी है। वहां सेना और पुलिस के जवान राहत और बचाव कार्यों में जुटे हैं। बाढ़ और भूस्खलन से जानमाल का सबसे ज्यादा नुकसान पश्चिमी नेपाल के सुरखेत जिले में हुआ है।



फिलहाल नजारा यह कि उत्तराखंड में भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने की अलग-अलग घटनाओं में 26 लोगों के मारे जाने की सूचना है। राजधानी देहरादून में ही पिछले 48 घंटे में हुई मुसलाधार बारिश से काफी नुकसान हुआ। राजपुर के काठ बंगला क्षेत्र में शुक्रवार की देर रात दो बजे पहाड़ी दरकने से तीन मकान टूट गए। जिसमें सात लोग जिंदा दफन हो गए। एक महिला चंद्रकला को छह घंटे बाद मलबे पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने निकाला। एक छात्र नेता तेज बहाव में बह गया। उसका कुछ पता नहीं चला।


रायपुर के मालदेवता में 500 मीटर सड़क बहने से दर्जनों गांव का राजधानी से संपर्क कट गया है। जबकि रिस्पना और बिंदाल के तट पर बसी बस्तियों में भी काफी नुकसान हुआ है। प्रशासन ने स्कूलों में एहतिहात के तौर पर छुट्टी कर दी है।


पौड़ी जिले में दो जगह बादल फटने की घटनाओं में 10 लोग मारे गए। तहसील यमकेश्वर के ग्राम दियूली व जामल में पांच लोग मारे गए, दो भवन पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हुए। तहसील पौड़ी के कल्जीखाल ब्लाक के ग्राम नौड़ी में दो व्यक्ति (एक पुरुष एक महिला) की मौत हो गई। दो भवन पूरी तरह से क्षतिगस्त हो गए।


तहसील लैंसडाउन के ब्लाक द्वारीखाली के तहत ग्राम परसोली और सिमली कुटी में बादल फटने से पांच लोग मारे गए। 4 भवन पूरी तरह से ध्वस्त हो गए। जिले में कुल 14 लोग मारे गए और 8 भवन पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त हो गए।


पिथौरागढ़ जिले की मुनस्यारी तहसील के अंतर्गत गिनीबैंड व गिरगांव के बीच गड्यार गाड में 3 व्यक्तियों की पानी के तेज बहाव में बहने की सूचना है। एक व्यक्ति की मौत हो गई है। दो घायल बताए जा रहे हैं।



 

दूसरी ओर,नेपाल के सुरखेत जिले में 11 लोग, गोरखा जिले में नौ, चितवन, रुकुम जिले में नौ, ललितपुर, उदयपुर, दांग और मनांग जिले में आठ और नवलपरासी, खोतांग, सिंधुली, धनुषा, मकवनपुर जिलों में छह लोग मारे गए हैं।सुरखेत जिले के चीसापानी गांव में भूस्खलन से कई मकान जमीदोंज हो गए। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता शंकर कोइराला के अनुसार मलबे से 20 शव बाहर निकाले गए हैं। बहेरी नदी में आई बाढ़ से कई पुल बह गए. हजारों लोग विस्थापित हो गए हैं और देश भर में हजारों एकड़ जमीन में बाढ़ का पानी और पहाड़ों से आई गाद व मलबे से भर गया है।


पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन हुआ है जबकि तराई के मैदान डूबे हुए हैं। मैदानी इलाके में जनजीवन अस्तव्यस्त हो गया है। कई लोग सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे हैं और सरकार से अविलंब सहायता की मांग की है।


गोरखा जिले के पंथेश्वर गांव में स्कूल की दीवार ढहने से तीन लोग मारे गए। घटना के वक्त एक कोरियाई नागरिक स्कूल में बच्चों को जरूरी सामान बांट रहा था। हादसे में मरनेवालों में स्कूल में काम करने वाली दो महिलाएं और एक पुरुष शामिल हैं। हालांकि सभी बच्चे सुरक्षित हैं।बाढ़ और भूस्खलन के कारण देश में करोड़ों रुपये की संपत्ति को नुकसान पहुंचा है। 2 अगस्त को सुनकोसी नदी में भूस्खलन के कारण नदी पूरी तरह अवरुद्ध हो गई थी और इस हादसे में 150 से ज्यादा लोग मारे गए थे। सुनकोसी की घटना से भारत के बिहार के कोसी क्षेत्र में भी भारी अफरा-तफरी मच गई थी और लोगों को खाली कराना पड़ा था।


लालकिले के मैदान से जनता केखिलाफ कारपोरेट युद्ध की घोषणा प्राकृतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग के सूक्तिवाक्य माध्यमे करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज आईएनएस कोलकाता राष्ट्र को समर्पित किया। स्वदेशी तकनीक से निर्मित देश का यह सबसे बड़ा युद्धपोत है। प्रधानमंत्री के साथ इस मौके पर रक्षा मंत्री अरुण जेटली व नौसेना प्रमुख एडमिरल आरके धवन भी मौजूद थे।


मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में प्रतिरक्षा तैयारियां अहम हैं।छायायुद्ध बहाने सैन्यीकरण और सैन्य राष्ट्र का अपनी ही जनता के खिलाफ युद्ध पर्तिरक्षा का यह मुक्तबाजारी समीकरण है।जो सबसे पहले प्रकृति,पर्यावरण और प्रकृति से जुड़े जनसमुदायों के नरसंहार का अटल सत्य भी है।


गौर करें कि यह जलवा प्रतिरक्षा में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और प्रतिरक्षा से संबंधित सरकारी उपक्रमों के निजीकरण का है।


गौर करें कि ओबामा से शिखर वार्ता से पहले समूते पोलिटिकल क्लास को हाशिये पर रखकर नई बाबू संस्कृति, संपूर्ण महाकाव्यिक शिक्षा और अनुशासन के जरिये मुक्त बाजार के सारे दरवाजे खोलते हुए भारत अमेरिकी परमाणु संधि को ही लागू नहीं कर रहे हैं नरेंद्र मोदी,संविधान और कानून के राज को इतिहास बना रहे हैं वे।


गौर करें कि एफडीआई राज के मेक इन को उन्होंने मेडइन इंडिया के सफाये कि लिए मनुस्मृति में तब्दल कर दिया है।


इस खबर को पूरी तरह देखने से पहले इसे भी देख लें कि  चीन के एक कदम से भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। भारतीय सीमा से लगे रेल नेटवर्क को मजबूत करने की कोशिशों में लगे चीन ने तिब्‍बत क्षेत्र में मौजूद अपनी दूसरी रेलवे लाइन का उद्घाटन कर दिया है। यह रेलवे लाइन सिक्किम तक आती है। इसकी निर्माण लागत करीब 216 करोड़ डॉलर है। भारत के लिए अलार्म, सिक्किम तक पहुंची चीन की रेलवे लाइन. यह रेलवे लाइन जो सिक्किम के बहुत पास है, उसकी मदद से चीन की सेना बहुत ही आसानी से भारत के लिए सबसे अहम हिमालयन रिजन में आ जा सकती है। चीन की यह रेलवे लाइन तिब्‍बत की राजधानी ल्‍हासा को इस क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े शहर शिगाजे से जोड़ती है।


रडार की पकड़ में नहीं आने वाले 6,800 टन वजनी कोलकाता श्रेणी के इस युद्धपोत का डिजाइन भारतीय नौसेना के डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है। मझगांव डॉक लिमिटेड (एमडीएल) ने इसके निर्माण का काम सितंबर, 2003 में शुरू किया था। यह अपनी श्रेणी का पहला युद्धपोत है। भारत की इसी तरह के दो अन्य युद्धपोत बनाने की योजना है। इस जंगी पोत में अत्याधुनिक हथियार प्रणालियां लगाई गई हैं, जिसमें पनडुब्बी रोधी प्रौद्योगिकी भी शामिल है।


इस युद्धपोत में सतह से सतह पर मार करने वाली अत्याधुनिक ब्रह्मोस मिसाइलें, रॉकेट लांचर, टॉरपीडो ट्यूब लांचर, सोनार हमसा, ईडब्ल्यूएस एलोरा व एके-630 बंदूकें मौजूद हैं, जो समुद्री व हवाई हमले के दौरान दुश्मन के दांत खंट्टे करने में सक्षम हैं।


भारतीय नौसेना में शामिल होने जा रहा युद्धपोत आईएनएस कोलकाता दुश्मनों के रडार को चकमा देने में तो सक्षम होगा ही, ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस होने के कारण यह 400 किलोमीटर की दूरी तक मार भी कर सकेगा।


प्रधानमंद्दी नरेंद्र मोदी के हाथों शनिवार को देश को समर्पित होने जा रहा यह पोत इस वर्ष स्वतंद्दता दिवस का उपहार माना जा रहा है। कई खूबियों से लैस इस पोत को मुंबई के ही मझगांव डॉकयार्ड में तैयार किया गया है। अपनी विशिष्ट बनावट के कारण यह दुश्मनों के रडार को चकमा देने में सक्षम है। नौसेना अधिकारियों के अनुसार 164 मीटर लंबा एवं 18 मीटर चौड़ा 7500 टन का यह पोत दुश्मनों के रडार पर किसी छोटी नौका जैसा दिखाई देगा। जिसके दम पर यह उन्हें भ्रमित करता हुआ उनके काफी नजदीक पहुंचकर हमला कर सकता है।


इस पर स्वदेशी ब्रह्मोस मिसाइलों की तैनाती भारत को दुनिया के उन चंद देशों की कतार में खड़ा कर देती है, जो अपनी नौसेना के युद्धपोत से 400 किलोमीटर तक निशाना साध सकते हैं। ब्रह्मोस के अलावा कम दूरी तक मार कर सकनेवाली मिसाइलों एवं अतिसंवेदनशील रडार भी इस पोत की विशिष्टता में चार चांद लगा रहे हैं।


नौसेना के दो सी-किंग हेलीकॉप्टर अपने साथ ले चल सकने की क्षमता वाले आईएनएस कोलकाता की रफ्तार 30 नॉटिकल मील प्रति घंटा होगी। ऊर्जा आपूर्ति के लिए इसमें लगे चार गैस टर्बाइन जेनरेटर एवं एक डीजल ऑल्टरनेटर किसी छोटे-मोटे शहर को भी रोशन करने की क्षमता रखते हैं। इस पर 30 अधिकारी एवं 330 नौसैनिक तैनात होंगे।


इसका नामकरण भारत के सांस्कृतिक शहर कोलकाता के नाम पर किया गया है और इसका घोष वाक्य है-युद्धाय सर्वसन्नद्ध अर्थात युद्ध के लिए सदा तैयार। आईएनएस कोलकाता श्रेणी के ही स्वदेश निर्मित दो और विध्वंसक युद्धपोत कोच्चि एवं चेन्नई भी कुछ ही वर्षों में भारतीय नौसेना को प्राप्त हो जाएंगे।

SEZ प्रोजेक्ट का उद्घाटन कर बोले PM मोदी, 'राज्य-केंद्र मिलकर करें काम'



नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी

आईएनएस कोलकाता को देश को समर्पित करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवी मुंबई में छह हजार करोड़ के स्पेशल इकोनॉमिक जोन(एसईजेड) प्रोजेक्ट की शुरुआत की. इस मौके पर मोदी ने कहा कि हमारी कोशिश सरलीकरण की तरफ है. देश को आयात से ज्यादा निर्यात पर ध्यान देना चाहिेए.

मोदी ने कहा, 'निर्माण उद्योग को बढ़ावा देना प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए. अगर देश के विकास की गति को तेज करना है. तो हमें शिक्षा, रोजगार पर ध्यान देना होगा. यह युग विश्व व्यापार का युग है. विश्व व्यापार के इस युग में सामुंद्रिक व्यापार पर ध्यान देना जरूरी हो गया है.'

बंदरगाहों पर देश के लिए उपयोगी बताते हुए मोदी ने कहा, 'हमनें सागरमाला योजना की शुरुआत की. कंटेनर का करीब 50 फीसदी व्यापार हिंद महासागर के जरिए होता है. आने वाले दिनों में यह व्यापार निश्चित रूप से बढ़ेगा. भारत के समुद्र तट पर जो राज्य हैं उसे सागरमाला योजना का लाभ मिले. ऐसी हमारी कोशिश होगी.'

दुनिया के बाकी देशों का उदाहरण देते हुए मोदी ने बताया,' दुनिया में जिन जिन राष्ट्रों का विकास हुआ है उन सभी देशों में यह बात कॉमन है कि वो सभी शहर समुद्र किनारे स्थित होते हैं, ऐसे राज्यों की वजह से ही उस देश का अधिक आर्थिक विकास हुआ है. इसी को देखते हुए भारत में बंदरगाहों के विकास और सागरमाला परियोजना पर ध्यान दिया गया है. अगर हमें विकास करना है तो हमें पोर्ट लेड पर ध्यान देना होगा.

मोदी ने कहा, 'हम व्यवस्था को विकसित करना चाहते हैं. देश में उत्पादन बढ़े, नौजवानों को रोजगार मिले. इसी के लिए ऐसी एसईजेड परियोजना को शुरू किया गया है. अगर हम निर्यात पर ध्यान नहीं देंगे तो हम विकास की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाएंगे. राज्य और केंद्र मिलकर इसपर अच्छा काम कर सकते हैं.'

काम करने के नए तरीकों पर जोर देते हुए मोदी ने कहा, 'इनोवेशन, डिजाइनिंग पर अगर हम काम करें तो हम बेहतर कर सकते हैं. मुझे आने वाले दिनों में यकीन है कि हम निर्यात की दुनिया पर भी भारत का डंका बजा सकते हैं.' गडकरी की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा, 'हमारी कोशिश सरलीकरण की तरफ है. इसी के चलते शिपिंग के लिए अब लाइफटाइम शिपिंग का लाइसेंस दिया जाने लगा है.'

कांग्रेस पर मोदी ने ली चुटकी

कांग्रेस पर चुटकी लेते हुए कहा, सीएम पृथ्वीराज चव्हाण को इसकी योजना की जरूरत पहले से रही होगी. लेकिन चव्हाण बोल नहीं पाए होंगे. मैं उनकी चिंता समझ सकता हूं. अक्सर बीमारियों को दूर करने के लिए डॉक्टरों की जरूरत होती है.



और भी... http://aajtak.intoday.in/story/prime-minister-innaugrates-sez-project-in-maharashtra-1-776204.html





अब पूरी बहस जो गौर तलब भी हैः


चन्द्रशेखर करगेती

Yesterday at 7:09am · Edited ·

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?

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किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है ?

कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है ?

सेठ है, शोषक है, नामी गला-काटू है,

गालियां भी सुनता है, भारी थूक-चाटू है,

चोर है, डाकू है, झूठा-मक्कार है,

कातिल है, छलिया है, लुच्चा-लबार है,

जैसे भी टिकट मिला, जहां भी टिकट मिला,

शासन के घोड़े पर वह भी सवार है,

उसी की जनवरी छब्बीस,

उसी का पंद्रह अगस्त है !

बाकी सब दुखी है, बाकी सब पस्त है,

कौन है खिला-खिला, बुझा-बुझा कौन है,

कौन है बुलंद आज, कौन आज मस्त है,

खिला-खिला सेठ है, श्रमिक है बुझा-बुझा,

मालिक बुलंद है, कुली-मजूर पस्त है,

सेठ यहां सुखी है, सेठ यहां मस्त है,

उसकी है जनवरी, उसी का अगस्त है !

पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,

फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,

फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है,

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

मास्टर की छाती में कै ठो हाड़ है !

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

मजदूर की छाती में कै ठो हाड़ है !

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

घरनी की छाती में कै ठो हाड़ है !

गिन लो जी, गिन लो, गिन लो जी, गिन लो,

बच्चे की छाती में कै ठो हाड़ है !

देख लो जी, देख लो, देख लो जी, देख लो,

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

मेला है, ठेला है, भारी भीड़-भाड़ है,

पटना है, दिल्ली है, वहीं सब जुगाड़ है,

फ्रिज है, सोफा है, बिजली का झाड़ है,

फैशन की ओट है, सबकुछ उघाड़ है,

महल आबाद है, झोपड़ी उजाड़ है,

गरीबों की बस्ती में उखाड़ है, पछाड़ है,

धतू तेरी, धतू तेरी, कुच्छो नहीं! कुच्छो नहीं,

ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,

ताड़ के पत्ते हैं, पत्तों के पंखे हैं,

पंखों की ओट है, पंखों की आड़ है,

कुच्छो नहीं, कुच्छो नहीं,

ताड़ का तिल है, तिल का ताड़ है,

पब्लिक की पीठ पर बजट का पहाड़ है !

किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है !

कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है !

सेठ ही सुखी है, सेठ ही मस्त है,

मंत्री ही सुखी है, मंत्री ही मस्त है,

उसी की है जनवरी, उसी का अगस्त है ।

~बाबा नागार्जुन~

विचार कर लें....बधाई देनें की कोई एक वजह तो हो ?

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  • You, Rajiv Lochan Sah, Surendra Grover, Bhaskar Upreti and 99 others like this.

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  • Gopal Gururani baba nagarjun ki jay

  • Yesterday at 7:10am · Like · 1

  • Jagdish Kalauni अति प्रासंगिक रचना.....

  • Yesterday at 7:43am · Unlike · 3

  • Digvijay Pant Well said

  • Yesterday at 9:02am · Like · 1

  • Kiran Bala क्षमा करें आज सकारात्मकता की बात होनी चाहिए...हम सभी जानते हैं कि परेशानियां हैं..समस्याएं हैं..मगर आज के दिन ये संकल्प लें कि हम अपना काम ईमानदारी से करेंगे...देश की सरकार को, लोगों को, कोसना छोड़ कर..और समस्याओं की दुहाई देकर नहीं बल्कि देशभक्ति का जज्बा जगाकर दृढ़ संकल्प होकर आज के दिन का आनंद लें तो अधिक बेहतर होगा...

  • Yesterday at 9:52am · Like · 1

  • चन्द्रशेखर करगेती Kiran Bala जी आज अगर देश में कुछ सकारात्मक अगर कुछ दिखाई दे रहा है तो वह इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से काम करने वाले लोगो की वजह से ही हुआ हैं, देश के अगर हालात अगर बदतर है तो अगस्त और जनवरी में बड़े बड़े भाषण देनें वालो की वजह से ही हुआ है, और इसी को बाबा की यह कविता बताती है.....आखिर सच्चाई से मुंह कब तक मोड़ा जा सकता है......आप कविता का भाव समझें....

  • Yesterday at 10:36am · Edited · Unlike · 8

  • Rajesh Sharma आज के शुभ अवसर पर देश के प्रधान मंत्री जी ने देशवासियों को एक सूत्र में बांध दिया ! आज भारत माता का तिरंगा देश के प्रधान सेवक के हाथों से लहराकर आप ने अपने देशदेशवासियों का मनोबल बढाया है जिसके लिए देश आपको आगे बढने का आशीर्वाद दे रहा है

  • Yesterday at 10:42am · Like · 1

  • चन्द्रशेखर करगेती Rajesh Sharma जी आज से २० साल पहले का अगस्त यद् करो तो तब का उत्साह और आज में कुछ फर्क नजर आता...अगर हाँ तो इस उत्साह में कमी के कारण भी खोजियेगा...

  • Yesterday at 10:52am · Unlike · 2

  • Kiran Bala मैं सहमत नहीं हूँ...ये सब तो हम जानते ही हैं..कोई नयी बात तो नहीं...ये बातें कहके तो केवल आप हतोत्साहित ही कर रहे हैं सभी को...कोई सकारात्मक सन्देश दीजिए...स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सकारात्मकता ने ही सेनानियों के मन में अलख जगाए रखा...सचाई केवल इस कविता के माध्यम से ही पता चले ये ज़रूरी तो नहीं..हम सभी इस सच का हिस्सा हैं...रोज जीते हैं ये जीवन...जिसमें निराशा है...भ्रष्टाचार है..मगर आज का दिन अलग है...सोचिये आजादी से पहले का जीवन कैसा था..आज हम आज़ाद तो हैं...ज़रूरत है तो हालत को सँभालने की..जो सकारात्मक सोच से ही संभव हो सकता है...

  • Yesterday at 10:55am · Like · 1

  • चन्द्रशेखर करगेती हतोत्साहित वे लोग हो रहें है जो सच्चाई देखकर भी समझना नहीं चाहते कि आज देश के हालात क्या है, जो समझ रहें हैं वे तो प्रण लिए ही हुए हैं कि उन्हें इस देश के हालत बदलने हैं, विचार से, कर्म से, परिश्रम से......

  • Yesterday at 11:13am · Edited · Unlike · 4

  • Prerna Garg Aaj pahli bar man nahi hua tv chalane ka... Aazadi milegi hame in kale angrejon se...tab jan aur aug dono manaenge...

  • Yesterday at 11:28am · Like

  • Kiran Bala aap sachayi deshvasiyon ko dikha rahe hain..jaise aapke n dikhane se kisi ko desh k haalat pta hi nhi chalenge..post ka samarthan karna achhi baat hai..mgr kewal rote rahna bhi to hal.nahi..aapne avashya pran liya hoga mujhe yakin hai..mgr jo aapse prerna lete hn unko yahi sandesh milega ki kuchh bhi kr lo kuch nhi hoga is desh ka..there is no hope..kyonki wo bachna chahte hn apne krtavyo se..aur isme ye kavita unki madad kregi.

  • 21 hrs · Like

  • चन्द्रशेखर करगेती Kiran bala ji, yah to samjhane wale ko sochna hai ki vah kise samjha raha hai........vaise bhi jo haalaat ko apane aap na samjhe usei koe dusra samjha bhi nahi sakta.

  • 20 hrs · Unlike · 2

  • Navnish Negi Bhook se ladta hua AADMI / AAZAADI kE Parcham ka kya kare

  • 20 hrs · Like · 1

  • Manoj Pande करगेती जी यह दिन वास्तव में यही सोचना है की स्वाधीनता से हमने क्या पाया। क्यूँ हमारे बड़े बूढ़े हमसे यह कहते है की अंग्रेजी हुकूमत इससे अच्छी थी। क्यूँ बार बार यह महसूस कराया जाता है की भूरे अँगरेज़ हम पर शासन कर रहे है। क्यूँ आज प्रधान मंत्री जी ने कहा में आपका प्रधान सेवक हूँ। क्या इस बात में यह जाहिर नहीं होता की देश का प्रधानमंत्री इस बात को स्वीकारता है प्रधान सेवक कहलाना उचित है।

  • 19 hrs · Like · 1

  • Sharad Dixit Kargeti ji jinke pet bhare hai wo kaha samjhegey is kavita ko.....

  • 19 hrs · Like · 1

  • चन्द्रशेखर करगेती Kirna Bala जी आपके लिए एक और समसामयिक कविता, शायद इससे आपको कुछ और अधिक समझने में आसानी होगी.......

  • नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम

  • बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

  • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

  • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

  • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

  • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब – २

  • जहाँ आवाम के ख़िलाफ़ साज़िशें हो शान से

  • जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

  • जहाँ पे लब्ज़े-अमन एक ख़ौफ़नाक राज़ हो

  • जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज़ हो

  • वहाँ न चुप रहेंगे हम

  • कहेंगे हाँ कहेंगे हम

  • हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

  • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

  • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

  • इन्क़लाब इन्क़लाब -२

  • यक़ीन आँख मूँद कर किया था जिनको जानकर

  • वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तान कर

  • उन्ही की सरहदों में क़ैद हैं हमारी बोलियाँ

  • वही हमारी थाल में परस रहे हैं गोलियाँ

  • जो इनका भेद खोल दे

  • हर एक बात बोल दे

  • हमारे हाथ में वही खुली क़िताब चाहिए

  • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

  • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

  • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

  • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

  • क्रमश...

  • 17 hrs · Unlike · 2

  • चन्द्रशेखर करगेती वतन के नाम पर ख़ुशी से जो हुए हैं बेवतन

  • उन्ही की आह बेअसर उन्ही की लाश बेकफ़न

  • लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके

  • करें तो क्या करें भला जो जी सके न मर सके

  • स्याह ज़िन्दगी के नाम

  • जिनकी हर सुबह और शाम

  • उनके आसमान को सुर्ख़ आफ़ताब चाहिए

  • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

  • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

  • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

  • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब -2

  • तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर

  • निगाह डाल सोच और सोचकर सवाल कर

  • किधर गए वो वायदे सुखों के ख़्वाब क्या हुए

  • तुझे था जिनका इन्तज़ार वो जवाब क्या हुए

  • तू इनकी झूठी बात पर

  • ना और ऐतबार कर

  • के तुझको साँस-साँस का सही हिसाब चाहिए

  • घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए

  • नफ़स-नफ़स क़दम-क़दम बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

  • जवाब-दर-सवाल है के इन्क़लाब चाहिए

  • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद,

  • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

  • नफ़स-नफ़स, क़दम-क़दम

  • बस एक फ़िक्र दम-ब-दम

  • घिरे हैं हम सवाल से, हमें जवाब चाहिए

  • जवाब दर-सवाल है कि इन्क़लाब चाहिए

  • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

  • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

  • जहाँ आवाम के ख़िलाफ साज़िशें हों शान से

  • जहाँ पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से

  • वहाँ न चुप रहेंगे हम, कहेंगे हाँ कहेंगे हम

  • हमारा हक़ हमारा हक़ हमें जनाब चाहिए

  • इन्क़लाब ज़िन्दाबाद

  • ज़िन्दाबाद इन्क़लाब

  • साभार : शलभ श्रीराम सिंह

  • 17 hrs · Like

  • Kiran Bala main aapko un logo se bahut upar manti thi jo aalochna ko sakaratmak roop se lete hai ..par aap bhi unhi logo me se ek nikle jo apni post pr ek bhi negative comment bardasht nahi kr skte...afsos hua mujhe..maaf kijiyega..aage se mai kewal like kr diya krungi..shubh sandhya.

  • 15 hrs · Like · 1

  • चन्द्रशेखर करगेती Kiran Bala जी जैसा आप समझ रही हैं वैसा नहीं हैं, जो पूर्व में कवियों ने अपनी रचनाओं में जो लिखा है, क्या आज भी स्थितियां कुछ बदली हैं ? मैं आलोचनाओं को सार्थक रूप से ही लेता हूँ, लेकिन जब स्थितियों को नकारा जाय तब नहीं ?

  • 15 hrs · Unlike · 1

  • Manoj Pande मुझे अपने देश से प्रेम है। पर प्रेम होने का मतलब symbolism से नाता जोड़ लेना नहीं है। देश प्रेम देश वासियों से प्रेम है। उनके दर्द समझना है।

  • अगर साहिर कहते है...रहने को घर नहीं है सारा जहाँ हमारा। तो वस्त्व्स में सोच्निये विषय है। सडको पर imhuman conditions पर रहते बच्चे जिन्हें दो जून की रोटी नसीब नहीं है भारत की सत्यता है। औरत के ऊपर होते अन्याय। बेशुमार गन्दगी सत्य है। शायद प्रधानमंत्री ने इसी लिए इन बिन्दुओं पर इंगित किया। क्यों हम प्रधानमंत्री को regressive और pessimist नहीं कहते। वर्तमान स्थिति पर यथार्थ के धरातल पर देखना कोई गलत बात नहीं है।

  • 15 hrs · Unlike · 2

  • Sonu Kanyal कभी भी कुछ भी नहीं सुधरेगा। बिगाड़ना आसान होता है। खूब बिगाड़ लिया। अब बस ख़ास ही लोग होंगे सुखी, क्रान्ति तक।

  • 14 hrs · Unlike · 2

  • Rakesh Kargeti सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा......... सोच बदलनी होगी........ हालात हमेशा एक से नहीं रहते हैं....हज़ारो साल से नरगिस अपनी बेनूरी पर क्यों रोये...............

  • 14 hrs · Edited · Unlike · 3

  • Palash Biswas Thanks for the most relevant quote.blogging.

  • 13 hrs · Like · 2

  • Anjana Srivastava very true per koi upay karger nahi hia

  • 24 mins · Like

प्रधानमंत्री मोदी का स्वतंत्रता दिवस भाषण ज्यों का त्यों

मेरे प्यारे देशवासियो,

आज देश और दुनिया में फैले हुए सभी हिन्दुस्तानी आज़ादी का पर्व मना रहे हैं। इस आज़ादी के पावन पर्व पर प्यारे देशवासियों को भारत के प्रधान सेवक की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ।


मैं आपके बीच प्रधान मंत्री के रूप में नहीं, प्रधान सेवक के रूप में उपस्थित हूँ। देश की आज़ादी की जंग कितने वर्षों तक लड़ी गई, कितनी पीढ़ियाँ खप गईं, अनगिनत लोगों ने बलिदान दिए, जवानी खपा दी, जेल में ज़िन्दगी गुज़ार दी। देश की आज़ादी के लिए मर-मिटने वाले समर्पित उन सभी आज़ादी के सिपाहियों को मैं शत-शत वंदन करता हूँ, नमन करता हूँ।


आज़ादी के इस पावन पर्व पर भारत के कोटि-कोटि जनों को भी मैं प्रणाम करता हूँ और आज़ादी की जंग के लिए जिन्होंने कुर्बानियां दीं, उनका पुण्य स्मरण करते हुए आज़ादी के इस पावन पर्व पर मां भारती के कल्याण के लिए हमारे देश के गरीब, पीड़ित, दलित, शोषित, समाज के पिछड़े हुए सभी लोगों के कल्याण का, उनके लिए कुछ न कुछ कर गुज़रने का संकल्प करने का पर्व है।


मेरे प्यारे देशवासियो, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय चरित्र को निखारने का एक अवसर होता है। राष्ट्रीय पर्व से प्रेरणा ले करके भारत के राष्ट्रीय चरित्र, जन-जन का चरित्र जितना अधिक निखरे, जितना अधिक राष्ट्र के लिए समर्पित हो, सारे कार्यकलाप राष्ट्रहित की कसौटी पर कसे जाएँ, अगर उस प्रकार का जीवन जीने का हम संकल्प करते हैं, तो आज़ादी का पर्व भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का एक प्रेरणा पर्व बन सकता है।


मेरे प्यारे देशवासियो, यह देश राजनेताओं ने नहीं बनाया है, यह देश शासकों ने नहीं बनाया है, यह देश सरकारों ने भी नहीं बनाया है, यह देश हमारे किसानों ने बनाया है, हमारे मजदूरों ने बनाया है, हमारी माताओं और बहनों ने बनाया है, हमारे नौजवानों ने बनाया है, हमारे देश के ऋषियों ने, मुनियों ने, आचार्यों ने, शिक्षकों ने, वैज्ञानिकों ने, समाजसेवकों ने, पीढ़ी दर पीढ़ी कोटि-कोटि जनों की तपस्या से आज राष्ट्र यहाँ पहुँचा है। देश के लिए जीवन भर साधना करने वाली ये सभी पीढ़ियां, सभी महानुभाव अभिनन्दन के अधिकारी हैं। यह भारत के संविधान की शोभा है, भारत के संविधान का सामर्थ्य है कि एक छोटे से नगर के गरीब परिवार के एक बालक ने आज लाल किले की प्राचीर पर भारत के तिरंगे झण्डे के सामने सिर झुकाने का सौभाग्य प्राप्त किया। यह भारत के लोकतंत्र की ताकत है, यह भारत के संविधान रचयिताओं की हमें दी हुई अनमोल सौगात है। मैं भारत के संविधान के निर्माताओं को इस पर नमन करता हूँ।


भाइयो एवं बहनो, आज़ादी के बाद देश आज जहां पहुंचा है, उसमें इस देश के सभी प्रधान मंत्रियों का योगदान है, इस देश की सभी सरकारों का योगदान है, इस देश के सभी राज्यों की सरकारों का भी योगदान है। मैं वर्तमान भारत को उस ऊँचाई पर ले जाने का प्रयास करने वाली सभी पूर्व सरकारों को, सभी पूर्व प्रधान मंत्रियों को, उनके सभी कामों को, जिनके कारण राष्ट्र का गौरव बढ़ा है, उन सबके प्रति इस पल आदर का भाव व्यक्त करना चाहता हूँ, मैं आभार की अभिव्यक्ति करना चाहता हूं। यह देश पुरातन सांस्कृतिक धरोहर की उस नींव पर खड़ा है, जहाँ पर वेदकाल में हमें एक ही मंत्र सुनाया जाता है, जो हमारी कार्य संस्कृति का परिचय है, हम सीखते आए हैं, पुनर्स्मरण करते आए हैं- "संगच्छध्वम् संवदध्वम् सं वो मनांसि जानताम्।" हम साथ चलें, मिलकर चलें, मिलकर सोचें, मिलकर संकल्प करें और मिल करके हम देश को आगे बढ़ाएँ। इस मूल मंत्र को ले करके सवा सौ करोड़ देशवासियों ने देश को आगे बढ़ाया है। कल ही नई सरकार की प्रथम संसद के सत्र का समापन हुआ। मैं आज गर्व से कहता हूं कि संसद का सत्र हमारी सोच की पहचान है, हमारे इरादों की अभिव्यक्ति है। हम बहुमत के बल पर चलने वाले लोग नहीं हैं, हम बहुमत के बल पर आगे बढ़ना नहीं चाहते हैं। हम सहमति के मजबूत धरातल पर आगे बढ़ना चाहते हैं। "संगच्छध्वम्" और इसलिए इस पूरे संसद के कार्यकाल को देश ने देखा होगा। सभी दलों को साथ लेकर, विपक्ष को जोड़ कर, कंधे से कंधा मिलाकर चलने में हमें अभूतपूर्व सफलता मिली है और उसका यश सिर्फ प्रधान मंत्री को नहीं जाता है, उसका यश सिर्फ सरकार में बैठे हुए लोगों को नहीं जाता है, उसका यश प्रतिपक्ष को भी जाता है, प्रतिपक्ष के सभी नेताओं को भी जाता है, प्रतिपक्ष के सभी सांसदों को भी जाता है और लाल किले की प्राचीर से, गर्व के साथ, मैं इन सभी सांसदों का अभिवादन करता हूं। सभी राजनीतिक दलों का भी अभिवादन करता हूं, जहां सहमति के मजबूत धरातल पर राष्ट्र को आगे ले जाने के महत्वपूर्ण निर्णयों को कर-करके हमने कल संसद के सत्र का समापन किया।


भाइयो-बहनो, मैं दिल्ली के लिए आउटसाइडर हूं, मैं दिल्ली की दुनिया का इंसान नहीं हूं। मैं यहां के राज-काज को भी नहीं जानता। यहां की एलीट क्लास से तो मैं बहुत अछूता रहा हूं, लेकिन एक बाहर के व्यक्ति ने, एक आउटसाइडर ने दिल्ली आ करके पिछले दो महीने में, एक इनसाइडर व्यू लिया, तो मैं चौंक गया! यह मंच राजनीति का नहीं है, राष्ट्रनीति का मंच है और इसलिए मेरी बात को राजनीति के तराजू से न तोला जाए। मैंने पहले ही कहा है, मैं सभी पूर्व प्रधान मंत्रियों, पूर्व सरकारों का अभिवादन करता हूं, जिन्होंने देश को यहां तक पहुंचाया। मैं बात कुछ और करने जा रहा हूं और इसलिए इसको राजनीति के तराजू से न तोला जाए। मैंने जब दिल्ली आ करके एक इनसाइडर व्यू देखा, तो मैंने अनुभव किया, मैं चौंक गया। ऐसा लगा जैसे एक सरकार के अंदर भी दर्जनों अलग-अलग सरकारें चल रही हैं। हरेक की जैसे अपनी-अपनी जागीरें बनी हुई हैं। मुझे बिखराव नज़र आया, मुझे टकराव नज़र आया। एक डिपार्टमेंट दूसरे डिपार्टमेंट से भिड़ रहा है और यहां तक‍ भिड़ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खट-खटाकर एक ही सरकार के दो डिपार्टमेंट आपस में लड़ाई लड़ रहे हैं। यह बिखराव, यह टकराव, एक ही देश के लोग! हम देश को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं? और इसलिए मैंने कोशिश प्रारम्भ की है, उन दीवारों को गिराने की, मैंने कोशिश प्रारम्भ की है कि सरकार एक असेम्बल्ड एन्टिटी नहीं, लेकिन एक ऑर्गेनिक युनिटी बने, ऑर्गेनिक एन्टिटी बने। एकरस हो सरकार - एक लक्ष्य, एक मन, एक दिशा, एक गति, एक मति - इस मुक़ाम पर हम देश को चलाने का संकल्प करें। हम चल सकते हैं। इन दिनों अखबारों में चर्चा चलती है कि मोदी जी की सरकार आ गई, अफसर लोग समय पर ऑफिस जाते हैं, समय पर ऑफिस खुल जाते हैं, लोग पहुंच जाते हैं। मैं देख रहा था, हिन्दुस्तान के नैशनल न्यूज़पेपर कहे जाएं, टीवी मीडिया कहा जाए, प्रमुख रूप से ये खबरें छप रही थीं। सरकार के मुखिया के नाते तो मुझे आनन्द आ सकता है कि देखो भाई, सब समय पर चलना शुरू हो गया, सफाई होने लगी, लेकिन मुझे आनन्द नहीं आ रहा था, मुझे पीड़ा हो रही थी। वह बात मैं आज पब्लिक में कहना चाहता हूं। इसलिए कहना चाहता हूं कि इस देश में सरकारी अफसर समय पर दफ्तर जाएं, यह कोई न्यूज़ होती है क्या? और अगर वह न्यूज़ बनती है, तो हम कितने नीचे गए हैं, कितने गिरे हैं, इसका वह सबूत बन जाती है और इसलिए भाइयो-बहनो, सरकारें कैसे चली हैं? आज वैश्विक स्पर्धा में कोटि-कोटि भारतीयों के सपनों को साकार करना होगा तो यह "होती है", "चलती है", से देश नहीं चल सकता। जन-सामान्य की आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए, शासन व्यवस्था नाम का जो पुर्जा है, जो मशीन है, उसको और धारदार बनाना है, और तेज़ बनाना है, और गतिशील बनाना है और उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं और मैं आपको विश्वास देता हूं, मेरे देशवासियो, इतने कम समय से दिल्ली के बाहर से आया हूं, लेकिन मैं देशवासियों को विश्वास दिलाता हूं कि सरकार में बैठे हुए लोगों का सामर्थ्य बहुत है - चपरासी से लेकर कैबिनेट सेक्रेटरी तक हर कोई सामर्थ्यवान है, हरेक की एक शक्ति है, उसका अनुभव है। मैं उस शक्ति को जगाना चाहता हूं, मैं उस शक्ति को जोड़ना चाहता हूं और उस शक्ति के माध्यम से राष्ट्र कल्याण की गति को तेज करना चाहता हूं और मैं करके रहूंगा। यह हम पाकर रहेंगे, हम करके रहेंगे, यह मैं देशवासियों को विश्वास दिलाना चाहता हूं और यह मैं 16 मई को नहीं कह सकता था, लेकिन आज दो-ढाई महीने के अनुभव के बाद, मैं 15 अगस्त को तिरंगे झंडे के साक्ष्य से कह रहा हूं, यह संभव है, यह होकर रहेगा।


भाइयो-बहनो, क्या देश के हमारे जिन महापुरुषों ने आज़ादी दिलाई, क्या उनके सपनों का भारत बनाने के लिए हमारा भी कोई कर्तव्य है या नहीं है, हमारा भी कोई राष्ट्रीय चरित्र है या नहीं है? उस पर गंभीरता से सोचने का समय आ गया है।


भाइयो-बहनो, कोई मुझे बताए कि हम जो भी कर रहे हैं दिन भर, शाम को कभी अपने आपसे पूछा कि मेरे इस काम के कारण मेरे देश के गरीब से गरीब का भला हुआ या नहीं हुआ, मेरे देश के हितों की रक्षा हुई या नहीं हुई, मेरे देश के कल्याण के काम में आया या नहीं आया? क्या सवा सौ करोड़ देशवासियों का यह मंत्र नहीं होना चाहिए कि जीवन का हर कदम देशहित में होगा? दुर्भाग्य कैसा है? आज देश में एक ऐसा माहौल बना हुआ है कि किसी के पास कोई भी काम लेकर जाओ, तो कहता है, "इसमें मेरा क्या"? वहीं से शुरू करता है, "इसमें मेरा क्या" और जब उसको पता चलेगा कि इसमें उसका कुछ नहीं है, तो तुरन्त बोलता है, "तो फिर मुझे क्या"? "ये मेरा क्या" और "मुझे क्या", इस दायरे से हमें बाहर आना है। हर चीज़ अपने लिए नहीं होती है। कुछ चीज़ें देश के लिए भी हुआ करती हैं और इसलिए हमारे राष्ट्रीय चरित्र को हमें निखारना है। "मेरा क्या", "मुझे क्या", उससे ऊपर उठकर "देशहित के हर काम के लिए मैं आया हूं, मैं आगे हूं", यह भाव हमें जगाना है।




भाइयो-बहनो, आज जब हम बलात्कार की घटनाओं की खबरें सुनते हैं, तो हमारा माथा शर्म से झुक जाता है। लोग अलग-अलग तर्क देते हैं, हर कोई मनोवैज्ञानिक बनकर अपने बयान देता है, लेकिन भाइयो-बहनो, मैं आज इस मंच से मैं उन माताओं और उनके पिताओं से पूछना चाहता हूं, हर मां-बाप से पूछना चाहता हूं कि आपके घर में बेटी 10 साल की होती है, 12 साल की होती है, मां और बाप चौकन्ने रहते हैं, हर बात पूछते हैं कि कहां जा रही हो, कब आओगी, पहुंचने के बाद फोन करना। बेटी को तो सैकड़ों सवाल मां-बाप पूछते हैं, लेकिन क्या कभी मां-बाप ने अपने बेटे को पूछने की हिम्मत की है कि कहां जा रहे हो, क्यों जा रहे हो, कौन दोस्त है? आखिर बलात्कार करने वाला किसी न किसी का बेटा तो है। उसके भी तो कोई न कोई मां-बाप हैं। क्या मां-बाप के नाते, हमने अपने बेटे को पूछा कि तुम क्या कर रहे हो, कहां जा रहे हो? अगर हर मां-बाप तय करे कि हमने बेटियों पर जितने बंधन डाले हैं, कभी बेटों पर भी डाल करके देखो तो सही, उसे कभी पूछो तो सही।


भाइयो-बहनो, कानून अपना काम करेगा, कठोरता से करेगा, लेकिन समाज के नाते भी, हर मां-बाप के नाते हमारा दायित्व है। कोई मुझे कहे, यह जो बंदूक कंधे पर उठाकर निर्दोषों को मौत के घाट उतारने वाले लोग कोई माओवादी होंगे, कोई आतंकवादी होंगे, वे किसी न किसी के तो बेटे हैं। मैं उन मां-बाप से पूछना चाहता हूं कि अपने बेटे से कभी इस रास्ते पर जाने से पहले पूछा था आपने? हर मां-बाप जिम्मेवारी ले, इस गलत रास्ते पर गया हुआ आपका बेटा निर्दोषों की जान लेने पर उतारू है। न वह अपना भला कर पा रहा है, न परिवार का भला कर पा रहा है और न ही देश का भला कर पा रहा है और मैं हिंसा के रास्ते पर गए हुए, उन नौजवानों से कहना चाहता हूं कि आप जो भी आज हैं, कुछ न कुछ तो भारतमाता ने आपको दिया है, तब पहुंचे हैं। आप जो भी हैं, आपके मां-बाप ने आपको कुछ तो दिया है, तब हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूं, कंधे पर बंदूक ले करके आप धरती को लाल तो कर सकते हो, लेकिन कभी सोचो, अगर कंधे पर हल होगा, तो धरती पर हरियाली होगी, कितनी प्यारी लगेगी। कब तक हम इस धरती को लहूलुहान करते रहेंगे? और हमने पाया क्या है? हिंसा के रास्ते ने हमें कुछ नहीं दिया है।


भाइयो-बहनो, मैं पिछले दिनों नेपाल गया था। मैंने नेपाल में सार्वजनिक रूप से पूरे विश्व को आकर्षित करने वाली एक बात कही थी। एक ज़माना था, सम्राट अशोक जिन्होंने युद्ध का रास्ता लिया था, लेकिन हिंसा को देख करके युद्ध छोड़, बुद्ध के रास्ते पर चले गए। मैं देख रहा हूं कि नेपाल में कोई एक समय था, जब नौजवान हिंसा के रास्ते पर चल पड़े थे, लेकिन आज वही नौजवान संविधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हीं के साथ जुड़े लोग संविधान के निर्माण में लगे हैं और मैंने कहा था, शस्त्र छोड़कर शास्त्र के रास्ते पर चलने का अगर नेपाल एक उत्तम उदाहरण देता है, तो विश्व में हिंसा के रास्ते पर गए हुए नौजवानों को वापस आने की प्रेरणा दे सकता है।


भाइयो-बहनो, बुद्ध की भूमि, नेपाल अगर संदेश दे सकती है, तो क्या भारत की भूमि दुनिया को संदेश नहीं दे सकती है? और इसलिए समय की मांग है, हम हिंसा का रास्ता छोड़ें, भाईचारे के रास्ते पर चलें।


भाइयो-बहनो, सदियों से किसी न किसी कारणवश साम्प्रदायिक तनाव से हम गुज़र रहे हैं, देश विभाजन तक हम पहुंच गए। आज़ादी के बाद भी कभी जातिवाद का ज़हर, कभी सम्पद्रायवाद का ज़हर, ये पापाचार कब तक चलेगा? किसका भला होता है? बहुत लड़ लिया, बहुत लोगों को काट लिया, बहुत लोगों को मार दिया। भाइयो-बहनो, एक बार पीछे मुड़कर देखिए, किसी ने कुछ नहीं पाया है। सिवाय भारत मां के अंगों पर दाग लगाने के हमने कुछ नहीं किया है और इसलिए, मैं देश के उन लोगों का आह्वान करता हूं कि जातिवाद का ज़हर हो, सम्प्रदायवाद का ज़हर हो, आतंकवाद का ज़हर हो, ऊंच-नीच का भाव हो, यह देश को आगे बढ़ाने में रुकावट है। एक बार मन में तय करो, दस साल के लिए मोरेटोरियम तय करो, दस साल तक इन तनावों से हम मुक्त समाज की ओर जाना चाहते हैं और आप देखिए, शांति, एकता, सद्भावना, भाईचारा हमें आगे बढ़ने में कितनी ताकत देता है, एक बार देखो।


मेरे देशवासियो, मेरे शब्दों पर भरोसा कीजिए, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं। अब तक किए हुए पापों को, उस रास्ते को छोड़ें, सद्भावना, भाईचारे का रास्ता अपनाएं और हम देश को आगे ले जाने का संकल्प करें। मुझे विश्वास है कि हम इसको कर सकते हैं।





भाइयो-बहनो, जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ रहा है, आधुनिकता का हमारे मन में एक भाव जगता है, पर हम करते क्या हैं? क्या कभी सोचा है कि आज हमारे देश में सेक्स रेशियो का क्या हाल है? 1 हजार लड़कों पर 940 बेटियाँ पैदा होती हैं। समाज में यह असंतुलन कौन पैदा कर रहा है? ईश्वर तो नहीं कर रहा है। मैं उन डॉक्टरों से अनुरोध करना चाहता हूं कि अपनी तिजोरी भरने के लिए किसी माँ के गर्भ में पल रही बेटी को मत मारिए। मैं उन माताओं, बहनों से कहता हूं कि आप बेटे की आस में बेटियों को बलि मत चढ़ाइए। कभी-कभी माँ-बाप को लगता है कि बेटा होगा, तो बुढ़ापे में काम आएगा। मैं सामाजिक जीवन में काम करने वाला इंसान हूं। मैंने ऐसे परिवार देखे हैं कि पाँच बेटे हों, पाँचों के पास बंगले हों, घर में दस-दस गाड़ियाँ हों, लेकिन बूढ़े माँ-बाप ओल्ड एज होम में रहते हैं, वृद्धाश्रम में रहते हैं। मैंने ऐसे परिवार देखे हैं। मैंने ऐसे परिवार भी देखे हैं, जहाँ संतान के रूप में अकेली बेटी हो, वह बेटी अपने सपनों की बलि चढ़ाती है, शादी नहीं करती और बूढ़े माँ-बाप की सेवा के लिए अपने जीवन को खपा देती है। यह असमानता, माँ के गर्भ में बेटियों की हत्या, इस 21वीं सदी के मानव का मन कितना कलुषित, कलंकित, कितना दाग भरा है, उसका प्रदर्शन कर रहा है। हमें इससे मुक्ति लेनी होगी और यही तो आज़ादी के पर्व का हमारे लिए संदेश है।


अभी राष्ट्रमंडल खेल हुए हैं। भारत के खिलाड़ियों ने भारत को गौरव दिलाया है। हमारे करीब 64 खिलाड़ी जीते हैं। हमारे 64 खिलाड़ी मेडल लेकर आए हैं, लेकिन उनमें 29 बेटियाँ हैं। इस पर गर्व करें और उन बेटियों के लिए ताली बजाएं। भारत की आन-बान-शान में हमारी बेटियों का भी योगदान है, हम इसको स्वीकार करें और उन्हें भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ लेकर चलें, तो सामाजिक जीवन में जो बुराइयाँ आई हैं, हम उन बुराइयों से मुक्ति पा सकते हैं। इसलिए भाइयो-बहनो, एक सामाजिक चरित्र के नाते, एक राष्ट्रीय चरित्र के नाते हमें उस दिशा में जाना है। भाइयो-बहनो, देश को आगे बढ़ाना है, तो विकास - एक ही रास्ता है। सुशासन - एक ही रास्ता है। देश को आगे ले जाने के लिए ये ही दो पटरियाँ हैं - गुड गवर्नेंस एंड डेवलपमेंट, उन्हीं को लेकर हम आगे चल सकते हैं। उन्हीं को लेकर चलने का इरादा लेकर हम चलना चाहते हैं। मैं जब गुड गवर्नेंस की बात करता हूँ, तब आप मुझे बताइए कि कोई प्राइवेट में नौकरी करता है, अगर आप उसको पूछोगे, तो वह कहता है कि मैं जॉब करता हूँ, लेकिन जो सरकार में नौकरी करता है, उसको पूछोगे, तो वह कहता है कि मैं सर्विस करता हूँ। दोनों कमाते हैं, लेकिन एक के लिए जॉब है और एक के लिए सर्विस है। मैं सरकारी सेवा में लगे सभी भाइयों और बहनों से प्रश्न पूछता हूँ कि क्या कहीं यह 'सर्विस' शब्द, उसने अपनी ताकत खो तो नहीं दी है, अपनी पहचान खो तो नहीं दी है? सरकारी सेवा में जुड़े हुए लोग 'जॉब' नहीं कर रहे हैं, 'सेवा' कर रहे हैं, 'सर्विस' कर रहे हैं। इसलिए इस भाव को पुनर्जीवित करना, एक राष्ट्रीय चरित्र के रूप में इसको हमें आगे ले जाना, उस दिशा में हमें आगे बढ़ना है।


भाइयो-बहनो, क्या देश के नागरिकों को राष्ट्र के कल्याण के लिए कदम उठाना चाहिए या नहीं उठाना चाहिए? आप कल्पना कीजिए, सवा सौ करोड़ देशवासी एक कदम चलें, तो यह देश सवा सौ करोड़ कदम आगे चला जाएगा। लोकतंत्र, यह सिर्फ सरकार चुनने का सीमित मायना नहीं है। लोकतंत्र में सवा सौ करोड़ नागरिक और सरकार कंधे से कंधा मिला कर देश की आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए काम करें, यह लोकतंत्र का मायना है। हमें जन-भागीदारी करनी है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के साथ आगे बढ़ना है। हमें जनता को जोड़कर आगे बढ़ना है। उसे जोड़ने में आगे बढ़ने के लिए, आप मुझे बताइए कि आज हमारा किसान आत्महत्या क्यों करता है? वह साहूकार से कर्ज़ लेता है, कर्ज़ दे नहीं सकता है, मर जाता है। बेटी की शादी है, गरीब आदमी साहूकार से कर्ज़ लेता है, कर्ज़ वापस दे नहीं पाता है, जीवन भर मुसीबतों से गुज़रता है। मेरे उन गरीब परिवारों की रक्षा कौन करेगा?


भाइयो-बहनो, इस आज़ादी के पर्व पर मैं एक योजना को आगे बढ़ाने का संकल्प करने के लिए आपके पास आया हूँ - 'प्रधान मंत्री जनधन योजना'। इस 'प्रधान मंत्री जनधन योजना' के माध्यम से हम देश के गरीब से गरीब लोगों को बैंक अकाउंट की सुविधा से जोड़ना चाहते हैं। आज करोड़ों-करोड़ परिवार हैं, जिनके पास मोबाइल फोन तो हैं, लेकिन बैंक अकाउंट नहीं हैं। यह स्थिति हमें बदलनी है। देश के आर्थिक संसाधन गरीब के काम आएँ, इसकी शुरुआत यहीं से होती है। यही तो है, जो खिड़की खोलता है। इसलिए 'प्रधान मंत्री जनधन योजना' के तहत जो अकाउंट खुलेगा, उसको डेबिट कार्ड दिया जाएगा। उस डेबिट कार्ड के साथ हर गरीब परिवार को एक लाख रुपए का बीमा सुनिश्चित कर दिया जाएगा, ताकि अगर उसके जीवन में कोई संकट आया, तो उसके परिवारजनों को एक लाख रुपए का बीमा मिल सकता है।


भाइयो-बहनो, यह देश नौजवानों का देश है। 65 प्रतिशत देश की जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा नौजवान देश है। क्या हमने कभी इसका फायदा उठाने के लिए सोचा है? आज दुनिया को स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है। आज भारत को भी स्किल्ड वर्कफोर्स की जरूरत है। कभी-कभार हम अच्छा ड्राइवर ढूँढ़ते हैं, नहीं मिलता है, प्लम्बर ढूँढ़ते हैं, नहीं मिलता है, अच्छा कुक चाहिए, नहीं मिलता है। नौजवान हैं, बेरोजगार हैं, लेकिन हमें जैसा चाहिए, वैसा नौजवान मिलता नहीं है। देश के विकास को यदि आगे बढ़ाना है, तो 'स्किल डेवलपमेंट' और 'स्किल्ड इंडिया' यह हमारा मिशन है। हिन्दुस्तान के कोटि-कोटि नौजवान स्किल सीखें, हुनर सीखें, उसके लिए पूरे देश में जाल होना चाहिए और घिसी-पिटी व्यवस्थाओं से नहीं, उनको वह स्किल मिले, जो उन्हें आधुनिक भारत बनाने में काम आए। वे दुनिया के किसी भी देश में जाएँ, तो उनके हुनर की सराहना हो और हम दो प्रकार के विकास को लेकर चलना चाहते हैं। मैं ऐसे नौजवानों को भी तैयार करना चाहता हूँ, जो जॉब क्रिएटर हों और जो जॉब क्रिएट करने का सामर्थ्य नहीं रखते, संयोग नहीं है, वे विश्व के किसी भी कोने में जाकर आँख में आँख मिला करके अपने बाहुबल के द्वारा, अपनी उँगलियों के हुनर के द्वारा, अपने कौशल्य के द्वारा विश्व का हृदय जीत सकें, ऐसे नौजवानों का सामर्थ्य हम तैयार करना चाहते हैं। भाइयो-बहनो, स्किल डेवलपमेंट को बहुत तेज़ी से आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर मैं यह करना चाहता हूं।



भाइयो-बहनो, विश्व बदल चुका है। मेरे प्यारे देशवासियो, विश्व बदल चुका है। अब भारत अलग-थलग, अकेला एक कोने में बैठकर अपना भविष्य तय नहीं कर सकता। विश्व की आर्थिक व्यवस्थाएँ बदल चुकी हैं और इसलिए हम लोगों को भी उसी रूप में सोचना होगा। सरकार ने अभी कई फैसले लिए हैं, बजट में कुछ घोषणाएँ की हैं और मैं विश्व का आह्वान करता हूँ, विश्व में पहुँचे हुए भारतवासियों का भी आह्वान करता हूँ कि आज अगर हमें नौजवानों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार देना है, तो हमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देना पड़ेगा। इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट की जो स्थिति है, उसमें संतुलन पैदा करना हो, तो हमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर बल देना होगा। हमारे नौजवानों की जो विद्या है, सामर्थ्य है, उसको अगर काम में लाना है, तो हमें मैन्युफैक्चरिंग की ओर जाना पड़ेगा और इसके लिए हिन्दुस्तान की भी पूरी ताकत लगेगी, लेकिन विश्व की शक्तियों को भी हम निमंत्रण देते हैं। इसलिए मैं आज लाल किले की प्राचीर से विश्व भर में लोगों से कहना चाहता हूँ, "कम, मेक इन इंडिया," "आइए, हिन्दुस्तान में निर्माण कीजिए।" दुनिया के किसी भी देश में जाकर बेचिए, लेकिन निर्माण यहाँ कीजिए, मैन्युफैक्चर यहाँ कीजिए। हमारे पास स्किल है, टेलेंट है, डिसिप्लिन है, कुछ कर गुज़रने का इरादा है। हम विश्व को एक सानुकूल अवसर देना चाहते हैं कि आइए, "कम, मेक इन इंडिया" और हम विश्व को कहें, इलेक्ट्रिकल से ले करके इलेक्ट्रॉनिक्स तक "कम, मेक इन इंडिया", केमिकल्स से ले करके फार्मास्युटिकल्स तक "कम, मेक इन इंडिया", ऑटोमोबाइल्स से ले करके ऐग्रो वैल्यू एडीशन तक "कम, मेक इन इंडिया", पेपर हो या प्लास्टिक "कम, मेक इन इंडिया", सैटेलाइट हो या सबमेरीन "कम, मेक इन इंडिया"। ताकत है हमारे देश में! आइए, मैं निमंत्रण देता हूं।


भाइयो-बहनो, मैं देश के नौजवानों का भी एक आवाहन करना चाहता हूं, विशेष करके उद्योग क्षेत्र में लगे हुए छोटे-छोटे लोगों का आवाहन करना चाहता हूं। मैं देश के टेक्निकल एजुकेशन से जुड़े हुए नौजवानों का आवाहन करना चाहता हूं। जैसे मैं विश्व से कहता हूं "कम, मेक इन इंडिया", मैं देश के नौजवानों को कहता हूं - हमारा सपना होना चाहिए कि दुनिया के हर कोने में यह बात पहुंचनी चाहिए, "मेड इन इंडिया"। यह हमारा सपना होना चाहिए। क्या मेरे देश के नौजवानों को देश-सेवा करने के लिए सिर्फ भगत सिंह की तरह फांसी पर लटकना ही अनिवार्य है? भाइयो-बहनो, लालबहादुर शास्त्री जी ने "जय जवान, जय किसान" एक साथ मंत्र दिया था। जवान, जो सीमा पर अपना सिर दे देता है, उसी की बराबरी में "जय जवान" कहा था। क्यों? क्योंकि अन्न के भंडार भर करके मेरा किसान भारत मां की उतनी ही सेवा करता है, जैसे जवान भारत मां की रक्षा करता है। यह भी देश सेवा है। अन्न के भंडार भरना, यह भी किसान की सबसे बड़ी देश सेवा है और तभी तो लालबहादुर शास्त्री ने "जय जवान, जय किसान" कहा था।


भाइयो-बहनो, मैं नौजवानों से कहना चाहता हूं, आपके रहते हुए छोटी-मोटी चीज़ें हमें दुनिया से इम्पोर्ट क्यों करनी पड़ें? क्या मेरे देश के नौजवान यह तय कर सकते हैं, वे ज़रा रिसर्च करें, ढूंढ़ें कि भारत कितने प्रकार की चीज़ों को इम्पोर्ट करता है और वे फैसला करें कि मैं अपने छोटे-छोटे काम के द्वारा, उद्योग के द्वारा, मेरा छोटा ही कारखाना क्यों न हो, लेकिन मेरे देश में इम्पोर्ट होने वाली कम से कम एक चीज़ मैं ऐसी बनाऊंगा कि मेरे देश को कभी इम्पोर्ट न करना पड़े। इतना ही नहीं, मेरा देश एक्सपोर्ट करने की स्थिति में आए। अगर हिन्दुस्तान के लाखों नौजवान एक-एक आइटम ले करके बैठ जाएं, तो भारत दुनिया में एक्सपोर्ट करने वाला देश बन सकता है और इसलिए मेरा आग्रह है, नौजवानों से विशेष करके, छोटे-मोटे उद्योगकारों से - दो बातों में कॉम्प्रोमाइज़ न करें, एक ज़ीरो डिफेक्ट, दूसरा ज़ीरो इफेक्ट। हम वह मैन्युफैक्चरिंग करें, जिसमें ज़ीरो डिफेक्ट हो, ताकि दुनिया के बाज़ार से वह कभी वापस न आए और हम वह मैन्युफैक्चरिंग करें, जिससे ज़ीरो इफेक्ट हो, पर्यावरण पर इसका कोई नेगेटिव इफेक्ट न हो। ज़ीरो डिफेक्ट, ज़ीरो इफेक्ट के साथ मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का सपना ले करके अगर हम आगे चलते हैं, तो मुझे विश्वास है, मेरे भाइयो-बहनो, कि जिस काम को ले करके हम चल रहे हैं, उस काम को पूरा करेंगे।


भाइयो-बहनो, पूरे विश्व में हमारे देश के नौजवानों ने भारत की पहचान को बदल दिया है। विश्व भारत को क्या जानता था? ज्यादा नहीं, अभी 25-30 साल पहले तक दुनिया के कई कोने ऐसे थे जो हिन्दुस्तान के लिए यही सोचते थे कि ये तो "सपेरों का देश" है। ये सांप का खेल करने वाला देश है, काले जादू वाला देश है। भारत की सच्ची पहचान दुनिया तक पहुंची नहीं थी, लेकिन भाइयो-बहनो, हमारे 20-22-23 साल के नौजवान, जिन्होंने कम्प्यूटर पर अंगुलियां घुमाते-घुमाते दुनिया को चकित कर दिया। विश्व में भारत की एक नई पहचान बनाने का रास्ता हमारे आई.टी. प्रोफेशन के नौजवानों ने कर दिया। अगर यह ताकत हमारे देश में है, तो क्या देश के लिए हम कुछ सोच सकते हैं? इसलिए हमारा सपना "डिजिटल इंडिया" है। जब मैं "डिजिटल इंडिया" कहता हूं, तब ये बड़े लोगों की बात नहीं है, यह गरीब के लिए है। अगर ब्रॉडबेंड कनेक्टिविटी से हिन्दुस्तान के गांव जुड़ते हैं और गांव के आखिरी छोर के स्कूल में अगर हम लॉन्ग डिस्टेंस एजुकेशन दे सकते हैं, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि हमारे उन गांवों के बच्चों को कितनी अच्छी शिक्षा मिलेगी। जहां डाक्टर नहीं पहुंच पाते, अगर हम टेलिमेडिसिन का नेटवर्क खड़ा करें, तो वहां पर बैठे हुए गरीब व्यक्ति को भी, किस प्रकार की दवाई की दिशा में जाना है, उसका स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सकता है।


सामान्य मानव की रोजमर्रा की चीज़ें - आपके हाथ में मोबाइल फोन है, हिन्दुस्तान के नागरिकों के पास बहुत बड़ी तादाद में मोबाइल कनेक्टिविटी है, लेकिन क्या इस मोबाइल गवर्नेंस की तरफ हम जा सकते हैं? अपने मोबाइल से गरीब आदमी बैंक अकाउंट ऑपरेट करे, वह सरकार से अपनी चीज़ें मांग सके, वह अपनी अर्ज़ी पेश करे, अपना सारा कारोबार चलते-चलते मोबाइल गवर्नेंस के द्वारा कर सके और यह अगर करना है, तो हमें 'डिजिटल इंडिया' की ओर जाना है। और 'डिजिटल इंडिया' की तरफ जाना है, तो इसके साथ हमारा यह भी सपना है, हम आज बहुत बड़ी मात्रा में विदेशों से इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ इम्पोर्ट करते हैं। आपको हैरानी होगी भाइयो-बहनो, ये टीवी, ये मोबाइल फोन, ये आईपैड, ये जो इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ हम लाते हैं, देश के लिए पेट्रोलियम पदार्थों को लाना अनिवार्य है, डीज़ल और पेट्रोल लाते हैं, तेल लाते हैं। उसके बाद इम्पोर्ट में दूसरे नम्बर पर हमारी इलैक्ट्रॉनिक गुड्ज़ हैं। अगर हम 'डिजिटल इंडिया' का सपना ले करके इलेक्ट्रॉनिक गुड्ज़ के मैन्युफैक्चर के लिए चल पड़ें और हम कम से कम स्वनिर्भर बन जाएं, तो देश की तिजोरी को कितना बड़ा लाभ हो सकता है और इसलिए हम इस 'डिजिटल इंडिया' को ले करके जब आगे चलना चाहते हैं, तब ई-गवर्नेंस। ई-गवर्नेंस ईजी गवर्नेंस है, इफेक्टिव गवर्नेंस है और इकोनॉमिकल गवर्नेंस है। ई-गवर्नेंस के माध्यम से गुड गवर्नेंस की ओर जाने का रास्ता है। एक जमाना था, कहा जाता था कि रेलवे देश को जोड़ती है । ऐसा कहा जाता था। मैं कहता हूं कि आज आईटी देश के जन-जन को जोड़ने की ताकत रखती है और इसलिए हम 'डिजिटल इंडिया' के माध्यम से आईटी के धरातल पर यूनिटी के मंत्र को साकार करना चाहते हैं।


भाइयो-बहनो, अगर हम इन चीजों को ले करके चलते हैं, तो मुझे विश्वास है कि 'डिजिटल इंडिया' विश्व की बराबरी करने की एक ताकत के साथ खड़ा हो जाएगा, हमारे नौजवानों में वह सामर्थ्य है, यह उनको वह अवसर दे रहा है।


भाइयो-बहनो, हम टूरिज्म को बढ़ावा देना चाहते हैं। टूरिज्म से गरीब से गरीब व्यक्ति को रोजगार मिलता है। चना बेचने वाला भी कमाता है, ऑटो-रिक्शा वाला भी कमाता है, पकौड़े बेचने वाला भी कमाता है और एक चाय बेचने वाला भी कमाता है। जब चाय बेचने वाले की बात आती है, तो मुझे ज़रा अपनापन महसूस होता है। टूरिज्म के कारण गरीब से गरीब व्यक्ति को रोज़गार मिलता है। लेकिन टूरिज्म के अंदर बढ़ावा देने में भी और एक राष्ट्रीय चरित्र के रूप में भी हमारे सामने सबसे बड़ी रुकावट है हमारे चारों तरफ दिखाई दे रही गंदगी । क्या आज़ादी के बाद, आज़ादी के इतने सालों के बाद, जब हम 21 वीं सदी के डेढ़ दशक के दरवाजे पर खड़े हैं, तब क्या अब भी हम गंदगी में जीना चाहते हैं? मैंने यहाँ सरकार में आकर पहला काम सफाई का शुरू किया है। लोगों को आश्चर्य हुआ कि क्या यह प्रधान मंत्री का काम है? लोगों को लगता होगा कि यह प्रधान मंत्री के लिए छोटा काम होगा, मेरे लिए बहुत बड़ा काम है। सफाई करना बहुत बड़ा काम है। क्या हमारा देश स्वच्छ नहीं हो सकता है? अगर सवा सौ करोड़ देशवासी तय कर लें कि मैं कभी गंदगी नहीं करूंगा तो दुनिया की कौन-सी ताकत है, जो हमारे शहर, गाँव को आकर गंदा कर सके? क्या हम इतना-सा संकल्प नहीं कर सकते हैं?


भाइयो-बहनो, 2019 में महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती आ रही है। महात्मा गांधी की 150वीं जयंती हम कैसे मनाएँ? महात्मा गाँधी, जिन्होंने हमें आज़ादी दी, जिन्होंने इतने बड़े देश को दुनिया के अंदर इतना सम्मान दिलाया, उन महात्मा गाँधी को हम क्या दें? भाइयो-बहनो, महात्मा गाँधी को सबसे प्रिय थी - सफाई, स्वच्छता। क्या हम तय करें कि सन् 2019 में जब हम महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती मनाएँगे, तो हमारा गाँव, हमारा शहर, हमारी गली, हमारा मोहल्ला, हमारे स्कूल, हमारे मंदिर, हमारे अस्पताल, सभी क्षेत्रों में हम गंदगी का नामोनिशान नहीं रहने देंगे? यह सरकार से नहीं होता है, जन-भागीदारी से होता है, इसलिए यह काम हम सबको मिल कर करना है।


भाइयो-बहनो, हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। क्या कभी हमारे मन को पीड़ा हुई कि आज भी हमारी माताओं और बहनों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है? डिग्निटी ऑफ विमेन, क्या यह हम सबका दायित्व नहीं है? बेचारी गाँव की माँ-बहनें अँधेरे का इंतजार करती हैं, जब तक अँधेरा नहीं आता है, वे शौच के लिए नहीं जा पाती हैं। उसके शरीर को कितनी पीड़ा होती होगी, कितनी बीमारियों की जड़ें उसमें से शुरू होती होंगी! क्या हमारी माँ-बहनों की इज्ज़त के लिए हम कम-से-कम शौचालय का प्रबन्ध नहीं कर सकते हैं? भाइयो-बहनो, किसी को लगेगा कि 15 अगस्त का इतना बड़ा महोत्सव बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने का अवसर होता है। भाइयो-बहनो, बड़ी बातों का महत्व है, घोषणाओं का भी महत्व है, लेकिन कभी-कभी घोषणाएँ एषणाएँ जगाती हैं और जब घोषणाएँ परिपूर्ण नहीं होती हैं, तब समाज निराशा की गर्त में डूब जाता है। इसलिए हम उन बातों के ही कहने के पक्षधर हैं, जिनको हम अपने देखते-देखते पूरा कर पाएँ। भाइयो-बहनो, इसलिए मैं कहता हूँ कि आपको लगता होगा कि क्या लाल किले से सफाई की बात करना, लाल किले से टॉयलेट की बात बताना, यह कैसा प्रधान मंत्री है? भाइयो-बहनो, मैं नहीं जानता हूँ कि मेरी कैसी आलोचना होगी, इसे कैसे लिया जाएगा, लेकिन मैं मन से मानता हूँ। मैं गरीब परिवार से आया हूँ, मैंने गरीबी देखी है और गरीब को इज़् ज़त मिले, इसकी शुरूआत यहीं से होती है। इसलिए 'स्वच्छ भारत' का एक अभियान इसी 2 अक्टूबर से मुझे आरम्भ करना है और चार साल के भीतर-भीतर हम इस काम को आगे बढ़ाना चाहते हैं। एक काम तो मैं आज ही शुरू करना चाहता हूँ और वह है- हिन्दुस्तान के सभी स्कूलों में टॉयलेट हो, बच्चियों के लिए अलग टॉयलेट हो, तभी तो हमारी बच्चियाँ स्कूल छोड़ कर भागेंगी नहीं। हमारे सांसद जो एमपीलैड फंड का उपयोग कर रहे हैं, मैं उनसे आग्रह करता हूँ कि एक साल के लिए आपका धन स्कूलों में टॉयलेट बनाने के लिए खर्च कीजिए। सरकार अपना बजट टॉयलेट बनाने में खर्च करे। मैं देश के कॉरपोरेट सेक्टर्स का भी आह्वान करना चाहता हूँ कि कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत आप जो खर्च कर रहे हैं, उसमें आप स्कूलों में टॉयलेट बनाने को प्राथमिकता दीजिए। सरकार के साथ मिलकर, राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक साल के भीतर-भीतर यह काम हो जाए और जब हम अगले 15 अगस्त को यहाँ खड़े हों, तब इस विश्वास के साथ खड़े हों कि अब हिन्दुस्तान का ऐसा कोई स्कूल नहीं है, जहाँ बच्चे एवं बच्चियों के लिए अलग टॉयलेट का निर्माण होना बाकी है।


भाइयो-बहनो, अगर हम सपने लेकर चलते हैं तो सपने पूरे भी होते हैं। मैं आज एक विशेष बात और कहना चाहता हूँ। भाइयो-बहनो, देशहित की चर्चा करना और देशहित के विचारों को देना, इसका अपना महत्व है। हमारे सांसद, वे कुछ करना भी चाहते हैं, लेकिन उन्हें अवसर नहीं मिलता है। वे अपनी बात बता सकते हैं, सरकार को चिट्ठी लिख सकते हैं, आंदोलन कर सकते हैं, मेमोरेंडम दे सकते हैं, लेकिन फिर भी, खुद को कुछ करने का अवसर मिलता नहीं है। मैं एक नए विचार को लेकर आज आपके पास आया हूं। हमारे देश में प्रधान मंत्री के नाम पर कई योजनाएं चल रही हैं, कई नेताओं के नाम पर ढेर सारी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन मैं आज सांसद के नाम पर एक योजना घोषित करता हूं - "सांसद आदर्श ग्राम योजना"। हम कुछ पैरामीटर्स तय करेंगे और मैं सांसदों से आग्रह करता हूं कि वे अपने इलाके में तीन हजार से पांच हजार के बीच का कोई भी गांव पसंद कर लें और कुछ पैरामीटर्स तय हों - वहां के स्थल, काल, परिस्थिति के अनुसार, वहां की शिक्षा, वहां का स्वास्थ्य, वहां की सफाई, वहां के गांव का वह माहौल, गांव में ग्रीनरी, गांव का मेलजोल, कई पैरामीटर्स हम तय करेंगे और हर सांसद 2016 तक अपने इलाके में एक गांव को आदर्श गांव बनाए। इतना तो कर सकते हैं न भाई! करना चाहिए न! देश बनाना है तो गांव से शुरू करें। एक आदर्श गांव बनाएं और मैं 2016 का टाइम इसलिए देता हूं कि नयी योजना है, लागू करने में, योजना बनाने में कभी समय लगता है और 2016 के बाद, जब 2019 में वह चुनाव के लिए जाए, उसके पहले और दो गांवों को करे और 2019 के बाद हर सांसद, 5 साल के कार्यकाल में कम से कम 5 आदर्श गांव अपने इलाके में बनाए। जो शहरी क्षेत्र के एम.पीज़ हैं, उनसे भी मेरा आवाहन है कि वे भी एक गांव पसंद करें। जो राज्य सभा के एम.पीज़ हैं, उनसे भी मेरा आग्रह है, वे भी एक गांव पसंद करें।


हिन्दुस्तान के हर जिले में, अगर हम एक आदर्श गांव बनाकर देते हैं, तो सभी अगल-बगल के गांवों को खुद उस दिशा में जाने का मन कर जाएगा। एक मॉडल गांव बना करके देखें, व्यवस्थाओं से भरा हुआ गांव बनाकर देखें। 11 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण जी की जन्म जयंती है। मैं 11 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण जी की जन्म जयंती पर एक "सांसद आदर्श ग्राम योजना" का कम्प्लीट ब्ल्यूप्रिंट सभी सांसदों के सामने रख दूंगा, सभी राज्य सरकारों के सामने रख दूंगा और मैं राज्य सरकारों से भी आग्रह करता हूं कि आप भी इस योजना के माध्यम से, अपने राज्य में जो अनुकूलता हो, वैसे सभी विधायकों के लिए एक आदर्श ग्राम बनाने का संकल्प करिए। आप कल्पना कर सकते हैं, देश के सभी विधायक एक आदर्श ग्राम बनाएं, सभी सांसद एक आदर्श ग्राम बनाएं। देखते ही देखते हिन्दुस्तान के हर ब्लॉक में एक आदर्श ग्राम तैयार हो जाएगा, जो हमें गांव की सुख-सुविधा में बदलाव लाने के लिए प्रेरणा दे सकता है, हमें नई दिशा दे सकता है और इसलिए इस "सांसद आदर्श ग्राम योजना" के तहत हम आगे बढ़ना चाहते हैं।


भाइयो-बहनो, जब से हमारी सरकार बनी है, तब से अखबारों में, टी.वी. में एक चर्चा चल रही है कि प्लानिंग कमीशन का क्या होगा? मैं समझता हूं कि जिस समय प्लानिंग कमीशन का जन्म हुआ, योजना आयोग का जन्म हुआ, उस समय की जो स्थितियाँ थीं, उस समय की जो आवश्यकताएँ थीं, उनके आधार पर उसकी रचना की गई। इन पिछले वर्षों में योजना आयोग ने अपने तरीके से राष्ट्र के विकास में उचित योगदान दिया है। मैं इसका आदर करता हूं, गौरव करता हूं, सम्मान करता हूं, सत्कार करता हूं, लेकिन अब देश की अंदरूनी स्थिति भी बदली हुई है, वैश्विक परिवेश भी बदला हुआ है, आर्थिक गतिविधि का केंद्र सरकारें नहीं रही हैं, उसका दायरा बहुत फैल चुका है। राज्य सरकारें विकास के केन्द्र में आ रही हैं और मैं इसको अच्छी निशानी मानता हूँ। अगर भारत को आगे ले जाना है, तो यह राज्यों को आगे ले जाकर ही होने वाला है। भारत के फेडेरल स्ट्रक्चर की अहमियत पिछले 60 साल में जितनी थी, उससे ज्यादा आज के युग में है। हमारे संघीय ढाँचे को मजबूत बनाना, हमारे संघीय ढाँचे को चेतनवंत बनाना, हमारे संघीय ढाँचे को विकास की धरोहर के रूप में काम लेना, मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री की एक टीम का फॉर्मेशन हो, केन्द्र और राज्य की एक टीम हो, एक टीम बनकर आगे चले, तो इस काम को अब प्लानिंग कमीशन के नए रंग-रूप से सोचना पड़ेगा। इसलिए लाल किले की इस प्राचीर से एक बहुत बड़ी चली आ रही पुरानी व्यवस्था में उसका कायाकल्प भी करने की जरूरत है, उसमें बहुत बदलाव करने की आवश्यकता है। कभी-कभी पुराने घर की रिपेयरिंग में खर्चा ज्यादा होता है लेकिन संतोष नहीं होता है। फिर मन करता है, अच्छा है, एक नया ही घर बना लें और इसलिए बहुत ही कम समय के भीतर योजना आयोग के स्थान पर, एक क्रिएटिव थिंकिंग के साथ राष्ट्र को आगे ले जाने की दिशा, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की दिशा, संसाधनों का ऑप्टिमम युटिलाइजेशन, प्राकृतिक संसाधनों का ऑप्टिमम युटिलाइजेशन, देश की युवा शक्ति के सामर्थ्य का उपयोग, राज्य सरकारों की आगे बढ़ने की इच्छाओं को बल देना, राज्य सरकारों को ताकतवर बनाना, संघीय ढाँचे को ताकतवर बनाना, एक ऐसे नये रंग-रूप के साथ, नये शरीर, नयी आत्मा के साथ, नयी सोच के साथ, नयी दिशा के साथ, नये विश्वास के साथ, एक नये इंस्टीट्यूशन का हम निर्माण करेंगे और बहुत ही जल्द योजना आयोग की जगह पर यह नया इंस्टीट्यूट काम करे, उस दिशा में हम आगे बढ़ने वाले हैं।


भाइयो-बहनो, आज 15 अगस्त महर्षि अरविंद का भी जन्म जयंती का पर्व है। महर्षि अरविंद ने एक क्रांतिकारी से निकल कर योग गुरु की अवस्था को प्राप्त किया था। उन्होंने भारत के भाग्य के लिए कहा था कि "मुझे विश्वास है, भारत की दैविक शक्ति, भारत की आध्यात्मिक विरासत विश्व कल्याण के लिए अहम भूमिका निभाएगी"। इस प्रकार के भाव महर्षि अरविन्द ने व्यक्त किए थे। मेरी महापुरुषों की बातों में बड़ी श्रद्धा है। मेरी त्यागी, तपस्वी ऋषियों और मुनियों की बातों में बड़ी श्रद्धा है और इसलिए मुझे आज लाल किले की प्राचीर से स्वामी विवेकानन्द जी के वे शब्द याद आ रहे हैं जब स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था, "मैं मेरी आँखों के सामने देख रहा हूँ।" विवेकानन्द जी के शब्द थे - "मैं मेरी आँखों के सामने देख रहा हूँ कि फिर एक बार मेरी भारतमाता जाग उठी है, मेरी भारतमाता जगद्गुरु के स्थान पर विराजमान होगी, हर भारतीय मानवता के कल्याण के काम आएगा, भारत की यह विरासत विश्व के कल्याण के लिए काम आएगी।" ये शब्द स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने तरीके से कहे थे। भाइयो-बहनो, विवेकानन्द जी के शब्द कभी असत्य नहीं हो सकते। स्वामी विवेकानन्द जी के शब्द, भारत को जगद्गुरु देखने का उनका सपना, उनकी दीर्घदृष्टि, उस सपने को पूरा करना हम लोगों का कर्तव्य है। दुनिया का यह सामर्थ्यवान देश, प्रकृति से हरा-भरा देश, नौजवानों का देश, आने वाले दिनों में विश्व के लिए बहुत कुछ कर सकता है।


भाइयो-बहनो, लोग विदेश की नीतियों के संबंध में चर्चा करते हैं। मैं यह साफ मानता हूं कि भारत की विदेश नीति के कई आयाम हो सकते हैं, लेकिन एक महत्वपूर्ण बात है, जिस पर मैं अपना ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं कि हम आज़ादी की जैसे लड़ाई लड़े, मिल-जुलकर लड़े थे, तब तो हम अलग नहीं थे, हम साथ-साथ थे। कौन सी सरकार हमारे साथ थी? कौन से शस्त्र हमारे पास थे? एक गांधी थे, सरदार थे और लक्षावती स्वातंत्र्य सेनानी थे और इतनी बड़ी सल्तनत थी। उस सल्तनत के सामने हम आज़ादी की जंग जीते या नहीं जीते? विदेशी ताकतों को परास्त किया या नहीं किया? भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया या नहीं किया? हमीं तो थे, हमारे ही तो पूर्वज थे, जिन्होंने यह सामर्थ्य दिखाई थी। समय की मांग है, सत्ता के बिना, शासन के बिना, शस्त्र के बिना, साधनों के बिना भी इतनी बड़ी सल्तनत को हटाने का काम अगर हिंदुस्तान की जनता कर सकती है, तो भाइयो-बहनो, हम क्या गरीबी को हटा नहीं सकते? क्या हम गरीबी को परास्त नहीं कर सकते हैं? क्या हम गरीबी के खिलाफ लड़ाई जीत नहीं सकते हैं? मेरे सवा सौ करोड़ प्यारे देशवासियो, आओ! आओ, हम संकल्प करें, हम गरीबी को परास्त करें, हम विजयश्री को प्राप्त करें। भारत से गरीबी का उन्मूलन हो, उन सपनों को लेकर हम चलें और पड़ोसी देशों के पास भी यही तो समस्या है! क्यों न हम सार्क देशों के सभी साथी दोस्त मिल करके गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने की योजना बनाएं? हम मिल करके लड़ाई लड़ें, गरीबी को परास्त करें। एक बार देखें तो सही, मरने-मारने की दुनिया को छोड़ करके जीवित रहने का आनंद क्या होता है! यही तो भूमि है, जहां सिद्दार्थ के जीवन की घटना घटी थी। एक पंछी को एक भाई ने तीर मार दिया और एक दूसरे भाई ने तीर निकाल करके बचा लिया। मां के पास गए - पंछी किसका, हंस किसका? मां से पूछा, मारने वाले का या बचाने वाले का? मां ने कहा, बचाने वाले का। मारने वाले से बचाने वाले की ताकत ज्यादा होती है और वही तो आगे जा करके बुद्ध बन जाता है। वही तो आगे जा करके बुद्ध बन जाता है और इसलिए, मैं पड़ोस के देशों से मिल-जुल करके गरीबी के खिलाफ लड़ाई को लड़ने के लिए सहयोग चाहता हूं, सहयोग करना चाहता हूं और हम मिल करके, सार्क देश मिल करके, हम दुनिया में अपनी अहमियत खड़ी कर सकते हैं, हम दुनिया में एक ताकत बनकर उभर सकते हैं। आवश्यकता है, हम मिल-जुल करके चलें, गरीबी से लड़ाई जीतने का सपना ले करके चलें, कंधे से कंधा मिला करके चलें। मैं भूटान गया, नेपाल गया, सार्क देशों के सभी महानुभाव शपथ समारोह में आए, एक बहुत अच्छी शुभ शुरुआत हुई है। तो निश्चित रूप से अच्छे परिणाम मिलेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है और देश और दुनिया में भारत की यह सोच, हम देशवासियों का भला करना चाहते हैं और विश्व के कल्याण में काम आ सकें, हिन्दुस्तान ऐसा हाथ फहराना चाहता है। इन सपनों को ले करके, पूरा करके, आगे बढ़ने का हम प्रयास कर रहे हैं।


भाइयो-बहनो, आज 15 अगस्त को हम देश के लिए कुछ न कुछ करने का संकल्प ले करके चलेंगे। हम देश के लिए काम आएं, देश को आगे बढ़ाने का संकल्प लेकर चलेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाता हूं भाइयो-बहनो, मैं मेरी सरकार के साथियों को भी कहता हूं, अगर आप 12 घंटे काम करोगे, तो मैं 13 घंटे करूंगा। अगर आप 14 घंटे कर्म करोगे, तो मैं 15 घंटे करूंगा। क्यों? क्योंकि मैं प्रधान मंत्री नहीं, प्रधान सेवक के रूप में आपके बीच आया हूं। मैं शासक के रूप में नहीं, सेवक के रूप में सरकार लेकर आया हूं। भाइयो-बहनो, मैं विश्वास दिलाता हूं कि इस देश की एक नियति है, विश्व कल्याण की नियति है, यह विवेकानन्द जी ने कहा था। इस नियति को पूर्ण करने के लिए भारत का जन्म हुआ है, इस हिन्दुस्तान का जन्म हुआ है। इसकी परिपूर्ति के लिए सवा सौ करोड़ देशवासियों को तन-मन से मिलकर राष्ट्र के कल्याण के लिए आगे बढ़ना है।


मैं फिर एक बार देश के सुरक्षा बलों, देश के अर्द्ध सैनिक बलों, देश की सभी सिक्योरिटी फोर्सेज़ को, मां-भारती की रक्षा के लिए, उनकी तपस्या, त्याग, उनके बलिदान पर गौरव करता हूं। मैं देशवासियों को कहता हूं, "राष्ट्रयाम् जाग्रयाम् वयम्", "Eternal vigilance is the price of liberty". हम जागते रहें, सेना जाग रही है, हम भी जागते रहें और देश नए कदम की ओर आगे बढ़ता रहे, इसी एक संकल्प के साथ हमें आगे बढ़ना है। सभी मेरे साथ पूरी ताकत से बोलिए -


भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द।

वंदे मातरम्, वंदे मातरम्, वंदे मातरम्!


(साभार: PIB)


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