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Saturday, March 10, 2012

हासिल, मकबूल, नेमसेक! अब पान सिंह में भी मर गये!!

हासिल, मकबूल, नेमसेक! अब पान सिंह में भी मर गये!!



 आमुखसिनेमा

हासिल, मकबूल, नेमसेक! अब पान सिंह में भी मर गये!!

9 MARCH 2012 6 COMMENTS

♦ सुतपा सिकदर

पांच मार्च को सुतपा सिकदर ने अपनी फेसबुक वॉल पर यह टिप्पणी की थी। इस टिप्‍पणी में पान सिंह तोमर देखने के बाद उनके आठ साल के बेटे की प्रतिक्रया का उल्लेख है। सुतपा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की स्‍नातक हैं और फिल्मों में लेखन करती हैं। तिग्मांशु धूलिया की इस फिल्म में पान सिंह तोमर की भूमिका निभाने वाले इरफान सुतपा के पति हैं। यह टिप्पणी छोटी जरूर है, लेकिन इसमें मानी की कई परतें हैं। संभव है कि सुतपा ने यह टिप्पणी फेसबुक के अपने दोस्तों के लिए लगाया हो और हम इसे इस तरह प्रकाशित-प्रसारित कर उनकी निजता का उल्लंघन कर रहे हों। बिना पूछे इसे अनुदित, प्रकाशित और प्रसारित करने के लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं लेकिन इस टिप्पणी के महत्व को देखते हुए हमें अपने को रोक पाना मुश्किल है : प्रकाश के रे

ल मैं अपने छोटे बेटे के साथ पान सिंह तोमर देखने गयी थी। वापस आते समय उसने मुझसे कहा कि यह चौथी फिल्म है, जिसमें बाबा की मृत्यु हो जाती है। कुछ चिंता के साथ मैंने उसकी ओर देखा। वह गंभीरता के साथ बोले जा रहा था, 'पहले वे हासिल में मरे, फिर मकबूल में, फिर नेमसेक में और अब…' (शुक्र है उसे चरस की याद नहीं)। मैंने उससे पूछा कि क्या उसे यह खराब लगता है? उसने सर हिलाकर हामी भरी… फिर मेरी ओर देखा और मुस्कराते हुए बोला, 'पर पान सिंह में बाबा मरे बहुत अच्छा'।

उसे हिट और फ्लॉप का मतलब नहीं पता। उसके लिए हिट का मतलब दृश्य का असरदार होना है। उसने पूछा कि 'पता है फिल्म कहां हिट थी?'। मैंने कहा, 'कहां?' उसने बताया- 'जब बाबा को एक कंधे के पास गोली लगती है और उन्हें उनके खेलों की याद आने लगती है… ऊपर आतिशबाजियां होती हैं।'

उसने मुझसे पूछा- 'उनको जन्नत में क्रैकर्स (आतिशबाजी) दिख रहे थे न? बस वहीं फिल्म बहुत हिट थी।'

मैं अवाक थी। मुझे नहीं मालूम कि क्या यह असाधारण बच्चा है… मैं ऐसा मानती भी नहीं। बच्चे ने उस असर को समझा और आखिर किसी फिल्म से हम उम्मीद भी क्या करते हैं? घर आकर उसने कहा कि यह एक प्रेरित करनेवाली फिल्म है। आठ साल के बच्चे के हिसाब से यह बात कुछ बड़ी बात थी। मुझे लगा कि यह उसने मुझसे ही सुना होगा। मैंने हंसते हुए पूछा, 'इसने तुम्हें क्या करने के लिए प्रेरित किया?'

वह क्रिकेट वाली अपनी सफेद जर्सी पहने हुए था… और मेरी डांट के डर से कहने लगा कि पुरानी है पुरानी है… और पीछे मुड़ के दिखाया, जहां उसने 118 लिख दिया था। लाल स्केच पेन से। पान सिंह तोमर की जर्सी का नंबर…

मुझे वयस्क हो कर भी पान सिंह की जर्सी का नंबर ध्यान में नहीं आया था।

वह एक दूसरी जर्सी लेकर आया, जिस पर 11 लिख हुआ था… बाद में शायद पान सिंह ने इस नंबर की जर्सी पहनी थी। अयान ने बताया, 'मैंने क्रिकेट छोड़ दी है, अब फुटबॉल खेलता हूं, यह बेकार है…' और तभी मुझे खयाल आया कि बच्चों में अनुसरण की जबरदस्त क्षमता होती है, और मेरे विचार में, हमें बहुत सावधान रहना चाहिए कि हम उन्हें 'इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट' के नाम पर क्या दिखाएं।

(सुतपा सिकदर। मुंबई में रिहाइश। फिल्‍मों के लिए लेखन। केंद्रीय विद्यालय (एंड्र्यूजगंज, नयी दिल्‍ली) से शुरुआती शिक्षा। राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय से डिप्‍लोमा।)

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