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Dr.B.R.Ambedkar

Tuesday, February 4, 2014

पत्थर के अभिमन्यु सुन रहे हैं तुम्हारी चीखें वे रोपेंगे तुम्हारी गर्भनाल को जंगलों पहाड़ों और बंदूकों की गोलियों में /अभी सरगोशियाँ जिन्दा हैं सोनी स‌ाभार गीता गैरोला

पत्थर के अभिमन्यु सुन रहे हैं तुम्हारी चीखें

वे रोपेंगे तुम्हारी गर्भनाल को जंगलों पहाड़ों और

बंदूकों की गोलियों में /अभी सरगोशियाँ जिन्दा हैं सोनी

स‌ाभार गीता गैरोला

पलाश विश्वास
आज का स‌ंवाद

पत्थर के अभिमन्यु सुन रहे हैं तुम्हारी चीखें

वे रोपेंगे तुम्हारी गर्भनाल को जंगलों पहाड़ों और

बंदूकों की गोलियों में /अभी सरगोशियाँ जिन्दा हैं सोनी

स‌ाभार गीता गैरोला

Geeta Gairola

Geeta Gairola

तुम्हारी देह की वनवासी तीखी महक बरक़रार है अभी

तुम्हे पिलाना होगा गर्भनाल का खून

अपनी योनि में घुसाये पत्थरों को

तुम्हारी देह की उपजाऊ मिट्टी से/ बन जायेंगे ये

पत्थर पहाड़ ओर जंगल /तुम जानती हो ना

पहाड़ दरकते हैं तो तबाही होती है

और जंगल की आग सब कुछ स्वाह कर देती है

पत्थर के अभिमन्यु सुन रहे हैं तुम्हारी चीखें

वे रोपेंगे तुम्हारी गर्भनाल को जंगलों पहाड़ों और

बंदूकों की गोलियों में /अभी सरगोशियाँ जिन्दा हैं सोनी

अभी वे केवल फुसफुसा रही हैं

तुम्हारे औरइन कसमसाती आवाजों के बीच

सफ़ेद और खाकी चेहरे एकजुट हैं

उनकी एकजुटता/ तुम्हारी चीखों को

इरोम की नाक में लगी नलियों में जाने से

नहीं रोक सकती

तुम्हारी योनि के कंकड़ और इरोम की भूख

भुरभुरी मिट्टी में शिशुओं के बीज बो रहे हैं

धरती के नीचे खामोशी गरज रही है

और नदियाँ करवटें बदलने को बैचेन हैं

ये कैसा वक्त है जिसकी धार खुरदुरी है

जिसमे दर्द का सैलाब है पर सैलाब के किनारे नहीं

तुम्हारी जिन्दगी की कहानियां

चुप चाप दम तोड़ने के लिए नहीं हैं

कि आवाजों की प्रार्थनाएं धरती के

सन्नाटों को चीरने को बेताब हैं

वे खामोशी को चौकन्ना कर रही हैं

समय का हर कण बीज बनता जा रहा है

ये ठिठका वक्त है सोनी इसकी कोइ उम्र नहीं होती

गीता गैरोला (अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित 'नूपीलान की मायारा पायावी' से )

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गीता गैरोला ने इन पंक्तियों में वह सबकुछ कह दिया है जो दरअसल अब तक हाम कहने की कोशिश करते रहे हैं। हम उत्तराखंड की महिलाओं को बचपन से जानते हैं और अपनी इजाओं और बैणियों की ही ताकत हमारी प्रेरणा है।


उत्तरा की संपादक उमाभाभी आंदोलन की हर गतिविधि में खामोशी के साथ शामिल रही हैं। लेकिन 1988-89 में महतोष मोड़ बलात्कारकांड के प्रतिरोध में जो महिला शक्ति की अभिव्यक्ति हुई वह रैणी गांव में चिपको माता गौरादेवी के प्रतिरोध की परंपरा को देश दुनिया के फलक पर चित्रार्पित करने की कार्रवाई है।


फिर उत्तरा के प्रकाशन के बाद जो नेतृत्वकारी महिला टीम बनी,उसके केंद्र में उमा भट्ट, बसंती पाठक,कमला पंत,शीला रजवार और गीता गैरोला की सक्रियता निरंतर रही है।


पृथक उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उत्तराखंड की इजाओं ने ,बैणियों ने जो कुर्बीनी दीं,उसके बदले में हमने अबतक ठीक से आभार भी व्यक्त नहीं किया है।


रामपुर तिराहे कांड के लिए न्याय की मांग ढीली पड़ गयी है।


जो लोग उस वक्त अलग पर्वतीय परिषद की आवाज उठा रहे थे, आज पहाड़ के पुराने आंदोलनकारी जनांदोलन के मसीहा बतौर उन्ही तत्वों का महिमामंडन करने लगे हैं।


हमने कई दफा एकदम युवा सुनीता भास्कर और सुधा राजे के लिखे की तारीफ की है। पहाड़ ही नहीं बाकी देश के बारे में पहाड़ की बेटियां कितनी गहराई से सोचती है,उसके सबूत बतौर गीता गैरोला की ये पंक्तियां पेश हैं।


नस्ली दिल्ली में उत्तरपूर्व के भूमिपुत्र नीडो की निर्मम हत्या के बाद मगरमच्छ आंसुओं की सुनामी है मीडिया में।


अब तक कभी उत्तर पूर्व की बात न करने वाले प्रधानमंत्रित्व के प्रबल केशरिया दावेदार ने दंगापीड़ित मेरठ में शंखनाद करते हुए सोनिया गांधी और अरविंद केजरीवाल पर हमले के लिए इस कांड को मुद्दा बना डाला।


उनके कंठस्वर और तेवर में सिरे से गायब रही उत्तरपूर्व समेत देश के अस्पृश्य भूगोल की पीड़ा या उनके प्रति ईमानदार सहमर्मिता।


तो समान नागरिक अधिकार  के मानवीय मांग के साथ जंतर मंतर पर धरना दे रहे छात्रों के बीच पहुंच गये प्रधानमंत्रित्व के दूसरे तीसरे दावेदार,पहले राहुल गांधी फिर अरविंद केजरीवाल।


बयानों और चित्रों का घटाटोप है। पर किसी ने सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार कानून के मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं कहा।


आमरण अनशन पर बैठी इरोम शर्मिला को समर्थन तो दूर इस फर्जी सहानुभूति और फर्जी समर्थन के मध्य मणिपुर की दो और बेटियों पर हमला हो गया।


जाहिर है कि कुछ बदला नहीं है।


उत्तरपूर्व ही नहीं,हिमालयी क्षेत्र के कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, गोरखालैंड, सिक्किम, असम समेत तमाम लोगों के साथ यही नस्ली सलूक किया जाता है।


नस्ली युद्ध है सैन्य राज्यतंत्र का आदिवासियों के विरुद्ध।


हम आफसा पर पुनर्विचार को तैयार नहीं हैं,इरोम शर्मिला के साथ खड़े नहीं हैं हम,सोनी सोरी की योनि में पत्थर डालने वालों को राष्ट्रपति पदक दिये जाने पर भी हम शर्म नही करते।


सच तो यह है कि जाति व्यवस्था और नस्ली भेदभाव के वर्णवर्चस्वी समाज और राष्ट्र में आदिवासी, मुसलमान, ईसाई,जैन,बौद्ध,सिख,बस्तियों में रहने वाले गरीब लोग,शरणार्थी और पूरी हिमालयी जनता भारत के नागरिक ही नहीं है।


उनके दमन,उत्पीड़न, बेदखली को ही हमने विकास का विमर्श,मुक्त बाजार की अर्थ व्यवस्था,कारपोरेट राज और इन सबको मजबूत करते धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद आधार बनाते रहे हैं हम।नस्ली दिल्ली में हुई हत्या के संदर्भ में शांतिप्रिय संवेदनशील अरुणाचल और भारत चीन सीमा विवाद हमारी चिंता का मुख्य विषय है और ऐसा कहते हुए हम सारे लोग बाकी पूर्वोत्तर,मध्य भारत और कश्मीर की जनता पर हिंसक होने की ही तोहमत लगा रहे हैं।


हम यह भूल रहे हैं कि पूर्वोत्तर के लोग भी विभिन्न आदिवासी समुदायों के हैं जहां पुरुषतंत्र का तांडव नही है। सामाजिक हिंसा न के बराबर है।जो विरोध है ,वह दिल्ली के वर्चस्व के खिलाफ वंचित जनपदों का विद्रोह है।


वे आर्य या अनार्य नहीं हैं बाकी देश की तरह।


इसलिए न सवर्ण आर्यसमाज और न बहिस्कृत बहुजन अनार्य द्रविड़ समाज का उनसे कुछ लेना देना है।


कश्मीरियों को जैसे हम दहशतगर्द मानते रहे हैं भारतवासी तमाम मुसलमानों की तरह संदिग्ध,जैसा कि अस्सी नब्वे के दशक में निर्ममता और निर्लज्जता की हद तक पूरे सिख समाज के साध अंध राष्ट्रवाद के जनसंहारी स्वरुप को हमारा मौन समर्थन रहा है,जैसे सोनी सोरी समेत समूचे आदिवासी समाज को हम माओवादी मानते हुए उन्हें विकास में बाधक और राष्ट्रविरोधी माओवादी मानते रहे हैं,उसी तरह उत्तरपूर्व के लोगों को हम भारतीय मानते ही नहीं हैं और इन तमाम इलाकों में नागरिक व मानवअधिकारों की लड़ाई को हम एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानने को अभ्यस्त हैं।


पूर्वोत्तर ही नहीं,बाकी हिमालय में भी तमाम लोग जाति धर्म रंग भले कुछ हों, मूलतः भिन्न नस्ल मंगोलियाड या आस्ट्रिक नस्ल के हैं।


फर्क यह है कि देवभूमियों के विपरीत पूर्वोत्तर के तमाम लोग आदिवासी हैं जैसे उत्तरकाशी जिले में जौनास भाबर के मातृतांत्रिक लोग।


हमारी स्वाभाविक नफरत इन सभी लोगों के विरुद्ध है,जिसकी राष्ट्रीय अभिव्यक्ति नस्ली दिल्ली की तुनकमिजाजी और बेलगा नस्लवाद में बार बार होती रहती है और हम इसे महज कानून व्यवस्था का मामला बनाते हुए रफा दफा कर देते हैं।


राष्ट्र और समाज के आचरण पर कोई प्रश्नचिन्ह नही लगता।


फ्रांसिस ने जो हस्तक्षेप में खुलासा किया है कि पूर्वोत्तर के लोगों के साथ ही ऐसा क्यों  होता रहता है, उसपर गंभीरता से हर देशभक्त नागरिक को सोचना चाहिए गीता गैरोला की सहमर्मिता के साथ।


पूर्वोत्तर के मूल में आदिवासी संस्कृति है, समानता और न्याय का बोध है। वे अन्याय बर्दाश्त नहीं कर पाते। इसलिए अगर कोई टिप्पणी करता है तो उसका विरोध करने में वे पीछे नहीं रहते। दिल्ली में भी ऐसा ही हुआ जिसमें निदो की जान गयी। ऐसी घटनाओं से पूर्वोत्तर में प्रतिक्रिया होने का डर भी बना रहता है। हम लोग अन्याय के खिलाफ खड़ा हो, ताकि पूर्वोत्तर के लोगों को लगे कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है, वे अकेले नहीं हैं। चेहरे के अलगाव और जागरूकता के अभाव से उन्हें दिल्ली वाले विदेशी समझ बैठते हैं तो उनसे ज्यादा किराया वसूलने में भी पीछे नहीं हटते। पूर्वोत्तर को अन्य भारत को जोड़ऩे के लिये जागरूकता ही एकमात्र माध्यम है। यह ठीक है कि पूर्वी सीमान्त के लोग दिखने में हम लोगों से अलग होते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम उनसे ऐसा बर्ताव करें, जैसा विदेशियों के साथ करते हैं। अच्छा तो यह हो कि हम उनके प्रति अतिरिक्त शिष्टता, आत्मीयता और विनम्रता प्रकट करें ताकि वे इस विशाल भारत के साथ एकरसता अनुभव करें।


हमारा तर्क है कि महज  पूर्वोत्तर ही नहीं,अस्पृश्य भूगोल  के हर हिस्से के भारतीय नागरिक दिल्ली के नस्लभेद से न सिर्फ पीड़ित हैं, उनके खिलाफ घोषित अघोषित युद्ध जारी है। जिसकी प्रतीक इरोम शर्मिला और सोनी सोरी के अलावा अब अरुणाचल का मारा गया युवा नीडो भी है।


हम कितने निर्मम हैं,इसका अंदाजा अस्सी के दशक को कोई भी दिन है,जिसमें हम लौटकर नहीं जाना चाहते।


हम कितने निर्मम हैं,उसका नजीर मिस्टर एंड मिसेज अर जैसी फिल्म की कथा है।


हम कितने निर्मम है ,उसका सबूक बाबरी विध्वंस है।


हम कितने निर्मम है,उसका ज्वलंत उदाहरण मुजफ्परनर का शरणार्थी शिविर है।


हमारी निर्ममता कश्मीरी जनता के साथ हमें खड़े नहीं होने देती।


हमारी निर्ममता के धारक वाहक है रोजमर्रे की जिंदगी में बलात्कार का रोजनामचा,भ्रूण हत्या,दहेज हत्या,आनर किलिंग,खाप पंचायतें।


रोज रोज के स्त्री आखेट के रोजनामचे में सोनी सोरी एक विशेष उल्लेख है।फूलन देवी जैसे विस्फोट से हम चौंकते जरुर हैं ,बाद में वह हमारे मजे का सबब है।


सोनी सोरी की पीड़ा से जिन्हें कोई लेना देना नहीं है,वे क्या खाक कश्मीर समझेंगे,क्याखाक गोंडवाना बूझेंगे,क्या खाक पूर्वोत्तर को देश का हिस्सा मानेंगे,यह समझना जरुरी है।


भारत ही नहीं,दुनियाभर में,खास तौर पर इस खंडित महादेश में सभ्यता और विकास से तात्पर्य है आदिवासियों का ध्वंस,कृषि ौर कृषि समाज का विध्वंस ौर जनपदों का महाविनाश।


इसे हम उत्तर आधुनिक विमर्श मान चुके हैं।

इसे हम ग्लोबीकरण कहते हैं।

आर्थिक सुधारों के नाम नरमेध महाभियान यह है।

पूर्वोत्तर के छात्रों के साथ जो हो रहा है,वह देश का रोजनामचा है,बस , कुछ अनेपेक्षित दृश्य राजधानी में फोकस हो गये.सिख संहार के दौरान अंध राष्ट्रवादी विजयोन्माद में हमने लगातार लगातार मौन निरपेक्षता के साथ ऐसे दृश्यों का थोक पैमाने पर दरशन करते रहे हैं लाइव और हमारी आत्मा तीस साल बाद भी न्याय की दस्तक नहीं सुन पाती।

जबकि जन्मलग्न से मुख्यधारा के भारत  में सिख सबसे बड़ी ताकत हैं।

सिखों का दिल्ली में यह हश्र हुआ और कोई माफी मांगने तक को तैयार नहीं है तो पूर्वोत्तर के प्रति नस्ली दिल्ली के नस्लभेद पर आर्य अनार्य मिश्रित भारत की क्या प्रतिक्रिया संभव है,यह विचारणीय है।


विडंबना है कि बांग्लादेश के चटगांव से चकमा शरणार्थियों का सफाया हम चुपचाप देखते रह गये।

विडंबना है कि पाकिस्तान में आदिवासी बहुल इलाकों में निरंतर ड्रोन हमलों को हम आतंक के विरुद्ध युद्ध मानते हैं।

विडंबना है कि नेपाल के हिंदुत्व में हमें आदिवासियों की चीखें सुनायी नहीं देती।


सोनी सोरी की उत्पीड़ित योनि में जो ज्वालामुखी सुलग रही है,उसकी आंच हमें कहीं स्पर्श नहीं करती।

इसके विपरीत जबकि बहुआयामी ज्ञान के लिए राथचाइल्डस दामाद शास्त्रीयमृत भाषा संस्कृत को पुनर्जीवित करने की मांग कर रहे हैं ,हम तमिल सीखने के सवाल पर खामोश हैं,बांग्लादेश में सभी आदिवासी भाषाएं सीखने का आंदोलन शुरु हो चुका है राष्ट्रभाषा बांग्ला के नाम पर राष्ट्रीयता होने के बावजूद।


हमारे प्रगतिवाद के महानगरीय केंद्र नई दिल्ली के जेएनयू में विश्वविख्यात भारतीयभाषा केंद्र के तमाम विद्वतजनों में से किसी ने कभी तमिल,गोंड,संथाली,कुरमाली जैसी भाषाओं के पक्ष में कोई आवाज उठायी है तो बतायें।


भाजपा ने जब नागरिकता संशोधन विधेयक पेश किया,अंध राष्ट्रवादी अंधेरे में हम बायोमेट्रिक डिजिटल रोबोटिक भविष्य बांच नहीं पाये।आज गोपाल कृष्ण जी  से बात हुई तो उन्होंने भी माना कि बेदखली का पुख्ता इंतजाम तो नागरिकता कानून में संसोधन के जरिये ही हो गया था।


नंदन निलेकणि की सेवानिवृत्ति व संभावित संसदीय भूमिका से पहले इंफोसिस ने खूब आधार बना दिया।नई सरकार जो करेगी सो करेगी,लेकिन अब असंवैधानिक आधार के पैक होने के आसार हैं।फरवरी से आधार नामांकन बंद हने जा रहा है।जनसंख्या रजिस्टर के मार्फत फिरभी संघ परिवार आधार को जीवित रखेगा। लेकिन नया कोई कार्ड फिर आयेगा।


इन बिखरे हुए संदर्भों में संवेदनशील मनन के लिए माननीया गीता गैरोला की ये पंक्तियां पेश हैं।

कोई कवि सम्मेलन नही है।रास रंग नहीं है।

कृपया तालियां न बजायें और बिना समझे लाइक या शेयर भी न करें।
















































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Ak Pankaj shared आदिवासी साहित्य - Adivasi Literature's photo.

'कपड़ा ...! पहनने का?'

'हां-हां, कपड़ा. इसे पहनने से आदमी नंगा नहीं रहता.' दूकानदार ने आदिवासी को समझाया.

'ओह! हमारे यहां तो कोई नंगा नहीं. लोग जहां नंगे हैं वहां ले जाओ इसे. कपड़ा दे कर हमको भला क्यों नंगा बनाना चाहते हो?'

आदिवासी दर्शन कथा -6 हाट लगा हुआ था. तरह-तरह के सामान बेचने बाजार में दूर-दूर से आए थे व्यापारी. दूकानों की कतार ही कतार. कहीं कुछ तो कहीं कुछ. हर दूकानदार ग्र...See More


Abhishek Srivastava

''ऑपरेशन ग्रीनहंट के बाद बचे हुए जीवन और उसके इतिहास, बचे रह गए आसमान में लटके हुए बर्तन-भांडे और उजाड़ के बाद बची रह गई सफेदी का यह बिम्ब है या टाटा, जिंदल, मित्तल के स्टील प्लांट की जीत का यह लहराता हुआ झंडा है? ये विशाल आकृतियां अपना स्पेस हासिल करने के लिए जमीन और आसमान पर काबिज हो जाने के लिए आतुर दिखती हैं- एक स्रोत से शुरू होकर फैलाव की ओर बढ़ती हुई। ये किन्हें संबोधित करेंगी और कहां काबिज होंगी? करोड़ों-अरबों रूपए के कला बाजार में इन धातुओं का व्यापार और मुनाफा बटोरने वाले कॉरपोरेट घरानों (जिसमें सरकारें भी शामिल हैं) को निश्‍चय ही ये कलाकृतियां लुभा रही हैं और बोलियां भी लग रही हैं। हमें तो इनमें खून के छींटे दिखाई दे रहे हैं।''

जनपथ : संदिग्‍ध है सुबोध गुप्‍ता की दुर्बोध कला!

junputh.com

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Jagadishwar Chaturvedi

सन् 1984 के सिख नर संहार पीडितों के सभी पीड़ितों के परिवारों को जेएनयू की ओर से हमने घर घर जाकर एक महिने का राशन और सभी को जरुरी सामान और काम के सभी बर्तन दिए,सभी कैम्पों में सक्रिय रुप से कई हजार छात्रों ने मदद की और कई हजार छात्रों ने दिल्ली में खासकर दक्षिणी दिल्ली में हर घर से मदद इकट्ठा की और उसको पीडि़त सिख परिवारों तक पहुँचाया। सहायता शिविरों से सज्जन कुमार ,धर्मदत्त शास्त्री आदि को पीड़ितों के प्रतिवाद के कारण लौटना पड़ा।

मैं निजी तौर कांग्रेस के इन दागी नेताओं क...See More

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  • Kishore Kumar and 6 others like this.

  • Anand Dubey When was the army called? When was the Police given order to shoot at sight? How many Hindus died in Police firing? How many Hindu rioters were arrested? How many were punished by the Court? How many inquiry Commissions were set up? Please answer the questions.

  • 2 hours ago · Like

  • Jagadishwar Chaturvedi आनंद ,इस स्टीरियोटाइप के बाहर निकलकर सोचो ?

  • about an hour ago · Edited · Like

  • Akhilesh Pratap Singh संघी गिरोह के सक्रिय होने की रिपोर्ट पायनियर में छपी थी

  • about an hour ago · Like · 1

  • Akhilesh Pratap Singh संघ क्यों रोकने लगा यह सब...अकाली दल से बीजेपी का याराना सियासी है और सियासी मजबूरी में संघ चुप है...वरना सिख हिंदू हैं की टेर कोई न कोई नागपुरिया लगाता ही रहता था

  • about an hour ago · Like




Palash Biswas I endorse this statement Biplab Bhai.Pl write in detail,In Bengali as well as in English so that we may intiate a debate at last.

Palash Biswas shared Biplob Rahman's photo.

Palash Biswas Sharadendu was planning to write something.I am looking forward to you both.

সকল আদিবাসীর মাতৃভাষার স্বীকৃতি চাই!


#Indigenous #LifeStyle #Adivasi #Bangladesh

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HARD LIFE IN THE REMOTE HILL


#Indigenous #LifeStyle #CHT #Bangladesh — with Chinchi Larmaand Polash Poulinus Jambil Deaf.

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আদিবাসীদের জমি হস্তান্তরের বিধানাবলি

February 3, 2014 at 5:10pm

আদিবাসী (The Aborigines) ১৯৫০ সালের স্টেট একুইজিশন এন্ড টেনান্সি এক্ট এর ৯৭ ধারার ১ উপধারায় আদিবাসী বা উপজাতি ( The Aborigines) বলতে (১) সাঁওতাল (২) বানিয়াস (৩) ভূঁইয়া (৪) ভূমিজ (৫) দালুস (৬) গারো (৭) গন্ডা (৮) হাদী (৯) হাজং (১০) হো (১১) খারওয়াত (১২) খরিয় (১৩) কোরা (১৪) কোচ (১৫) মগ (১৬) মাল এবং সুরিয়া (১৭) পাহাড়িয়া (১৮) মাচজ (১৯) মন্ডা (২০) মুন্ডাই (২১) ওড়াং এবং (২২) তোড়ি দেরকে উপজাতী বোঝায়।

উপরোক্ত শ্রেণীর উপজাতীয়দের জমি-জমা হস্তান্তরের জন্য ১৯৫০ সালের স্টেট একুইজিশন এন্ড টেনান্সি এক্টের ৯৭ ধারায় বলা হয়েছে। উক্ত ধারার ২ উপধারায় বলা হয়েছে কোন আদিবাসী যদি তার সম্পত্তি অন্য কারো নিকট হস্তান্তর করতে চায় তাহলে তাকে বাংলাদেশে স্থায়ীভাবে বসবাসরত কোন উপজাতির কাছে হস্তান্তর করতে হবে।

এই ধারার ৩ উপধারায় বলা হয়েছে যদি কোনো উপজাতি বা আদিবাসী রায়ত তার সম্পত্তি বা সম্পত্তির কোন অংশ বিক্রি, দান, উইল বা অন্য কোন ভাবে  কোন আদিবাসী বা উপজাতি ব্যতিত অন্য কোন গোত্রের বা শ্রেণীর কোনো মানুষের নিকট হস্তান্তর করতে চায় তাহলে উক্ত আদিবাসী রায়তকে তার সম্পত্তি হস্তান্তরের অনুমতির জন্য রাজস্ব অফিসারের নিকট দরখাস্ত দাখিল করতে হবে। উক্ত দরখাস্ত পাওয়ার পর রাজস্ব অফিসার ১৯৫০ সালের স্টেট একুইজিশন এন্ড টেনান্সি এক্টের ৯০ ধারা এবং বর্তমানে প্রচলিত ১৯৮৪ সালের ভূমি সংস্কার অধ্যাদেশ এর বিধানাবলি বিবেচনা করে  যদি যথাযথ মনে হয় তাহলে রাজস্ব  অফিসার উক্ত আবেদনকারী উপজাতি বা আদিবাসী রায়তকে তার সম্পত্তি হস্তান্তর করার অনুমতি দিবেন।


অত্র ধারার ৪ উপধারায় বলা হয়েছে আদিবাসীদেরকে তার জমি হস্তান্তর করতে হলে রেজিস্ট্রি দলিলের মাধ্যমে করতে হবে। যদি কোনো কারণে জমি রেজিস্ট্রেশনের পূর্বেই কোনো আদিবাসীকে তার জমি হস্তান্তর  করতে হয় তাহলে সেক্ষেত্রে দলিল মতে এবং হস্তান্তরের শর্ত অনুযায়ী রাজস্ব কর্মকর্তার নিকট হতে লিখিত সম্মতি গ্রহণ করতে হবে।

অত্র ধারার ৫ উপধারায় বলা হয়েছে যে কোন আদিবাসী তার জমি কেবলমাত্র সম্পূর্ণ খাইখালাসি বন্ধক হিসাবে হস্তান্তর করতে পারবে। তবে যদি কোন আদিবাসী কৃষি ঋণ প্রাপ্তির জন্য কৃষি উন্নয়ন কর্পোরেশন এর নিকট হতে অথবা কোনো সমবায় সমিতির নিকট হতে ঋণ গ্রহন করতে চান তাহলে উপরোক্ত শর্ত প্রযোয্য হবে না ।

অত্র ধারার ৬ উপধারায় বলা হয়েছে যে উক্ত খাইখালাসী বন্ধক এর মেয়াদ সর্বোচ্চ ৭ (সাত) বছর পর্যন্ত হবে এবং তা রেজিষ্ট্রেশন করতে হবে ।

যদি কোন আদিবাসী অত্র ধারার কোনো বিধান লংঘন করে সে তার জমি হস্তান্তর করে তাহলে উক্ত হস্তান্তর  বাতিল বলে গণ্য হবে।


অত্র ধারার ৮ উপধারার (এ) অনুচ্ছেদে বলা হয়েছে যদি কোনো আদিবাসী রায়ত এই ধারার কোন বিধান লঙ্ঘন করে তার কোনো সম্পত্তি বা সম্পত্তির কোনো অংশ হস্তান্তর করেন তাহলে রাজস্ব  অফিসার নিজ উদ্যোগে বা উক্ত বে-আইনী হস্তান্তর এর স্বপক্ষে তার বরাবরে পেশকৃত কোনো দরখাস্তের ভিত্তিতে লিখিত আদেশের মাধ্যমে নোটিশ প্রদান করে উক্ত হস্তান্তর গ্রহিতাকে উচ্ছেদ করে দিবেন।


তবে অবশ্যই হস্তান্তর গ্রহীতাকে এইরূপ উচ্ছেদ এর জন্য কারন দর্শানোর সুযোগ দিতে হবে।   

                  

অত্র ধারার ৮ উপধারার (বি) অনুচ্ছেদে আরো উল্লেখ করা হয়েছে রাজস্ব কর্মকর্তা কোনো আদেশ দিলে অথবা কোন আদিবাসীর জমি ফেরত দেওয়ার প্রয়োজন হলে রাজস্ব কর্মকর্তা উক্ত আদিবাসীকে অথবা তার আইনগত উত্তরাধিকারীকে কিংবা তার কোনো আইনগত প্রতিনিধির নিকট ফেরত দিবেন। যদি কোনো আদিবাসীর কোন আইনগত উত্তরাধিকারী কিংবা কোনো প্রতিনিধি না থাকেন সেক্ষেত্রে আদিবাসীর উক্ত জমি সরকারের নিয়ন্ত্রনে ন্যস্ত বলে গণ্য ঘোষণা করবেন এবং রাজস্ব কর্মকর্তা উক্ত জমিটি অন্য একজন আদিবাসীর নিকট বন্দোবস্ত দিবেন।


এই কনটেন্ট হতে আদিবাসী বা উপজাতীয়দের জমি হস্তান্তরের বিধানাবলি সম্পর্কে জানা যাবে।

http://www.abolombon.org/vumi-ain/adibashi.html

- See more at:http://www.infokosh.gov.bd/atricle/%E0%A6%86%E0%A6%A6%E0%A6%BF%E0%A6%AC%E0%A6%BE%E0%A6%B8%E0%A7%80-%E0%A6%AC%E0%A6%BE-%E0%A6%89%E0%A6%AA%E0%A6%9C%E0%A6%BE%E0%A6%A4%E0%A7%80%E0%A7%9F%E0%A6%A6%E0%A7%87%E0%A6%B0-%E0%A6%9C%E0%A6%AE%E0%A6%BF-%E0%A6%B9%E0%A6%B8%E0%A7%8D%E0%A6%A4%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A7%8D%E0%A6%A4%E0%A6%B0%E0%A7%87%E0%A6%B0-%E0%A6%AC%E0%A6%BF%E0%A6%A7%E0%A6%BE%E0%A6%A8%E0%A6%BE%E0%A6%AC%E0%A6%B2%E0%A6%BF#sthash.yBGzpsfD.dpuf

MANDI (GARO) DANCER


#Indigenous #LifeStyle #Adivasi #Bangladesh

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#ULFA

পরেশ বড়ুয়ার ফাঁসির রায় পুনর্বিবেচনার আহ্বান উলফার | খবর | কালের কণ্ঠ

www.kalerkantho.com

চাঞ্চল্যকর দশ ট্রাক অস্ত্র মামলায় ভারতের বিচ্ছিন্নতাবাদী নেতা উলফার সামরিক কমান্ডার পরেশ বড়ুয়াকে দেওয়া ফাঁসির রায় পুনর্বিবেচনা (রিভিউ) করতে বাংলাদেশের

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February 2

#STOP!

রাঙামাটির লংগদুতে ৪২ রোহিঙ্গার অনুপ্রবেশ ও অবৈধ বসতি স্হাপন | parbattanews bangladesh

parbattanews.com

রাঙামাটির লংগদুতে ৪২ রোহিঙ্গার অনুপ্রবেশ ও অবৈধ বসতি স্হাপনপ্রকাশ সময় 2 February, 2014 at 9:39 AMপার্বত্যনিউজ রিপোর্ট:পার্বত্য রাংগামাটি জেলার লংগদু উপজেলার বগাচত্তর এবং গুলশাখালীতে ৭ রোহিঙ্গা পরিবারের ৪২ জন সদস্যের অবৈধ বসতি স্হাপনের খবর পাওয়া গেছে । অনুসন্ধানে জানা যায়, আরাকানের পকতু এলাকা থেকে বি...

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February 2

Rise with obr. Rise for #justice. Global campaign OBR endorses issue of #KalpanaChakma abduction.

Rise4Justice Blog: Bangladesh is rising for Kalpana, an indigenous activist and victim of...

www.onebillionrising.org

I will #Rise4Justice! On 14 February 2013, one billion people in 207 countries rose and danced to demand an end to violence against women and girls. On 14 February 2014, we are escalating our efforts, calling on women and men everywhere to RISE, RELEASE, DANCE, and demand JUSTICE! JOIN me! Watch the...

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Ak Pankaj

वैष्णवी ज्ञान के पर्व पर आइए बौद्धिक लूट की बात करें

लाला जगदलपुरी और हरिहर वैष्णव द्वारा संपादित पुस्तक 'बस्तर की लोक कथाएं' नेशनल बुक ट्रस्ट से छपी है. इसकी भूमिका पढ़ रहा हूं जो 'निवेदन' शीर्षक से है. भूमिका हरिहर वैष्णव ने लिखी है और इसमें कहीं भी 'आदिवासी' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है. सरकारी नामकरण 'जनजातीय' शब्द का ही संपादक ने उपयोग किया है. इसी तरह आदिवासी भाषाओं के लिए भी बहुत ही सचेतन ढंग से वैष्णव महोदय ने 'लोक-भाषा' का इस्तेमाल किया है. जिस संपादक को आदिवासी शब्द से ही परहेज हो उसके संपादकत्व में किस नजरिए से आदिवासियों का पुरखा साहित्य परोसा गया होगा, आप सब सोच सकते हैं. बहुत जल्दी ही इस पुस्तक में दी गई सामग्री पर बात रखूंगा. तब तक आप यह भी सूचना लें कि 'निवेदन' वाली भूमिका में एक पूरा पृष्ठ संपादक महोदय ने अपने परिवार के आगे-पीछे के सभी सदस्यों को धन्यवाद देने में खर्च कर दिया है लेकिन एक भी शब्द उन आदिवासी समुदायों के लिए लिखना जरूरी नहीं समझा है जो इन कथाओं के सामूहिक सर्जक हैं.

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Ak Pankaj

अभी-अभी रांची पुस्तक मेला से लौटा हूं. बहुत सारे प्रकाशक आए हुए हैं. खूब सारी पुस्तकें हैं हिंदी में अंग्रेजी में. इनके शत-प्रतिशत लेखक उत्पीड़ित वर्गों के नहीं हैं. हम आदिवासी लेखक की किताब ढूंढने गए थे. नहीं मिली.


लौटते हुए अलबर्ट एक्का चौक की एक पत्र-पत्रिका की दूकान पर 'भोर' पत्रिका का दूसरा अंक दिखा. खरीद लिया. पहली नजर में पत्रिका अच्छी लगी. लेकिन कीमत ज्यादा है. प्रतिरोध की संस्कृति के निर्माण के लिए इतनी कीमत ठीक नहीं. फिर भी इसे खरीद कर पढ़ने की गुजारिश करूंगा. अंक पर प्रतिक्रिया पढ़ने के बाद.

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Ak Pankaj

संवैधानिक प्रावधानों को परे रखकर ही 'योग्यता' तय करता रहा है यह देश!

जब लोग अपना हक मांगते हैं तभी टैलेंट का सवाल क्यों खड़ा हो जाता है?


झारखंड के बड़े पत्रकार हैं इसलिए राज्य को लेकर उनकी चिंता स्वाभाविक ही है. आज अपने अखबार के फ्रंट पेज पर उन्होंने लिखा है, 'कुलपति के चयन में बाहरी-भीतरी न करें'. इस लेख का आशय यह है कि स्थानीय लोग अर्थात् झारखंड के आदिवासी-मूलवासी विद्वान व शिक्षाविद् कुलपति बनने के 'योग्य' नहीं हैं. उनका कहना है योग्य व्यक्तियों को ही विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं में जगह मिलनी चाहिए.


क्योंकि उनके अनुसार, ' विश्वविद्यालय ही वह संस्था है, जो छात्रों को गढ़ती है. देश के भविष्य वहीं तैयार होते हैं. अगर इसी संस्था के शीर्ष यानी कुलपति की नियुक्ति जाति-धर्म और समुदाय के आधार पर होने लगे, तो विश्वविद्यालय और वहां से निकलनेवाले छात्रों का भविष्य क्या होगा. शीर्ष पदों पर नियुक्ति प्रतिभा (टैलेंट) के आधार पर होनी चाहिए न कि पैरवी-जाति-धर्म के आधार पर.' वरीय पत्रकार महोदय योग्यता के इतने प्रबल समर्थक हैं कि वे नियुक्ति के कानूनी प्रावधानों तक को ताक पर रख देने की बात कह रहे हैं, कुलपति नियुक्ति 'कमेटी में दो स्थानीय लोगों को होना चाहिए था, स्थानीय को कुलपति बनाना चाहिए. कुलपति की नियुक्ति कैसे होगी, इसके लिए विश्वविद्यालय अधिनियम में प्रावधान है. (पर) कानूनी बात अलग है. ... कमेटी को घेरे में लेना अनुचित है. राज्य के भविष्य के लिए इसमें राजनीति बंद होनी चाहिए.'


जुलाई 1960 में रांची विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी. तथ्य बताते हैं कि रांची विश्वविद्यालय के 54 साल में सिर्फ 3 या 4 स्थानीय झारखंडी लोगों को कुलपति बनाया गया है. हम इन्हें अयोग्य मान लेते हैं और शेष कुलपतियों को योग्य. अब वरीय पत्रकार महोदय ही बताएं कि उच्च शिक्षा का बंटाधार किसने किया? स्थानीय अयोग्य लोगों ने या बाहरी योग्य लोगों ने. और जब कानूनी प्रावधान को परे रखकर ही 'योग्यता' तय करनी है तो फिर कैसा लोकतंत्र? किसका लोकतंत्र? ... और किसकी राजनीति बंद होनी चाहिए???


टैलेंट की चिंता का बाहरी लिंक -

http://www.prabhatkhabar.com/news/86158-Lpti-selection-exterior-interior-governor-university.html

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  • 9 people like this.

  • Jagdish Lohra इसकी शुरुआत आई आई टी जैसे देश के तथाकथित श्रेष्ठ संस्थानों से क्यों नहीं करते/या बड़े बड़े विश्वविद्यालयों से.. जो पूरी दुनियां में २०० वां स्थान भी हासिल नहीं कर पाते /

  • about an hour ago · Like · 1

  • Atul Anand आरक्षण के मुद्दे पर भी उनका "नीति-उपदेश" सुनना चाहिए.

  • 49 minutes ago · Like · 1

  • K UM AR पर सवाल ये है पंकज साहब कि हम उम्मीद किससे कर रहे हैं ।

  • यहां की सारी व्यवस्था ही तो बाहरी के ही हाथों है ।

  • पूरा सिस्टम ही जब आयातित हो तो उम्मीद भी नहीं किया जा सकता और जो थोड़े से तथाकथित 'अपने'अंदर है भी तो उन्हें अपने से बाहर कुछ दीखता भी है क्या ॥बेहद निराशाजनक ;अत्यंत शर्मनाक : अफसोस ॥

  • 39 minutes ago · Like

जनज्वार डॉटकॉम

अबूझमाड़ में जनताना सरकार की तूती बोलती है. यहाँ गणतंत्र के 'गण' का कोई महत्व नहीं है. सरकार भी अबूझमाड़ में पंगु नजर आती है. अबूझमाड़ को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है, जहां विकास की बात करना गलत है. इसको सरकार ने जनताना सरकार को सौंप दिया है, कहना गलत न होगा...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/25-politics/4763-maovadiyon-ke-ilake-men-patrkaron-kee-padyatra-for-janjwar-by-laxminarayanlahare

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जनज्वार डॉटकॉम

नक्सलबाड़ी का किसान संघर्ष भारत में माओवाद की पहली प्रयोगशाला थी, जिसने माओवाद और उसके 'चीनी रास्ते' के दिवालियापन को पूरी तरह उजागर करते हुए दिखा दिया कि चीन की क्रांति से माओवादियों ने जो निष्कर्ष निकाले थे, वे पूरी तरह गलत थे...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4764-aundhe-munh-girta-rusi-chini-krantiyon-kee-bhrantiyon-men-jeeta-maovad-by-rajesh-tyagi-for-janjwar

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Ak Pankaj shared Artist Against All Odd (AAAO)'s photo.

उसने कहा

मैं स्त्री हूं

तब उसने कहा

नहीं तुम माल हो

उसने कहा मैं स्त्री हूं तब उसने कहा नहीं तुम माल हो उसने कहा मैं मां हूं तब उसने कहा नहीं तुम हमारी ढाल हो उसने कहा मैं बहन हूं तब उसने कहा नहीं तुम परिवार की...See More

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The Economic Times

Rush at Narendra Modi's Kolkata rally fetches big money. The minimum online price for a seat was Rs 100. "Some have even paid Rs 2 lakh for a seat," said a top BJP source. Read more at http://ow.ly/tfKkW | Full Politics coverage http://ow.ly/tfLaU

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Divik Ramesh and 2 other friends were tagged in Shrikant Singh'sphoto.

मीडिया की बेजा हरकतों से छुट्टी पाने का समय.......

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February 2

#Indigenous

সেরাদের সঙ্গী

www.prothom-alo.com

এগিয়ে চলেছেন আদিবাসী তরুণ প্রজন্ম। ৩৩তম বিসিএস পরীক্ষায় চূড়ান্তভাবে উত্তীর্ণ হয়ে যাঁরা বিভিন্ন ক্যাডারে চাকরির জন্য সুপারিশপ্রাপ্ত হয়েছেন তাঁদের মধ্যে থেকে পাঁচজন আদিবাসী কৃতী শিক্ষার্থীর সাফল্য ও স্বপ্নের কথা শোনা যাক। লসমী চাকমা৩৩তম বিসিএস ইকনোমিক ক্যাডার'স্নাতক করার পর পরই...

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Adivasi Voice

January 31

MANDI (GARO) DANCER


#Indigenous #LifeStyle #Adivasi #Bangladesh

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Adivasi Voice shared আদিবাসী ছাত্র পরিষদ, Indigenous Students Council - ISC's photo.

January 31

#Adivasi

বেগম রোকেয়া বিশ্ববিদ্যালয়ে ভর্তি পরীক্ষার প্রথম দিনে (৩০-০১-২০১৪) আদিবাসী ছাত্র পরিষদ বেগম রোকেয়া বিশ্ববিদ্যালয় শাখার অবস্থান.................. — with Porimal Mahato and 19 others.

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January 31

#NEWS

@[159173667572976:2044:]With Bikram Kishore Tripura and16 others.

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Adivasi Voice

January 31 · Edited

#FIGHTER: MANDI (GARO) DANCE


#Indigenous #LifeStyle #Adivasi #Bangladesh

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Adivasi Voice

January 30

EMPOWERED JUMMA LADY: Selling `Chidol'/ 'Nappi' (a paste made of dried fish)


#Indigenous #LifeStyle #CHT #Bangladesh

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Adivasi Voice

January 29

TRIPURA HOLY MAN: Taindong, Khagrachari


#Indigenous #LifeStyle #CHT #Bangladesh

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January 29

The Quest for #Indigenous Identity in #Bangladesh, 1993-2013

The Quest for Indigenous Identity in Bangladesh, 1993-2013

alalodulal.org

"Historically, the so called 'tribal', non-Bengali ethnic groups – i.e. those who wish to be known as indigenous peoples (IPs) – of Bangladesh have been at the forefront of various struggles agains...

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Adivasi Voice

January 28

#PROTEST:

বাংলাদেশের সমাজ ও সংস্কৃতি (Bangladesh Society and culture) by আলহাজ্ব মোঃ আসাদুজ্জামান, শফিউল আমান খান মজলিশ , ওহিদুর রহমান ,মোজাহাঙ্গীর আলাম সিদিক্কী; কবির পাবলিকেশন্স এর বই, এখানে আদিবাসীদের নিয়ে যত ভূলে ভরা যত তথ্য জাতীয় বিশ্ববিদ্যালয়ের অধীনে বিভিন্ন কলেজ অনার্স এ পড়ানো হিসেবে পড়ানো হচ্ছে । যেখানে মারমা আর রাখাইনদের মগ বলা হয়েছে , আবার কোথাও কোথাও আদিবাসীদের সংস্কৃতি সমাজ ও ধর্ম নিয়ে ভূল তথ্য ও উপাত্ত উদ্দেশ্য প্রনোদিত ভাবে ভূল ভাবে দেখানো হয়েছে , ,আবার কোথাও কোথাও অধিকাংশ আদিবাসী গোষ্ঠীর কোন কথাই উল্লেখ নেই ।একে তো বিতর্কিত সব তথ্য যাতে আবার পাচমিশেলী মিথ্যা দিয়ে সাম্প্রদায়িকতাকে দীর্ঘায়িত করার জন্য যা শেখানো হচ্ছে এর প্রভাব আগামী দশকে কি রূপ ধারন করবে ?

#Indigenous #LifeStyle #CHT #Bangladesh (4 photos)

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Hemant Meshram

Aadhaar Project Of India Is Bad And Should Be Scrapped

http://technolegalthoughts.wordpress.com/2013/05/05/aadhaar-project-of-india-is-bad-and-should-be-scrapped/

Aadhaar Project Of India Is Bad And Should Be Scrapped

technolegalthoughts.wordpress.com

Aadhaar project is full of loopholes, inconsistencies and troubles. While other countries have abandoned similar ideas, India has simply adopted the same without much debate and analysis. By attach...

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Hemant Meshram

Aadhar Project Is Unconstitutional, Undemocratic And Anti Parliamentarian

http://tlnind.blogspot.in/2012/01/aadhar-project-is-unconstitutional.html

Techno Legal News: Aadhar Project Is Unconstitutional, Undemocratic And Anti Parliamentarian

tlnind.blogspot.com

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Questioning Aadhaar

http://questioningaadhaar.blogspot.in/2010/12/techno-legal-news-views.html

Articles Questioning Aadhaar: TECHNO LEGAL NEWS & VIEWS

questioningaadhaar.blogspot.com

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Aadhaar UID enrollment to stop from February

http://allaboutbelgaum.com/news/aadhaar-uid-enrollment-to-stop-from-february/

Aadhaar UID enrollment to stop from February

allaboutbelgaum.com

Registration for Aadhaar cards being issued by U …

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Aadhaar Card: A R 50,000 crore prank played on Indian citizens by UPA?

Aadhaar Card: A R 50,000 crore prank played on Indian citizens by UPA?


http://daily.bhaskar.com/article/DEL-aadhar-card-a-rs-50000-cr-prank-played-on-indian-citizens-4383750-PHO.html

Aadhaar Card: A R 50,000 crore prank played on Indian citizens by UPA?

daily.bhaskar.com

The Supreme Court trashed Centre's claim of Rs 50,000 crore expenses on the UIDAI project.

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Sudha Raje
एक सोच ही तो है जो ग़ुलाम है ।
वरना तो कभी न हवा क़ैद हुयी है न खुशबू और दूर चिनार चीङ फर और पाईन देवदार के नीचे कभी न बर्फ कैद हुयी है न आग ।
एक सोच ही तो है जो रखती है दायरों पर दायरों के दायरे बनाकर दीवारों पर दीवारें
वरना दूर कच्चे जामुन आम इमली कैंथ बेल जंगल जलेबी झरबेरी मकोर करील और चकोतरे के झाङ अब तक वैसे ही मह मह महक रहे हैं नहीं बची तो उनके नीचे अब नन्हीं नन्ही हथेलियाँ और झोलियाँ ।
एक सोच ही तो होती है बाँध और बंधन वरना
चचाई सनकुआ झिरना और सहस्त्रधारा धुँआधार अब भी चिघ्घाङ रहे है चाँदी की बूँदों के साथ और काँप जाती है अब भी हलकी सरदी में भी नजदीक खङी कोयलें तोते श्यामा बुलबुल और कठफोङवे अब भी ठक ठक कुरेदते रहते है काठ बया बुनती है उलटे दरवाज़ों के नीङ और हुदहुद के सिर अब भी तीखी कलगियाँ है जलमुरगी तैरकर मछलियाँ खोजती है ।
एक सोच ही तो नाता है
वरना
तो आज भी खारी जमुना का जल मीठी मंदाकिनी से अलग दिखता है और चंबल का समझौता हर ग्रीष्म पर टूट जाता है अरावली से विन्ध्याञ्चल के भार का प्रतिवाद हिमालय की वादियों में करते कच्चे पहाङ खिसक जाते है वारणावत टूट जाता है डूब जाती है टिहरी और संगम में सरस्वती ना होते हुये भी मान ली जाती है जबकि वह कभी वहाँ थी ही नहीं ।
गोदावरी से नहीं सँभलता बंगाल का शोक और गंडकी का हर पत्थर सालिगराम हो कर गोमती के चक्रप्रस्तर खोज कर पूजता नर्मदा के शंकर कंकर तलाशता दक्षिणावर्ती शंख जल पीता मन
दरिद्र ही रह जाता सारे कनकधारा यंत्रों के बीच ।
मुक्ति एक सोच ही तो है वरना मैदानों पहाङों नदी झरनों से लौट लौट आती प्रतिध्वनि केवल मेरी न होती ।
पदार्थ से परे जो है वही मैं हूँ
अस्तित्व एक सोच ही तो है
वरना तो सब जलेगा औऱ दफन होकर गलेगा सङकर खत्म होने को
अमृत एक सोच ही तो है वरना तीर्थस्नान से कोई पवित्र नहीं हो जाता ।
©®सुधा राजे
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झारखंडी भाषा संस्कृति अखड़ा

तपकरा गोली कांड में शहीद हुए लोगों की याद में 2 फरवरी को शहीद दिवस के रूप में तपकरा में लोगों का जुटान हुआ। इस गोलीकांड में बोड़ा पाहन, जमाल खान, प्रभु सहाय कंडुलना, सोमा जोसेफ गुडि़या, लुकस गुडि़या, समीर डहंगा, सुरसेन गुडि़या और सुंदर कंडुलना शहीद हुए थे।

दुख की बात है कि कोर्इलकारो आंदोलन और तपकरा गोली कांड के बाद आज तक कोइलकारो जनसंगठन ने स्वंय को राजनीतिक रूप से सशक्त नहीं किया। लोग जुटे लेकिन दिखी खाली-खाली सी आंखें जिनमें आगे के लिए कोर्इ रणनीति, कोर्इ सपने नहीं। जिंदगी बस चल रही जैसी चलती रही है हमेशा से...। भाषण देने वालों की संख्या बढ़ रही थी और सुनने वाले धीरे-धीरे खिसक रहे थे। फिर भी रांची से दयामनी बारला, फादर स्टेन स्वामी, सुनील मिंज, जेरोम जोराल्ड कुजूर, भुवनेश्वर केवट, आलोका सहित कर्इ अन्य लोग जुटे और गांववालों में फिर वहीं पुराना जोश भरने की कोशिश की।

तपकरा गोली कांड में शहीद हुए लोगों की याद में 2 फरवरी को शहीद दिवस के रूप में तपकरा में लोगों का जुटान हुआ। इस गोलीकांड में बोड़ा पाहन, जमाल खान, प्रभु सहाय कंड...See More

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Dalit Adivasi Dunia

January 19

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Dalit Adivasi Dunia

January 19

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Dalit Adivasi Dunia

January 19

Dalit Adivasi Dunia

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Dalit Adivasi Dunia

January 19

Dalit Adivasi Dunia

January 19

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Ashok Dusadh

यह एक कोरी बकवास बात है की दिल्ली की आआप की सरकार को कोई अस्थिर करने के लिए इतने करोड़ खर्चा करेगा .इससे किसी को फायदा होनेवाला नहीं है .दिल्ली की सरकार और आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सत्ता में बने रहे इसी में बीजेपी और कांग्रेस दोनों का भला है .महीने भर में आम आदमी पार्टी के खिलाफ आक्रोश चरम पर है ऐसे में उसकी जगह कोई स्थानापन्न होना चाहेगा यह मुर्ख ही सोच सकता है .कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को बुरी तरह फंसा दिया है .अपने नकाब को छुपाने के लिए उसे कोई रूम ही नहीं छोड़ा है .केजरीवाल एंड कम्पनी जितनी नौटंकी करेगी जनता उससे दुगने अनुपात में उनका असली चेहरा पहचान जायेगी .

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Aam Aadmi Party

Rajasthan Kisan Union, a non-political farmers organisation, on Saturday announced to support the Aam Aadmi Party in the upcoming Lok Sabha elections. "Both BJP and Congress have betrayed the farmers every time. They made promises but did nothing for the welfare of farmers, so we have decided to support the Aam Aadmi Party," Krishna Kumar Saharan, union leader said.


news: http://zeenews.india.com/news/rajasthan/rajasthan-kisan-union-announces-support-for-aap-in-ls-polls_908401.html

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चन्द्रशेखर करगेती likes a link.

मुख्यमंत्री के दावेदारों को मंत्री पद की लेनी पड़ी शपथ

www.devbhoomimedia.com

बहुगुणा के संरक्षक बने मठाधीशों के षडयंत्र पर पानी फेर कर सोनिया गांधी ने करायी हरीश रावत की ताजपोशी मुख्यमंत्री के दावेदारों को मंत्री पद की लेनी पड़ी...

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Hemant Meshram

Aadhaar UID enrollment to stop from February

http://allaboutbelgaum.com/news/aadhaar-uid-enrollment-to-stop-from-february/

Aadhaar UID enrollment to stop from February

allaboutbelgaum.com

Registration for Aadhaar cards being issued by U …

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Hemant Meshram

Aadhaar Card: A R 50,000 crore prank played on Indian citizens by UPA?

Aadhaar Card: A R 50,000 crore prank played on Indian citizens by UPA?


http://daily.bhaskar.com/article/DEL-aadhar-card-a-rs-50000-cr-prank-played-on-indian-citizens-4383750-PHO.html

Aadhaar Card: A R 50,000 crore prank played on Indian citizens by UPA?

daily.bhaskar.com

The Supreme Court trashed Centre's claim of Rs 50,000 crore expenses on the UIDAI project.

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Hemant Meshram

Aadhaar Unmasked ~ What is the cost? And who benefits?

http://www.thestatesman.net/news/6489-aadhaar-unmasked-what-is-the-cost-and-who-benefits-21st-july-2013.html

The Statesman: Aadhaar Unmasked ~ What is the cost? And who benefits? (21st July 2013)

thestatesman.net

Why have the Government and Nandan Nilekani's UIDAI shied away from a proper cost-benefit analysis of the Aadhaar project? Why is a powerful lobby hard at work to obfuscate inconvenient facts? After all, public money is at stake. ~ Usha Ramanathan There was no feasibility study and no cost-benefit a...

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Hemant Meshram

'Concern over Aadhaar project's impact on lives'

http://archives.deccanchronicle.com/131008/news-current-affairs/article/%E2%80%98concern-over-aadhaar-project%E2%80%99s-impact-lives%E2%80%99

'Concern over Aadhaar project's impact on lives' | Deccan Chronicle

archives.deccanchronicle.com

Questions raised about the UIDAI project's transparency, control and data.

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Hemant Meshram

Aadhaar project draws IB's ire over issuing cards to refugees, foreigners

http://m.economictimes.com/news/politics-and-nation/aadhaar-project-draws-ibs-ire-wants-background-check-on-pvt-registrars/articleshow/26869529.cms

Aadhaar project draws IB's ire over issuing cards to refugees, foreigners - The Economic Times

economictimes.indiatimes.com

IB raised the objections at a November 6 meeting of senior officials of the investigative agency, the home ministry and UIDAI.

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Hemant Meshram

How does govt justify 'Aadhaar' when its foundation has crashed?


http://www.deccanherald.com/content/212980/how-does-govt-justify-aadhaar.html

How does govt justify 'Aadhaar' when its foundation has crashed?

deccanherald.com

UID – 'Aadhaar' was touted out as a 'transformational' initiative -- one that would change the face of India, make it the most digitised nation in the world, with the biggest data base of demographic information anywhere and so forth.

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Hemant Meshram

Aadhaar for LPG: Oil companies, Ministry of Petroleum & UIDAI disobeying Supreme Court order–Part XXII


http://www.moneylife.in/article/lpg-aadhaar-government-disobeying-supreme-court-order/35933.html

LPG & Aadhaar: Government disobeying Supreme Court order

moneylife.in

Oil companies, HPCL, BPCL and IOC conduct are violating the Supreme Court's order with regard to Aadhaar

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Indresh Maikhuri

हरीश रावत कहते हैं कि विजय बहुगुणा ने जहां छोड़ा था,वे वहीँ से उत्तराखंड के विकास को आगे बढ़ाएंगे.यानि इंडिया बुल्स,कोका कोला,अल्ट्राटेक पर ही उत्तराखंड के संसाधनों की लूट नहीं रुकेगी,बल्कि आगे भी बदस्तूर जारी रहेगी.

एक सवाल यह भी हरीश रावत जी कि जब विजय बहुगुणा के कामों को ही आगे बढ़ाना था तो मुख्यमंत्री बदलने की जरुरत ही क्या थी?

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Uday Prakash

''Strict moral codes, regulations and laws have been imposed to prevent individual or grouped capitalists from corrupting government officials. Evidence suggests, however, that neither civic-minded ethics, nor regulations nor laws have come close to ending capitalists' corruption. Countless government courts, commissions, etc., have hardly ended official complicities in that corruption. Mainstream economics mostly proceeds in its analyses and policy prescriptions as if rampant corruption did not exist. Mass media tend to treat capitalist corruption (at least in their home countries) as exceptional and government efforts to stop it as serious. These, too, are further examples of that "appropriate language" with which modern capitalist societies mask systemic corruption.''

http://truth-out.org/opinion/item/21559-political-corruption-and-capitalism

Political Corruption and Capitalism

truth-out.org

Corruption is endemic to the capitalist system and has not been successfully regulated away. Perhaps a system change is warranted, suggests Richard D Wolff.

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  • You, Ak Pankaj and 12 others like this.

  • Swapnil Bhartiya Situation is extremely bad here in the US - where the entire system is owned by mega corps. From funding to lobbying - which is a refined version of bribery - it's one of the most corrupt systems in the world.

  • 3 hours ago · Like

  • Ernest Albert no wonder thinkers like Noam Chomsky are never, never invited to speak at expensive dinner lectures .....yes extremely bad situation there, even in India.

  • about an hour ago · Like

Ak Pankaj shared झारखंडी भाषा संस्कृति अखड़ा's photo.

झारखंड की राजधानी रांची में आयोजित हो रहे इस राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं 'आदिवासी दर्शन और समकालीन आदिवासी साहित्य सृजन' विषयक परिसंवाद में शामिल होने के लिए उपरोक्त विषय के किसी भी एक उपविषय में जिसमें आपकी रुचि है अपने पत्र का सार-संक्षेप हमें 500 शब्दों में लिख कर 1 मार्च 2014 तक अवश्य भेज दें. पत्र के सार-संक्षेप के साथ 300 रुपए रजिस्ट्रेशन शुल्क भी भेजना अनिवार्य है. जिससे कि परिसंवाद में आपकी भागीदारी सुनिश्चित किया हो सके.

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Mon, 03 Feb 2014 22:30:00 GMT | By PTI

Nido Tania's Death: Rahul joins protesters at Jantar Mantar

The Delhi High Court took suo motu cognisance of Nido's death and asked the Centre to file a report on the incident by Wednesday

PTI

New Delhi: Rahul Gandhi today vowed "very swift action" into the killing of a student from Arunachal Pradesh here and asked Home Minister Sushilkumar Shinde to order a judicial probe, as he stepped in to address concerns of people from the northeast in the wake of attacks on them.

The Union Home Ministry, meanwhile, directed Delhi Police to sensitise all police stations in the capital about people from the northeast living in their respective jurisdiction and resolve their grievances.

The Delhi High Court also took suo motu cognisance of the death of the student Nido Tania last week after he was allegedly beaten by some shopkeepers in Lajpat Nagar and asked the Centre to file a report on the incident by Wednesday.

Rahul met protesting student groups from the northeast who had gathered at Jantar Mantar demanding that those involved in the attack on the student be brought to book.

Delhi's racism caused Arunachal student's death, cries northeast

Asserting that "what has happened was unacceptable", Rahul in his brief address said,"....You can expect a very strict action and detailed study done by a committee on the issues of north-easterners of this country. We are trying to move forward on that."

"There is no other India that I am interested in. I am not concerned whether you are from the North-East or any other religion, there is only one India and that India is for all of us. We will fight for this. We are going to ensure that you get respect in this country, full stop," he said.

Noting that Nido represented India, Rahul said "it does not matter where he comes from, who he is and what he looks like. These things do not matter and to me only one thing matters--that he is an Indian. Because he is an Indian, he deserves justice and he is going to get it. I am here with you".

Minister of State for Minority Affairs Ninong Ering earlier in the day said that Rahul has asked the Home Minister to order the judicial probe and provide justice to the family.

"Rahulji has called up Shindeji in front of us and requested the probe. Since the Home Minister is out of station, he told Rahulji that he would do the needful once he is back in Delhi tomorrow," Ering, who hails from Arunachal Pradesh, told PTI here.

Arunachal legislator's son dies after Delhi beating, northeast enraged

Rahul's call to Shinde came after Ering led a delegation of students from northeast seeking the Congress Vice- President's help for a speedy probe and justice to the family.

The Union Home Ministry directed Delhi Police to adopt zero tolerance approach in cases of attacks on people from northeast and asked it to strictly follow the guidelines in providing security to those hailing from the region.

At a high-level meeting, it also directed Delhi Police to immediately register cases of atrocities on people from northeast, launch probe upon receiving complaints and book the guilty.

The meeting was convened in the wake of a series of attacks on people from the northeast in the capital recently.

A High Court bench of Chief Justice N V Ramana and Rajiv Sahai Endlaw issued notices to the Union Home Ministry, Delhi Government and Delhi Police seeking a status report on the incident by Wednesday and also details of the steps taken for safety of people from northeast staying in the capital.

Abhishek Srivastava

तो लीजिए साहेबान, साहित्‍य की दुनिया में जला है नया चिराग जिसमें तेल की जगह शराब है। शराब व्‍यवसायी और रियल एस्‍टेट के सरताज मरहूम पोन्‍टी चड्ढा की वेव कंपनी हिंदुस्‍तान टाइम्‍स अखबार के सहयोग से प्रस्‍तुत करती है दिल्‍ली लिटरेचर फेस्टिवल 2014...!


इस मेले की शुरुआत श्री राजेंद्र यादव को श्री नामवर सिंह द्वारा श्रद्धांजलि से होगी। अद्भुत संयोग! इसके बाद तमाम किस्‍म की बहसों में आप कुसुम अंसल से लेकर विश्‍वनाथ त्रिपाठी तक कई हिंदीजीवियों को पाएंगे। फिर अंत में महान पत्रकार बरखा दत्‍त इस मौसम के सबसे बड़े लेखक, भ्रष्‍टाचार के क्रूसेडर और सबसे ईमानदार मानव अरविंद केजरीवाल से उनकी पुस्‍तक ''स्‍वराज'' पर चर्चा करेंगी। एंट्री मुफ्त, मुफ्त, मुफ्त...


डिसक्‍लेमर: इस बार किसी को टैग नहीं करूंगा क्‍योंकि देख रहा हूं आजकल आवाजाही के लोकतंत्र को बड़ी ठेस पहुंच रही है। किसी को दुख पहुंचाने की मेरी कोई मंशा नहीं है। वैसे भी, अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं- बापू ने कहा था।

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  • Reyazul Haque, Yashwant Singh, Rakesh Kumar Singh and 15 others like this.

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  • Chandan Kumar तब ठीक सर वैसे सेटिंग वाला साहित्यकार ही बनना है सर

  • about an hour ago · Like · 1

  • Abhishek Srivastava बिना सेटिंग वाला साहित्‍यकार होता ही नहीं है।

  • about an hour ago · Like · 2

  • Chandan Kumar अरे पता ही नहीं था, तब सही में इंटर्नशिप की जरूरत है सर...

  • about an hour ago · Like · 1

  • Saurabh Verma Chor chor mosere bhaiyo me Gandhi ka fasna tay that Abhishek Ji........

  • 44 minutes ago · Like

  • Palash Biswas बहुत खूब अभिषेक।आयोजकों स‌े कहो कि डा.अमर्त्य स‌ेन को बुलाकर उनसे स‌ंस्कृत में राजेद्र यादव,नामदेव धसाल और ओम प्रकाश बाल्मीकि को श्रदधांजलि दिलवा दें।एबीएआईएसएफ मार्का क्रांति हो जायेगी।

  • a few seconds ago · Like

  • Palash Biswas अपने वीर भारततलवार जी और मधु किश्वर जी को भी बुला स‌कते हैं।

  • a few seconds ago · Like

Uday Prakash

अगर इस समय मीडिया के बाहर कोई 'लहर' है, तो वह 'आप' की है. मेरे पास इतने फोन आ रहे हैं, एम पी, बिहार, छत्तीसगढ़ से कि कुछ अंदाज़ा लग रहा है. (भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है, कौन जाने ?) घमासान है भई !

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  • Vyomesh Shukla and 26 others like this.

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  • Uday Prakash यही तो वो बात है Satyendra Pratap Singh ji !!!

  • 37 minutes ago · Like · 1

  • Sanjay Patel वाकई आप के लिए अनूठी लहर है। काश कोई ढंग का बन्दा इनकी नैया का खेवनहार बन जाए। वरना ये 1977 की जनता पार्टी जैसा शिगूफा बनकर रह जाएगी। शेषन,गोपाल् क्रष्ण गांधी,सुब्रमण्यम स्वामी या शरद यादव जैसा कोई कद्दावर मिल जाए आप को तो सब सध जाए !

  • 32 minutes ago · Like

  • Surendra Bansal koi bhi lahar jyada din nahin thahrati.....

  • 26 minutes ago · Like

  • Uday Prakash यह एक समस्या है , ज़रूर ! कोई ऐसा, जिसका नैतिक कद निर्विवाद हो. Sanjay Patel ji ....ताज़्ज़ुब है कि राष्ट्रीय महिला आयोग के लिए भी उन्होंने सिर्फ़ दिल्ली तक देखा. दिल्ली 'लोकल' है ...'नेशनल' या 'अखिल भारतीय' नहीं. यह एक पुराना 'डिफ़ाल्ट' है. महिलाएं सिर्फ़ दिल्ली में नहीं रहतीं. उनका दायरा बहुत बड़ा है. ...(और ज़रूरी नहीम कि सब 'हिंदी' ही बोलती हों. ये ज़ाहिर संकीर्णताएं हैं, क्या इनसे दूर हुआ जा सकता है?)

  • 26 minutes ago · Like · 1

  • Rising Rahul ....और मुसलसल आपस में लड़ रहे हैं...

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Anand Patwardhan

about an hour ago ·

  • Acceptance speech at MIFF 2014
  • I have mixed feelings this evening as I accept this Lifetime Achievement Award. Of course I am overjoyed that our work is recognized and deeply grateful to all those who must have struggled to make this come about.
  • I have been very lucky. I was lucky to have the parents, the family and the friends that I did, who gave me such unstinting and ungrudging support through all the times when our work was frowned upon by the authorities and ignored by the market. I am also lucky that despite opposition, many of my films got recognition both in India and abroad.
  • Here is where my mixed feelings come in. My films are nothing without the causes they speak about and the people they champion. Today if I ask myself whether these films really made a difference to the people and the causes they are about, I would have to admit that the difference is marginal.
  • Let me give just a few examples:
  • Prisoners of Conscience (completed in 1978) was about political prisoners in Independent India. Today our jail population continues to rise as our system refuses to grant bail even to those who have been in detention without trial for years. As I speak many prisoners have gone on a hunger strike to protest this long denial of bail.
  • Bombay Our City (completed in 1985) was about the macabre practice of demolishing the makeshift homes of the homeless. Demolitions are still in full swing as we continue to criminalize the poor instead of questioning a development paradigm that forces urban migration and urban poverty.
  • In Memory of Friends (1990) and Ram ke Naam/In the Name of God (1992) were about the rise of sectarianism and violence in the name of religion. Today we may be on the brink of once again bringing to power those who were nurtured with the ideological mindset that killed Mahatma Gandhi, who engineered and celebrated the demolition of the Babri Mosque, who connive in or condone the massacre of minorities. Amongst those attacked and then denied justice, it also creates a thirst for revenge and counter-violence.
  • Father, Son and Holy War (1995) was about our patriarchal system and the connection between religious violence and machismo. Today we are witnessing increasing attacks on women, communal assaults that include gang rape and a popular culture that celebrates manliness. And we have a prime ministerial candidate who publicly boasts of his 56 inch chest size even as his crimes of omission and commission during the pogroms of 2002 are forgotten and forgiven by the entire corporate world and its embedded media.
  • A Narmada Diary (1995) was about the destruction and displacement caused by the gigantic Sardar Sarovar dam and about a peoples' movement that forced the World Bank to stop further funding to the project. Today the dam is almost complete yet the water instead of reaching the thirsty in drought prone areas, is being electrically pumped to serve water-parks and promenades in urban Gujarat.
  • War and Peace (2002) was about India's tragic decision to join the infamous nuclear club and become a nuclear weapons wielding State. As Pakistan replied in kind, the region plunged into nuclear insecurity and uncertainty. Today our departing Prime Minister when recounting the few achievements he is proud of, lists at the forefront a nuclear deal with the USA that lifted an embargo on India's nuclear program and allowed it to plan a huge increase in nuclear plants across the country. In the wake of Fukushima when the world is finally waking up to the fact that nukes are not only unsafe, they are unaffordable, India is busy buying second-hand Chernobyls to populate our tsunami susceptible coastline.
  • Jai Bhim Comrade (2012) was about the music of protest of a people who for thousands of years were denied education, forced to do menial jobs and regarded as "untouchables". According to official government figures, every day somewhere in this country, two Dalits are killed and three raped. In our film one of the many groups protesting these atrocities was the Kabir Kala Manch (the KKM). By the end of the film KKM members had been forced to go underground after police began to brand them as Maoist "Naxalites". After Jai Bhim Comrade won awards including one at the last MIFF, and was extensively written about, we formed a KKM Defence Committee. Finally the KKM decided that with civil society support, it was worth it to come overground. They did a non-violent Satyagraha by singing outside the Maharashtra Assembly and were arrested. Three of them eventually got bail thanks to a High Court order, but 10 months later, three others are still in jail. They all gave themselves up voluntarily, expressing faith in democracy. Their only weapons were their songs. Today it is really our political and judicial system that is in the dock.
  • So I say that my feelings are mixed. Added to the bitter sweetness of this moment is the fact that my parents to whom I owe everything are not here anymore. Nor are many of the protagonists in my films, people like Pujari Laldas, Jaimal Singh Padda and Shahir Vilas Ghogre who gave their lives for what they believed in. And during this long journey I have also lost many of my beloved and admired friends in the filmmaking fraternity, people like Pervez Merwanji, Saratchandran, Sato Makoto, Tareque Masood and now, Peter Wintonick.
  • I am sorry for taking so much of your time. I am deeply grateful that my work, and through it, the work of so many others, has been recognized. I only hope that such awards will make our work and our causes more visible. Once that happens on a bigger scale, I am confident that change will come. Thank you !
  • Anand Patwardhan
  • Mumbai, 3 Feb. 2014
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Jagadishwar Chaturvedi

सन् 1984 के दंगों को लेकर भाजपा चीख चीखकर हल्ला कर रही है ,लेकिन जिस समय दंगे हुए थे मैं जेएनयूछात्रसंघ का अध्यक्ष था और दिल्ली में दंगों के तत्काल बाद पुलिस की परमीशन के बिना प्रतिवाद में जेएनयू के तकरीबन 8हजार छात्र-शिक्षक-कर्मचारी पहले संघबद्ध प्रतिवाद करने वालों में थे, हमने पुलिस कमिश्नर के प्रदर्शन न करने के आदेश को न मानकर विशाल जुलूस संभवतः4नबम्बर को निकाला था। यह इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि 1984 के दंगों का जेएनयू के छात्रों ने शिक्षकों -कर्मचारियों को साथ लेकर एकमात्र पहला प्रतिवाद किया था। कोई भी उस समय के अखबार देख सकता है।

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  • Chandra Prakash Jha JNU belongs to all of us - not always left , and therefore it played a role - big or small in 1984 and even before that -during 'internal emergency'

  • 2 hours ago · Like · 1

  • Mahabir Jaglan No body can deny that JNUSU was the first organization to protest against 1984 riots. We all were involved in relief work also in Mangolpuri, Trilokpuri and Sultanpuri, most affected localities by riots. Every body is not Left in JNU but no body can deny the role of Left in democratization of JNU politics.

  • 2 hours ago · Like · 2

  • Reetu Kalsi आतंकवाद के समय जब हजारों निर्दोष हिंदुओं के जो कत्ल हुए उस के बारे में कोई क्यों नहीं बोला 1984 के सिख विरोधी दंगों की निंदा तो जायज है परंतु आतंकवाद के समय निर्दोषों की हत्याओं पर चुप्पी किस लिए दंगो पर राजनीति करने वालों से आग्रह है कि निर्दोष लोगों के मारे जाने पर दोहरे मापदंड न अपनाएं। बेशक वह दिल्ली के सिख दंगों या गुजरात के मुस्लिम विरोधी दंगे हो या फिर आतंकवादियों के हाथों निर्दोष लोगों की हत्याएं।

  • about a minute ago · Like

Jagadishwar Chaturvedi

जहर के खेत-1-


समझौता ब्‍लास्‍ट केस के मुख्‍य आरोपी स्‍वामी असीमानंद के एक इंटरव्यू से आरएसएस और इसके प्रमुख मोहन भागवत की मुश्‍किल बढ़ सकती है। इस इंटरव्यू में असीमानंद ने साफ कहा है कि भागवत को ब्‍लास्‍ट की जानकारी थी और मुस्लिम ठिकानों पर धमाकों की योजना को उन्‍होंने ही मंजूरी दी थी। यह इंटरव्यू 'कारवां' पत्रिका में छपा है।

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  • Jagadishwar Chaturvedi आनंद, कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं होती, बल्कि गंदगी फैलती है।

  • 2 hours ago · Like

  • Uma Jhunjhunwala सर, सारी जानकारियों के बावजूद ना तो इन RSS वालो का कुछ होगा और ना ही बीजेपी वालो का बाल बांका होगा....

  • 2 hours ago · Like · 1

  • Anand Dubey Pragya Thakur ki charge sheet submit ho gayee kya? Puruhit ke khilaf saboot mile kya? Rajasthan Police Jadugar ki vafadari kar rahi thi ab thode dino bad mamla saf ho jayega, Aseem bahar aur Police vale andar.

  • 2 hours ago · Like

  • Pawan Sood Let the case reach court first, instead of making judgement......

  • 2 hours ago · Like

  • Aam Aadmi Party
  • For ever we have been listening to governments say that they need time to bring about change.

  • Now that ‪#‎AAP‬ government in Delhi shows what can be done in one day.

  • 1. PNG price reduced by 5 Rs after Delhi govt approached SC....See More

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Ashok Dusadh

किसी ने साहब कांशीराम से पूछा था -आप तो पंजाब से है फिर उतर प्रदेश से राजनीति की शुरुआत क्यों की ?

उन्होंने कहा था अगर भारत को ब्राह्मणवाद का पूरा शरीर मान ले तो उतर प्रदेश को उसका सर और दिमाग मानिये और जब हम उतर प्रदेश कब्ज़ा लेंगे तो यह ब्राह्मणवाद का गर्दन दबोचने जैसा होगा और जब किसी का गर्दन दबोच लिया जाता है तो शरीर खुद ब खुद निष्क्रिय हो जाता है .

१०१४ की बीएसपी की रणनीति ऐसे भी समझ सकते है .

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  • Nomad's Hermitage, Parmeshwar Das, Sanjay Samant and 29 others like this.

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  • विकास जाटव कोई व्यक्ति अगर खुद सफल नही हो पाता और कांशीराम जी पर प्रश्नचिन्ह लगाता है तो यह हास्यपद ही होगा. मान्यवर कांशीराम जी को ही सभी शोषित समाज पुरे देश के संगठन 'बाबा साहब' के बाद अपना आदर्श मानते है.

  • 2 hours ago · Like · 2

  • Sudhir Kumar Jatav इधर लुढका मैं उधर लुढका जाने किधर मैं कहाँ लुढका ।

  • 2 hours ago · Like · 2

  • Sanjay Kumar Kawal bharti saheb@ Aapko monsoon me Girgit ki Axepresion pr obeserve karna chahiye ho sakta hai Aapko isaki Activity aur kisi khas Aadmi ki activity me SAMANATA najar Aa jaye!!!!

  • about an hour ago · Like

  • Satyendra Pratap Singh ऐसा है तो ठीके है। लेकिन कुछ हवा पानी मिल नहीं रहा है!

  • about an hour ago · Like

Amalendu Upadhyaya

मुलायम सिंह यादव की इस बात में तो दम नज़र आ रहा है- कि खुद को ईमानदार कहनेवाले केजरीवाल ने नौकरी क्यों छोड़ी, कहीं वह भ्रष्टाचार में तो लिप्त नहीं थे।

मोदी जी, क्या गुजरात में सिंचाई, पढ़ाई और दवाई मुफ्त है

hastakshep.com

गोंडा, 3 फरवरी। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने पूछा है कि क्या गुजरात में सिंचाई, पढ़ाई और दवाई मुफ्त है? शहीद भगत सिंह इंटर कालेज मैदान में आयोजित सपा की 'देश बचाओ-देश बनाओ' रैली को सम्बोधित करते हुये मुलायम ने यह सवाल उठाया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्र...

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  • 6 people like this.

  • Ashu Bhatnaagar कोई बताएगा की मुलायम ने टीचर की नौकरी काहे छोड़ दी थी कहीं वो भी भ्रष्टाचार में तो लिप्त नहीं थे।

  • 7 hours ago · Like

  • Amalendu Upadhyaya क्योंकि मुरलीमनोहर जोशी की तरह बिना पढ़ाए सरकार से तनख्वाह नहीं लेना चाहते थे मुलायम,इसलिए छोड़ दी थी नौकरी।

  • 7 hours ago · Like · 2

  • Ashu Bhatnaagar ओ तेरी हम तो समझे की पहलवानी पुरी नहीं हुई फिर नौकरी भी पूरी नहीं हुई तो नेता बन गये

  • 7 hours ago · Like

  • Aam Aadmi Party
  • Delhi Lokayukta had recommended action against Sheila Dixit in case of fraud provisional certificates distributed to unauthorized colonies.

  • The President had asked the previous Delhi government to give its opinion on the issue but Sheila Dixit government didn't answer.

  • Now the ‪#‎AAP‬ government in Delhi has recommended action against Sheila Dixit in the issue.

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  • Vallabh Pandey
  • पिछले बार समाजवादी सरकार ने 17 जातियों को लालीपॉप पकड़ाए थे, किसी को कुछ लाभ नहीं हुआ, इस बार फिर से कुम्हार भाई लोगों को चाकलेट पकडाने की कोशिश हो रही है, चुनाव तक और लोगों को भी झुनझुना दिया जाएगा .... अब दौड़ो आफिस आफिस प्रमाणपत्र बनवाने ले लिए .... 'शासनादेश नहीं आया है' वाला रटा रटाया जुमला सुन के वापस लौट आना ....

  • Like ·  · Share · 8 hours ago ·

Jagadishwar Chaturvedi

सन् 1984 में जब सिख नरसंहार हो रहा था, तो संघ परिवार के नेता घरों में दुबके हुए क्यों बैठे थे ? मैंने दो दिन पहले ही जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष का दायित्व लिया था। हमने इंदिरा गांधी की हत्या के दिन ही सभी छात्रों को गोलबंद किया, कैम्पस में सक्रियता बढाई,वसंत विहार स्थित हरिकिशन पब्लिक स्कूल में बंद तकरीबन 34 सिखों को दंगों के समय मैं अपने साथियों की मदद से इस स्कूल के तहखाने से निकालकर कैम्पस के अंदर देर रात गए 2बजे करीब लेकर आया ।

उस समय मुनीरका,आर.के.पुरम आदि में आगजनी हो रही थी, हरिकिशन सिंह पब्लिक स्कूल में आग लगाई जा चुकी थी, पीडित सिख तहखाने में बंद थे किसी तरह जेएनयू के मैनगेट पर फोन पर मेरे नाम एक स्कूल शिक्षक का संदेश था कि आकर हमारी जान बचाओ,मैं निजी तौर पर बेहद परेशान था कि क्या करुँ,एक कॉमरेड को मोटर साइकिल से लेकर गया तो देखा कि रास्ते में गुण्डे हथियारों से लैस गाडियों में हिंसा-आगजनी करते घूम रहे थे। किसी तरह झूठ बोलते हुए हरिकिशन पब्लिक स्कूल में जलती बिल्डिंग के तहखाने में जाकर सब पीडित सिखों को देखा तो रुह कांप गयी।खैर, मैं उलटे मोटर साइकिल से जेएनयू लौटा और परिचित शिक्षकों की 5 कारों को लेकर तुरंत लौटा और पीड़ितों को तहखाने से निकालकर कैम्पस लेकर आया और यह खबर हमने जेएनयू के छात्रों से भी छिपायी। बाद में रात में ही सभी 34 सिखों को जेएनयू शिक्षकों के घर में 2-2 के ग्रुप में करके रख दिया गया। यह काम बहुत ही तेजी और गोपनीयता के साथ किया गया। यही वह घटना थी जिसने अकाली दल को गहरे तक प्रभावित किया और संत लोंगोवाल अकालीदल की ओर से मिलने जेएनयू आए उन्होंने निजी तौर पर मुझे बहुत ही प्यार दिया और कहा कि इस तरह के युवाओं पर ही देश गर्व करता है।संत का प्यार मेरे जीवन की अनमोल उपलब्धि थी।

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Jagadishwar Chaturvedi

जहर के खेत-2-


इंटरव्यू करने वाली लीना गीता रघुनाथ ने लिखा है- असीमानंद ने एक मीटिंग के बारे में मुझे बताया, जो कथित तौर पर जुलाई 2005 में हुई थी। सूरत में आरएसएस के सम्‍मेलन के बाद संघ के बड़े नेता भागवत (मोहन) और इंद्रेश कुमार डैंग (गुजरात) के एक मंदिर में गए थे। असीमानंद वहीं रहा करते थे। मंदिर से कई किलोमीटर दूर एक तंबू में भागवत और कुमार ने असीमानंद और उनके सहयोगी सुनील जोशी से मुलाकात की। जोशी ने भागवत को देश भर में मुस्लिम ठिकानों पर बम धमाके की योजना बताई।

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Jagadishwar Chaturvedi

जहर के खेत-3-


असीमानंद के मुताबिक आरएसएस के दोनों नेताओं ने योजना पर सहमति जताई और भागवत ने उनसे कहा, 'आप सुनील के साथ मिल कर इस पर काम कर सकते हैं। हम शामिल नहीं होंगे। लेकिन, आप इसे कर रहे होगे तो यह समझना कि हम आपके साथ हैं।' असीमानंद ने बताया, 'उन्‍होंने मुझसे कहा कि स्‍वामी अगर आप यह करते हो तो हम आपके साथ हैं। कुछ गलत नहीं होगा। क्रिमिनलाइजेशन नहीं होगा। आप इसे करते हो तो लोग यह नहीं कहेंगे कि हमने अपराध करने के मकसद से किया है। यह हमारे सिद्धांतों से जुड़ेगा। यह हिंदुओं के लिए बेहद अहम है। कृपया इसे कर लें। हमारा आशीर्वाद आपके साथ है।'

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जनज्वार डॉटकॉम

उत्तराखण्ड में सरकार बदलने से ठीक पहले प्रदेश की कैबिनेट ने मंत्रियों, विधायकों यहाँ तक कि पूर्व विधायकों के वेतन, भत्तों व पेंशन में तीन गुने की वृद्धि कर दी. इसके उलट राज्य में नौकरी के लिए आवेदन करने वाले बेरोजगारों पर अब शुल्क थोप दिया गया है, जो सामान्य व ओबीसी के लिए 500 रुपए तथा एससी-एसटी के लिए 300 रुपए होगा...http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-08-56/81-blog/4759-abhi-main-kis-tarah-muskaraun-for-janjwar-by-mukul

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एच एल दुसाध
पद्मश्री नामदेव ढसाल नहीं रहे .उनका जाना एक ऐसी दुर्लभ शख्सियत का जाना है जिसने धरती के नरक से निकल कर अपने बहु आयामी व्यक्तित्व से विश्व को विस्मित किया.किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने वाले उन्हें मुख्यतः कवि के रूप में उन्हें याद कर रहे.जबकि सचाई यह है की कवि ढसाल एक बड़े चिन्तक,पेंटर ,असाधारण संगठनकर्ता और दूरदर्शी राजनेता सहित अन्य कई गुणो के स्वामी थे.अब जहां तक कविता का सवाल है वे नोबेल विजेता कवि टैगोर से भी बड़े कवि थे.इस मामले में मुझे 2012 में दिल्ली के 20 वें अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में चर्चित कवि विष्णु खरे की उस टिपण्णी की बार-बार याद आ रही है जो उन्होंने,उनकी हिंदी में पहली अनुदित पुस्तक 'आक्रोश का कोरस'का विमोचन करते हुए कही थी.संयोग से उस विमोचन समारोह में मैं भी उपस्थित था.वैसे मैंने ढसाल साहब के विषय बहुत कुछ सुन रखा था.किन्तु खरे साहब ने जो सत्योद्घाटन किया,वह चौकाने वाला था.उसके बाद मैंने नए सिरे से उनका मूल्यायन करना शुरू किया तो जो निष्कर्ष सामने आया वह खुद मेरे लिए भी अचंभित करनेवाला था.
बहरहाल कवि विष्णु खरे ने कहा था-'पिछले दिनों कोलकाता पुस्तक मेले में आयोजित लेखकों की एक संगोष्ठी में तमाम लोगों ने एक स्वर में नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर को भारत के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में स्वीकृति प्रदान किया.किन्तु मेरा मानना है कि ऐसी मान्यताएं ध्वस्त होनी चाहिए.आज की तारीख में रवीन्द्रनाथ ठाकुर पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके हैं.आज भारत जिन समस्यायों से जूझ रहा है ,उसका कोई भी समाधान उनकी कविताओं में नहीं है.अगर कविता का लक्ष्य मानव-जाति की समस्यायों का समाधान ढूँढना है तो मेरा दावा है कि ढसाल, टैगोर से ज्यादा प्रासंगिक और बड़े कवि हैं.'उन्होंने आगे कहा था 'रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे लोग हमारे लिए बोझ हैं जिसे उतारने का काम ढसाल ने किया है.अंतर्राष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता का विजिटिंग कार्ड का नाम नामदेव ढसाल है.उन्होंने कविता की संस्कृति को बदला है;कविता को परंपरा से मुक्त किया एवं उसके आभिजात्यपन को तोडा है.संभ्रांत कविता मर चुकी है और इसे मारने का काम ढसाल ने किया है.आज हिंदी के अधिकांश सवर्ण कवि दलित कविता कर रहे हैं तो इसका श्रेय नामदेव ढसाल को जाता है.ढसाल ने महाराष्ट्र के साथ देश की राजनीति को बदल कर रख दिया है,ऐसा काम करनेवाला भारत में दूसरा कोई कवि पैदा नहीं हुआ.नामदेव ढसाल किसी व्यक्ति नहीं,आंदोलन का नाम है.अगर देश में 5,6 ढसाल पैदा हो जाएँ तो इसका चेहरा ही बदल जाय.'क्या कोई कवि ,वह भी दलित समाज से निकला ,नोबेल विजेता टैगोर से बड़ा और ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है,इस पर सहसा विश्वा करने कठिन है.किन्तु रवीन्द्रनाथ के नोबेल तमगे से आतंकित हुए बिना अगर उनकी प्रासंगिकता पर विचार किया जाय तो ढसाल के प्रति श्रद्धा कई गुणा बढ़ जाति है.
रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रासंगिकता पर विचार किया जाय तो साफ़ नज़र आता है कि आज मानव जाति जिन संकटों से जूझ रही है,उनका समाधान देने में वे पूरी तरह व्यर्थ रहे.उसका अन्यतम प्रधान कारण उनकी पारिवारिक पृष्ठ भूमि थी जिसमें वे पले-बढे.उन्होंने एक ऐसे संपन्न व सुशिक्षित 'पीराली ब्राह्मण' परिवार में जन्म लिया था,'जिसमें कवि और विद्वान,संगीतकार और दार्शनिक,कलाकार और समाजसुधारक,प्रतिभावान और सनकी-सब ही मौजूद थे.' इस परिवार में 'प्रिंस' द्वारकानाथ के पुत्र और रवीन्द्रनाथ के पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने 'महर्षि'के रूप में अपनी अलग पहचान स्थापित की थी,क्योंकि 'वे एक साथ संत भी थे और मनीषी भी'.अपने विशिष्ट आध्यात्मिक गुणों के कारण उन्हें भारतवर्ष के सुधार के जनक 'राजा राममोहन राय के नैतिक वंशज और आध्यात्मिक उत्तराधिकारी' कहलाने का दुर्लभ गौरव प्राप्त हुआ था.दिन भर ब्रह्म और ब्रह्म की रट लगाने वाले महर्षि की परमात्मा में घनघोर आस्था पैदा हुई थी और सांसारिक खुशियों के बदले दैवीय आनंद के अभ्यस्त हो गए थे.देशवाशियों को अपनी तड़क-भड़क से चकाचौध करनेवाले प्रिंस द्वारकानाथ अपने बेटे देवेंद्रनाथ को तो अपने रंग में ढालने में सफल नहीं हो पाए,किन्तु देवेंद्रनाथ का आध्यात्मिक व्यक्तित्व उनके विनीत व आज्ञाकारी पुत्र रवीन्द्रनाथ पर इच्छित प्रभाव छोड़ने में सफल रहा.परवर्ती काल में योग्य पिता की आध्यात्मिक बातों का अनुसरण करते हुए वे योग्यतम संतान के रूप में परिणत हुए.पिता से मिले अध्यात्मिक संस्कार के फ़लस्वरू उन्होंने गीतांजलि जैसी पुस्तक का सृजन कर नोबेल विजेता रुप में न सिर्फ पने ठाकुर परिवार बल्कि भारतवर्ष का मान बढाया. गीतांजलि में कवि ने जिस उत्कट ईश्वर-प्रेम की अभिव्यक्ति किया था उससे मोक्षकामियों के लिए उसमे एक सार्वदेशिक अपील पैदा हो गई थी.यही कारण है गीतांजलि धार्मिक-कविताओं की दुनिया की धरोहर बन गई और रवीन्द्रनाथ बन गए पाश्चात्य जगत में 'एशिया के अध्यात्मिक दूत.'


गीतांजलि में रवीन्द्रनाथ के जिस उत्कट ईश्वर-प्रेम का प्रतिबिम्बन हुआ था वह मृत्यु पर्यन्त कायम रहा.इसके चलते उन्हें इहलोक की समस्याएं बिलकुल ही स्पर्श नहीं कर पाईं,यहां तक कि स्वाधीनता आन्दोलन से भी आधे-अधूरे मन से जुड पाए.इसलिए स्वाधीनता आन्दोलन में उनकी भूमिका पर रह-रह कर सवाल उठता रहा. यही कारण है महात्मा गाँधी के गुरुदेव अपनी लेखनी द्वारा सदियों से अध्ययन-अध्यापन,पौरोहित्य,राज्य-संचालन,सैन्य-वृत्ति,व्यवसाय-वाणिज्य इत्यादि अर्थात शक्ति के तीनों स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-धार्मिक) से पूरी तरह वंचित किये गए शूद्रातिशूद्रों और महिलाओं की दशा में बदलाव लाने का कोई उपक्रम न चला सके.पर क्या बहुजन समाज की पूर्णतया अनदेखी करनेवाले वाले अकेले रवीन्द्रनाथ ही थे ?नहीं, मध्ययुग युग से लेकर आधुनिक युग तक के बड़े से बड़े किसी भी साहित्यकार ने हिंदू- ईश्वर सृष्ट वर्ण-व्यवस्था के वंचितों को शक्ति के स्रोतों में उसका प्राप्य और मनुष्य रूप में मानवीय मर्यादा दिलाने के लिए अपनी मनीषा का भरपूर इस्तेमाल नहीं किया.उलटे ईश्वर का जयगान कर सामाजिक परिवर्तन की राह में अवरोध खड़ा किया .


बहरहाल भारत में आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी की जो बेनजीर खाई पैदा की गई,उसमें सबसे बड़ी भूमिका ईश्वर –महिमा प्रचारक साहित्य की रही.इसलिए ही दलित साहित्यकारों ने अपनी कविता,कहानी, उपन्यास,आत्मकथा,नाटक,निबन्धों इत्यादि के माध्यम से मुख्यधारा के साहित्य की निर्जीव कहानियों,मनगढंत लेखन और यथास्थितिवादी विचारधाराओं को तार्किक तरीके से अस्वीकार किया ही,मगर सर्वाधिक हमला हिंदू-ईश्वर-धर्म के खिलाफ किया .आज दलित साहित्य ईश्वर-विरोध के मामले में विश्व का सर्वश्रेष्ठ साहित्य बन चुका है.फुले-आंबेडकर के विचारों को आधार बनाकर सत्तर के दशक से महाराष्ट् में जो 'दलित-साहित्य का आन्दोलन' शुरू हुआ वह देखते ही देखते पुरे देश में फ़ैल गया.इस क्रम में राष्ट्रीय स्तर पर ढेरों दलित साहित्यकारों का उदय हुआ,जिनमें सबसे आगे निकल गए वह नामदेव ढसाल,जिन्हें विष्णु खरे जैसे लोग रवीन्द्रनाथ से श्रेष्ठ और ज्यादा प्रासंगिक मानते हैं.
नामदेव ढसाल और रवीन्द्रनाथ ठाकुर में कुछ साम्यताएं रहीं.जिस तरह साहित्य की विविध विधाओं पर मास्टरी हासिल करने के बावजूद रवीन्द्रनाथ का परिचय मुख्यतः कवि के रूप में रहा ,वैसे ही भारी मात्रा में वैचारिक और उपन्यास लेखन करने के बावजूद ढसाल का परिचय एक कवि के रूप में ही रहा है.एक साम्यता इनमें यह भी रही कि बंकिम चट्टोपाध्याय के 'साहित्य-सम्राट'के रूप स्थापित होने के बावजूद रवि ऐसे पहले साहित्यकार हुए जिन्होंने नोबेल पुरस्कार जीत कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'हिंदू-साहित्य' का मान बढ़ाया.ठीक उन्ही की तरह ढसाल पहले ऐसे शीर्षस्थ दलित साहित्यकार हुए जिन्होंने विश्वमय ख्याति अर्जित की जिसकी चर्चा नोबेल विजेता व्ही.एस.नायपाल से लेकर कई विदेशी लेखकों ने की है.इन साम्यताओं को छोड़ दिया जाय तो शेष मामलों में स्थिति उलटी ही रही.
रवीन्द्रनाथ जहाँ प्रकृति गोद में बैठकर निश्चिन्त भाव से कविता सृजन का माहौल पाए,वहीँ बूचड़खाने के एक सामान्य कर्मचारी की संतान व कामाठीपुरा और गोलपीठा जैसे दुनिया के दूसरे विशालतम रेड लाईट एरिया में पले-बढे ढसाल को छोटी-छोटी नौकरियां करते हुए कविता-कर्म जारी रखना पड़ा.विपरीत परिवेश ने दोनों को विपरीत धारा का कवि बना दिया.अनुकूल परिवेश में पले-बढे रवीन्द्रनाथ जहां प्रकृति के सच्चे प्रेमी के रूप में अवतरित होकर साहित्य के कलापक्ष को सर्वोच्च उच्चता प्रदान कर भावी पीढ़ी के हिंदू साहित्यकारों के आदर्श बने,वहीँ दलित उपसंस्कृति तथा महानगरीय अधोलोक ने ढसाल को ऐसे विद्रोही कवि के रूप में जन्म दिया जिसने बेख़ौफ़ होकर अभिजनों की भाषा और व्यवस्था पर शक्तिशाली प्रहार किया.उनकी काव्यात्मक उग्रता ने परवर्ती वर्षों में विस्तारलाभ करनेवाले दलित साहित्य पर ऐसा प्रभाव डाला जिसकी चपेट में आने से कोई भी दलित साहित्यकार खुद को नहीं रोक पाया.विपरीत धारा के इन दोनों श्रेष्ठतम कवियों में पार्थक्य यह भी रहा कि रवीन्द्रनाथ की कवितायेँ जहां वेद-उपनिषदों से प्रभावित रहकर मोक्षकामियों के लिए अत्यंत ग्राह्य बनीं,वहीँ दलित कवि पर मानव जाति की समस्या का सर्वाधिक प्रभावी समाधान देनेवाले मार्क्स और आंबेडकर का गहरा प्रभाव रहा,जिसे इहलौकिक समस्यायों से जूझते लोगों ने सोत्साह वरण किया.यही कारण है ढसाल की कवितायेँ भारत के किसी भी कवि से ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं.एक बड़ा अंतर दोनों में यह भी रहा कि कवि सम्राट ने नैसर्गिक वातावरण में 'शांतिनिकेतन' की स्थापना कर जहां प्रकृत और नई शिक्षा प्रणाली के प्रति अपने लगाव को मूर्त रूप दिया ,वहीँ नामदेव ढसाल ने अपनी कविता संसार को जमीन पर उतारने के लिए ,अपने लेखक मित्रों के साथ मिलकर 'दलित पैंथर'जैसे उग्र संगठन की स्थापना किया जिसने महाराष्ट्र ही नहीं,सम्पूर्ण भारत की राजनीति को प्रभावित किया.यद्यपि यह संगठन कुछेक कारणों से अपने इच्छित लक्ष्य को पाने में विफल रहा,तथापि सामाजिक बदलाव के लिए कार्यरत दूसरे संगठनों के लिए आज भी यह प्रेरणा का बड़ा स्रोत है.भारतीय समाज और राजनीति पर दलित पैंथर के प्रभाव को देखते हुए यह बात तो दावे के साथ कही जा सकती है कि ऐसा करनेवाला भारत में कोई दूसरा कवि पैदा नहीं हुआ;पर क्या विश्व में भी और कोई हुआ?
मेरा मानना है कि धरती के नरक से निकल कर विश्व कवि का दर्ज़ा हासिल करनेवाले नामदेव ढसाल ने जिस तरह महज़ 23 वर्ष में दलित पैंथर जैसे उग्र संगठन की स्थापना की वह भारत ही नहीं ,विश्व-साहित्य जगत की इकलौती घटना है.दुनिया के तमाम बड़े-बड़े लेखक-कवि,जिनमें मैक्सिम गोर्की का नाम खास आदर के साथ लिया जाता है,अपना बौद्धिक अवदान दूसरों द्वारा पहले से स्थापित सामाजिक/राजनीतिक संगठनों के लिए देते रहे.यह शायद धरती पर एकमात्र कवि नामदेव ढसाल हैं जिन्होंने दलित पैंथर जैसा खुद का संगठन खड़ा किया.यदि हम कामाठीपुरा और गोलपीठा की बदनाम बस्ती के परिवेश को ध्यान में रखे तो दलित पैंथर के संस्थापक कवि ढसाल की अहमियत में रवीन्द्रनाथ टैगोर सहित अन्य विश्व वन्दित कवियों के मुकाबले और ज्यादा बढ़ जाती है.
दिनांक:2 फरवरी,2014

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Palash Biswas तुलना करके ाप कहना क्या चाहते हैं,दुसाध जी।इस तरह स‌त्तावर्ग की तरह आप भी टैगोर को विश्वकवि बना रहे हैं।नामदेव धसाल का मूल्यांकन हो या न हो ,आप कविगुरु प्रतिमा की नये स‌िरे स‌े स‌्थापना करके फिर ्पने को रामभक्त ही स‌ाबित कर रहे हैं।

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Panini Anand

मोदी ने जिन सूत्रों को अपना विज़न बताया है, उनकी कसौटी पर वे खुद कितने खरे हैं, इसकी पड़ताल यहाँ, 10 सूत्रों के साथ उभरते बिंबों की मदद से.

भाइयों-बहनों, माई इंडिया ऑफ़ आइडिया

kindlemag.in

 नहीं, कतई ग़लती से नहीं लिखा है यह शीर्षक. यही सुनाई दिया था पिछले दिनों…

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Dilip C Mandal

मोदी उसी वजह से नहीं बन पाएंगे, जिस वजह से आडवाणी नहीं बन पाए थे. भारत का विविधता भरा समाज मर्दाना दंभ वाले प्रधानमंत्रियों के अनुकूल नहीं है. पिछले 25-30 साल के प्रधानमंत्रियों के नाम देखिए- मनमोहन सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, इंदर कुमार गुजराल, एच डी देवेगौड़ा, नरसिंह राव, चंद्रशेखर, वी पी सिंह, राजीव गांधी......इस सिलसिले में मोदी मिसफिट हैं. मेल-जोल की परंपरा भारत में पिछले दशकों में मजबूत हुई है. मोदी इस परंपरा की एंटीथिसिस हैं.

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  • Ajit Rai, Musafir D. Baitha, Rpi Ashokkumar Bhatti and 97 others like this.

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  • Gautam Anand जिस दिन दलित मुस्लिम गठजोड़ हो गया उस दिन हिंदुत्व नाम ही चीज की देश से " नमस्ते और राम राम" दोनों एक साथ हो जाएगी ................... ऐसा मिलता जुलता अपने देश के "सर्वॊच संविधान विचारक" कह कर गए हैं

  • 2 hours ago · Like · 1

  • Indrapal Singh Modi p.m. nahi ban sakte sare des ko lekar chalne ki kabiliyat nahi h bolne bale kuchh nahi kar sakte karne bale bolte nahi h kar ke dikhate h

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  • Hamidur Rahman Modi secularism ke antithesis hai isliye unse dar nahi lagta ghin lagta hai

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Ashok Dusadh

आज इंडिया न्यूज पर आआप का नेता चीख -चीख कर कह रहा था -''देश को नेताओं ने धर्म और जाति में बाँट दिया है '' मैंने अपने दिमाग में कई बार इस वाक्य को रिवाइंड किया लेकिन इसका अर्थ और भावार्थ समझने में नाकाम रहा .मेरे मित्र सूचि में कई बुद्धिजीवी है जो बढ़िया चिन्तक है और विचारक है .अब इस वाक्य को राजनीतिक सन्दर्भ में समझना चाहता हूँ की किन नेताओं ने कहा की अमुक जाति मुझे वोट देना -या अमुक जाति मुझे वोट नहीं देना .समाज और देश को सचमुच नेताओं ने बाँट दिया है क्या ? उसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है ?

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  • Nomad's Hermitage, Rbk Bauddh and 11 others like this.

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  • Ashok Dusadh

  • 2 hours ago · Like · 1

  • Rajesh Kumar Ravi धर्म और जाति ने इतिहास की निरंतरता में समाज को बाँटा है, न कि नेताओँ ने. वर्चस्ववादी जाति के नेताओँ ने तो अपने पूर्वजों के इन कुकृत्योँ/ बँटे हुए समाज का सिर्फ फायदा उठाया है...

  • 2 hours ago · Like · 1

  • Rajesh Kumar Ravi वैसे आम आदमी को तो जाति का नाम लेने का कोई अधिकार ही नहीं क्योंकि वह तो लोगों को सिर्फ आम आदमी ही मानकर ही चली है !!

  • 2 hours ago · Like

  • Rbk Bauddh Till Vande Mataram, Bharat Mata ki jai, slogans are raisedv & Hindu& Hindized religions are intact vote will be devided on caste/race basis bcz human being's daily activities are governed by caste &religions.Are u going to marry yr son/daughter /sister...See More

  • about an hour ago · Like

जनज्वार डॉटकॉम

बड़े पापा ये देखो, बम्पर ऑफर. अभी हर खरीदारी पर 40 से 50 फीसदी तक की छूट चल रही है, तो आप भी रिया दीदी के ससुराल वालों को बोलो कि जीजू पर छूट दें, क्योंकि उन्हें भी तो हम पैसे देकर खरीद ही रहे हैं ना. यहा भी छूट है क्या...http://www.janjwar.com/society/1-society/4761-doolhe-par-discount-milega-kya-for-janjwar-by-jagriti-priya

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Aam Aadmi Party

It may not just be the local residents of Khirki Extension - where Somnath Bharti carried out a midnight raid last month - who are affected by the alleged drug and sex trafficking going on in their backyard. On Monday night, three young Ugandan women lodged a police complaint seeking protection from traffickers.


No body can deny that a problem exists. Now we have to find amicable ways top solve the drug and sex trafficking problem.


What is your suggestion? What steps should be taken to control this menace?


Read more: http://ibnlive.in.com/news/khirki-extension-3-ugandan-women-file-complaint-over-sex-trafficking/449799-3.html

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Rajiv Nayan Bahuguna

आज कुछ चीजें साफ़ हो ही जाएँ , तो बेहतर . कुछ लोग मेरे सामने नहीं कह पाते , सौजन्य वश लेकिन खुस फूस करते हैं की मैं हरीश रावत का चमचा हूँ . कृपया तथ्यों का अवलोकन कर लें

१- मैं खुले आम हरीश रावत का समर्थक हूँ , चमचा नहीं

२- हरीश रावत का पक्षधर बौद्धिक कारणों से अधिक उनके टिपिकल पहाड़ी फेस के कारण हूँ

३- हरीश रावत से मेरी मैत्री है , बराबरी का रिश्ता है

४-- चूंकि सम्प्रति हरीश रावत के मुकाबले विजय बहुगुणा या सतपाल रावत ( सो कोल्ड महाराज ) है , इन दोनों के मुकाबले हरीश रावत लाख गुना श्रेष्ट है

५- जिस दिन हरीश रावत का मुकाबला इन्द्रेश मैखुरी या राजिव लोचन साह से होगा , उस दिन मैं हरीश रावत पर सौ लानत भेज कर उन दोनों के साथ दिखूंगा

६-- और अंत में -- जिस राहुल गांधी के विरोध या समर्थन में तुम अपनी नींद हराम किये हो , वह मेरे घर आकर मेरी श्लाघा कर चुका है , लेकिन मैं आज भी उसके नहीं , बल्कि तुम्हारे साथ हूँ , आगे तुम्हारी मर्ज़ी

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amit Carr shared GMO Free USA's photo.

Chilean Farmer Defeats Monsanto in Landmark Legal Victory! José Pizarro Montoya, a 38-year-old ex-GMO farmer from Melipilla (Santiago, Chile), is the first and ...See More

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Amitabh Bachchan

FB 480 - In the beginning there were cats … and more cats .. cute cats and cuddly cats, cats with intent, cats with stomach and valour, and their strengths of position in a world of equality and presence … !

Unlike ·  · Share · 19,9504261,203 · 2 hours ago ·

Satya Narayan

पत्रकारिता के बुर्जुआ संस्‍थानों से जो पत्रकार बनकर निकलते हैं उनकी एक खास प्रवृत्ति होती है कि वो बहसों को उनके संदर्भों से काटकर, उनका कुछ हिस्‍सा पेश करके(किसी एक पक्ष का) कुछ सनसनीखेज पेश करना चाहते हैं। ऐसी ही एक कोशिशAvinash Chanchal महोदय ने की है। 'एक क्रान्तिकारी मज़दूर अखबार कैसा हो' इसको लेकर 'बिगुल' में एक बहस चली थी। इन महोदय ने उस बहस से दो तीन उद्धरण (एक ही पक्ष के) उठाकर कुछ सनसनीखेज करने की कोशिश की है। आप पूरी बहस यहां देख सकते हैं जिसमें सभी पक्षों के पत्र हैं।

http://www.mazdoorbigul.net/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%82

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Palash Biswas

http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%B8/2014/02/01/%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%88-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%95

हम वाकई एक असभ्य समाज हैं, क्रूर हैं

hastakshep.com

दिल्ली नस्लभेदी है और नस्लभेदी दिल्ली की प्रजा है बाकी देश पलाश विश्वास दिल्ली नस्लभेदी है और नस्लभेदी दिल्ली की प्रजा है बाकी देश। इसी नस्लभेद की उपज है जाति व्यवस्था और जातिव्यवस्था से बाहर इस देश की निनानब्वे फीसद जनता को वध्य बना देने का यह निरंकुश राज्यतन्त्र। मामला सिर्फ अरुणाचल का नहीं…

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ऐसा व्यवहार क्यों पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ ?



बीते दिनों दिल्ली के लाजपत नगर में निदो तानिया की निर्मम हत्या ने न सिर्फ प्रदेश के निवासियों को बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। दिल्ली में पूर्वोत्तर के एक छात्र निदो तानिया की हत्या कर दी गयी। उसका गुनाह सिर्फ इतना था कि जब बाल और चेहरे को लेकर उसका मजाक उड़ाया गया, उसके खिलाफ नस्ली टिप्पणी की गयी तो उसने इसका विरोध किया। यह टिप्पणी कुछ दुकानदारों ने की थी। जब दुकानदारों ने निदो और उसके मित्रों पर हमला किया तो पुलिस आयी थी, पर उसने दुकानदारों का ही पक्ष लिया। दुकान का काँच तोड़ने का आरोप लगा कर निदो से हर्जाना भी भरवाया गया। दुकानदारों ने दोबारा हमला किया और निदो की मौत हो गयी।

ऐसी घटनाओं का दूरगामी असर पड़ता है । पूर्वोत्तर का हिस्सा पहले से संवेदनशील रहा है अरुणाचल के बड़े हिस्से पर चीन सीधे दावा करता रहा है न सिर्फ अरुणाचल, बल्कि संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत में गड़बड़ी फैलाने की साजिश लम्बे समय से चलती रही है। ऐसी घटनाओं से पूर्वोत्तर के लोगों को शेष भारत के खिलाफ भड़काने का मौका मिल सकत है। पूर्वोत्तर के छात्रों के साथ यह कोई पहली घटना नहीं है कि किसी छात्र के साथ ऐसा हुआ हो? इससे पहले भी दर्जनों बार पूर्वोत्तर की रहने वाली लड़कियाँ दुष्कर्म का शिकार बनती रही हैं। इस बार छात्र नीडो तानिया की मौत ने पूरी दिल्ली को हिलाकर रख दिया है।

इस बात को समझना होगा कि भारतीय संघ में कई ऐसे राज्य हैं जहाँ के निवासियों की वेश-भूषा, जीवन-शैली, संस्कृति, शारीरिक बनावट अलग-अलग है। पूर्वोत्तर, भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहाँ के लोगों के भी वही अधिकार हैं जो भारत के अन्य नागरिकों के हैं। किसी के बाल, चेहरे को लेकर की गयी टिप्पणी ही गलत है। देश का कोई भी नागरिक किसी राज्य में जा सकता है, पढ़ सकता है, यह तो उसका हक है। सात बहनों के नाम से महशूर पूर्वोत्तर से हर साल दिल्ली में करीब 75 हजार युवक-युवतियाँ पढ़ाई के लिये आते हैं जो दिल्ली विश्वविद्यालय, अम्बेदकर विश्वविद्यालय, आई.पी. विश्वविद्यालय आदि जगह में दाखिला लेते हैं, पर चेहरे के अलगाव और रहन-सहन में विविधता होने के कारण इन छात्रों को आशियाने के लिये भारी मशक्त करनी पड़ती है। अगर कोई नस्ली टिप्पणी कर उसे उकसाता है, तो एक तरीके से वह देश को तोड़ने में लगी ताकतों की परोक्ष मदद करता है। यह बात सही है कि ऐसी टिप्पणी करने वालों की संख्या गिनी-चुनी है, लेकिन ऐसी ही टिप्पणी से माहौल खराब होता है। भेदभाव और नफरत की शुरुआत दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने की देश का बड़ा तबका महसूस करता है कि पूर्वोत्तर के लोगों को कभी ऐसे न लगने दिया जाये कि उनके साथ दूसरा व्यवहार होता है। दिल्ली पुलिस अगर लापरवाही न बरतती होती तो अपने बालों के रंग पर मजाक का पात्र बने छात्र की मौत न होती। पुलिस के ध्यान न देने पर ही अरुणाचल प्रदेश के एक विधायक के बेटे की दो बार पिटाई हुयी और उसकी बाद में मौत हो गयी।

पूर्वोत्तर के मूल में आदिवासी संस्कृति है, समानता और न्याय का बोध है। वे अन्याय बरदाश्त नहीं कर पाते। इसलिए अगर कोई टिप्पणी करता है तो उसका विरोध करने में वे पीछे नहीं रहते। दिल्ली में भी ऐसा ही हुआ जिसमें निदो की जान गयी। ऐसी घटनाओं से पूर्वोत्तर में प्रतिक्रिया होने का डर भी बना रहता है। हम लोग अन्याय के खिलाफ खड़ा हो, ताकि पूर्वोत्तर के लोगों को लगे कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है, वे अकेले नहीं हैं। चेहरे के अलगाव और जागरूकता के अभाव से उन्हें दिल्ली वाले विदेशी समझ बैठते हैं तो उनसे ज्यादा किराया वसूलने में भी पीछे नहीं हटते। पूर्वोत्तर को अन्य भारत को जोड़ऩे के लिये जागरूकता ही एकमात्र माध्यम है। यह ठीक है कि पूर्वी सीमान्त के लोग दिखने में हम लोगों से अलग होते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम उनसे ऐसा बर्ताव करें, जैसा विदेशियों के साथ करते हैं। अच्छा तो यह हो कि हम उनके प्रति अतिरिक्त शिष्टता, आत्मीयता और विनम्रता प्रकट करें ताकि वे इस विशाल भारत के साथ एकरसता अनुभव करें।

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आर एल फ्रांसिस, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं।



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