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Friday, January 16, 2015

दिल्ली पुलिस रक्षक या भक्षक

दिल्ली पुलिस रक्षक या भक्षक

सुनील कुमार

'दिल्ली पुलिस सदैव आपके साथ' कहने का दावा करने वाली दिल्ली पुलिस के करनामे तो हम सभी समय समय पर देखते-सुनते आये हैं। दिल्ली पुलिस ने ऐसे समय में बहादुरी पेश कीया है जब अच्छा सुशासन देने के नाम पर केन्द्र सरकार सत्ता में आयी है और दिल्ली पुलिस का कमान सीधा केन्द्र सरकार के हाथ में है। इस बार बेलगाम वर्दी वालों का निशाना बना 9 माह का गोपाल। सरस्वती और गोपाल के जन्म के बाद मां ने नसबंदी करा लिया था। यह सोचकर कि हम दो हमारे दो के साथ परिवार सुखी होगा। हम मेहनत मजदूरी करके दोनों बच्चों को पढ़ा-लिखा कर एक अच्छा इंसान बनायेंगे।

गोपाल के पिता संतोष व मां अनिता बिहार के सहरसा व दरभंगा जिला के रहने वाले हैं। दोनों पढ़े-लिखे नहीं है और बचपन से मजदूरी करते रहे हैं। संतोष 6-7 साल की उम्र से ही बंगाल व उसके बाद हरियाणा में जा कर काम करने लगे थे। शादी होने के बाद वो पत्नी के साथ दिल्ली रहने लगे। शादी के बाद दो बच्चे हुए संतोष चाहते थे कि बेटा-बेटी पढ़े। वह अपनी तरह का जीवन अपने बच्चों को नहीं देना चाहते थे। वे मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते रहे। अनिता की मां जानकी देवी बताती हैं कि उनका परिवार 50 साल से दिल्ली में रह रहा है। पहले उनकी झूग्गी तोड़ी गयी और अब रोजगार करने नहीं दिया जा रहा है। वह पूछती है की ''रोजगार करना पाप है कि उनके नाती (बेटी का लड़का) की जान पुलिस वालों ने ले ली?''

सराये काले खां से अक्षयधाम मंदिर के तरफ नेशनल हाइवे 24 पर जाते समय यमुना को पार करते ही रेनी वेल नं. 3 है। हाईवे 24 के दोनों किनारों पर फूल और सब्जी की खेती की जाती है। आफिस से घर जाते समय लोग यहां से ताजी सब्जियां लेकर घर जाते हैं और स्वादिष्ट भोजन बना-खा कर अपनी थकान दूर करते हैं। उन लोगों का क्या जो यह सब्जियां उगाते हैं? वो वहीं यमुना के किनारे आने वाले बाढ़-कीचड़, बड़े-बड़े मच्छरों के बिच अपनी दो-तीन पुश्त बिता चुके हैं। ये लोग जमीन लिज पर लेकर खेती करते हैं। कभी नुकसान, कभी फायादा झेलते हुए पुश्त दर पुश्त इसी में लगे हुए हैं। यहां इतने बड़े-बड़े मच्छर लगते हैं कि जानवरों को भी बड़ी-बड़ी मच्छरदानी में रखा जाता है। बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है इसलिए ज्यादा बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं। लक्ष्मी के मां-पिता बिहार के सहरसा जिले के हैं। लक्ष्मी का जन्म दिल्ली का है, वह 16 साल की हो चुकी है। लेकिन वह कभी स्कूल पढ़ने के लिए नहीं जा पाई, परिवार के साथ खेती में हाथ बंटाती रही। वह अनुभव के आधार पर किसी तरह से हिसाब जोड़ लेती है। लक्ष्मी अब भी पढ़ना चाहती है। उसकी इच्छा है कि कोई आये और उसको पढ़ाये। वह कहती है कि यहां काफी बच्चे इकट्ठे हो जायेंगे पढ़ने के लिए। जब उसका जन्म हुआ तब अपनी झुग्गी हुआ करती थी। लेकिन अब वह उन्हीं खेतों में रहती है जिन पर उनके परिवार लिज पर लेकर खेती करते हैं। लक्ष्मी का जिस स्थान पर जन्म हुआ था वहां आज झुग्गी की जगह भव्य मंदिर (अक्षय धाम) का निर्माण हो चुका है। वहां पर करोड़ों रू. चढ़ाये जाते हैं। उसके परिवार वालों के हाथ में एक कागज का टुकड़ा थमा दिया गया कि प्लाट मिलेगा और सपना दिखाया गया कि तुम्हारे भी अच्छे दिन आयेंगे जिसमें अच्छे मकान होगें। लेकिन आज तक अच्छे दिन नहीं आये। जानकी देवी कागज के टुकड़े को सम्भाल कर रखी हुई हैं। उनका परिवार अपनी झुग्गी की जगह लिज के जमीन पर रहने लगा और इसी जमीन से अपनी जन्म भूमि को देखते हैं जहां पर एक भव्य ईमारत खड़ी है। उसमें उन भगवानों को रखा दिया गया है जिनका जन्म पता नहीं कहां हुआ था।

यमुना खादर रेनी वेल नं. 3 पर चार मछली, एक मुर्गा व दो सब्जी की दुकानें हुआ करती थीं जिसके लिए 2000 रू. प्रति माह, प्रति दुकान मण्डावली थाने की पुलिस ले जाया करती थी। अच्छी सरकर के आने के बाद अगस्त से उनके दुकान को बंद करा दिया गया, लेकिन पेट की आग और अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ये लोग चोरी-छिपे दुकान लगा लिया करते थे। यही कारण था कि पुलिस वाले इनसे मुफ्त में सब्जियां और मछलियां खाया करते थे और पैसे का डिमांड भी करते थे। 28 दिसम्बर, 2014 को दिल्ली सर्दी में ठिठुर रही थी। उस दिन दिल्ली पुलिस के चार बहादुर (अशोक, प्रकाश, प्रदीप और एक अज्ञात) सिपाही कार (एच आर 35 एफ 6703) से आये और रेनी वेल नं 3 के कमरे में शराब (प्रदीप सुबह 9 बजे से पी रहा था) पिये। शराब पिते पिते इनको मुफ्त का मछली खाने का दिल कर बैठा और संतोष से इन्होंने मछली फ्राई करने को कहा। संतोष के मना करने पर वे आग बबूला हो गये और प्रदीप ने इनको धमकी दी कि तुमको मजा चखायेंगे। ये शराब पीने के बाद तीन बजे निकले और संतोष के बेटे गोपाल (9 माह) पर कार चढ़ा दी। लोगों के चिल्लाने पर कार को बैक कर के चढ़ाया गया जिससे गोपाल की मौत हो गई और बचाने के क्रम में एक बुर्जुग महिला डोमनी देवी घायल हो गई। इसके बाद लोगों ने शोर मचाया और भागते हुए सिपाही अशोक को पकड़ लिया। इंसाफ के लिये वे नेशनल हाईवे 24 को जाम कर दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई करने की मांग करने लगे। इंसाफ की मांग कर रहे लोगों पर पुलिस ने लाठियां बरसाई इसके बाद अशोक को ले गयी।

मण्डावली पुलिस थाने में एक पुलिस (अशोक) वाले पर मनमाने तरीके से एफआईआर दर्ज की गई जिसमें आईपीसी की धारा 302 दर्ज नहीं लगाई गई। बाकी पुलिस वालों को साफ-साफ बचा लिया गया। जबकि मुख्य गुनाहगार प्रदीप ने कुछ दिन पहले ही श्ीाला की सब्जी की दुकान पर इसी जगह पर गाड़ी चढ़ा दी थी जिसमें शीला किसी तरह बच गई लेकिन उनकी चीजें तहस-नहस हो गईं।

मीडिया में खबर आ जाने के कारण एफआईआर दर्ज तो हुआ लेकिन वह सही आईपीसी धारा के अन्तर्गत नहीं हुआ, और दूसरे पुलिसकर्मियों को बचा लिया गया। इस पर दिल्ली के सभी सामाजिक-नागरिक-मानवाधिकार संगठन चुप्पी साधे रहे। न्याय की मांग में गोपाल के मां-बाप, नानी इस अधिकारी से उस अधिकारी के पास दौड़ रहे हैं। पेशावार घटना पर मोमबत्ती जलाने वाले क्रांतिकारी-सामाजिक संगठनों को अपनी शहर की घटना दिखाई नहीं दी। पेशावार में तो दहशतगर्द थे लेकिन यहां तो लोगों की 'सुरक्षा' देनी वाली दिल्ली पुलिस के जवान हैं। तो क्या यह घटना अत्यधिक चिंतनीय नहीं है जहां 'रक्षक' ही भक्षक बन गया? क्या इसी तरह का सुशासन आने वाला है? 28-30 नवम्बर को मोदी ने राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों व अर्द्धसैनिक बलों के मुखिया के वार्षिक सम्मेलन में पुलिस को स्मार्ट बनाने की बात कही। इस पुलिस को आधुनिकीकरण से लेकर सेंसिटिव व एकाउंटेब्लिटि की बात कही गई है। क्या यही सेंसिटिव व एकाउंटेब्लिटि है कि एक बच्चे को कुचल दिया जाये और बाकी पुलिस बल उसको बचाने में लग जाये? इसके बावजूद पुलिस को स्मार्ट बनाने वाले 'प्रधान सेवक' और उनका मंत्रीमंडल गूंगा, बहरा बना हुआ है। इन गरीब मां-बाप को संत्वाना देने के लिए कोई भी सांसद, विधायक या नेतागण नहीं पहंुचे!

 

'पीके': पाखंड खंडन

सुनील कुमार

'आजादी के ठीक 50 साल पहले स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि भारत के लोग 50 साल के लिए अपने देवी देवताओं को भूल जाएं।' - नरेन्द्र मोदी, सिडनी (आस्ट्रेलिया)

दुनिया भर में विचारों, संवेदनाओं को प्रकट करने व विरोधियों को जवाब देने के लिए लेखन, नाटक, गाने इत्यादि कलाओं का इस्तेमाल किया जाता है। पीके फिल्म द्वारा विभिन्न धर्मों के पाखंडियों को जबाब देने की कोशिश की गई है। एक ही भगवान का संतान बताने वाले सभी धार्मिक संगठन अलग-अलग धर्म के ठेकेदार बने बैठे हैं। अपने आप को हिन्दू धर्म के ठेकेदार और राष्ट्र भक्त कहने वाले विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे उन्मादी संगठन पीके के विरोध में तोड़-फोड़ कर रहे हैं। इनकी 'रष्ट्र भक्ती' वैसी ही है जैसे फिल्म में ब्लैक टिकट बेचने वाले बन्देमातरम तो बोलता है लेकिन अपने ही देश की लड़की को कुछ पैसे कम होने पर टिकट नहीं देता है। इनकी देश भक्ति में मुनाफे का पूरा ख्याल रखा जाता है। नरेन्द्र मोदी आस्ट्रेलिया में बोल तो सकते हैं कि देवी-देवताओं को भूल जाओ लेकिन जब उनके बिरादराना संगठन भारत में धर्म के ठेकेदार बनकर तोड़-फोड़ करते हैं तो चुप रहते हैं।

फिल्म में टिकट नहीं मिलने के बाद लड़की (जगत जननी साहनी) अकेलापन महसूस करती है जिसका साथ पाकिस्तानी लड़का सरफराज देता है। इसे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन लव जेहाद कहते हैं। तपस्वी जिस तरह से साहनी के परिवार पर अपना प्रभाव जमा रखा है उसी तरह आसाराम बापू ने पीड़ित लड़की के परिवार वालों पर जमा रखा था। तपस्वी इन्टरनेट आरती, आनलाईन प्रश्न, कोरियर से प्रसाद भेजना  इत्यादि करते हैं; उसी तरह आज हमें टीवी चैनलों पर सत्संग, जागरण व सुबह-सुबह समाचार चैनलों पर भी ज्योतिषी बैठे मिल जाते हैं। यहां तक कि कई चैनलों पर बाबा अपनी अंगूठी और ताजिब बेचते नजर आते हैं। तपस्वी की स्टोरी दिखाने पर जिस तरह से तपस्वी के चेलों ने न्यूज चैनल के मालिक पर हमला किया; क्या उसी तरह डेरा सच्चा सौदा पर पत्रकार की हत्या कराने का मामला दर्ज नहीं है? या आसाराम बापू के खिलाफ गवाही देने वालों की हत्या नहीं हुई है? तपस्वी जिस तरह से पीके के रिमोट को शंकर के डमरू का टूटा हुआ अवशेष बताता है और झूठ बोलता है कि वह हिमालय पर्वत में तपस्या कर के लाया है; क्या उसी तरह रामपाल रिमोट कंट्रोल से कुर्सी को संचालित कर चमत्कार नहीं करते थे? तपस्वी के रांग नम्बर के पोल खुलने के बाद फोटो, दवाईयां, अगरबत्ती व तेल बिकना बंद हो जाता है। तपस्वी की तरह क्या रामदेव दुकानदारी नहीं करते हैं? क्या इसी डर से रामदेव पीके फिल्म का विरोध कर रहे हैं कि किसी दिन ऐसा उनके साथ भी हो सकता है? पीके के सवाल उठाने पर तपस्वी जिस तरह से उसे एक धर्म विशेष से जोड़कर उसका नामकरण परवेज खान या पासा कमाल कहता है ठीक उसी तरह से दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके मंे मैंने जब जाना शुरू किया तो हमें सम्प्रदायिक ताकतों द्वारा कहा गया कि तुम्हारा नाम अजहर है। साधु सोने की चेन चमत्कारी रूप में निकाल कर दिखा रहा है और एक व्यक्ति उसको रांग नम्बर बता रहा है; उसी तरह से साई बाबा ने सोने की चेन निकालते हुए पकड़े जाने के बाद से अपने कार्यक्रम में विडियो कैमरा, फोटो कैमरा ले जाने पर पाबंदी लगा दी थी।

पुलिस के ड्रेस मिलते ही उसे फ्री में खाना मिलने लगता है। क्या ऐसा नहीं होता है? दिल्ली में 28 दिसम्बर को जब पुलिस वालों को फ्री की फ्राई मछली नहीं मिली तो 9 माह के बच्चे को कार से कुचल दिया। पीके के रिमोट को चुराकर दिल्ली में बेचा जाता है क्योंकि रिमोट की कीमत अत्यधिक है और देश के छोटे शहरों में बेचने से चोर पकड़ में आ जाता। देश को लूटने वाले नीति निर्माता, माफिया, बड़े ठेकेदार, नौकरशाह क्या दिल्ली में नहीं रहते?

पीके गांधी जी का फोटो इकट्ठा करता है लेकिन उसको पता चलता है कि गांधी के फोटो की कीमत एक ही तरह के कागज पर है और सब बेकार है। क्या यह सही नहीं है कि गांधी की विचारधारा पर चलने वाली पार्टियां उनकी विचारधारा को तिलांजली देकर एक ही तरह के कागज बटोरने के लिए दिन-रात तिकड़म बाजी में लगी हुई है? पीके अपनी रिमोट पाने के लिए मंदिर, गुरूद्वारा, चर्च, मस्जिद सभी जगह जाता है लेकिन उसका रिमोट वापस नहीं मिलता है। भगवान को मानने वालों में श्रद्धा कम, डर ज्यादा होती है। जो जितना डरता है उतना चढ़ावा देता है, उतना ही अधिक झुकता है। क्या धर्म द्वारा लोगों को डराया नहीं जाता है? जब भी कोई सवाल उठाता है तो उसका सत्यानाश हो जाने का डर दिखाया जता है।

पीके फिल्म हमें बताता है कि हमें अपना प्राब्लम एक दूसरे के सहयोग से हल करना चाहिए, भगवान के भरोसे नहीं रहना चाहिए। पीके फिल्म में किसी एक धर्म को ही गलत नहीं बताया गया है, इसमें सभी धर्मों की ढोकोसले बाजी की पोल खोली गई है। यह फिल्म कोई नई बात नहीं दिखा रही है, इससे पहले कबीर, गुरू नानक, महर्षी दयानंद ने भी ऐसे पाखंडियों का खंडन किया है। पीके फिल्म द्वारा बताया जाता है कि हम अलग-अलग रंग के कपड़े पहन कर धार्मिक अंधविश्वास में डूब जाते हैं। हम खाकी, काला, सफेद, केसरिया, लाल, पीला रंग के वस्त्र डाले अहंकार में डूबे हैं कि हम सर्वश्रेष्ठ है, हम देश भक्त हैं और अपनी श्रेष्ठता देशभक्ति दिखाने के लिए मानवता का खून बहा रहे हैं। अगर हम खुद को सर्वश्रेष्ठ और देशभक्त बताते रहे तो इंसान नहीं केवल जूता ही बचेगा।

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