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Wednesday, May 8, 2013

घोटाला सिर्फ कोयला ब्लाकों के आबंटन में नहीं है, कोयला के परत परत में है घोटाला!

घोटाला सिर्फ कोयला ब्लाकों के आबंटन में नहीं है, कोयला के परत परत में है घोटाला!


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​


घोटाला सिर्फ कोयला ब्लाकों के आबंटन में नहीं है, कोयला के परत परत में है घोटाला!इस वक्त पूरे देश में कोयला आबंटन में घोटाले पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिहं से लेकर कानून मंत्री के इस्तीफे की मांग दिनोंदिन प्रबल होती जा रही है। सीबीआई कटघरे में हैं। बले के लिए बकरे की खोज जारी है। बलि की रस्म निभ जाने के बाद फिर अमन चैन कायम हो जायेगा। न कोयला उद्योग को राहत मिलने वाली है और कोयलांचल वासियों को परत परत घोटाला, माफिया राज, अपराध, दहशत, अवैध खनन, आग, धुआं, धंसान की रोजमर्रे की नरक से।


निजी मालिकों से खानों को सरकारी क्षेत्र में लेने की राष्ट्रीयकरण की कार्वाई से देशभर में विस्तृत कोयलाचंल एक अनियंत्रित आखेटगाह हैं। जहां कोयला खानों के एजंट और इंजीनियर कभी खानों के अंदर तक नहीं जाते। माइनिंग सरदारों के भरोसे खनन होता है।सर्वेयर की कभी सुनी नहीं जाती। खान सुरक्षा निदेशालय सफेद हाथी है। जो कोयला दुर्घटनाओं को रोकने में हमेशा नाकाम है। भूमि अधिग्रहण कानून, वनाधिकार कानून, पेसा, पांचवी छठीं ​​अनुसूचियां, भूमि अधिग्रहण कानून , पर्यावरण कानून, खनन अधिनियम, खान सुरक्षा कानून की धज्जियां उधेड़कर माफिया राज और उसके सहारे पलते राजनेताओं, सत्तावर्ग के हित में काम होते हैं। कोयला कंपनियों के लूट लूटकर कंगाल बना दिया गया है। अधिकारी और कर्मचारी से लेकर मंत्री संतरी तक मापिया के पे रोल पर हैं। दफ्तर तो मौज मस्ती की जगह है। लगभग चार दशकों से यही सिलसिला जारी है। अब सरार आहिस्ते आहिस्ते किश्त दर किश्त कोल इंडिया को नीलामी पर चढ़ा रही है। सबसे बड़ा घोटाला तो यह है और इसपर कोई बोल नहीं रहा कि नवर्तन कंपनी होने के बावजूद कोल इंडिया  की यह दुर्गति कैसे हो गयी।


अरबों रुपये का कोकिंग कोल जो सिर्फ झरिया कोयलांचल  और ईस्टर्न कोल्पील्ड्स के कुच खदानों में मिलता है, जलकर खाक हो रहा है। भूमिगत​​त आग बुझाने के लिए कंद्र से मंजूर करोड़ों की रकम हर साल बंदरबांट हो जाती है। पूछनेवाला नहीं है कोई माई का लाल। कोयला निकालने के​​ बाद खाली खदानों में रेत बरने के ठेके दिये जाते हैंष भुगतान भी होता है। पर रेत डालने की औपचारिकता निभायी जाती है। पूरा कोयलांचल खासकर झरिया रानीगंज कोयलांचल आग, धुंआं और धंसान का पर्याय बन गया है।


इस्पात कारखाना हो या बिजली परियोजनाएं, उन्हें कोयला आपूर्ति की निरंतरता पर हमारी विकासगाथा निर्भर है। इन कंपनियों की हमेशा शिकायत होती है कि उन्हें घटिया कोयला दिया जाता है। दरअसल खदानों और डंपिंग यार्ट, वासरी से ही बेहतर कोयला तस्करों के हवाले हो जाता है। डिस्को पोपर के जरिये कानून के रखवालों की मिलीबगत से देश के कोने कोने में बिकता है। पर इस्पात कारखानों और बिजली परियोजनाओं को प्तऱ मिला घटिया कोयला मिलता है। इस कारोबार में मापिया गैंगवार से रोज लहूलुहान होता है कोयलांचल।मारे जाते हैं आम लोग। पूरे तचार दशक से यह कारोबार पीढ़ियां बदल जाने के बावजूद चल रहा है। राजनेताओं को सारी मलाई इसी कारोबार से मिलती है।​

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अवैध कोयला खदानों पर कब्जा है मापिया गिरोहों का। जहां नाममात्र मजदूरी पर लाखों लोग रोजाने आये दिन होती रहती दुर्घटनाओं में मरते खपते रहते हैं। न पोस्टमार्टम होता है और न ही अंतिम संस्कार। सारा मामला स्थानीय स्तर पर रफा दफा कर दिया जाता है। इन अवैध खदानों में प्रचुर मात्रा में कोयला की मौजूदगी के बावजूद उन्हे असुरक्षित घोषित करके कोयला माफिया के हवाले करने की परंपरा बिना रोक टोक चल रही हैं।यह कारबार भी राजनीतिक संरक्षण से चलता है।

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​कोयलाब्लाकों के आबंटन का मामला ही विवादास्पद नहीं है, कोल इंडिया को निजी कंपनियों को कोयला आपूर्ति उनकी शर्तो केमुताबिक करने को मजबूर कर दिया जाता है।जंगी मजदूर आंदोलन और केंद्रीय वेतनमान के दबाव में खस्ताहाल कोल इंडिया की रुलाई किसी को सुनायी ही नहीं पड़ती।​

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​आज हालत यह है कि  सरकार कोल इंडिया में 10 फीसदी हिस्सेदारी बेचकर करीब 20,000 करोड़ जुटाने की तैयारी में है। उसने फाइनेंशियल ईयर 2014 में डिसइनवेस्टमेंट से 40,000 करोड़ रुपए जुटाने का टारगेट रखा है। कोल इंडिया में हिस्सेदारी सितंबर 2013 तक बेची जा सकती है।कोल इंडिया में हिस्सेदारी बेचने के लिए मर्चेंट बैंकरों और लीगल एडवाइजर्स की नियुक्ति के लिए अंतर-मंत्रिस्तरीय ग्रुप के सचिवों की बैठक बुधवार को होगी। मामले से जुड़े एक शख्स ने बताया, 'सरकार इस महीने के अंत तक इन्हें अप्वाइंट कर देगी और डिसइनवेस्टमेंट प्रोसेस सितंबर तक पूरा कर लिया जाएगा।'


हालांकि कोल रेगुलेटर के मुद्दे पर कोल इंडिया को एक बड़ी राहत मिली है। जिसके बाद अब कोयले की कीमत तय करने का अधिकार कोल इंडिया के पास ही रहेगा। यदि कीमत को लेकर कोई मतभेद हुआ तभी कोल रेगुलेटर उसमें दखल देगा।मंगलवार इस मुद्दे पर हुई एंपावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक में ये फैसला लिया गया है। इसके अलावा कोल रेगुलेटर से जुड़े दूसरे मुद्दे पर भी विवाद सुलझा लिए गए हैं।हालांकि इस बारे में अंतिम प्रस्ताव कानून मंत्रालय की तरफ से तैयार होने के बाद अगले हफ्ते दोबारा ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की बैठक होगी। जिसमें कोल रेगुलेटर के प्रस्ताव को मंजूरी दी जाएगी। इसके बाद ये प्रस्ताव अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट के पास भेजा जाएगा।


कोल इंडिया का पेडअप कैपिटल 6,316.36 करोड़ रुपए है। सरकार 63.16 करोड़ शेयरों को बेचने की तैयारी में है, जो कंपनी के कैपिटल बेस का 10 फीसदी है। अगर कोल इंडिया इस प्रक्रिया की शुरुआत करती है, तो सरकार शेयरों के बायबैक के जरिए इसमें छोटा सा हिस्सा बेच सकती है। मौजूदा बायबैक रूल्स के मुताबिक, कंपनी स्टैंडअलोन आधार पर नेटवर्थ का 25 फीसदी शेयर बायबैक कर सकती है। कोल इंडिया की स्टैंडअलोन नेटवर्थ 19,000 करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा है। सब्सिडियरी कंपनियों की नेटवर्थ एडजस्ट करने के बाद कोल इंडिया की नेटवर्थ 40,453 करोड़ रुपए है। हालांकि, मौजूदा नॉर्म्स के तहत कंसॉलिडेटेड नेटवर्थ को बायबैक से लिंक करने की इजाजत नहीं है।



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