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Wednesday, April 10, 2013

क्या वाकई ये जमीनें सिडकुल के लिये ही खोजी जा रही हैं ?

क्या वाकई ये जमीनें सिडकुल के लिये ही खोजी जा रही हैं ?


ऐसा मुख्यमन्त्री जो अपने निर्वाचन क्षेत्र को नहीं जानता

चन्द्रशेखर करगैती


अँधा पीसे कुत्ता खाय……जनता बेचारी मरत जाय ! मित्रों यह कहावत आप लोगों ने बहुत सुनी होगी, उत्तराखण्ड राज्य निर्माणके पश्चात कांग्रेस की पहली चुनी हुयी सरकार द्वारा राज्य के औद्योगिक विकास तथा स्थानीय युवाओं को रोजगार उपलब्ध करवाने हेतु राज्य में स्थापित छह सिडकुल पर भी पूरी तरह से लागू होती हैl

आज अगर सिडकुल के हालात पर नजर डाली जाये तो स्थिति बड़ी ही विचित्र लगती है, राज्य के मुख्यमन्त्री अपनी कार्यशैली तथा अपनेकॉर्पोरेट प्रेम के कारण विपक्ष के निशाने पर बार-बार आते रहें हैं, हद तो तब हो जाती है जब वे राज्य के सिडकुल की बेशकीमती एकड़ों जमीन को कॉर्पोरेट को लगभग दान में ही दे देते हैं। उसके पीछे उनका तर्क भले ही कुछ हो लेकिन इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस सारे खेल के पीछे राज्य अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास विभाग के अधिकारियों का कोई बड़ा खेल जरूर चल रहा हैl

राज्य के विभिन्न सिडकुल में औद्योगिक इकाईयों को वहाँ प्लॉट इस प्रतिबन्ध के साथ आवंटित किये गये थे कि वे आवंटन होने की तिथि से दो वर्ष के भीतर निर्माण कार्य पूरा कर उत्पादन शुरू कर देंगे तथा अपने संस्थान में 70% प्रतिशत रोजगार स्थानीय युवाओं को ही देंगे। पहली शर्त को काफी इकाईयों ने पूरा कर उत्पादन शुरू कर दिया लेकिन दूसरी शर्त का पालन आज 10 वर्ष बीत जाने पर भी नहीं किया गया। राज्य के सिडकुल में आधिकतर कामगार ठेके पर रखे गये हैं और उनमें से भी अधिकतर दिहाड़ी मजदूर पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के हैं। सिडकुल में व्याप्त इस ठेका प्रथा को रोकने के लिये ना राजनेताओं ने कोई राजनैतिक इच्छा शक्ति जतायी और ना प्रशासनिक अधिकारियों ने 70% प्रतिशत रोजगार स्थानीय युवाओं को रोजगार दियेए जाने के प्रतिबन्ध को कड़ाई से लागू किये जाने की ही कोई पहल की। इस कार्य के लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने अगर किसी बात का ध्यान रखा तो वह, यह कि सिडकुल से कैसे अधिक से अधिक माल बनाया जाये, और यही कारण है कि सरकार कोई भी हो लेकिन आईएएस राकेश शर्मा एक लम्बे समय तक राज्य के इस मह्त्वपूर्ण विभाग पर कुण्डली जमाये बैठे रहते हैंl

चन्द्रशेखर करगैती, लेखक आरटीआई कार्यकर्ता और अधिवक्ता हैं

औद्योगिक विकास विभाग के प्रमुख सचिव राकेश शर्मा की योग्यता का अँदाजा इसी बात से लग जाता है कि जब हम इस बात पर नजर डालते हैं कि सितारगंज सिडकुल में औद्योगिक इकाईयों को उद्योग लगाने हेतु 320 प्लॉट आवंटित किये गये, प्लॉट आवंटन होने के दस वर्ष बीत जाने के बाद आजतक 198 प्लॉट्स पर कोई निर्माण कार्य नहीं हुआ और 212 प्लॉट पर उत्पादन जैसा कुछ नहीं हो रहा है। यह स्थिति तब और ज्यादा शर्मनाक है जब सितारगंज स्वयं राज्य के मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा का विधानसभा क्षेत्र है, और वे अपने ही विधानसभा क्षेत्र में स्थित फेस-एक के सिडकुल की जमीनी हकीकत से अनभिज्ञ हैं। और तो और तुरत फुरत बिना अध्ययन किये राकेश शर्मा को हेलिकॉप्टर से भेजकर सितारगंज में सिडकुल फेज-टू के लिए अतिरिक्त जमीन खोजने के अभियान पर लगा देते हैं। क्या वाकई ये जमीनें सिडकुल के लिये ही खोजी जा रही हैं ?

इससे शर्मनाक कोई और बात हो ही नहीं सकती जिस विधायक को अपने विधनसभा क्षेत्र की ठीक-ठीक जानकारी ना हो उसे मुख्यमन्त्री जैसे जिम्मेदार पद पर किस मजबूरी के चलते ढोया जाता है, अगर मुख्यमन्त्री को इस बात के लिए अँधेरे में रखा जाता है तो दोषी विभाग के प्रमुख सचिव को किस वजह से ढोया जाता है। राज्य के संसाधनों से इस प्रकार का खिलवाड़ करने वाले व्यक्ति को क्या जेल की सलाखों के पीछे नहीं होना चाहिये ? कोमोबेश यही स्थित केन्द्रीय मन्त्री हरीश रावत के लोकसभा क्षेत्र में स्थित सिडकुल की भी है, जहाँ के कुल 686 प्लॉट्स में से 106 में उत्पादन जैसी कोई गतिविधि नहीं हो रही है। यही हाल पन्तनगर का भी है जहाँ कुल 511 प्लॉट्स में से 38 प्लॉट्स में उत्पादन जैसा कुछ नहीं हैl

पिछले पाँच से आठ सालों के बीच आवंटित किये गये इन औद्योगिक प्लॉट्स पर आवंटियों द्वारा कोई निर्माण कार्य नहीं किया जाता और मुख्यमन्त्री सिडकुल फेस-टू शुरू करने को बड़े उतावले दिखायी देते हैं ! सिडकुल फेस-एक में जिन पुराने आवंटियों ने अभी तक अपना उत्पादन शुरू नहीं किया है उनके प्लॉट आवंटन को रद्दकर नए लोगो को आवंटित न किया जाना अपने आप में औद्योगिक विकास विभाग के प्रमुख सचिव की कार्य शैली पर बहुत से सवालात खड़े करता है ? जिसका जवाब देर सबेर स्वयं मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा को ही देना हैं, अगर इन सबके लिये प्रमुख सचिव राकेश शर्मा जिम्मेदार नहीं है तो कौन है ? अगर इन सबके लिए प्रमुख सचिव राकेश शर्मा जिम्मेदार हैं तो अब तक वे राज्य की रीढ़ कहे जाने वाले इस महत्वपूर्ण विभाग में कैसे जमे बैठे हैं ? उन्हें किस प्रतिफल के एवज में अब तक वे सब कार्य करने की छूट दी गयी है जिसे करने में वे राज्य के उच्च न्यायालय के आदेशों की परवाह भी नहीं करते, राज्य का विधि विभाग तो कोई हैसियत रखता ही नहीं ? प्रश्न यह भी अगर इनके लिये प्रमुख सचिव राकेश शर्मा जिम्मेदार नहीं हैं तो फिर कौन है? यह प्रश्न आने वाले समय में विजय बहुगुणा के गले की हड्डी भी बन सकता है !

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