Follow palashbiswaskl on Twitter

ArundhatiRay speaks

PalahBiswas On Unique Identity No1.mpg

Unique Identity No2

Please send the LINK to your Addresslist and send me every update, event, development,documents and FEEDBACK . just mail to palashbiswaskl@gmail.com

Website templates

Jyoti basu is dead

Dr.B.R.Ambedkar

Thursday, February 16, 2012

दिवालियेपन के अंदेशे से जूझता यूनान

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-09-22

दिवालियेपन के अंदेशे से जूझता यूनान

  • PDF

यूरोपीय संघ, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बदनाम तिकड़ी द्वारा बेलआउट पैकेज के माध्यम से यूनान पर जो शर्तें थोपी जा रही हैं. यूनान को पूरी तरह तबाह कर देने तथा वेतन और कार्यस्थल के सहूलियतों को 1960 के दशक तक वापस ले जाने की भयानक कोशिश है...

रेड ट्यूलिप्स.यूनान फिर उबाल पर है. यूनानी संसद नें यूरोपीय संघ, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की खूंखार तिकड़ी द्वारा दिए जाने वाले 170 अरब अमेरिकी डॉलर (यानी 130 अरब यूरो) के बेलआउट कोष के बदले 15,000 सरकारी नौकरियों में कटौती करने और न्यूनतम मजदूरी को 22 प्रतिशत घटाने की संस्तुति कर दी है.

यूनान के वित्त मन्त्री एवांगेलोस वेनिज़ेलोस ने फ़रमाया है कि "हमें यह जरूर दिखाना चाहिए कि यूनानियों से जब ख़राब और निकृष्टतम के बीच चुनाव करने को कहा गया तो उन्होंने निकृष्टतम से बचने के लिए ख़राब का चुनाव किया." और निकृष्ट का चुनाव कर लिया गया है भले ही छह मन्त्रियों ने इस्तीफ़ा दे दिया हो.

greece-agitation

इसकी प्रतिक्रिया में एथेन्स में जो कुछ हुआ या हो रहा है उसकी जानकारी अधिकतर लोगों को मिल चुकी होगी. रविवार को एथेन्स के सडकों पर 80,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों ने मार्च किया, जिनमें मजदूर-कर्मचारी और छात्र-युवा सभी शामिल थे और उन्होंने पुलिस के घोर दमनकारी रवैये का बहादुरी के साथ मुकाबला किया.

पुलिस के उकसावे के बीच भीड़ के एक हिस्से ने दुकानों को लूटा और जम कर तबाही मचायी. 34 इमारतों को आग के हवाले किया गया जिसमें एक अमेरिकी काफी कम्पनी स्टारबक्स का भवन और एक ऐसा भूमिगत छवि गृह शामिल था जिसे कभी गेस्टापो ने अपने यातना गृह के तौर पर इस्तेमाल किया था. एक वृद्ध महिला का कहना था, " यह चालीस के दशक से भी बुरा है...इस समय तो सरकार ही जर्मनों का आदेश मान रही है."

ऐसा लगता है कि यूनान नव उदारवादी सामाजिक इंजीनियरिंग की एक चरम प्रयोगशाला में तब्दील हो गया है. यूरोपीय संघ, यूरोपीय केंद्रीय बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की बदनाम तिकड़ी द्वारा बेलआउट पैकेज के माध्यम से यूनान पर जो शर्तें थोपी जा रही हैं, वे सामूहिक सामाजिक अधिकारों में से वहाँ जो कुछ भी थोडा बहुत बच रहा है उन्हें पूरी तरह तबाह कर देने तथा वेतन और कार्यस्थल के सहूलियतों को 1960 के दशक तक वापस ले जाने की भयानक कोशिश है. यह एक ऐसी कोशिश है जिसे पूरे यूरोप के पैमाने पर लागू किये जाने के पहले यूनान में अजमाया जा रहा है.

यूनानी संसद द्वारा 11 फरवरी की देर शाम को इस मितव्ययिता कार्यक्रम को पारित किये जाने के बावजूद कल होने वाले यूरो ज़ोन के वित्त मन्त्रियों की बैठक में यूनान से और कटौतियाँ करने की मांग की जाएगी. इसके अलावा बेलआउट के करार पर हस्ताक्षर किये जाने से पूर्व यूनान के राजनितिक नेताओं से करार की शर्तों को लागू किये जाने के गारण्टी देने की भी मांग की जाएगी.

इसके बावजूद न तो इस बात के कोई गारण्टी ही है कि बेलआउट की यह धनराशि वाकई यूनान को हासिल होगी (क्योकि इसे एक निलम्ब खाते यानी एस्क्रो अकाउंट में डाले जाने की चर्चा है) और न तो इस बात की ही कोई उम्मीद है कि वह पहले से लदे कर्ज के बोझ को चुका कर मौजूदा संकट से निकल पायेगा.

स्थिति ऐसी बन गयी है कि कटौती और मितव्ययिता की एक खेप पर सहमति बनने के साथ ही, उसके अमल में आने के पहले ही तिकड़ी के अधिकारी कटौती के नए माँग पत्र्रक के साथ तैयार रहते हैं. ऐसा लगता है चार वर्षों की मन्दी और तीन वर्षों की मितव्ययिता की मार ने यूनान को एक सामाजिक क्रान्ति के मुहाने पर ला दिया है. यूरोपीय अधिकारीगण भी उसे लगातार उसी दिशा में धकेल रहे हैं.

हमें नहीं भूलना चाहिए कि यूनान ही वह देश है जो 1821 में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता अर्जित करने वाला महाद्वीप का पहला देश बना. 1940 में 'नहीं' कहने के माध्यम से इसी ने फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत की. सत्तर के दशक में सैनिक तानाशाही के खिलाफ इसके विद्रोह ने दक्षिण यूरोप और लातिनी अमेरिका में ऐसे ही उत्पीड़न के शिकार देशों की जनता को अनुप्राणित किया. ऐसी स्थिति में यह आश्चर्यजनक नहीं होगा अगर वह फिर से एक नए परिवर्तन का बिगुल फूंके.

युद्धोत्तर पश्चिमी यूरोप की दृष्टि से यूनान की मौजूदा परिस्थिति अभूतपूर्व है. देश की पहले से ख़राब आर्थिक स्थिति बाद से बदतर होती जा रही है. ऐसे में सरकार के लिए मितव्ययिता की एक नई खुराक को जनता के गले उतरना कत्तई आसन नहीं होगा, खास कर तब जब जनता पहले से सडकों पर है और आगामी शनिवार 18 फ़रवरी 2012 को उनके समर्थन में अन्तरराष्ट्रीय लामबन्दी का आह्वान किया जा रहा है. 

No comments: