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Thursday, April 28, 2016

मुक्त बाजार में अब फासीवाद का प्राणपाखी! अब सही मायने में बाजार में राष्ट्र की कोई भूमिका नहीं है और न लोकतंत्र और संविधान की कोई भूमिका बची है।कही कोई राष्ट्र नहीं है और न कोई राष्ट्रनेता हैं।सारे के सारे कारोबारी! सत्ता में वापसी के लिए वे खुद, उनके तमाम मंत्री,सांसद,विधायक और मेयर कटघरे में हैं तो ममता बनर्जी चीख चीख कर कह रही हैं कि बाकी राजनीतिक दलों की आय अघोषित स्रोतों से है और सभी ले रहे हैं तो हमने लिया तो क्या गुनाह कर लिया।यह सच है। पूंजी और खास तौर पर तो देश के सीधे मुक्तबाजार बनने के बाद अबाध है।नागरिकों की कोई स्वतंत्रता हो या न हो, मानवाधिकार सुरक्षित हो या न हो, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो या न हों,समता और न्याय ,सहिष्णुता और बहुलता,भ्रातृत्व और बंधुत्व,धर्मनिरपेक्षता हो न हो,कानून का राज हो न हो,संविधान के प्रावधानों को लागू किया जाये या न किया जाये,लोकतंत्र रहे या भाड़ में जाये, देशी विदेशी पूंजी स्वतंत्र है और उसके लिए तमाम दरवाजे और खिड़कियां खुल्ला रहे ,इसलिए अश्वमेधी वैदिकी हिंसा के जनसंहारी घोड़े और घुड़सवार देश के खेत खलिहान रौंदते हुए अभूतपूर्व विकास कर


मुक्त बाजार में अब फासीवाद का प्राणपाखी!


अब सही मायने में बाजार में राष्ट्र की कोई भूमिका नहीं है और न लोकतंत्र और संविधान की कोई भूमिका बची है।कही कोई राष्ट्र नहीं है और न कोई राष्ट्रनेता हैं।सारे के सारे कारोबारी!

सत्ता में वापसी के लिए वे खुद, उनके तमाम मंत्री,सांसद,विधायक और मेयर कटघरे में हैं तो ममता बनर्जी चीख चीख कर कह रही हैं कि बाकी राजनीतिक दलों की आय अघोषित स्रोतों से है और सभी ले रहे हैं तो हमने लिया तो क्या गुनाह कर लिया।यह सच है।


पूंजी और खास तौर पर तो देश के सीधे मुक्तबाजार बनने के बाद अबाध है।नागरिकों की कोई स्वतंत्रता हो या न हो, मानवाधिकार सुरक्षित हो या न हो, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो या न हों,समता और न्याय ,सहिष्णुता और बहुलता,भ्रातृत्व और बंधुत्व,धर्मनिरपेक्षता हो न हो,कानून का राज हो न हो,संविधान के प्रावधानों को लागू किया जाये या न किया जाये,लोकतंत्र रहे या भाड़ में जाये, देशी विदेशी पूंजी स्वतंत्र है और उसके लिए तमाम दरवाजे और खिड़कियां खुल्ला रहे ,इसलिए अश्वमेधी वैदिकी हिंसा के जनसंहारी घोड़े और घुड़सवार देश के खेत खलिहान रौंदते हुए अभूतपूर्व विकास कर रहे हैं।जिसे हम नरसंहार कहते हैं या किसानों की थोक आत्महत्या समझते हैं या मेहनतकशों का सफाया और एकाधिकारवादी पितृसत्ता भी कह सकते हैं।

मुक्त बाजार के खिलाफ लड़ाई फिर जनता के मोर्चे के बिना असंभव है।कृपया इसे समझें और जनता की गोलबंदी के लिए जो भी कुछ हम कर सकते हैं,तुरंत शुरु करें वरना जो मारे जा रहे हैं,उनके तुंरत बाद हमारी बारी भी मारे जाने की हो ही सकती है।

पलाश विश्वास

अब लगभग तय है कि मुक्तबाजारी साम्राज्यवाद के ग्लोबल लीडर बनने के लिए मुकाबला मैडम हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप के बीच है।नतीजा चाहे कुछ हो,न अमेरिका और न बाकी दुनिया में इंसानियत या कायनात के लिए कोई अच्छी खबर निकलने के आसार हैं।


डोनाल्ड महाशय सिर्फ खाकी हाफ पैंट पहनते हैं  या नहीं,सिर्फ यही पता नहीं है और बाकी वे मुकम्मल बजरंगी हैं।जाहिर है कि उनके अमेरिका का राष्ट्रपति बनने से ग्लोबल हिंदुत्व की ही जय जयकार होगी जैसी जय जयकार फिलहाल हम केसरिया भारत  एक दस दिगंत में सुनने को अभ्यस्त है।


हिलेरी मैडम जीतें और अमेरिका की पहली राष्ट्रपति बनें तो इससे पितृसत्ता की सेहत पर वैसे ही कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है जैसे भारत की राष्ट्रपति मैडम प्रतिभा पाटील के पांच साला कार्यक्रम का भारतीय अनुभव है।


ट्रंप और मैडम हिलेरी,दोनों के अमेरिका के जायनी शक्ति केंद्र से बेहत घनिष्ठ रिश्ते हैं और ट्रंप हार भी जाये तो हिंदुत्व के ग्लोबल एजंडे को अमेरिका का समर्थन जारी रहेगा तबतक ,जबतक न भारत अमेरिकी मुक्तबाजार का उपनिवेश बना रहे।


ट्रंप अमेरिका के बिल्डर टायकून हैं और उनके जैसे धनकूबेर के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने पर यह घटना भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के लिए संभावनाओं के नये दरवाजे खोल सकते हैं।


वैसे भी भारत में आल इंडिया बिजनेस पार्टी बन चुकी है और फिलहाल इसके बारे में कुछ ज्यादा खुलासा हुआ नहीं है।फिर राजकाज का मतलब ही भारतीय मुक्तबाजार में बिजनेस है तो जाहिर है कि राजनीतिक दलों को सालाना भारी भरकम चंदा देकर कमसकम पांच साल के लिए उनके बिजनेस बंधु कारोबार का मोहताज होने के बजाय भारत में भी कोई ट्रंप सीधे सत्ता की कमान संभाल लें।


जैसे धनपशुओं और बाहुबलियों की भूमिका भारतीय राजनीति में आजादी से पहले ही शाश्वत सत्य रहा है और वही रघुकुल रीति चली आ रही है और वर्तमान परिदृश्य में अबाध पूंजी के रंगभेदी राजधर्म में पशुबल और धनबल की भूमिका प्रत्यक्ष स्वदेशी विनियोग है।फिर राजनीति अब पेशा है और चुनावों के हलफनामे में भी इस पेशे की बाबुलंद ऐलान होने लगा है।


पेशेवर राजनीति में पूंजी अपने घर से लगायी जाये,फिलहाल ऐसी रीति चली नहीं है।


पराया माल बटोरकर करोड़पति अरबपति खरबपति बनने में भारतीय राजनीति की दक्षता और कुशलता को हम आम मूढ़मति जनगण भ्रष्टाचार दुराचार वगैरह वगैरह कहा करते हैं।


पूंजी और खास तौर पर तो देश के सीधे मुक्तबाजार बनने के बाद अबाध है।नागरिकों की कोई स्वतंत्रता हो या न हो, मानवाधिकार सुरक्षित हो या न हो, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो या न हों,समता और न्याय ,सहिष्णुता और बहुलता,भ्रातृत्व और बंधुत्व,धर्मनिरपेक्षता हो न हो,कानून का राज हो न हो,संविधान के प्रावधानों को लागू किया जाये या न किया जाये,लोकतंत्र रहे या भाड़ में जाये, देशी विदेशी पूंजी स्वतंत्र है और उसके लिए तमाम दरवाजे और खिड़कियां खुल्ला रहे ,इसलिए अश्वमेधी वैदिकी हिंसा के जनसंहारी घोड़े और घुड़सवार देश के खेत खलिहान रौंदते हुए अभूतपूर्व विकास कर रहे हैं।जिसे हम नरसंहार कहते हैं या किसानों की थोक आत्महत्या समझते हैं या मेहनतकशों का सफाया और एकाधिकारवादी पितृसत्ता भी कह सकते हैं।


सच यह है कि आजादी के बाद से सत्ता जिस वर्ग की पुश्तैनी विरासत है,सियासत उनके लिए बेलगाम मुनाफावसूली है और तमाम किस्म के घोटाले उनके जन्म सिद्ध अधिकार है।पहले अखबार पढ़ने वाले कम थे और अखबार सर्वत्र पहुंचते न थे।इसलिए बहुत हल्ला होने के बावजूद कहीं किसी कोे फर्क नहीं पडा़ और अबाध लूटतंत्र जारी रहा।अब सूचना महाविस्फोट,लाइव हजारों चैनल और सोशल मीडिया के शोर की वजह से औचक लग रहा है कि बहुत अजूबा हो रहा है और यकबयक सारे राजनेता भ्रष्ट हो गये हैं और पहले राजनीति दूध से दुली हुई थी।


आर्थिक सुधार लागू होने से पहले भारत केस्वतंत्र होने के तुरंत बाद रक्षा ब्यय बेलगाम रहा और पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्दों के बाद हथियारों की होड़ देशभक्ति का पर्याय हो गया और शुरु से लेकर अब तक सत्ता वर्ग का कमाने खाने का जरिया यह अंध राष्ट्रवाद है।सरहदों पर बहादुर जवान अपनी कुर्बानी देते रहें और जनता बच्चों की तरह देशभक्ति के गीत गाते रहे और रक्षा सौदों के अबाध कारोबार के जरिये सत्ता पर वर्चस्व कायम रहे।


अब तक किसी रक्षा घोटाले में किसी को सजा होने की कोई नजीर नहीं है।पर्दाफाश और हो हल्ला का सिलसिला बराबर जारी है।

आयात निर्यात,आपदा प्रबंधन,जनकल्याण,निर्माण विनिर्माण से लेकर खेलकूद तक कोई सेक्टर बाकी नहीं बचा है।संपूर्ण निजीकरण और संपूर्ण विनिवेथ के तहत सत्ता वर्ग विकास के नाम पूरा देश नीलमा कर रहा है और हर सौदे में,हर फैसले में कमीशन कितना मिला है, किसी को अता पता नहीं है।


इन दिनों कोलकाता में हंगामा रोज रोज नारदा स्टिंग के तहत आंखों देखी रिश्वतखोरी मामले में मुखयमंत्री ममता बनर्जी के रोजाना बदलते आक्रामक इकबालिया बयान से बरप रहा है।


सत्ता में वापसी के लिए वे खुद, उनके तमाम मंत्री,सांसद,विधायक और मेयर कटघरे में हैं तो ममता बनर्जी चीख चीख कर कह रही हैं कि बाकी राजनीतिक दलों की आय अघोषित स्रोतों से है और सभी ले रहे हैं तो हमने लिया तो क्या गुनाह कर लिया।यह सच है।


थोडा़ सच का सामना करें तो उनकी यह दलील उतनी नाजायज भी नहीं है।हम भारतीय नागरिक जन्मजात राजनीतिक कारोबार और मुनाफावसूली के अभ्यस्त हैं और राजनीतिक फैसले से हमारी तमाम जरुरतों,सेवाओं और रोजमर्रे की जिंदगी प्रभावित होती है तो गादार हो या बेदाग,हमारी सहज प्रवृत्ति सत्ता के साथ नत्थी होकर खाल बचाने की है और यही लोकतंत्र है ,जहां विवेक बहुत काम नहीं करता है और हम अमूमन देखते हैं कि जिसे हम हारा हुआ समझते हैं,जीतता वही है।


दुनियाभर में नफरत उगलते डोनाल्ड ट्रंप के बोल निंदा के विषय रहे हैं और खुद उनकी पार्टी में ही उनका विरोध हो रहा है।फिरभी वे अमेरिका राष्ट्रपति बनने के प्रबल दावेदार हैं वैसे ही देशभर में गुजरात नरसंहार के लिए लगभग अस्पृश्य से समझे जाते रहे किसी नरेंद्र भाई मोदी को हमने पलक पांवड़े पर बिठा दिया है और उनकी मन की बातों से ही तय होता है हमारा भूत भविष्य और वर्तमान।वे हमारे भविष्य का निर्माण कर रहे हैं तो प्रबल जन समर्थन और बहुमत के अटूट समर्थन से वे अतीत और इतिहास भी बदलने लगे हैं।



हम बार बार कहते लिखते रहे हैं कि फासीवाद कोई किसी एक राष्ट्र का मामला नहीं है।मुक्त बाजार में अब फासीवाद का प्राणपाखी है।अब सही मायने में बाजार में राष्ट्र की कोई भूमिका नहीं है और न लोकतंत्र और संविधान की कोई भूमिका बची है।कही कोईराष्ट्र नहीं है और न कोई राष्ट्रनेता हैं।सारे के सारे कारोबारी हैं।


सही मायने में अंध राष्ट्रवाद हवा हवाई है और जमीन पर कोई राष्ट्र या राष्ट्रीयता की गुंजाइश ही नहीं है और सारे राजकाज वैश्विक इशारे सेतय होते हैं और वे ही वैश्विक इशारे ईश्वर के वरदहस्त है। मुक्तबाजार में कोई राष्ट्र नहीं बचा है और ग्लोबल आर्डर की कठपुतलियां है तमाम सरकारें।जिस जनादेश के निर्माण की खुशफहमी में सराकर बनाने या गिराने की कवायदें हम करते रहे हैं,वे सिरे से बेमतलब है क्योंकि सरकारें कहीं और बनती हैं।


हमारी बात समझ में नहीं आ रही है और आप इसे अपनी अपनी राजनीति,वर्गीयहित और जाति धर्म के अवस्थान के हिसाब से बाशौक खारिज कर सकते हैं।


हिंदुस्तान की बात हम करेंगे और हिंदुत्व की बात हम करेंगे तो बहुमत सुनने के लिए कतई तैयार न होगा और हमारे खिलाफ राष्ट्रविरोधी हिंदूविरोधी फतवा लागू हो जायेगा।गनीमत है कि देश के धर्मोन्मादी मुक्ताबाजार बनने से बहुत पहले हमने अपनी पढ़ाई लिखाई 1979 में पूरी कर ली और वे हमें किसी विश्वविद्यालय से निस्कासित नहीं कर सकते।


हो सकें तो अमेरिका में लोकतंत्र के उत्सव पर नजर रखें तो समझ में आ जायेगा कि मुक्तबाजार जनादेश कैसे बनाता है और कैसे सरकारें बनती हैं।


इस निरंकुश ग्लोबल मनुस्मृति अनुशासन को तोड़ने के लिए हम सत्तर के दशक से जनता की सत्ता के खिलाफ मोर्चाबंदी की बात कहते और लिखते रहे हैं और हम जैसे मामूली हैसियत वाले की आवाज कहीं पहुंची नहीं है।


जैसे गांधी ने कहा था कि विकास का यह फर्जीवाड़ा पागल दौड़ है,अब जस कातस हम ऐसा मान नहीं सकते,जैसे हम इस निरंकुश सत्ता को हिटलर शाही भी मान नहीं सकते।यह सीधे तौर पर नागरिकों के वध की वैदिकी हिंसा है और मुक्त बाजार में यह जायज है तो सत्ता वर्ग का जन्मसिद्ध अधिकार भी है।


मुक्त बाजार के खिलाफ लड़ाई फिर जनता के मोर्चे के बिना असंभव है।कृपया इसे समझें और जनता की गोलबंदी के लिए जो भी कुछ हम कर सकते हैं,तुरंत शुरु करें वरना जो मारे जा रहे हैं,उनके तुंरत बाद हमारी बारी भी मारे जाने की हो ही सकती है।

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Wednesday, April 27, 2016

'চোর বললে গায়ে লাগে', অ্যাটাকিং মেজাজে মমতা अमित शाह के हस्तक्षेप से दीदी को राहत और भवानीपुर में कोई मुकाबला है नहीं बाकी बंगाल जीतने के लिए दीदी को मदद, अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने वोट भी कम काटे नहीं हैं।नतीजा फिर भी अधर में है। पार्क सर्कस में एक ही माला में गूंथ दिये गये बुद्धदेव और राहुल गांधी इस समीकरण को आखिरी मौके पर बदल नहीं सकते हालांकि बाकी दो चरणों में सत्तादल को अभी और कड़ी चुनौती मिलना तय है। दावों और चुनौतियों के बारे में रिजल्ट तो 19 मई को ही निकल पायेगा लेकिन मान लें कि अब आर पार की लड़ाई है और सत्तापक्ष या विपक्ष को कोई बहुमत अभी मिला नहीं है।वरना इतनी हिंसा,इतनी दहशत और एक एक इंच के लिए लड़ाई नहीं होती। एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास हस्तक्षेप


'চোর বললে গায়ে লাগে', অ্যাটাকিং মেজাজে মমতা

अमित शाह के हस्तक्षेप से दीदी को राहत  और भवानीपुर में कोई मुकाबला है नहीं

बाकी बंगाल जीतने के लिए दीदी को मदद, अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने वोट भी कम काटे नहीं हैं।नतीजा फिर भी अधर में है।

पार्क सर्कस में एक ही माला में गूंथ दिये गये बुद्धदेव और राहुल गांधी इस समीकरण को आखिरी मौके पर बदल नहीं सकते हालांकि बाकी दो चरणों में सत्तादल को अभी और कड़ी चुनौती मिलना तय है।

दावों और चुनौतियों के बारे में रिजल्ट तो 19 मई को ही निकल पायेगा लेकिन मान लें कि अब  आर पार की लड़ाई है और सत्तापक्ष या विपक्ष को कोई बहुमत अभी मिला नहीं है।वरना इतनी हिंसा,इतनी दहशत और एक एक इंच के लिए लड़ाई नहीं होती।


एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

हस्तक्षेप

बांग्ला टीवी 24 घंटा चैनल की खबरों पर गौर करेंः

জোট আসছে সরকারে, কনফিডেন্ট রাহুল-বুদ্ধ দুজনেই, বঙ্গ রাজনীতিতে গড়ল ইতিহাস

জোট আসছে সরকারে, কনফিডেন্ট রাহুল-বুদ্ধ দুজনেই, বঙ্গ রাজনীতিতে গড়ল ইতিহাস

বাংলার রাজনীতির ইতিহাসে জুড়ে গেল আরও একটা তারিখ। পার্ক সাকার্সে একইমঞ্চে রাহুল গান্ধী-বুদ্ধদেব ভট্টাচার্য। তৃণমূলকে হঠাতে দুদল জোট গড়েছিল আগেই। আজ পূর্ণ হল বৃত্ত। একমঞ্চ থেকে লাল-তেরঙ্গার জোট সরকার গঠনের ডাক দিলেন বুদ্ধ-রাহুল।



भवानीपुर में वैसे भी कांग्रेस वाम गठबंधन का दीदी से कोई मुकाबला नहीं है।इस इलाके में बड़ी संख्या में सिखों और हिंदीभाषियों के वोटर हैं जो कांग्रेस के हक में नहीं हैं।भाजपा की यहां बढ़त रही है और आज डायमंड हार्बर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुनाव रैली से दीदी के पेट में तितलियां उड़ रही हैं,ऐसा नहीं कह सकते ।शाम को अमित शाह के भवानीपुर में नेताजी वंशधर भाजपा प्रत्याशी चंद्र कुमार बोस के हक में चुनाव सभा को संबोधित करने की खबर है।अमित शाह की भवानीपुर में होने वाली इस चुनावी रैली को काफी अहम माना जा रहा है. राष्ट्रीय स्तर के नेता अब तक भवानीपुर में ममता बनर्जी के खिलाफ प्रचार करने से दूर ही रहे हैं.


इसके उलट अमित शाह के हस्तक्षेप से दीदी को राहत मिली है कि वोटों का ध्रूवीकरण भवानी पुर में नहीं होना है और तिकोने मुकाबले में दीदी को हराना नामुमकिन हैं।बाकी बंगाल जीतने के लिए अमित शाह की अगुवाई में भाजपा ने वोटभी कम काटे नहीं हैं।नतीजा फिर भी अधर में है।


बहरहाल धार्मिक ध्रूवीकरण के मकसद से घुसपैठ रोकने का वायदा करके दीदी को अल्पसंख्यकों को वोट बटोरने का मौका दे दिया शाह ने।


अमित शाह ने बुधवार को दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर में चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी विकास के वादे भूल गईं। उनके शासनकाल में राज्य में एक भी नया उद्योग नहीं स्थापित हुआ बल्कि बंद हुए हैं। यहां उद्योग के नाम पर सिर्फ बम बनाने का कारखाना लगा है। यहां चहुंओर बम बनाया जा रहा है। ऐसी स्थिति में उन्होंने बंगाल में परिवर्तन की नई लहर लाने का आह्वान किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि बंगालमें भाजपा की सरकार बनी तो बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ पर रोक लगेगी। एक भी घुसपैठिया बांग्लादेश से पश्चिमबंगाल में नहीं घुस पाएगा।


ভবানীপুরে দাঁড়িয়েই মমতাকে হারানোর ডাক দিলেন অমিত শাহ

By: ABP Ananda Web Desk | Last Updated: Wednesday, 27 April 2016 10:10 PM

ভবানীপুরে দাঁড়িয়েই মমতাকে হারানোর ডাক দিলেন অমিত শাহ

কলকাতা: মমতার গড় ভবানীপুরে দাঁড়িয়েই এবার মমতাকে হারানোর ডাক দিলেন অমিত শাহ। শনিবার দক্ষিণ কলকাতায় ভোট। তার আগে ভোট প্রচারের সভার জন্য তৃণমূলনেত্রীর কেন্দ্র ভবানীপুরকেই বেছে নেন বিজেপির সর্বভারতীয় সভাপতি। উপস্থিত জনতার উদ্দেশ্যে অমিত শাহ বলেন, আপনাদের বলছি, একটা সিট আমাদের দিন। ভবানীপুর দিন। তাতেই পরিবর্তন হয়ে যাবে।

সেখানে দাঁড়িয়েই উড়ালপুল বিপর্যয় থেকে সিন্ডিকেটের মতো ইস্যুতে মমতার সরকারকে আক্রমণ করেন তিনি। বলেন, উড়ালপুল ভেঙে পড়ল, মমতা বলছে সিপিএম শুরু করেছে। ৫ বছরে আপনি কী করলেন। ৭ বার রিভিউ করেছেন। কাজ করেছেন আপনার সিন্ডিকেটের লোকেরা।



उनकी सत्ता में वापसी होगी या नहीं,कहना मुश्किल है लेकिन उनकी मौजूदा मुख्यमंत्री हैसियत और हर मौके पर अपने वोटरों के साथ खड़े होते रहने के रिकार्ड के मुकाबले बहिरागत दीपा दासंमुशी या नेताजी वंशज चंद्र बोस के लिए उन्हें हराना संभव नहीं है।


पार्क सर्कस में एक ही माला में गूंथ दिये गये बुद्धदेव और राहुल गांधी इस समीकरण को आखिरी मौके पर बदल नहीं सकते हालांकि बाकी दो चरणों में सत्तादल को अभी और कड़ी चुनौती मिलना तय है।


गौरतलब है कि राजनीतिक भाईचारे का एक दुर्लभ दृश्य पेश करते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को माकपा के अनुभवी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य के साथ मंच साझा किया। 'बंगाल बचाने' के लिए कांग्रेस-वाम गठबंधन जिंदाबाद के नारों के बीच राहुल गांधी, बुद्धदेब भट्टाचार्य का हाथ पकड़े नजर आए। 'यह इतिहास में दुर्लभ दृश्य है' दोनों दलों के समर्थक गठबंधन के पक्ष में नारे लगा रहे थे, और इस दौरान भट्टाचार्य ने अपने संबोधन में दो बार कहा 'प्रिय राहुल गांधी।'


दीदी ने दावा किया है कि उन्हें अब तक हुए चुनाव में बहुमत मिल गया है तो विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र ने दो सौ सीटें जीत लेने का दावा किया है।पलटकर दीदी ने वाम कांग्रेस गठबंधन को महज बीस सीटें जीत कर दिखाने की चुनौती दी है।दावों और चुनौतियों के बारे में रिजल्ट तो 19 मई को ही निकल पायेगा लेकिन मान लें कि अब  आर पार की लड़ाई है और सत्तापक्ष या विपक्ष को कोई बहुमत अभी मिला नहीं है।वरना इतनी हिंसा,इतनी दहशत और एक एक इंच के लिए लड़ाई नहीं होती।


दीदी को घेरने का कोई बंदोबस्त वाम कांग्रेस गठबंधन नहीं कर पाया है और भवानीपुर में उनके फंसे न होने की वजह से बहुत फर्क पड़ने वाला है।दीदी के खेमे में उनके अलावा सिपाहसालार बहुत हैं लेकिन लड़ाई के मैदान में विपक्ष से लोहा लेने का जिगर किसी और में नहीं है।दीदी को भवानीपुर में घेर लेते तो मैदान में फिर दूसरा कोई नेता सत्तापक्ष का न होता जो इस कुरुक्षेत्र में चक्रव्यूह को तोड़ने का मंत्र जानता हो।दीदी पूरे बंगाल में दौड़ती रही हैं और घटती लोकप्रियता,शारदा से नारदा तक के विवादों की वजह से घटती साख के बावजूद तीखा तेवर बनाये हुए हैं और इससे सत्तापक्ष का मनोबल बहुत बुलंद है।यह परणनीति कारगर भी साबित हो सकती है।


गौरतलब है कि दीदी नारदा स्टिंग को अब झूठ साबित करने में वक्त जाया नहीं कर रही है और रिश्वतखोरी को अनुदान और चंदा साबित करने लगी हैं और फंसे हुए सांसदों,मंत्रियों,विधायकों और मेयरों का बचाव कर रही है और उनके समर्थक इससे बेहद खुश है।जबकि लोकसभा एथिक्स कमेटी और अदालती फैसले आने में अभी देर है।केंद्र सरकार शारदा की तरह नारदा मामले में जांच करवाने के लिए कोई जल्दबाजी नहीं कर रही है तो संसद में तृणमूल संघ परिवार का तरणहार है।


जाहिर है कि समर्थकों का हौसला बुलंद रखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने फिर  फिर चुनाव आयोग और कांग्रेस-वाममोर्चा के चुनावी तालमेल पर तीखा वार किया। उन्होंने बंगाल में गठबंधन राज समाप्त होने का दावा किया और कहा कि कांग्रेस और माकपा, दोनों पार्टियां सूचना पट्ट में परिवर्तन हो जाएंगी। माकपा के राज्य सचिव सूर्यकान्त मिश्रा के जीत संबंधित दावे पर कटाक्ष करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि बंगाल में गठबंधन नहीं टिकेगा। अब वाममोर्चा ही नहीं रहेगा। विधानसभा चुनाव के बाद माकपा और कांग्रेस सूचना पट्ट बन कर रह जाएगी।


हालांकि पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस को हटाने के उद्देश्य से कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य एक मंच पर आये। एक सुर से 'तृणमूल हटाओ, भाजपा हटाओ' का आह्वान करते हुए दावा किया कि पश्चिम बंगाल में अगली सरकार कांग्रेस व वामपंथी पार्टियों की बनेगी। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि सारधा घोटाले में आम लोगों का पैसा लूटा गया। भ्रष्टाचार हुआ है, लेकिन ममता बनर्जी ने एक भी शब्द नहीं कहा। कोई कार्रवाई नहीं की. नरेंद्र मोदी व ममता ने रोजगार का वादा किया था, लेकिन वह वादा नहीं पूरा गया।


पूर्व मुख्यमंत्री और माकपा के वयोवृद्ध नेता बुद्धदेब भट्टाचार्य और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल से ममता बनर्जी सरकार को हटाने और राज्य को बचाने का बुधवार को आह्वान किया। यहां पार्क सर्कस मैदान में एक रैली को संबोधित करते हुए राहुल और बुद्धदेब ने कहा कि बनर्जी सरकार पर जमकर हमला बोला और कहा कि कांग्रेस-वाममोर्चा गठबंधन राज्य में सत्ता में काबिज होगा। भट्टाचार्य ने कहा, "आप इस गठजोड़ का महत्व अच्छी तरह समझ सकते हैं। देश के राजनीतिक इतिहास में यह एक दुर्लभ गठजोड़ है।"


वैसे अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंदेर मोदी के नख्शेकदम पर दीदी के राजकाज को निशाना बांधा और भाजपा वोटरों को यकीन दिलाया कि भाजपा ही एकमात्र विकल्प है तो दीदी के शासनकाल में भ्रष्टाचार का बोलबाला है।लेकिन अमित शाह के इन अतुल्य बोल का दीदी की सेहत पर कोई बुरा असर बी होने नहीं वाला है।


बहरहाल पश्चिम बंगाल में पांचवें चरण के चुनाव से पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस और माकपा-कांग्रेस गठजोड़ पर हमला किया। शाह ने डायमंड हार्बर में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार की योजनाओं के नाम बदल दिये और उन्हें राज्य सरकार की योजनाएं बता रही हैं। जन धन योजना के तहत केंद्र सरकार की दो रुपये प्रति किलोग्राम चावल की योजना को बंगाल सरकार अपनी योजना बता रही है, जबकि केंद्र सरकार ने इस बाबत 27 रुपये प्रति किलो सब्सिडी दे रही है।


दीदी ने एरकमुश्त इन आरोपों का जवाब देते हुए आज भी बेहद आक्रामक तेवर अपनाया है।इसी सिलसिले में 24 घंटे की खबर हैः

'চোর বললে গায়ে লাগে', অ্যাটাকিং মেজাজে মমতা

ওয়েব ডেস্ক: ষষ্ঠদফা ভোটের আগেঅ্যাটাকিং মেজাজে মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।  সরাসরি অভিযোগ তুললেন সিপিএম, কংগ্রেস , বিজেপি আঁতাঁতের। বেহালার সভায় বললেন,অন্যায় করলে  চড় খেতে রাজি তিনি। তবে চোর অপবাদ সহ্য করবেন না।


'চোর বললে গায়ে লাগে'

কখনও সারদা, কখনও নারদ। ভোটপ্রচারে তৃণমূলের বিরুদ্ধে দুর্নীতিকেই হাতিয়ার করছে বিরোধীরা। মহেশতলা আর বেহালার  প্রচারে গিয়ে দুর্নীতি নিয়ে সিপিএম, কংগ্রেস বিজেপিকে পাল্টা বিঁধলেন তৃণমূলনেত্রী।

মমতার পাল্টা তোপ

তৃণমূলে নেত্রীর তোপ, অজানা সূত্রের আয় নিয়ে জবাব দিতে না পেরেই নারদ ইস্যু খুঁচিয়ে তুলছে বিরোধীরা।

অভিযোগ আঁতাঁতের

তৃণমূলে নেত্রীর অভিযোগ তৃণমূলকে রুখতে এক হয়েছে সিপিএম-কংগ্রেস-বিজেপি।

इसी बीच आनंदबाजार की खबरें हैंः


হালিশহরের সেই শিশুটির পাশে দাঁড়ালেন দীনেশ, অস্বস্তি বাড়ল তৃণমূলের

রাজ্যে বিধানসভা ভোটপর্ব চলার মধ্যেই তৃণমূল কংগ্রেসকে কিছুটা অস্বস্তিতে ফেলে দিলেন দলের এক সাংসদ দীনেশ ত্রিবেদী।



আত্মবিশ্বাস হারাচ্ছেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়?

নির্বাচন কমিশনের উদ্দেশে চ্যালেঞ্জের সুরটা বেঁধে দিয়েছিলেন নিজেই। সোমবার তিনিই বেঁধে দিয়েছিলেন। মঙ্গলবার তাকে আরও চড়া করলেন মমতা বন্দ্যোপাধ্যায়।

সম্পাদকের পছন্দ

পুলিশ নিরপেক্ষ হতেই দিদির মুখে ভূতের নাম

বুকে ব্যথা নিয়ে মদন ফের ভর্তি পিজিতে

হাওড়ায় ছাপ্পা নিয়ে রিপোর্ট চায় কমিশন, নেতা নির্বিকার

নতুন মন্ত্রিসভায় একজন উপমুখ্যমন্ত্রী থাকছেন, স্পষ্ট ইঙ্গিত অধীরের


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जुबानी जमा खर्च नहीं,अब मौका है कि हम कारपोरेट मीडिया के मुकाबले जनता का मीडिया बना सकते हैं हस्तक्षेप के साइट पर पेमनी बटन लगा है,कृपया तुरंत उसका इस्तेमाल करते हुए अगर आप हमारे साथ हैं,तो तुरंत अपने सामर्थ्य के मुताबिक न्यूनतम रकम तुरंत भेज दें ताकि हम सभी भारतीय भाषाओं में हस्तक्षेप के विस्तार के कार्यक्रम को अमलेंदु के स्वस्थ होकर डेस्क पर लौटते ही अंजाम तक पहुंचा सकें। हम आभारी है शुभकामनाओं के लिए। समर्थन और सहानुभूति के लिए। "हस्तक्षेप" पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।

जुबानी जमा खर्च नहीं,अब मौका है कि हम कारपोरेट मीडिया के मुकाबले जनता का मीडिया बना सकते हैं

हस्तक्षेप के साइट पर पेमनी बटन लगा है,कृपया तुरंत उसका इस्तेमाल करते हुए अगर आप हमारे साथ हैं,तो तुरंत अपने सामर्थ्य के मुताबिक न्यूनतम रकम तुरंत भेज दें ताकि हम सभी भारतीय भाषाओं में हस्तक्षेप के विस्तार के कार्यक्रम को अमलेंदु के स्वस्थ होकर डेस्क पर लौटते ही अंजाम तक पहुंचा सकें।

हम आभारी है शुभकामनाओं के लिए। समर्थन और सहानुभूति के लिए।

"हस्तक्षेप" पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि से हस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।

पलाश विश्वास

अमलेंदु के सड़क दुर्घटना में जख्मी होने के बाद हमें हस्तक्षेप टीम में शामिल जाने अनजाने तमाम लोगों के मुखातिब होने का मौका मिला है।


इस संकट की घड़ी में देशभर से मेल,फोन और फेसबुक के जरिये निरंतर जो संदेश आ रहे हैं,उसे यह लगता है कि हम अकेले नहीं है।लेकिन शुभकामनाओं के दम पर हम वैकल्पिक मीडिया आंदोलन को जिंदा नहीं रख सकते।


समकालीन तीसरी दुनिया के साथ 1978- 79 से लेकर अबतक लगातार जुड़े सरहदों के आरपार बहुत बड़े पाठक वर्ग के बावजूद हम अभी उसकी अबाध निरंतरता सुनिश्चित नहीं कर सके हैं और समयांतर तो पंकज बिष्ट के निहायत निजी प्रयास की फसल है।हस्तक्षेप फिलहाल बाधित है और अमलेंदु जल्द ही अपने डेस्क पर होंगे।फिरभी हमारी समस्या फिर वही तीसरी दुनिया की समस्या है।


सिर्फ हस्तक्षेप की प्रशंसा काफी नहीं है और सिर्फ लिंक लाइक या शेयर करना काफी नहीं है,हमें आपका सक्रिय सहयोग भी चाहिए।


हम आभारी है शुभकामनाओं के लिए।समर्थन और सहानुभूति के लिए।


विनम्र निवेदन यह है कि कृपया सुनिश्चित यह करें कि साधनों की कमी से हस्तक्षेप का सिलसिला कभी बंद न हो।हम हस्तक्षेप को भारत की पूरी आबादी समेत इस महादेश की जनता का मुखपत्र बनाना चाहते हैं।आप न्यूनतम सहयोग करें तो हम ऐसा यकीनन कर दिखायेंगे।


हस्तक्षेप के साइट पर पेमनी बटन लगा है,कृपया तुरंत उसका इस्तेमाल करते हुए अगर आप हमारे साथ हैं,तो तुरंत अपने सामर्थ्य के मुताबिक न्यूनतम रकम तुरंत भेज दें ताकि हम सभी भारतीय भाषाओं में हस्तक्षेप के विस्तार के कार्यक्रम को अमलेंदु के स्वस्थ होकर डेस्क पर लौटते ही अंजाम तक पहुंचा सकें।


पेमनी पर भुगतान करने पर आपको रसीद तुरंत मिल जायेगा।

तकनीकी तौर पर या अन्य कारण से जो इस बटन का इस्तेमाल नहीं कर

सकते, उनके लिए हस्तक्षेप का एकाउंट का ब्यौरा इस प्रकार हैः

AMALENDU UPADHYAYA

Bank of India,

Rajnagar,

Ghaziabad,

A/C NO.711910100001179

IFSC CODE BKID 0007119


जो भी मित्र,समर्थक और पाठक हस्तक्षेप के साथ हैं और हस्तक्षेप की निरंतरता के पक्ष में हैं,वे अपनी रकम इस एकाउंट में तुरंत डाल सकते हैं।बेहतर हो कि न्यूनतम एक हजार रुपये डालें।


जो समर्थ लोग हैं वे अधिकतम जितना डाले वह हस्तक्षेप के विसात कार्यक्रम को लागू करने में निर्मायक होगा।


भारी संख्या में  ऐसे लोग भी हो सकते हैं,जो हमारे साथ हैं और सौ रुपये भी निकालना जिनके लिए असंभव हो,वे लोग सामूहिक तौर पर कोई रकम किसी के जरिये जमा कर सकते हैं और इस मुहिम को आंदोलन की तर्ज पर चला सकते हैं।


क्रयशक्ति के मुक्तबाजार में हमें समता और न्याय के लक्ष्य को हाससिल करने के लिए जनता की मीडिया की दरकार है और हमारे पास वह क्रयशक्ति नहीं है,इसे लेकर शर्मिंदा होने की जरुरत नहीं है।


आप चाहें तो हस्तक्षेप की मदद के लिए अपने गांव,गली,मोहल्ले और खेत खलिहान से भी आंदोलन शुरु कर सकते हैं।


यह अटपटा लग सकता है क्योंकि सत्तर के दशक से लगातार वैकल्पिक मीडिया

आंदोलन चलाने के बावजूद हम जरुरी संसाधन जुटाने का कोई आंदोलन अब तक शुरु नहीं कर पाये हैं।


हालत यह है कि मीडिया को बाजार के हवाले करके उनसे जनमत और जन आंदोलन बनाने की उम्मीद करते रहे हैं और सूचनातंत्र से लगातार बेदखल होते रहने की वजह से अविराम बेदखली और मेहनतकशों के हक हकूक और नागरिक मानवाधिकार हनन के मामलों में कारपोरेट मीडिया की खबरों पर ही दांव लगाते रहे हैं।


आप भले ही हमारे साथ न हों और भले ही हमारी कोई मदद न करें लेकिन हकीकत का सामना जरुर करें और तयकरें कि अनंतकाल तक क्या हम बेबस हाथों पर हाथ धरे कारपोरेट मीडिया को ही कोसते रहेंगे और अपना मीडिया बनाने की कोशिश न करें।


हस्तक्षेप और हमारे मित्रों की सोशल मीडिया पर निरंतर सक्रियता की वजह से पहले के मुकाबले हम बढ़त पर है और कारपोरेट मीडिया का मुकाबला किसी न किसी रुप में कर रहे हैं और संवाद भी चरम असहिष्णु जनसंहारी अश्वमेधी माहौल की वजह से चल रहा है।इसके अलावा आज की नई पीढ़ी ने मनुस्मृति के खिलाफ जो महाविद्रोह का शंखनाद किया है और रंगभेदी वरतच्स्ववाद के खिलाप उनकी जो तेज होती लड़ाई है,और बाबासाहेब केजाति उन्मूलन का उनका जो एजंडा है-उसके मद्देनजर वैकल्पिक मीडिया के राष्ट्रव्यापी तंत्र बनाने का इसे बेहतरीन मौका हमारे पास कभी न था।


कृपया इस भढ़त को बेकार न जाने दें।


सत्तर के दशक में हम नैनीताल से नैनीताल समाचार और पहाड़ टीम के लिए काम करते रहे हैं और फिर लघु पत्रिका आंदोलन होकर हमारा लेखन समकालीन तीसरी दुनिया और समयांतर तक पहुंचा।


दिनमान से लेकर जनसत्ता जैसे मंचों की वजह से हमें तब जनसरोकार और जनसुनवाई का कोई संकट नहीं दिखा तो कारपोरेट मीडिया में भी प्रतिबद्ध जनसरोकारी पत्रकारों की एक विशाल सेना थी,जो अब नहीं हैं।


केसरिया सुनामी की वजह से वे तमाम जनसरोकारी प्रतिबद्ध लोग आर्थिक सुधारों के अस्वमेध और विदेशी पूंजी के वर्चस्व के तहत संपादन और संपादक के अवसान के बाद मैनेजर सीईओ तंत्र में मीडिया से बेदखल हो गये हैं या हो रहे हैं।


उन्हें नये सिरे से गोलबंद करने की जरुरत है।यह करना अनिवार्य है क्योंकि कारपोरेट मीडिया में लंबे अरसे से काम करने वाले हमारे तमाम साथियों को बखूब मालूम है कि हम कारपोरेट मीडिया के मुकाबले जनता का मीडिया कैसे गढ़ सकते हैं।


आप समझ लें कि हस्तक्षेप से बड़ी संख्या में ऐसे पेशेवर,अनुभवी और प्रतिबद्ध पत्रकारों का जुड़ाव शुरु से रहा है और हम इसे व्यापक बना रहे हैं।इसके अलावा जो बचे खुचे मंच हैं,उन्हें हम एक सूत्र में जोड़ भी रहे हैं।


हमारे सिपाहसालार आनंद स्वरुप वर्मा और पंकज बिष्ट अभी सक्रिय है और हम थोडा़ सा अतिरिक्त प्रयत्न करे तो हम यकीनन वैकल्पिक मीडिया का राष्ट्रीय नेटवर्क बना सकते हैं।इसमें फिर आपकी निर्णायक भूमिका है और आपके सहयोग के बिना हमारी कोई जमीन नहीं है,जिसपर हम पांव जमाकर चीख सकें पुरजोर।


हस्तक्षेप ने पिछले पास साल के दौरान रीयल टाइम जन सुनवाई और ब्रेकिंग न्यूज की दो तरफा चुनौती का मुकाबला करने की भरसक कोशिश की है।जिसके नतीजतन वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर समकालीन तीसरी दुनिया,समयांतर,काउंटर करंट की मौजूदगी में हम निरंतर देश भर में कारपोरेट मीडिया के मुकाबले में व्यापक पैमाने पर तमाम ज्वलंत मुद्दों पर संवाद की स्थिति बानान में कमोबेश कामयाब होते रहे।


तीस तीस हजार फेस बुक लाइक तो अब तक हस्तक्षेप पर किसी भी न्यूज ब्रेक या किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर विश्लेषण को मिल ही जाते हैं।


पिछले ही साल गुगुल के मार्फत हम पचास लाख से ज्यादा पाठकों तक पहुंच रहे थे तो अब करीब दो करोड़ पाठकों तक हस्तक्षेप पर दर्ज हर चीख की गूंज पहुंच ही जाती है।इसके अलावा मीडिया कर्मियों की दुःख दर्द की खबरें अब दबती नहीं है।


फिरभी हम इस बढ़त को वैकल्पिक मीडिया आंदोलन को कारपोरेट मीडिया के मुकाबले खड़ा करने का कोई देशव्यापी आंदोलन उसीतरह खड़ा नहीं कर सके जैसे साठ से लेकर अस्सी दशक तक चरमोत्कर्ष पर रहे लघु पत्रिका आंदोलन को हमने कभी मुक्तबाजार की चुनौतियों के मुकाबले वैकल्पिक सूचनातंत्र में बदलने का कोई उद्यम नहीं कर सकें।


इस यथास्थिति को तोड़ने के लिए आप पहल करें तो हम यकीनन कामयाब होंगे।


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Tuesday, April 26, 2016

#Shudown JNU सत्ता के लिए अनिवार्य है क्योंकि राष्ट्र अब अंध केसरिया राष्ट्रवाद के मुलम्मे में हिंदुत्व का मुक्तबाजार है और कानून व्यवस्था वैदिकी हिंसा की रघुकुल रीति है तो कानून का राज अश्वमेध है। जबाव में हस्तक्षेप की मुहिम में शामिल होने को हमारा खुल्ला आवाहन #Shudown JNU सत्ता के लिए अनिवार्य है क्योंकि दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों और बच्चों के खिलाफ देश के हर हिस्से में अत्याचार और उनका उत्पीड़न देश का रोजनामचा है तो मेहनतकशों के हकहकूक हैं ही नहीं। #Shudown JNU मुहिम के तहत छात्र नेताओंं को सजा अनिवार्य है जबकि अदालत में उनपर मुकदमे में उनका अपराध अभी साबित भी नहीं हुआ है।अनिर्वाण पर एक सतर के निष्कासन के बहाने पांच साल के लिए उसकी पढ़ाई रोक दी गयी है तो कन्हैया की लोकप्रियता की मजबूरी या छात्रों में आपसी गलतफहमी की रणनीति के तहत कन्हैया को मामली जुर्माना की सजा सुनायी गयी है और हाल यह है कि बजरंगी नंगी तलवारें लेकर उनके पीछे देश भर में घूम रहे हैं।हवाई जहाज में भी फासिज्म का राजकाज घात लगाकर गला घोंट देने के फिराक में है। पलाश विश्वास

#Shudown JNU सत्ता के लिए अनिवार्य है क्योंकि

राष्ट्र अब अंध केसरिया राष्ट्रवाद के मुलम्मे में हिंदुत्व का मुक्तबाजार है और कानून व्यवस्था वैदिकी हिंसा की रघुकुल रीति है तो कानून का राज अश्वमेध है।

जबाव में हस्तक्षेप की मुहिम में शामिल होने को हमारा खुल्ला आवाहन


#Shudown JNU सत्ता के लिए अनिवार्य है क्योंकि दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों और बच्चों के खिलाफ देश के हर हिस्से में अत्याचार और उनका उत्पीड़न देश का रोजनामचा है तो मेहनतकशों के हकहकूक हैं ही नहीं।

#Shudown JNU मुहिम के तहत छात्र नेताओंं को सजा अनिवार्य है जबकि अदालत में उनपर मुकदमे में उनका अपराध अभी साबित भी नहीं हुआ है।अनिर्वाण पर एक सतर के निष्कासन के बहाने पांच साल के लिए उसकी पढ़ाई रोक दी गयी है तो कन्हैया की लोकप्रियता की मजबूरी या छात्रों में आपसी गलतफहमी की रणनीति के तहत कन्हैया को मामली जुर्माना की सजा सुनायी गयी है और हाल यह है कि बजरंगी नंगी तलवारें लेकर उनके पीछे देश भर में घूम रहे हैं।हवाई जहाज में भी फासिज्म का राजकाज घात लगाकर गला घोंट देने के फिराक में है।


पलाश विश्वास


साथी हिमांशु कुमार का ताजा स्टेटस हैः

जेएनयू प्रशासन द्वारा कन्हैया, उमर खालिद और अनिर्वान के खिलाफ सज़ा का ऐलान किया है ၊ सभी जानते हैं कि यह सज़ा संघ और भाजपा सरकार के दबाव में दी गयी है ၊ खतरनाक बात यह है कि एक ऐसे मामले में सज़ा सुनाई गयी है जो अदालत में विचाराधीन है ၊ इसलिये इस सज़ा को कोर्ट में चुनौती दी जाय ၊ दूसरी आपत्तिजनक बात यह है कि सज़ा इस आरोप पर दी गयी है कि इन छात्रों नें कश्मीर की आज़ादी के पक्ष में नारे लगाये थे ၊ हांलाकि मौजूद वीडियो सबूतों से साफ हो चुका है कि नारे दरअसल भाजपा से जुड़े एबीवीपीके एजेंटों ने गड़बड़ी फैलाने के लिये लगाये थे ၊ लेकिन अगर थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाय कि किसी भारतीय नागरिक को कश्मीरी जनता की आत्मनिर्णय की मांग जायज़ लगती हो तो क्या वह नागरिक अपनी विचारधारा को नारा लगा कर व्यक्त नहीं कर सकता ၊ कोई भी कानून नागरिक के सोचने और उसे व्यक्त करने पर रोक नहीं लगाता ၊ कोई भी सरकार नागरिकों को आदेश नहीं दे सकती कि नागरिक क्या सोच सकते हैं और क्या नहीं सोच सकते ၊ क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो संध कहेगा कि भारत के सभी नागरिक वैसा ही सोचें जैसा संध चाहता है ၊ और जो वैसा नहीं सोचेगा उसे जेल में डाल दिया जायेगा ၊ हम इस सज़ा को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेंगे, नहीं तो लोकतन्त्र की ही हत्या हो जायेगी ၊

#Shudown JNU सत्ता के लिए अनिवार्य है क्योंकि दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, स्त्रियों और बच्चों के खिलाफ देश के हर हिस्से में अत्याचार और उनका उत्पीड़न देश का रोजनामचा है तो मेहनतकशों के हकहकूक हैं ही नहीं।राष्ट्र अब अंध केसरिया राष्ट्रवाद के मुलम्मे में हिंदुत्व का मुक्तबाजार है और कानून व्यवस्था वैदिकी हिंसा की रघुकुल रीति है तो कानून का राज अश्वमेध है।


#Shudown JNU मुहिम के तहत छात्र नेताओंं को सजा अनिवार्य है जबकि अदालत में उनपर मुकदमे में उनका अपराध अभी साबित भी नहीं हुआ है।


अनिर्वाण पर एक सत्र के निष्कासन के बहाने पांच साल के लिए उसकी पढ़ाई रोक दी गयी है तो कन्हैया की लोकप्रियता की मजबूरी या छात्रों में आपसी गलतफहमी की रणनीति के तहत कन्हैया को मामली जुर्माना की सजा सुनायी गयी है और हाल यह है कि बजरंगी नंगी तलवारें लेकर उनके पीछे देश भर में घूम रहे हैं।


हवाई जहाज में भी फासिज्म का राजकाज घात लगाकर गला घोंट देने के फिराक में है।


इस पर चर्चा से पहले कुछ जरुरी जानकारी दे दें।


अमलेंदु सड़क दुर्घटना के बाद हस्तक्षेप अपडेट करने में असमर्थ है और रियल टािम में आप तक सारी सूचनाएं पहुंचाने की हमारी मुहिम को गहरा झटका लगा है।डाक्टरों को आशंका थी कि उनके दाएं हाथ में क्रैक है लेकिन एक्सरे से पता चला कि क्रैक नहीं है और प्लास्टर या गार्ड की जरुरत नहीं है।


समस्या फिरभी गंभीर है कि भीतर मांसपेशियां फट गयी हैं।

वक्त लगेगा।

वक्त इसलिए भी लगेगा क्योंकि अमलेंदु को शुगर है।


इस बीच वीरेन डंगवाल के शिष्य और हमारे मित्र यशवंत नें भड़ास के मार्फत हमारा साथ दिया है।उनका और भड़ास का आभार। मीडियामोर्चा का भी साथ है।आभार।


फेसबुक और अन्य माध्यमों से देश भर से साथियों के संदेश समर्थन और मदद के वायदे के साथ आ रहे हैं।

उन सबका आभार और उनकी मदद का इंतजार है।


दिल्ली विश्वविद्यालय के हमारे विद्वान मित्र शमसुल इस्लाम शुरु से ही हस्तक्षेप के साथ हैं और उनने फिर दस हजार का चेक भेजा है।ऐसे सौ चेक मिल जायें तो हमें दस लाख रुपये तत्काल मिल सकते हैं जो हस्तक्षेप की नींव मजबूत कर सकते हैं तुरंत।


हम इतने बड़े देश में इतने समर्थ लोगं में वे सौ लोग फिलहाल खोज रहे हैं।हजार लोग हो जायें तो एक करोड़।सिर्फ एक सामूहिक प्रयास जरुरी है।


पहले भी हमने सौ सौ हजार हजार करोड़ के संसाधन मसीहावृद के लिए जुटाते रहे हैं,जिसका कोई हिसाब कभी मिला नहीं है।हम सिर्फ वैकल्पिक मीडिया ही नहीं, मीडियाकर्मी साथियों के वैकल्पिक रोजगार की पारदर्शी योजना पेश कर रहे हैं।


इसीतरह कारपोरेट मीडिया के शिकार वंचित उत्पीड़ित पत्रकारों की फौज जो यशवंत और भड़ास से या अन्यत्र जुड़े हैं,वे हमारी मुहिम का समर्थन और सहयोग करें तो हमारी ताकत बाजार का दम निकाल सकता है।उम्मीद है कि तमाम साथी इस पर गौर भी करेंगे।


सबसे बड़ी बात हमारे लिए यह है कि हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी मदद करेंगे और उनने हमें यह पूछकर मुश्किल में डाला है कि कितनी मदद चाहिए।


हमारे लिए गुरुजी का आशीर्वाद अनिवार्य है और वे जितनी चाहे मदद कर सकते हैं लेकिन इससे ज्यादा जरुरी है कि वे अपने काबिल शिष्यों को भी हमारे साथ खड़े होने के लिए कहें।


हम बहुत जल्द मराठी में मुंबई से हस्तक्षेप लांच करने की स्थिति में हैं लेकिन बंगाल और पंजाब में अभी तैयारियां बाकी हैं।


जाहिर है कि अलग अलग स्थान पर अलग अलग भाषा में हस्तक्षेप निकालने के लिए हमें दफ्तर और सर्वर और काम करने वाले साथियों के राशन पानी का बंदोबस्त करना होगा।

यह बंदोबस्त भी आसान नहीं है।मुश्किल भी नहीं है।


हमारे पास देश भर में ऐसे साथी बड़ी तादाद में मौजूद हैं जो इस मिशन का मतलब समझें तो यह कोई समस्या ही नहीं है और इसके लिए न हमें राजनीतिक मदद की जरुरत है और न बाजार की मदद की।विज्ञापनों के मामले भी और मदद के मामले में भी हम किसी भी स्तर पर कोई समझौता नहीं कर रहे हैं।


कारपोरेट मीडिया के लिए जरुरी सौ हजार करोड़ के बदले हमें उनके मुकाबले हर भाषा में वैकल्पिक मीडिया बतौर हस्तक्षेप के विस्तार के लिए फौरी तौर पर सिरिफ और कुल पांच करोड़ रुपये की जरुरत है और देशभर के प्रतिबद्ध साथी इस मिशन को पूरा करने में साथ दें तो यह बहुत मामूली रकम है लेकिन किसी एक व्यक्ति के लाख दस लाख की रकम दे देने से नेटवर्क बनेगा नहीं।


बजाय इसके सौ सो रुपये की मदद हर तहसील से मिले तो फिर तत्काल किसी की मदद की जरुरत नहीं होगी।




जनांदोलन मे हमारी साथी और वनाधिकार आंदोलन में जेलयात्री से लौटी रोमा खुद बेहद अस्वस्थ हैं और उनके मस्तिष्क में ट्यूमर है।

उनका इलाज चल रहा है।वे बहुत बहादुर हैं और हमें उनकी चिंता है।


उन्होंने एक हजार रुपये भेजकर पूछा है कि और कितनी मदद चाहिए।


हमने रोमा से कहा कि किसी के लाख दो लाख दे देने से यह मिशन चलेगा नहीं जबतक न जनांदोलन और जनसरोकार से जुड़े हर साथी वैकल्पिक मीडिया को अनिवार्य मानकर इसके लिए संसाधन जुटाने का काम सामूहिक तौर पर करें।आंदोलन की तर्ज पर।


अमलेंद को जो मदद अभी छिटपुट मिल रही है,उसके लिए संदेश भेजकर रसीद देने या धन्यवाद लिखने तक की हालत में वे नहीं हैं।


बहरहाल जो लोग साइट पर PAYUMONEY के तहत मदद कर रहे हैं ,उन्हें सीधे भुगतान के साथ साथ वहीं रसीद मिल रहा है और पारदर्शिता के लिहाज से हम इसी माध्यम से मदद की अपील कर रहे हैं।हस्तक्षेप पर PAYUMONEY बटन से आप तुरंत हमें न्यूनतम मदद अभी ही कर सकते हैं अगर आप चाहें तो।


पिछले महीने और  इस महीने भी कुछ पैसा आया है जिसका ब्यौरा हम अमलेंदु के स्वस्थ होने के साथ साथ जारी कर देंगे और हर पैसे का हिसाब हम देंगे क्योंकि यह जनता का मोर्चा है और इसमें नेतृत्व के लिए जाति धर्म भाषा नस्ल क्षेत्र की दीवारें तोड़कर हम हर भारतीय नागरिक का खुला आवाहन करते हैं।


वैसे भी हम अलग अलग भाषा के लिए अलग अलग टीम बनाने जा रहे हैं और भुगतान न कर पाने की हालत में भी हम सभी साथियों के रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोच रहे हैं।


आदरणीय शेष नारायण जी और शामसुल इस्लाम जी की मदद के बिना तो पांच साल का सफर भी असंभव था तो रणधीर सिंह सुमन जी और रिहाई मंच के तमाम  साथी इस मुहिम को जारी रखने में लगातार साथ दे रहे हैं और हमारे अंबेडकरी मित्र ध्यान दें कि इनमें कोई ब्राह्मण भी नहीं है।


अंबेडकरी लोग साथ होंगे,नेतृत्व भी करेंगे तो किसी साथी की जात पूछ कर क्या करेंगे।


निरंकुश सत्ता के खिलाफ जात पांत की राजनीति का हश्र देख लीजिये और सत्तर साल की आजादी में जाति धर्म के नाम पर जिनके साथ खड़े हैं,उनका इतिहास और वर्तमान देख लीजिये।


हम सारे लोग बाबासाहेब के समता सिपाही हैं।


आपको बता दें कि अमलेंदु मधुमेह के मरीज भी हैं।

कंधे की चोट से उनके कामकाज पर असर नही है।पहले ही उनकी कमर में लगातार बैठने से परेशानी हो रही थी और कंप्यूटर पर लगातार काम करने से उनकी आंखों में पानी आ रहा था।


अब जबकि डाक्टरों की सलाह पूर्ण विश्राम की है तो भी मोबाइल से लिंक शेयर करने से बाज नहीं आ रहे अमलेंदु और इसके लिए सख्त मनाही है।लगता है कि डांटना ही पड़ेगा।


उन्हें आराम की जरुरत है।हमारे सिपाहसालार भी कम नहीं हैं।सिर्फ हमारे पास बजरंगी नहीं हैं।किसी को बेमतलब जान देने की जरुरत नहीं है क्योंकि आगे बहुत लंबी लड़ाई है और राजनितिक सत्ता संघर्ष अपडेट करते रहना हमारी प्राथमिकता नहीं है।


हम उन्हें नजरअंदाज भी नहीं करते क्योंकि अंततः राजनीति और सत्ता की वजह से ही हमारी जिंदगी पल दर पल नर्क है और इस नर्क को बदलने की जरुरत भी है।

बाकी बुनियादी मुद्दे जस के तस हैं।


बेदखल अर्थव्यवस्था की रिहाई जरुरी है तो उत्पादन प्रणाली से जुड़े और प्रकृति से जुड़े बहुसंख्य समुदायों के दमन उत्पीड़न,नागरिक और मानवाधिकार हनन के किस्से भी साजा करते रहना है।


हर रात हमें बेहयाई से बेरहमी के साथ उनको अपडेट करने के लिए बार बार आगाह करना होता था।क्योंकि हस्तक्षेप का लेआउट और टेंपलेट में बिना छेड़छाड़ किये हम भी कोई अपडेट पोस्ट नहीं कर सकते।इसके लिए दिल्ली में ही अमलेंदु के साथ सहयोगियों को बैठाना जरुरी है और फिलहाल ऐसा इंतजाम हम नहीं कर सकते।


हमने बांग्ला का पेज शुरु किया तो उसमें भी जटिल समस्याएं हैं जो कोलकाता में अलग सर्वर लगाये बिना सुलझ नहीं सकतीं।


फिलहाल जो हालात हैं,हिमांशु कुमार जी के स्टेटस के अलावा छत्तीसगढ़ में आदिवासियों क भोगे हुए यथार्थ के बारे में फिलहाल कुछ ज्यादा जानकारी मिल नहीं रही है तो मणिपुर में इरोम शर्मिला की गतिविधियों के अलावा खास कुछ मालूम पड़ नहीं रहा है।


जम्मू और कश्मीर के बारे में अब शायद किसी विमर्श की कोई गुंजाइस ही नहीं है।क्योंकि जेएनयू के छात्रों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मामला अदालत में साबित नहीं हो सका तो क्या सत्ता का वर्चस्व इतना निरंकुश है कि छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों के खिलाप विश्वविद्यालय प्रशासन ने सजा का ऐलान कर दिया है।जाहिर है कि इसके खिलाफ आंदोलन भी शुरु हो चुका है।




#Shudown JNU सत्ता के लिए अनिवार्य है क्योंकि राजनीति आम जनता के खिलाफ है और मीडिया भी जनता के खिलाफ है।


शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में संपूर्ण मनुस्मृति अनुशान के तहत जो केसरियाकरण का मुक्तबाजार है,उसके बारे में सूचनाएं नहीं के बराबर है।


संपूर्ण विनेवेश,संपूर्ण एफडीआई,संपूर्ण निजीकरण का देशभक्ति कार्यक्रम भारतमाता की जयजयकार है तो मन की बातें भी वे हीं।


बाबासाहेब की मूर्तिपूजा के बावजूद कमजोर तबकों के लिए आरक्षण खत्म है और उनकी बुनियादी जरुरतों के बारे में जेएनयू के अलावा संवाद साहित्य और संस्कृति के माध्यमों,सूचना तंत्र से लेकर संसद और विधानसभाओं में भी अनुपस्थित है।


#Shudown JNU सत्ता के लिए अनिवार्य हैआईआईटी खड़गपुर में फीस में बढ़ोतरी के खिलाफ आंदोलन है तो दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र तक आंदोलित हैं।


#Shudown JNU के प्रतिरोध में कोलकाता.यादवपुर और शांतिनिकेतन से लेकर हैदराबाद तक विश्वविद्यालयों में मनुस्मृति के खिलाफ खुला विद्रोह है।


इस विद्रोह के महाविद्रोह में बदलने के आसार हैं।

इसीलिए #Shudown JNU अनिवार्य है।


फिलहाल बंगाल में बाजार की जिन ताकतों ने वाम शासन के अवसान के लिए ममता बनर्जी की ताजपोशी की थी,वे अब खुलकर उनके खिलाफ हैं तो माओवादी भी उनके साथ नहीं हैं और शारदा से नारदा के सफर मेंनये सिरे से जनादेश की अग्निपरीक्षा में वे साख और छवि के संकट से जूझ रही है तो सत्ता की लड़ाई  मासूम बच्चों,स्त्रियों और वृद्धों से भी हिंसक राजनीति कोई रियायत नहीं बरत रही है।


फासिज्म के राजकाज में आर्थिक सुधार के नाम देश नीलाम पर है तो लूटतंत्र बेलगाम है और हमारा सबकुछ डिजिटल इंडिया के बहाने बाजार के हवाले है।


भविष्यनिधि हड़पने की कोशिश के खिलाफ बंगलूर में महिला कपड़ा श्रमिकों की अगुवाई में जो अभूतपूर्व विरोध हुआ ,उसकी गूंज अगर बाकी देश मे हो पाती तो शायद भविष्यनिधि का ब्याज लगातार घटाते रहने का हादसा जारी नहीं रहता।


अमलेंदु का बयान

प्रिय मित्रों,

आपकी दुआओं से मैं पहले से काफी बेहतर हूँ। बीती 21 अप्रैल को मेरा एक्सीडेंट हो गया था। दाहिने हाथ में, कंधे में और दाहिने ओर पसलियों में चोट है,लेकिन अब तेजी से सुधार है।

एक्सीडेंट के तत्काल बाद प्राथमिक चिकित्सा कराई उसमें कुछ दवाएँ रिएक्शन कर गई थीं और शुगर भी बढ़ गई थी, जिसके कारण घाव भरने में समय लग रहा है। फिलहाल कंप्यूटर पर काम करने की स्थिति में नहीं हूँ, इसलिए "हस्तक्षेप" ठप्प पड़ा है, संभवतः यह सप्ताह तो लग ही जाएगा हस्तक्षेप को पुनः काम पर लौटने पर।

जिन मित्रों को सूचना मिली, कई के फोन आए, कई ने फेसबुक पर हालचाल पूछा। सभी का बहुत-बहुत आभार।

हमारे वरिष्ठ स्तंभकार पलाश विश्वास जी भविष्य में "हस्तक्षेप" के संचालन को लेकर काफी चिंतित हो जाते हैं।

एक बात स्पष्ट कर दूँ। आप सभी मित्रों की सहायता की दरकार "हस्तक्षेप" को है, व्यक्तिगत तौर पर मुझे कतई नहीं। मैंने न अपनी आवश्यकताएँ बढ़ाई हैं न कभी जीवनयापन के लिए सुख-सुविधाओं का मोहताज रहा। "हस्तक्षेप" मेरा मिशन है व्यवसाय नहीं, इसलिए जो भी मित्र इसके लिए सहायता करते हैं, उनका आभार व स्वागत और जो तथाकथित मित्र गालियाँ देते हैं, उनका भी दिल से उनका आभार व स्वागत।

अपने जीवनयापन के लिए और संकट-विपत्ति के लिए मैं आत्मनिर्भर हूँ, मेरा संस्थान "देशबन्धु" जिसके लिए मैं थोड़ा सहयोग करता हूँ, उससे मेरे जीवन की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाती हैं।

"देशबन्धु" के साथ मैं जुड़ा ही इसलिए हूँ ताकि एक पत्रकार के तौर पर मेरा स्वाभिमान बरकरार रहे व कॉरपोरेट दलाली के दबावों से मुक्त रहकर अपने मिशन "हस्तक्षेप" पर काम करता रहूँ।

"हस्तक्षेप" हमारे कुछ मित्रों व मेरे अपने आर्थिक सहयोग से पिछले साढ़े पाँच साल से निकलता रहा है। अभी तक "हस्तक्षेप" को मैं अधिकाँश समय देता रहा हूँ, लेकिन अब पूर्णकालिक सहयोगी भी चाहिएँ, सर्वर पर लोड भी बढ़ रहा है, उसकी क्षमता भी बढ़ानी है। और सबसे बड़ा योगदान तो "हस्तक्षेप" के लेखकों का है जो बिना पारिश्रमिक लिए अपना लेखकीय योगदान तो देते ही हैं बल्कि "हस्तक्षेप" के लिए आर्थिक योगदान भी देते हैं।

मैं जैसे ही काम पर लौटता हूँ, व्यक्तिगत तौर पर आप सभी को, जिन्होंने मेरी खैर-ख़बर ली, उन सबका शुक्रिया अदा करूँगा तब तक आप पढ़ते रहें "हस्तक्षेप" और पुराने लेखों को शेयर करके करते रहें हस्तक्षेप।

आपका

अमलेन्दु उपाध्याय

26-04-2016

अमलेन्दु उपाध्याय's photo.



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