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Saturday, March 9, 2013

राजनीतिक त्रासदी महंगाई पर खामोश है बजट ♦ प्रभात पटनायक

राजनीतिक त्रासदी महंगाई पर खामोश है बजट

♦ प्रभात पटनायक

बजट से बुनियादी तौर पर कुछ ज्यादा नहीं बदलता है, लेकिन मीडिया के शोरगुल में कुछ लोगों को यह भ्रम हो चला है, कि बजट से अर्थव्यवस्था की सारी बीमारियां दूर की जा सकती हैं। बजट के प्रति इस कदर दीवानगी 1990 के दशक से पहले नहीं देखी जाती थी और उस वक्त तक आम बजट-सरकार का सालाना लेखा-जोखा की अपनी परिभाषा के दायरे में ही रहता था।

बजट के बाद लोगों का जीना मुहाल कर चुकी महंगाई कम होगी? इस सवाल के आईने में बजट को देखें, तो साफ है कि महंगाई से हलकान देश की जनता को राहत नहीं मिलने वाली है। इसे समझने के लिए महंगाई की वजह पर नजर डालते हैं। आम आदमी को परेशान करने वाली महंगाई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, सीपीआइ) की दर फिलहाल 11 फीसदी के करीब है। सही मायने में चीजों की कीमतें लोगों की पहुंच में होने के लिए सीपीआइ की दर पांच फीसदी के नीचे होनी चाहिए। सीपीआइ की ऊंची दर में सबसे ज्यादा योगदान खाद्य वस्तुओं की महंगाई का है, जो बीते दो सालों से दोहरे अंक वाली मुद्रास्फीति दर से नीचे आने का नाम ही नहीं ले रही है। जनता को खाद्य चीजों की महंगी कीमतों से राहत पहुंचाने के लिए दो काम किये जा सकते हैं। एक, सरकार फल-सब्जियों के आपूर्ति तंत्र में सुधार करे और खाद्य वस्तुओं को बर्बाद होने से पहले किसान के खेत से कम दाम पर उपभोक्ता की प्लेट तक पहुंचाने का इंतजाम करे। दूसरा, अर्थव्यवस्था में नकदी की आमद में इजाफा किया जाये, ताकि लोग सस्ती ब्याज दरों पर पैसा लेकर महंगाई से लड़ सकें। सरकार बजट से पहले या बजट में पहला काम (आपूर्ति तंत्र में निवेश) कर सकती थी, लेकिन यूपीए सरकार का कहना है कि यह काम हम नहीं, वॉलमार्ट, टेस्को और कोरफोर जैसी रिटेल कंपनियां करेंगी।

कार्टून केशव: द हिंदू से साभार

कार्टून केशव: द हिंदू से साभार

अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ाने के लिए जरूरी है कि भारतीय रिर्जव बैंक नीतिगत दरों (रेपो और रिवर्स रेपो दर) में कमी करे। मगर आरबीआइ का कहना है कि सीपीआइ यानी खुदरा मुद्रास्फीति की दर कंफर्ट जोन (पांच फीसदी के भीतर) में आये बगैर ब्याज दरों में ढील नहीं दी जा सकती है। बात वही है कि तू भी रानी, मैं भी रानी, कौन भरेगा पानी।

दरअसल, बजट से बुनियादी तौर पर कुछ ज्यादा नहीं बदलता है, लेकिन मीडिया के शोरगुल में कुछ लोगों को यह भ्रम हो चला है, कि बजट से अर्थव्यवस्था की सारी बीमारियां दूर की जा सकती हैं। बजट के प्रति इस कदर दीवानगी 1990 के दशक से पहले नहीं देखी जाती थी और उस वक्त तक आम बजट-सरकार का सालाना लेखा-जोखा की अपनी परिभाषा के दायरे में ही रहता था।

1990 तक भारत के आम बजट में शेयर बाजार और विदेशी निवेशकों जैसा कोई फैक्टर काम नहीं करता था। वह दौर एशिया में ईस्ट एशियन टाइगर्स (सिंगापुर, ताईवान, हांगकांग व मलयेशिया) के उभार का वक्त था, लिहाजा वैश्विक स्तर पर कोई कंपनी भारतीय बजट की ओर कान भी नहीं देती थी।

1990 में भारतीय अर्थव्यवस्था को दिये गये एलपीजी (उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण) बूस्टर के बाद यह पूरा माहौल बदल गया। 1950 से 1980 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था सालाना 3.5 फीसदी की औसत रफ्तार (इस धीमी बढ़त को हिंदू विकास दर भी कहा जाता है) से आगे बढ़ी और इस दरम्यान खरीद क्षमता के नजरिये से आबादी में कोई बड़ा समूह नहीं था।

1980 से 2010 के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था हिंदू विकास दर के पिछड़ेपन से बाहर निकल आयी। विकास दर में हुए इस इजाफे ने 40 करोड़ उपभोक्ताओं वाला विशाल मध्यवर्ग पैदा कर दिया। यह मध्यवर्ग 'आइ हेट पॉलिटिक्स' वाले तबके से था और आमतौर पर वोट डालने नहीं जाता था।

दूसरी ओर 1990 के दशक में ही भारतीय राजनीति में पिछड़ों और दलितों का उभार शुरू हुआ, जिसे कुछ जानकार भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत मानते हैं। गांवों-कस्बों का रहवासी दलित-पिछड़ा समूह बड़ी तादाद में वोट डालने जाने लगा। इस समीकरण ने देश की आर्थिक नीति को एक अलग मोड़ दिया।

1990 के बाद आयी सरकारों ने दोनों समूहों के बीच संतुलन साधने के लिए एक नया फार्मूला ईजाद किया और इसे हर साल बजट के मार्फत अंजाम पर पहुंचाया जाने लगा। मध्यवर्ग को सालभर चाटने के लिए सब्सिडी की मलाई पकड़ा दी गयी, वहीं ग्रामीण इलाकों के लिए सामाजिक कल्याण योजनाओं पर सरकारी खर्च में मामूली इजाफा कर दिया गया।

पूरे साल की चुप्पी के बदले में बजट से मिलने वाली सब्सिडी और छूटों के लालच ने धीरे-धीरे बजट को सालाना जलसे में तब्दील कर दिया, जहां सरकार कुछ संसाधन मध्यवर्ग पर खर्च करने का ऐलान करती है। मगर इस साल इन दोनों तबकों को भी बजट में निराशा ङोलनी पड़ी है, गरीब तबके की बात तो दूर है।

बजट में कहा गया है कि सब्सिडी बिल को कम करके जीडीपी के दो फीसदी से नीचे लाया जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि सरकारी खर्च में कमी होने के कारण जनता पर बोझ बढ़ जायेगा। खेती-बाड़ी को पुराने बजटों की तरह ही इस बार भी नजरअंदाज किया गया है।

पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड और ओडि़शा जैसे गरीब राज्यों में हरित क्रांति को आगे ले जाने की बात करते हुए सरकार ने एक हजार करोड़ रुपये आवंटित किये हैं। क्या कोई इस बात को स्वीकार करेगा कि एक हजार करोड़ की रकम से पूर्वी भारत में हरित क्रांति लायी जा सकती है।
देश के किसानों में 85 फीसदी तादाद छोटे और मझोले किसानों की है। लेकिन, इस बजट में इन किसानों के लिए कुछ नहीं है। कृषि ऋण में एक फीसदी की छूट देने का ऐलान बजट में किया गया है। मगर इसका फायदा छोटे किसानों को नहीं मिलेगा, क्योंकि यह गरीब किसान संस्थागत बैंकिंग के दायरे में ही नहीं है।

ऐसी ही एक और विडंबना पंजाब-हरियाणा को दिये गये 500 करोड़ रुपये के फसल विविधीकरण के दावे में खोजी जा सकती है। उत्तर भारत के इस विशाल इलाके में 500 करोड़ से फसल विविधीकरण तो दूर, बल्कि किसी फसल के बीज तक नहीं बांटे जा सकते हैं।
बजट में छोटी-मोटी रेवडि़यां मसलन, दो लाख से पांच लाख तक आय वाले लोगों को 2000 रुपये की छूट देने का वादा किया गया है। मगर यह रकम इतनी छोटी है, कि इसका लाभ उठाने वाले लोगों को यह घोषणा मजाक लगेगी। एसी होटल-रेस्तरां में महंगा खाना और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी जैसे फैसलों से आम आदमी का जीवन ज्यादा दूभर हो जायेगा।

विमानन उद्योग में रख-रखाव सेवाओं के लिए सरकार ने इसीबी (बाह्य वाणिज्यिक उधारी) के जरिये एक अरब डॉलर की अमेरिकी सहायता का वादा किया है, लेकिन आत्महत्या कर रहे विदर्भ के किसानों के लिए कुछ नहीं है। बीते चार वर्षो से राजनीतिक त्रसदी बन चुकी महंगाई पर भी बजट में खामोशी की चादर ओढ़ ली गयी और मंद विकास का ठीकरा प्रतिकूल अंतरराष्ट्रीय माहौल पर फोड़ा गया है।

पेट्रोलियम पदार्थो की सब्सिडी को कम करने की घोषणा करके पहले से ही उबल रहे पेट्रोल और डीजल को महंगा करने की पृष्ठभूमि बजट में तैयार कर ली गयी है। उदारीकरण के दो दशक बाद भारत की अर्थव्यवस्था खासकर ग्रामीण व कृषि क्षेत्र दोराहे पर खड़े हैं और यूपीए सरकार का यह बजट इस क्षेत्र को उजाले की किरण दिखाने में नाकाम रहा है।

Prabhat Patnaik(प्रभात पटनायक प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं। आम बजट पर प्रभात खबर में प्रकाशित उनकी यह टिप्पणी अरविंद सेन से बातचीत पर आधारित है।)


http://mohallalive.com/2013/03/01/prabhat-patnaiks-comment-on-general-budget/

बराबरी की दुनिया परिवार के भीतर से बने तो बेहतर

बराबरी की दुनिया परिवार के भीतर से बने तो बेहतर

♦ आशिमा

साल 2013 के साथ महिलाओं की तरक्की का अध्याय तकरीबन अभी शुरू होता महसूस हो रहा था, और इस महिला दिवस के अलग मायने सेट करके सभी ने इस दिन के लिए तैयारी शुरू भी कर दी थी। दिल्ली गैंग रेप घटना के बाद जो सड़कों पर हुजूम उमड़ा, उससे यह साफ लगने लगा था कि मानो यह समाज ऐसी खौफनाक घटना के दोबारा न होने का वादा कर रहा हो। लेकिन एक के बाद एक अखबारों की सुर्खियों ने मानो गलतफहमी दूर कर देने का काम किया। छोटी बच्ची से दुष्कर्म, पंजाब में पुलिसवालों द्वारा एक युवती की बेरहमी से पिटाई के न्यूज चैनलों पर लगातार चलते वीडियो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि भले ही अब सड़कों पर महिलाओं के हक में आवाज बुलंद होना शुरू हो गयी है लेकिन पुरुषवादी सत्ता को उखाड़ फेंकना अब भी बहुत दूर की बात है। क्योंकि जब तक समाज की इस जड़ पर जोरदार हमला नहीं होगा, तब तक किसी भी तरह के परिवर्तन की कामना करना हवा में तीर चलाने के ही बराबर साबित होगा। याद रहे भले ही सुरक्षा या कानून व्यवस्था का मामला उठाकर सरकार और पुलिस पर आरोप लगा दिये जाएं लेकिन याद रहे वह महिला जो पुलिस वालों के पास छेड़छाड़ की शिकायत करने आयी थी, उसे पीटने वाले वर्दीधारी भी इसी समाज का हिस्सा हैं। और उनका पालन पोषण और यहां तक कि 'नैतिक शिक्षा' की जिम्मेदारी भी इसी समाज की है। इसलिए खाली पुलिस प्रशासन पर आरोप लगाना ठीक नहीं क्योंकि वे इस समाज का हिस्सा हैं।

liberated womenबात की गंभीरता समझने के लिए यह भी काफी होना चाहिए कि देश में गिरते लिंगानुपात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता जतायी है। जब भी महिलाओं की दुर्दशा का प्रश्न उठाया जाता है तो अव्वल तो बोरिंग टॉपिक पर कौन अपने कान देता है। और अगर बात शुरू हो ही जाए तो तरह तरह के तर्क दिये जाते हैं कि महिलाएं आगे बढ़ तो रहीं हैं, आज उन्हें पढ़ने-लिखने, अपना करियर तक चुनने की आजादी है। माना कि है लेकिन आज भी जब शादी के लिए रिश्ते देखे जाते हैं, तो 'जरूरत से ज्यादा पढ़ी लिखी' लड़कियों को अधिकतर रिजेक्ट कर दिया जाता है। फिर कहा जाता है कि लड़कियां तरक्की कर रही हैं, मन से अपनी जिंदगी जीने को स्वतंत्र हैं, लेकिन फिर वही बात आ जाती है कि ऐसी लड़कियों के लिए आदरणीय पुरुषवादी समाज ने किस किस तरह के नाम बनाये हैं, शायद बताने की जरूरत नहीं।

तो कुल मिलाकर मंथन की आवश्यकता इस बात को लेकर है कि आखिर नारी के किस रूप की तरक्की हो रही है, हमारे समाज में। आज यह बार बार सबको बताने की जरूरत पड़ती है किस तरह हमारे देश की लड़ाई में महिलाओं ने बराबर अंग्रेजों की लाठियां, गोलियां खायीं, रणभूमि में लड़ीं। और कुछ नहीं तो बार बार इतिहास बताने वाले इतिहास से ही सबक लेते तो भी था। आज भी दूर दराज के गावों में महिलाएं कभी शराब के ठेके हटवाने के लिए तो कभी पाकृतिक संपदाओं को बचाने के लिए पूरी तरह प्रयासरत हैं, लेकिन न मीडिया न ही आम लोग किसी का भी उनकी बहादुरी पर ध्यान नहीं गया। मगर विडंबना देखिए एक पोर्न स्टार जो एक दिन भारत आती है, तो वह इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली महिला बन जाती है, हिंदी फिल्मों में इतना बड़ा ब्रेक ऐसे मिल जाता है जिसे पाने के लिए एक असल कलाकार की जिंदगी निकल जाती है। जहां आज भी आफिस में आमदनी को लेकर महिलाओं के साथ भेदभाव की बातें सामने आती हैं, वहीं एक आइटम नंबर करने वाली एक्ट्रेस करोड़ों के हिसाब से पैसे बटोरती है। यहां घड़ी की सुई की तरह बात घूम कर फिर वहीं आ गयी। इस पूरे सिलसिले में आपके उस भाषण का क्या, जिसमें आपने कहा था कि लड़कियां पढ़ने लिखने को, करिअर चुनने को स्वतंत्र हैं, क्योंकि आपके इस समाज में मेहनत करने वाली, समाज के लिए भलाई करने वाली औरतों की तो कोई जगह नजर ही नहीं आती।

जाहिर है समय और जरूरत' के हिसाब से पुरूष ने नारी के जिस रूप की कल्पना की उसी रूप की तरक्की स्वभाविक मानी गयी। गर्लफ्रेंड बनानी हो तो शहरी लड़की, जिसकी हर अदा में स्टाइल हो और स्टेटस सिंबल के हिसाब से एकदम परफेक्ट, लेकिन बस उससे शादी नहीं क्योंकि ऐसी लड़की को अपने मां बाप के सामने किस मुंह से लेकर जाएगा आदर्शवादी लड़का आखिर वह घर का एक जिम्मेदार लड़का है, इसलिए ऐसी लड़की केवल गर्लफ्रेंड बनने लायक बस उससे आगे शादी नहीं। फिर शादी की यदि बात आ जाए तो शादी के लिए हाउस वाइफ होनी चाहिए, आखिर घर बार देखना भी तो है। थके हारे घर पहुंचो तो कोई होना चाहिए कि बना हुआ खाना मिल जाए। यहां जिन जिन बातों का उल्लेख हुआ, वे भले ही एक बार को अजीब लगे लेकिन झूठ नहीं यह बात सभी जानते हैं।

जाहिर है कि यह समाज अब भी नारी के किस रूप की कल्पना करता है वह सामने है यहां हर कोई आज सरकार से कभी पुलिस प्रशासन से अपने हक को मांग रहा है। लेकिन असल बात यह है कि आपका हक इसी समाजिक व्यवस्था से मिलना है। और उसके लिए जरूरी है कि समाज की छोटी यूनिट परिवार से इसकी शुरुआत की जाए। जहां महिला पुरुष दोनों को बराबरी का दर्जा हो।

स्वामी विवेकानंद ने इस देश की तरक्की में ठहराव का एक कारण महिलाओं के प्रति अत्याचार बताया। समय बीत गया लेकिन महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की भावना पर लगाम नहीं लग पायी। समाज में आ रही अव्यवस्था को कम से कम अब इस समज को समझना होगा, और यह तब होगा जब हम नारी को उसके काम के लिए उसको प्रोत्साहन देने के साथ साथ उसकी बहादुरी और समाज के प्रति कर्मठता को सलाम करेंगे और निजी जिंदगी में भी उसकी कद्र करेंगे। तभी सही मायने में महिला दिवस मुकम्मल माना जाएगा।

Ashima(आशिमा। भारतीय जनसंचार संस्‍थान से पत्रकारिता में डिप्‍लोमा के बाद स्‍वतंत्र रूप से मीडिया में सक्रिय। जनसत्ता, नवभारत टाइम्‍स और दैनिक जागरण जैसे अखबारों में नियमित लेखन। उनसे blossomashima@gmail.com पर संपर्क करें।)

http://mohallalive.com/2013/03/08/article-on-womens-liberation-by-ashima-kumari/

प्रणब अब नहीं करेंगे ताबड़तोड़ हस्ताक्षर

प्रणब अब नहीं करेंगे ताबड़तोड़ हस्ताक्षर

♦ राजकिशोर

संयुक्त राष्ट्र संघ ने पिछले दिनों मौत की सजा के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। हालांकि, भारत ने इस पर दस्तखत नहीं किए हैं, लेकिन देश के अंदर भी इसे लेकर काफी विवाद है। राष्ट्रपति भी इससे चिंतित हैं और बेहद संवेदनशील भी। भले ही फांसी देने का फैसला सरकार का था, लेकिन अपने सात माह के कार्यकाल में कुल सात लोगों की फांसी के फरमान पर हस्ताक्षर करने का तमगा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर जड़ गया।

सात माह में सात लोगों की दया याचिका खारिज कर चुके राष्ट्रपति फिलहाल शायद ही किसी की मौत के वारंट पर हस्ताक्षर करें। कसाब, अफजल, बेलगाम घटना के दोषी नंदियप्पा और अब वीरप्पन के चार साथियों समेत कुल सात लोगों की दया याचिका गृह मंत्रालय की संस्तुति के अनुरूप खारिज कर चुके राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सामने गृह मंत्रालय ने सात और मामले निस्तारण के लिए भेज दिए। इनमें पांच की दया याचिका खारिज करने की संस्तुति है, जिसे देखकर राष्ट्रपति नाराज हो गए। वह चाहते हैं कि फांसी की सजा से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता बरती जाए और विचारहीन होकर या जल्दबाजी में फैसला न लिया जाए।

Pranab poltu mukherjee

सूत्रों के मुताबिक, अधिकारियों ने जब नई सात फाइलें राष्ट्रपति के सामने रखीं तो वह बेहद असहज हो गए। मौत की सजा पा चुके दोषियों की दया याचिकाओं पर कई-कई वर्ष तक कोई फैसला न करने के बाद अब ताबड़तोड़ राष्ट्रपति भवन फाइल भेजने को प्रणब विचारहीन मान रहे हैं। अब हाल-फिलहाल वह किसी की दया याचिका खारिज करने के मूड में नहीं हैं। खासतौर से ऐसे समय में जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने पिछले दिनों मौत की सजा के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। हालांकि, भारत ने इस पर दस्तखत नहीं किए हैं, लेकिन देश के अंदर भी इसे लेकर काफी विवाद है। राष्ट्रपति भी इससे चिंतित हैं और बेहद संवेदनशील भी।

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ कसाब के मामले में देरी का पक्षधर कोई नहीं था। इसके बाद अफजल गुरु और चंदन तस्कर वीरप्पन के चार सहयोगियों व एक अन्य मामले की दया याचिका खारिज करने की संस्तुति पर भी राष्ट्रपति ने मुहर लगा दी। भले ही फैसला सरकार का था, लेकिन अपने सात माह के कार्यकाल में कुल सात लोगों की फांसी के फरमान पर हस्ताक्षर करने का तमगा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर जड़ गया। यही कारण था कि राष्ट्रपति भवन ने अपनी साइट से लंबित दया याचिकाओं के विवरण का पन्ना ही हटा दिया। साथ ही कहा कि यह गृह मंत्रालय से जुड़ा मामला है। उनसे ठीक पहले राष्ट्रपति रहीं प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पांच साल के कार्यकाल में सिर्फ तीन लोगों की दया याचिका रद्द की थी। उनके समय में 35 लोगों की फांसी उम्रकैद में तब्दील की गई।

कसाब, अफजल की चुपचाप फांसी के बाद वीरप्पन के साथियों की दया याचिका रद होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने उनकी फांसी पर रोक लगा दी। तर्क है कि इतने साल जेल में रहने के बाद अब उन्हें फांसी देना दोहरी सजा होगी। इसी तरह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को मौत की सजा सुनाने वाले जज केटी थामस भी अभियुक्तों को अब फांसी देने के पक्ष में नहीं हैं। पंजाब में बेअंत सिंह के हत्यारे राजोआना या भुल्लर किसी भी मामले में फांसी की मांग मुखर नहीं है। ऐसे में अब राष्ट्रपति भवन ताबड़तोड़ इन मौत के वारंटों पर हस्ताक्षर नहीं करेगा।

(दैनिक जागरण से साभार।)


AP INTERVIEW “I Don’t Think She Deserved The Nobel” One of the authors of the scathing paper which has triggered a fresh appraisal of the 'Saint of the Gutters' ANIRUDH BHATTACHARYYA INTERVIEWS GENEVIEVE CHENARD

AP
INTERVIEW
"I Don't Think She Deserved The Nobel"
One of the authors of the scathing paper which has triggered a fresh appraisal of the 'Saint of the Gutters'

It took two years of research, writing and peer review before three Canadian academics came up with their scathing paper, 'Les cotes tenebreux de Mere Teresa' (The Dark Side of Mother Teresa), which has triggered a fresh appraisal of the lady known as the Saint of the Gutters. The study—authored by Professors Serge Larivee and Genevieve Chenard of the University of Montreal along with Carole Senechal of the University of Ott­awa—was published in the March edition of the academic journal, Studies in Religion/Sciences Religieuses. In a telephonic interview with Anirudh Bhattacharyya, one of the authors—Genevieve Chenard, a professor at the University of Montreal's Department of Psycho Education—discusses the findings:

Where did the idea for this particular study originate? After all, Mother Teresa has been dead for over 15 years.

It was in an ethics class. We were reading for special work. We were discussing altruism and Mother Teresa came up because she was an example. So, we started working on this.

In your research, you argue that Mother Teresa was "anything but a saint". However, till 1969, her work had received virtually no publicity. What changed?

We think it started with a movie shoot (which became the documentary Something Beautiful For God), led by Mr (Malcolm) Muggeridge. He went to Calcutta to see Mother Teresa and her work there. He wanted to film in the house of the dying and then there was little light there. So, the cameraman, Mr (Ken) McMillan, he used a new kind of Kodak film. When they saw the film, the shots were bright and when Mr Muggeridge saw it, he claimed it was a miracle. This is why she became popular in the media after that time.

So, based on your research, your contention is that she was a media creation?

We found 287 books and articles on Mother Teresa (of which) 153—a little more than 50 per cent—were hagiography. We think Mother Teresa was doing what she thought was good. We are not claiming she was pretending. I think people like her because it made them feel better. I think that's why the media focused on her work.

Did her work actually merit this larger-than-life aura?

I don't think that was real. I think the media helped with everything; it may have done more for her work than what was real. Without that journalistic work, we may not have had this.

You have also criticised what you describe as her dogmatic Catholic values....

She won the Nobel Prize for Peace. When she got that, she said abortion was the worst thing against peace. I don't understand how abortion in the case of a woman who was raped could work against peace. There are many other contradictions. Like she was against divorce, but in the case of Lady Diana she agreed with the divorce. These are questions that should have been asked before she got the Nobel.

You've also questioned some of her financial dealings.

She took money, for example, from Haiti, from 'Baby Doc' Duvalier. She took the money to help the poorest of the poor around the world. But the money she got at that time was already stolen from a very poor population. Those things, it seems to us, are like contradictions, because you don't steal from someone to give to another.

You also believe that the beatification process was hurried through by the Vatican.

I cannot speak for the Vatican. John Paul II wanted to make a lot of saints or people who were beatified. Mother Teresa was just one of them. What we know is that they went through the process faster for her than for many others. What we know is that they never questioned the contradictions. Maybe it was to regain popularity or because the Catholic Church needed a figure to be proud of. Obviously, she was already considered a saint during her lifetime. It was kind of logical for them to propose her for sainthood once she was dead.

You also question the treatment at centres run by the Missionaries of Charity in Calcutta....

There was a lack of medication and ways to treat people. Many doctors went there and saw that conditions were very poor. A lot of pills, medications were missing, people were living in a poor condition. They didn't really treat the sick people. She was just having them over there, because, for her, suffering makes you feel like Jesus was feeling on the cross. So suffering was a good thing in her thoughts. That's what she was offering to people, being very near to Jesus by suffering and dying this way. They had a lot of money. She could have built the most technologically modern hospital of India at that time. But suffering was a good thing for her.

So there was underutilisation of funds?

What we learned is that there was about $5 million in all the accounts. She raised almost $100 million before 1980. What happened is that around 5 to 7 per cent went to the charity for medicines, things like that. The other money went to build some houses for the missionaries. Just five per cent went to the cause.

Do you believe she deserved the Nobel or the other accolades she won, like India's Bharat Ratna?

Good question. I don't think she deserved the Nobel Prize at that time. I think for giving the Nobel, there should have been much more research into what she did. I don't understand why this was a prize for peace. We really think she inspired a lot of people to do good for others. We just think a lot of questions should be asked before she is declared a saint. If you were to tell me she would be made a saint because she gave a lot to the Church and the Catholic religion, that's probably true. She did a lot for the Catholic Church. We're just saying that making her a saint because she treated sick people is maybe not as real as it seems.

Would you say the net effect of her life is positive?

I suppose it is. But before that, we must evaluate the effect of all those charity missions around the world. The intention is good but we don't know anything about the effect. Everybody in the world can help someone, but maybe the effect after that is negative.

What feedback have you received on this work?

It's balanced, many positive and many negative. But what is interesting is the positive feedback talks a lot about the article and what it contains. The negative does not attack the article at all. It just attacks the authors, ad hominem attacks—that we should read the Bible, exorcise ourselves.

Your research was based on published documentation. Did you do field work in Calcutta at all?

No. But I'd like to go to Calcutta.

How long did the research take you?

Just the research and writing the article took more than a year. But it was very long because we had to send the text to many people for peer review and then we had to correct the text. It took two years to complete the article.

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अनुवाद द्वारा पॉवर्ड
MOTHER TERESA
Is 'research' enough to bust the Mother Teresa 'myth'?
DOLA MITRA
INTERVIEW
The woman whom Mother is suppo­sed to have "healed" after death
OUTLOOK
INTERVIEW
Mother House spokesperson was brief, to the point and dismissive of the charges.
DOLA MITRA
OPINION
He had given Hitchens his vote, and his views remain unchanged
AMIT CHAUDHURI
OPINION
Mother's saintliness renewed itself for him each time he met her
RAGHU RAI

Mamata smells polls and role in Delhi

Mamata smells polls and role in Delhi

Calcutta, March 8: Mamata Banerjee today repeated her prediction of early Lok Sabha polls and hinted at Trinamul being a part of the next government at the Centre, without specifying on which side her party would be.

Addressing members of Trinamul Mahila Congress at a programme to commemorate Women's Day, the chief minister said the railway ministry could be back with Trinamul "if necessary".

"If some people think they can block the projects that I brought to Bengal as railway minister, they cannot do so. I have done everything. The Lok Sabha elections are a matter of two-three months. Darkar holey rail daftar abaar Trinamuler kaachhei aashbe (if necessary, the railway ministry will come back to Trinamul)," Mamata said at the Netaji Indoor Stadium programme. She, however, did not mention the Centre.

Trinamul insiders said Mamata was "weighing her options" at a time the results of the February 23 bypolls had shown the "need" for a Congress-Trinamul alliance. "The bypoll results have shown that the Congress and Trinamul need to be together to keep the Left out of power. Mamatadi will take the final call and is keeping her options open," a Trinamul vice-president said.

In Nalhati, one of the three constituencies where the bypolls were held, the Forward Bloc won the seat but had the Congress and Trinamul fought together, they would have got 20,000 votes more than the Left party.

Trinamul sources said early Lok Sabha polls, slated for 2014, would suit the party. "Given the situation the Congress is in, only bringing the elections forward could work in its favour. The same thing is true for us as well. There is no doubt that there is a growing disenchantment with our government among people in the urban areas. Early polls will help us counter that," a senior Trinamul leader said.

During today's programme, Mamata accused the Centre of trying to thwart the development programmes initiated by her government.

"There is a conspiracy against the state government. When it sees Bengal is making progress, the Centre deliberately slows down the process of disbursing money. They are behaving like crabs. It is a matter of two-three months and we will find out who will pull whom back," she said.

http://www.telegraphindia.com/1130309/jsp/bengal/story_16651415.jsp#.UTs_lqJQl4I

Like Lenin, like Mao but in a democracy - Chavez to be embalmed and displayed

Like Lenin, like Mao but in a democracy
- Chavez to be embalmed and displayed

Washington, March 8: Hugo Chavez has joined a pantheon of five leaders of their respective nations whose bodies are on display to remind posterity of the contribution they made to their peoples and to their countries' histories.

Venezuela's interim leaders announced last night that they would embalm the body of the President who died on Tuesday and put it on perpetual display. Vice-President Nicolas Maduro, who was to be sworn in tonight as interim President, referred to Vladimir Lenin and Mao Zedong while announcing the decision.

"Just like Lenin, Mao Zedong," Maduro said in a tear-stained address on television, "the body of our leader will be embalmed, and it will… be surrounded by crystal glass forever, present forever, and always with his people."

Other than Lenin and Mao, leaders whose bodies have been embalmed and preserved for public viewing are Vietnam's Ho Chi Minh and North Korea's Kim Il-sung and Kim Jong-il. Josef Stalin's body was similarly put on display but it was removed in 1961 and buried as part of a de-Stalinisation programme in the Soviet Union.

This is the first time, however, that an elected leader's body has been preserved in any democracy. It is not clear how the Venezuelan people will eventually react to the idea and there is no indication yet what Chavez's wishes were for his final resting place.

In the former Czechoslovakia, the body of Klement Gottwald, the country's first communist President who died five days after Stalin, was embalmed and preserved in a Prague mausoleum until 1962. Bulgarians preserved the body of their first communist leader, Georgi Dimitrov, until 1990, but his mausoleum in Sofia was not dismantled until 1999.

In the Catholic Church, it was once believed that if the embalmed body of a Pope did not decompose, it was tantamount to a miracle. That belief was abandoned after the decomposition of the remains of Pius XII, who was the Pope from 1939 to 1958. Among the papal remains that are on display are those of Pius X, the head of the Church from 1903 to 1914, and John XXIII, the Pope from 1958 to 1963.

Venezuela's government decided after today's ceremonies to extend for seven days the opportunity for people to pay their respects to the departed leader. This was because of a sea of sobbing, distraught Venezuelans who had not had a chance yet to say farewell to the President.

Huge crowds lined the streets of Caracas on Wednesday when Chavez's body was taken from the military hospital where he had been treated to a military academy, where it is lying in state.

On Friday, at last count, as the last rites for Chavez got under way, about 50 governments were represented at his funeral service in Caracas, although Venezuela's interim leadership gave just over 48 hours' notice of the arrangements.

India was represented at the funeral service by the minister of state for corporate affairs, Sachin Pilot, and a functional delegation.

Pilot is carrying a condolence message from Manmohan Singh in which the Prime Minister praised Chavez for leaving behind "an enduring legacy of striving for social justice. President Chavez also made a tremendous contribution to the development of closer relations among the countries of the developing world. We are grateful for his personal efforts in strengthening relations between India and Venezuela."

Singh pledged to "continue to work towards even closer relations with the friendly people of Venezuela" under Chavez's successors.

Yesterday, the Rajya Sabha observed a minute's silence in memory of the Venezuelan leader and Vice-President Hamid Ansari said: "India cherishes the special bond of friendship that was greatly strengthened during the charismatic leadership of President Chavez."

Thirty of these 50 governments which sent leaders to bid final farewell to Chavez were represented by heads of state, among them, Brazil's President Dilma Rousseff and firm Chavez allies in Latin America, Rafael Correa, President of Ecuador, and Evo Morales of Bolivia.

A surprise presence was that of Colombian President Juan Manuel Santos. Chavez and Santos harboured serious differences and their countries teetered on the edge of a conflict under Santos's predecessor.

It was a reflection of the impact Chavez had on all Latin America, even among those who disagreed with him, that Santos said in a special televised speech to his people that "everyone knows that we had a lot of differences in our economic vision, in our governing style, in our understanding of social progress. The obsession that united us, which was the foundation of our relationship, was peace in Colombia and the region. If we have advanced in a solid peace process, with clear and concrete progress, advances that have never been achieved before… it is also thanks to the unlimited dedication of President Chavez."

A star at the final tributes to Chavez was Fidel Castro's brother Raul Castro, the Cuban President for five years who announced last month that he would retire at the end of his term, disappointing Cuba's enemies who often accused the communist country of dynastic rule.

http://www.telegraphindia.com/1130309/jsp/frontpage/story_16651721.jsp#.UTs_JKJQl4I


पूर्वोत्तर की चुनावी इबारत

पूर्वोत्तर की चुनावी इबारत

Monday, 04 March 2013 11:50

अरविंद मोहन 
जनसत्ता 4 मार्च, 2013: पूर्वोत्तर के साथ मजाक जारी है। वहां हुए तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के समय यह और स्पष्ट रूप में दिखाई दिया, क्योंकि मुल्क की राजधानी में भी ये चुनाव किसी की दिलचस्पी का विषय बने हों ऐसा नहीं लगता। रही-सही कसर चुनाव आयोग ने पूरी कर दी, जिसने नतीजों की तारीख बजट के दिन रख दी, जिस दिन पूरा मीडिया और मुल्क बजट की चर्चा में ही लगा रहा। अगर चुनाव नतीजों के दिन भी मीडिया पूर्वोत्तर पर चर्चा कर लेता तो वे कई सवाल जरूर उभर कर सबकी आंखों के सामने आ जाते जो विधानसभा चुनावों में इन तीन राज्यों की जनता ने उठाए थे। 
यह मानना निहायत भोलापन ही होगा कि पूर्वोत्तर के लोगों के लिए कोई मसला ही नहीं बचा है और पांच साल बाद भी वे सरकार चुनते समय बेमतलब बातों पर मतदान करते हैं। असल में यह कांग्रेसी नजरिया है जो धीरे-धीरे सारे देशपर हावी हो चुका है। खतरा यह है कि चुनाव हारने से कांग्रेस का तो बहुत कुछ नहीं बिगड़ा, मगर पूर्वोत्तर की समस्याओं पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया तो मुल्क का जरूर नुकसान हो जाएगा। 
कांग्रेस की हालत चुनाव के बाद बिगड़ी है या सुधरी है, यहां यह बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि तीनों राज्यों की जनता द्वारा पुरानी सरकारों को फिर से जनादेश देने के चलते कांग्रेस की भी मेघालय सरकार बच गई है। पर बाकी दो राज्यों में उसकी पहले से ज्यादा धुनाई हो गई है। त्रिपुरा में तो उसे कोई भी मुकाबले में नहीं मान रहा था, लेकिन नगालैंड के बारे में शुरूमें यह लगा कि केंद्र की सत्ता पास रहने से उसे लाभ होगा। नगा लोगों को अपनी समस्या सुलझाने में केंद्र की भी मदद चाहिए ही। पर रणनीति के अभाव और आपसी गुटबाजी ने वहां भी कांग्रेस को पिटवा दिया। मेघालय की जीत को भी कई लोग कांग्रेस की जीत की जगह पीए संगमा की हार ज्यादा बताते हैं। यह माना जा रहा है कि पूर्व लोकसभा अध्यक्ष संगमा कांग्रेसी नेताओं से भी ज्यादा हवाई नेता हो चुके हैं। सिर्फ दिल्ली की राजनीति में उलझे रहने की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी और इसी के चलते मुकुल संगमा अपनी गद््दी बचाने में सफल हो गए। 
यह सही है कि पूर्वोत्तर की राजनीति काफी कुछ पारंपरिक पहचान के इर्दगिर्द ही चलती आई है। सात राज्य होने के बाद भी कबीलाई पहचान की प्रमुखता वाली इस राजनीति का ही बोलबाला दिखता है। इस अर्थ में जाति की पहचान वाली राजनीति मैदानी इलाकों में आती-जाती रही है। नगा समस्या तो आजादी के समय से ही है। असम में सारे बंटवारे के बावजूद आज भी रह-रह कर यही राजनीति चलती है और कई बार तो एकदम उग्र रूप ले लेती है। पर यह भी रेखंकित करना जरूरी है कि सैकिया हों या अब माणिक सरकार, इन लोगों ने धीरे-धीरे शासन अर्थात कामकाज के आधार पर जनादेश पाने में सफलता पाई है। पर अन्य राज्यों में यह स्थिति नहीं है। 
नगालैंड की पूरी चुनावी लड़ाई इस बार सिर्फ पहचान के सवाल पर लड़ी गई तो मेघालय में कई कबीलों के अपने-अपने इलाके में प्रभावी होने से दो दशक से गठबंधन सरकार ही रही है। इस बार हुआ यह कि पीए संगमा के अपने लोग उनके प्रभाव वाले खासी इलाके में भी पिट गए। पर नगा लोग तो दूसरे राज्यों में चले गए, उनके पुराने इलाकों को भी एक साथ लाकर नया राज्य बनाने की राजनीति को ही वे पसंद करते हैं। 
त्रिपुरा में माणिक सरकार की उपलब्धियां इसलिए भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं कि इनके चलते न सिर्फ वाम दलों का एकमात्र दुर्ग बचा हुआ है बल्कि अच्छी-भली पहचान की राजनीति को दफना दिया गया है। त्रिपुरा के आदिवासियों और बंगालियों का टकराव काफी डरावना था। कांग्रेस इसका इस्तेमाल भी करती थी।
पर कांग्रेस की अपनी गुटबाजी ने उसकी सरकार को भी नहीं चलने दिया। माणिक सरकार ने न सिर्फ लगातार चौथी बार जीत पाई और ज्योति बसु के रिकार्ड की बराबरी की बल्कि त्रिपुरा में जातीय टकराव को भी इतिहास की चीज बना दिया। इस बार डरावनी पहचान वाले आदिवासी नेता विजय हरांखल चुनाव में भागीदारी कर रहे हैं यह लोगों को ठीक से पता भी नहीं चला। कांग्रेस ने ममता बनर्जी की देखादेखी परिवर्तन के नारे के साथ चुनाव लड़ा था, पर वह खुद इस बात को लेकर गंभीर है यह कभी नहीं लगा। दूसरी ओर, आज के नेताओं में ईमानदारी और कर्मठता की मिसाल बन गए माणिक सरकार ने न सिर्फ केंद्र की मनरेगा जैसी योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू किया है बल्कि गरीबों को सस्ता चावल देने के वादे पर लोगों का भरोसा जीतने में सफल रहे हैं।
माणिक सरकार राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से चौकस रहे, साथ ही बल्कि विकास के कई बडेÞ काम करके भी बंगाल के कामरेडों से अलग छवि बनाने में कामयाब रहे हैं। इनमें बिजली उत्पादन की बड़ी योजना को सफलतापूर्वक चलाना भी शामिल है। सो संगठन से लेकर सरकार तक उनकी चौकसी ही है कि वे न सिर्फ चुनाव जीतने में सफल रहे बल्कि उनकी सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत में भी इजाफा हो गया। वाम मोर्चा इस बार पहले से तीन फीसद ज्यादा वोट पाने में सफल रहा। अपने चुनावी नामांकन पत्र में माणिक सरकार ने अपनी संपत्ति ग्यारह हजार से कम घोषित करके सबको हैरान कर दिया था। उनके पास न अपना घर है न कार। वे अपना पूरा वेतन पार्टी को दे देते हैं और वहां से पूर्णकालिक कार्यकर्ता के तौर पर मिलने वाले पैसों से अपना काम चलाते हैं। उनके उधार बीड़ी पीने का एक चुटकुला भी चलता है। पर त्रिपुरा में वाम मोर्चे को मिली सफलता सिर्फ उनकी अपनी लोकप्रियता की देन नहीं है। यह माकपा की भी जीत है। अलबत्ता में वाम मोर्चे में शामिल आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक को निराशा ही हाथ लगी। त्रिपुरा में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस थी, पर वह कभी गंभीर चुनौती देती नहीं लगी। कांग्रेस साठ सदस्यों की विधानसभा में सिर्फ दस सीटें जीत पाई, जो उसका अब तक का सबसे बुरा प्रदर्शन था। कांग्रेस के दो क्षेत्रीय सहयोगी दलों का खाता भी नहीं खुल सका।

कांग्रेस को ही नहीं, बहुत-से राजनीतिक पंडितों को भी लगता था कि नगालैंड में नगा पीपुल्स फ्रंट सरकार कुछ खास नहीं कर पाई है और अगर नगा समस्या को सुलझना है तो केंद्र की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। ऐसे में कांग्रेस के लिए वहां गुंजाइश है। कांग्रेस ने दो-तीन महीने पहले से यह दावा करना भी शुरू कर दिया था कि इशाक-मुइवा से चल रही बातचीत सहमति के मुकाम पर पहुंच गई है। इस दावे की असलियत जो भी हो, पर कांग्रेस को इसका लाभ नहीं मिला। दूसरी ओर, नेफ्यू रिओ की अगुआई वाले नगा पीपुल्स फ्रंट ने नौजवानों और बेरोजगारी के सवाल को केंद्र में रख कर चुनाव का मुद््दा बदल दिया। कांग्रेस इस चक्कर में पिट गई और उसके अंदरूनी झगडेÞ और बढ़ गए। और जब नतीजे आए तो वे रिओ की उम्मीद से भी बेहतर थे। उनके मोर्चे को पिछली बार के मुकाबले ग्यारह सीटें ज्यादा मिली हैं। 
यह नगा पीपुल्स फ्रंट का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। दूसरी ओर, पिछली बार की तेईस सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस इस बार महजआठ सीटों पर सिमट गई। रिओ नगालैंड के दिग्गज नेता जमीर के शिष्य हैं। इस बार की जीत के साथ वे उन जैसी हस्ती बन गए लगते हैं। वे पहले भाजपा की अगुआई वाले राजग के साथ थे, मगर राजग में बने रहने में उन्हें कोई भविष्य नजर नहीं आया और वे उससे अलग हो गए। असम को छोड़ कर भाजपा आज भी पूर्वोत्तर में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। 
कांग्रेस चाहे तो इस बात पर राहत महसूस कर सकती है कि उसने अपने दम पर मेघालय जीता ही नहीं है, वहां उसकी सीटें पहले से बढ़ गई हैं। उसे साठ सदस्यों वाली विधानसभा में उनतीस सीटें मिली हैं, जो कि पिछली बार की सीटों से चार ज्यादा हैं। वह बहुमत से दो सीट पीछे रह गई। पर उसके सहयोगी दलों को बारह सीटें मिली हैं, लिहाजा अगली सरकार बनने में उसे कोई दिक्कत नहीं होगी। मुकुल संगमा मेघालय के पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पांच साल का कार्यकाल चैन से पूरा किया है। पर इससे भी बड़ी उपलब्धि यह मानी जा रही है कि उन्होंने पीए संगमा के प्रभाव वाली गारो पहाड़ियों की चौबीस में से तेरह सीटों पर कांग्रेस को सफलता दिलाई है।
इसी के चलते कई राजनीतिक पंडित इसे कांग्रेस की जीत की जगह मुकुल संगमा की जीत और पीए संगमा की हार मान रहे हैं। पीए संगमा हार कर भी हार मानने को तैयार नहीं हैं- राष्ट्रपति चुनाव की तरह। वे इसे धनबल और बाहुबल की जीत बताने से भी नहीं चूके। उनकी नवगठित पार्टी सिर्फ दो सीट जीत सकी और पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश किए गए उनके सुपुत्र कोनार्ड अपनी विधानसभा सीट भी नहीं जीत सके। 
पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनाव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण थे कि इस साल नौ विधानसभा चुनावों की शुरुआत इनके साथ ही हो रही थी। फिर अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए इनके संकेत महत्त्वपूर्ण हैं। कांग्रेस के लिए तो बहुत साफ दिख रहा है कि अगर उसे राज्यों में मजबूती से जमना है तो क्षेत्रीय सूरमा भी खडेÞ करने होंगे। एकमात्र मेघालय में उसके पास ऐसा नेता था तो उसने चुनाव जितवा दिया। बाकी जगह उसे मुंह की खानी पड़ी।
इससे जाहिर है कि अगले आम चुनाव की राह उसके लिए आसान नहीं होगी। अलबत्ता कांग्रेस तो इतना कर भी गई और आलोचना सुनने जैसी हालत में भी है। पर भाजपा और कथित राष्ट्रीय राजनीति करने वालों की तो मौजूदगी भी नहीं दिखी। अगर उनकी भागीदारी इतनी दूर-दूर की होगी तो उनका पूर्वोत्तर से क्या जुड़ाव होगा! यही सवाल मीडिया और कथित सिविल सोसाइटी से भी पूछा जा सकता है। साफ है कि पूर्वोत्तर के चुनावों ने जितने सवालों का जवाब दिया है उससे ज्यादा सवाल खडेÞ कर दिए हैं। और मुल्क का ध्यान उन सवालों पर है, यह भी नहीं दिखता।
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/40087-2013-03-04-06-21-31