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Saturday, March 9, 2013

दो पाटों के बीच

दो पाटों के बीच

Wednesday, 06 March 2013 11:23

बनवारी 
जनसत्ता 6 मार्च, 2013: वित्तमंत्री चिदंबरम के पास इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं था कि वे भविष्य के बारे में थोड़े आशावान दिखते हुए एक मुनीमी बजट प्रस्तुत कर दें। उनके सामने दो चुनौतियां थीं और दोनों ही एक-सी गंभीर। पहली चुनौती आर्थिक संकट थी, जिसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नजरअंदाज करना नहीं चाहते थे। यह संकट आर्थिक वृद्धि दर में भारी गिरावट की आशंका से आरंभ हुआ था। वित्तीय वर्ष के उत्तरार्द्ध में यह भी स्पष्ट हो गया कि कच्चे तेल और सोने के भारी आयात के कारण राजकोषीय घाटा बहुत बढ़ गया है। यह आशंका भी व्यक्त की गई कि अगर खर्च पर तुरंत लगाम नहीं लगाई गई तो बजट घाटा भी हाथ के बाहर हो जाएगा। 
इस सबके बीच अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों की धमकी मिलने लगी कि भारत की साख घटाई जा सकती है। अगर ऐसा होता तो विदेशी निवेश और कर्ज और कठिन हो गया होता। इस धमकी से डरी सरकार ने अनुदान में कटौती करने के लिए पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाए और दूसरे कई खर्चों पर रोक लगा कर बजट घाटा सकल घरेलू उत्पादन के 5.2 प्रतिशत पर रोक लिया, जबकि उसके 5.7 प्रतिशत तक होने की आशंका हो गई थी। इस बजट घाटे को अगले वर्ष पांच प्रतिशत के नीचे रखने के घोषित संकल्प के कारण वित्तमंत्री के पास उद्योग-व्यापार या कमजोर वर्गों के लिए रियायतों का पिटारा खोलने की कोई गुंजाइश नहीं थी।
चिदंबरम के सामने दूसरी चुनौती कांग्रेस का राजनीतिक भविष्य थी। अगले वर्ष आम चुनाव होने हैं और उनकी सरकार के पास बजट के द्वारा मतदाताओं को लुभाने का यह अंतिम अवसर था। आम मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए सरकार अमीरों पर कर बढ़ा सकती थी, निचले स्तर पर कर कम कर सकती थी और जन कल्याणकारी योजनाओं की संख्या और राशि बढ़ा सकती थी। लेकिन इस सबके लिए अतिरिक्त साधन चाहिए और उन्हें जुटा पाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। अमेरिका और यूरोप की मंदी अभी टली नहीं है, इसलिए देशी निवेशकों को नाराज नहीं किया जा सकता था। 
भारत में विदेशी निवेश बढ़ाने के लिए खुदरा और बीमा क्षेत्र खोलने के बावजूद कोई बहुत उत्साहवर्धक स्थिति नहीं दिख रही। अगर आर्थिक विकास की दर में कोई उछाल नहीं आता तो सरकार के राजस्व में किसी बड़ी वृद्धि की आशा नहीं की जा सकती। साधनों की इस किल्लत ने सरकार के हाथ बांध दिए और वित्तमंत्री ने अपनी पार्टी की चुनावी संभावनाएं बढ़ाने वाली घोषणाएं करने से परहेज किया। अब अर्थव्यवस्था और पार्टी, दोनों भगवान भरोसे हैं। बेचारे चिदंबरम कर भी क्या सकते थे?
पर भारतीय अर्थव्यवस्था के सुधार के पुरोधा मनमोहन सिंह और वित्त व्यवस्था में सुधार के पुरोधा चिदंबरम के रहते ये संकट के बादल कैसे घिर आए? सरकार की तरफ से अब तक इसका एक ही उत्तर दिया जाता रहा है कि अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्था में आई मंदी ने हमारे निर्यात को हानि पहुंचाई है। विदेशी पूंजी निवेश में भी पिछले वर्षों के मुकाबले कमी आई है। इस सबने भारत की अर्थव्यवस्था की चाल मंदी कर दी। 
इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रहे और घरेलू बाजार में तेल की बढ़ती मांग के कारण हमारा आयात बिल बढ़ता गया, क्योंकि भारत अधिकांशत: आयातित तेल पर ही निर्भर है। दूसरी तरफ, निवेश के दूसरे विकल्पों के आकर्षक न रहने के कारण लोगों ने सोने में निवेश बढ़ाया और सोने का आयात भी काफी बढ़ गया। इससे न केवल राजकोषीय घाटा बढ़ा, रुपए पर भी दबाव आ गया, क्योंकि निर्यात की तुलना में आयात अधिक होने के कारण विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ गई।
दरअसल, ये सब सामयिक कारण हैं और निश्चय ही ऐसे कारण हैं जिन पर भारत सरकार का कोई नियंत्रण नहीं हो सकता था। लेकिन क्या सचमुच भारत के विकास की कहानी में भारत सरकार की भूमिका इतनी कम रह गई है? अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भारत के लिए ही नहीं, उन सभी देशों के लिए बदली हैं जो भारत की तरह आर्थिक विकास की सीढ़ियां चढ़ने में लगे हैं। लेकिन उनमें से किसी देश के नेताओं के हाथ-पैर इस तरह फूले हुए दिखाई नहीं दे रहे, जैसे भारतीय नेताओं के।
सरकार के इस संकट ने हमारे आर्थिक सुधारों की वास्तविकता सामने ला दी है। यह मुहावरा काफी दिन से चलन में है और हमारे राजनेताओं से लगाकर सरकारी और गैर-सरकारी सभी आर्थिक विशेषज्ञ इसका इस धड़ल्ले से उपयोग करते हैं कि लगता है उसके बारे में एक राष्ट्रीय सहमति है। जो लोग आर्थिक विशेषज्ञों की इस दुनिया से बाहर हैं वे आर्थिक सुधार का अर्थ यही लगाएंगे कि उनका संबंध अर्थव्यवस्था में सुधार संबंधी किन्हीं नियमों से है। 
अर्थव्यवस्था में सुधार की नीतियां तो सभी देशों की अलग-अलग ही होंगी, जो उन देशों की अपनी आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेंगी। मगर आर्थिक सुधार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यवहार में लाया जाने वाला एक मुहावरा है और उसका एक ही अर्थ है कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय पूंजी, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विश्व बाजार के लिए खोलना। 

विकासशील देशों को अपने आर्थिक जीवन में गतिशीलता लाने के लिए और अपने त्वरित औद्योगिक विकास के लिए इन अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का सहयोग लेना पड़ता है। लेकिन कोई भी देश आंख मूंद कर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शक्तियों को अपने घेरे में नहीं घुसा सकता। विरोधाभास देखिए कि जो विकसित देश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को अपने दरवाजे खोलने की नसीहत देते रहते हैं वे अपने दरवाजों पर दस तरह के पहरे बैठाने में कोई संकोच नहीं करते।
अगर हमारे राजनेताओं और आर्थिक विशेषज्ञों में अपना और अपने देश का थोड़ा भी गौरव होता तो वे आर्थिक सुधार जैसी छद्म शब्दावली का न प्रयोग करते और न अपनी आर्थिक नीतियों की समीक्षा करने वाली अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ बिरादरी को करने देते। लेकिन हमारे यहां तो यह मुहावरा कुछ ऐसे स्वयंसिद्ध प्रत्यय की तरह व्यवहार में लाया जा रहा है कि उसके श्रेयस्कर होने में किसी तरह के संदेह की कोई गुंजाइश ही न हो। आर्थिक सुधारों को लागू करने में सरकार में हिचकिचाहट हो ऐसा नहीं है। लेकिन यह मुहावरा अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा इतनी आक्रामकता के साथ प्रचारित किया जाता है कि थोड़ा-सा विदेशी दबाव पड़ते ही हम हथियार डाल देते हैं। 
याद कीजिए कि नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व-काल में जब भारत में आर्थिक सुधारों के इस तथाकथित दौर का आरंभ हुआ था तो रेटिंग एजेंसियों ने भारत की वित्तीय साख गिरा कर ही यह दबाव पैदा किया था। उस समय किसी को यह समझ में नहीं आया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सामान्य स्थिति के बावजूद भारत की रेटिंग क्यों कम की गई और यह दबाव क्यों पैदा किया गया। तब से हम रेटिंग के इस मायाजाल में फंसते ही गए हैं।
यह कहना मुश्किल है कि आर्थिक प्रगति के दौर में देश के साधारण लोगों का आर्थिक जीवन पहले से सुगम हो रहा है या दुर्गम। अधिकतर लोगों के लिए जीवन की कुछ स्थितियां सुधर रही हैं तो कुछ बिगड़ रही हैं और यह तय कर पाना कठिन है कि उनके आर्थिक जीवन की यह दिशा आश्वस्तिकारक है या नहीं। यह बात साधारण लोगों के बारे में ही नहीं, सरकार के बारे में भी उतनी ही सही है। 
शुरू के दिनों में हम विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्ज से दबे थे और उनके अनेक सुझाव निर्देश का काम करते थे। फिर वह समय आया जब भारत को विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के कर्ज की आवश्यकता ही नहीं रही। मनमोहन सिंह इस पर गर्व करते हुए कहते रहे कि हम अब कर्ज लेने नहीं देने की स्थिति में आ गए हैं। लेकिन इस नई स्थिति में हम पर बाहरी दबाव समाप्त नहीं हुआ, उसका स्वरूप बदल गया। अब हम विदेशी निवेशकों और विदेशी बाजार के दबाव में रहते हैं और इसीलिए उन रेटिंग एजेंसियों का भूत हमें डराता रहता है, जिनकी अपनी साख आज काफी संदिग्ध हो गई है क्योंकि पैसे के लालच में उन्होंने जान-बूझ कर गलत रेटिंग की।
ऐसा नहीं कि पिछले दिनों हमारी अर्थव्यवस्था में कुछ सकारात्मक न हुआ हो। बिहार और मध्यप्रदेश ने कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। इसका श्रेय केवल स्थानीय नेतृत्व को जाता है। इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री अपने समाज से जुड़े हैं और अपने निजी और सार्वजनिक जीवन में अधिक साफ-सुथरे रहे हैं। इसी तरह गुजरात ने उद्योग-व्यापार में वैसी ही उपलब्धि दिखाई है। 
नरेंद्र मोदी को इसका श्रेय भी मिला है। ये सभी नेता आधुनिक विधाओं में निष्णात होते हुए भी उस पश्चिमपरस्त भद्रलोक का हिस्सा नहीं हैं जो हमारी राष्ट्रीय राजनीति और सत्ता प्रतिष्ठान में छाया हुआ है। जो हिंदी क्षेत्र आरंभिक दौर में पिछड़े दिख रहे थे, धीरे-धीरे पहल उनके हाथ में पहुंच रही है। विदेशी शासन के दौरान इन्हीं क्षेत्रों के भौतिक जीवन की सबसे अधिक क्षति हुई थी। हमारे राष्ट्रीय प्रतिष्ठान ने उनकी इस क्षति की पूर्ति करने में रुचि लेने के बजाय उनका सदा उपहास ही किया। लेकिन अब वे अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़ रहे हैं।
धीरे-धीरे पहल राज्यस्तरीय नेतृत्व के हाथ में जा रही है। अभी इससे हमारे राष्ट्रीय प्रतिष्ठान को कोई खतरा दिखाई नहीं दे रहा। लेकिन कांग्रेस या भाजपा के नेतृत्व वाले शासन में अपनी प्रभुता के बने रहने का जो भ्रम इस प्रतिष्ठान ने पाल रखा है, वह बहुत दिन नहीं टिकेगा। राष्ट्रीय दलों की संगठनात्मक स्थिति ज्यों-ज्यों कमजोर होगी, उनका दिल्लीवासी नेतृत्व साधनों को चुनाव जीतने के लिए स्थानीय समाज के साथ बांटने और राज्यस्तरीय नेतृत्व को महत्त्व देने के लिए विवश होगा। 
इससे स्थानीय नेतृत्व की शक्ति उत्तरोत्तर बढ़ेगी और इंडिया भारत की तरफ खिसकने के लिए विवश हो जाएगा। अब तक का अनुभव यह भ्रम पैदा करता है कि देशज समाज पश्चिमी तंत्र का अंगभूत होता चला जा रहा है। लेकिन यह संक्रमण का काल है और अभी इंडिया का मुलम्मा उतरा नहीं है। पर मनमोहन सिंह ने यह मुलम्मा उतारने की नींव जरूर डाल दी है। इसका श्रेय उन्हें जरूर मिलेगा। बेचारे चिदंबरम तो दो पाटों में फंस गए हैं। वरना वे किसी गिनती में नहीं आते।

महिला सशक्तीकरण के वास्ते

महिला सशक्तीकरण के वास्ते

Friday, 08 March 2013 10:53

केपी सिंह 
जनसत्ता 8 मार्च, 2013: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिला सशक्तीकरण की बात करना फैशन नहीं, जरूरत है। इक्कीसवीं शताब्दी में भी महिलाएं संविधान-प्रदत्त मूलभूत अधिकारों को पाने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं। यह जद्दोजहद नई नहीं, सहस्राब्दियों पुरानी है। मानव-सभ्यता जब पृथ्वी पर पनपने लगी तो पुरुष ने अपनी शारीरिक सामर्थ्य का फायदा उठाते हुए पहला अधिकार स्त्री पर जताया था। महिलाओं के शोषण की कहानी वहीं से शुरू हो गई थी। संपत्ति पर अधिकार का सिलसिला उसके बाद शुरू हुआ। वर्ष 1848 में सोनेका फाल्स में आयोजित महिला-अधिकार सम्मेलन में जारी किए गए घोषणा-पत्र में कहा गया था कि मानवता का इतिहास पुरुष द्वारा स्त्री पर लगातार अत्याचार और उस पर आधिपत्य जमाने की गाथा मात्र है। 
प्राचीन रोमन साम्राज्य में महिलाओं को पुरुष के स्वामित्व वाला प्राणी समझा जाता था। फ्रांस में उन्हें आधी आत्मा वाला जीव समझा जाता था, जो समाज के विनाश के लिए जिम्मेदार था। चीनवासी महिलाओं में शैतान की आत्मा के दर्शन करते थे। इस्लाम के प्रचार से पहले अरबवासी लड़कियों को जिंदा दफ्न कर दिया करते थे। भारत में भी सीता से लेकर द्रौपदी तक स्त्रियां विभिन्न प्रकार की अग्नि-परीक्षा से गुजरती रही हैं। कन्या हत्या के पाप से जब भारतवासी मुक्त होने लगे थे तो सहज ही कन्या-भ्रूण हत्या सामाजिक व्यवस्था में स्थापित हो गई थी। मापदंड और तरीके भिन्न हो सकते हैं, पर महिलाओं के प्रति भेदभाव और शोषण एक विश्वव्यापी सामाजिक परिदृश्य है। इसे सभ्यता-दोष मान कर सभी को इसके निराकरण के उपाय ढूंढ़ने की जरूरत है।
महिला सशक्तीकरण की बात करने से पहले इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने की आवश्यकता है कि क्या वास्तव में महिलाएं अशक्त हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि अज्ञानवश या निहित स्वार्थों ने एक षड्यंत्र के तहत एक असत्य को बार-बार सत्य बता कर उसे सत्य के रूप में स्थापित कर दिया गया हो? मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक तथ्य यह साबित करते हैं कि वह प्राणी जिसे हम 'औरत' कहते हैं, जन्म से औरत नहीं होती, उसे समाज द्वारा 'औरत' बनाया जाता है। वह अशक्त नहीं, अशक्त बताई जाती है। 
प्रकृति ने स्त्री और पुरुष दोनों को अलग-अलग प्रकार की शक्तियां देकर एक समान रूप से सशक्त बनाया है। पुरुष में अगर शारीरिक सामर्थ्य थोड़ी ज्यादा है तो स्त्री में शारीरिक शक्ति का संवरण करने की शक्ति पुरुष से अधिक होती है। इसका प्रमाण है कि भारत में महिलाओं की औसत आयु पुरुषों की औसत आयु से लगभग पांच वर्ष अधिक है। 
भावनात्मक रूप से महिलाएं पुरुषों से अधिक संतुलित होती हैं। विषम परिस्थितियों से शीघ्र बाहर निकल कर संयमित हो जाने और दर्द सहने की क्षमता स्त्रियों में पुरुषों से अधिक होती है। मानसिक प्रबलता और कार्य-निपुणता में महिलाएं अगर पुरुषों से इक्कीस नहीं तो उन्नीस भी नहीं हैं। फिर यह समझने की जरूरत है कि स्त्री क्यों पुरुष के अधीन होती चली गई?
सभ्यता के प्रारंभ में 'जिसकी लाठी उसकी भैंस' का सिद्धांत स्थापित हो जाना स्वाभाविक था। बौद्धिक क्षमता और भावनात्मक दृढ़ता के मापदंड उस समय अज्ञात थे। इसीलिए शारीरिक सामर्थ्य ने जीवों के बीच परस्पर संबंधों को परिभाषित करने में अहम भूमिका निभाई थी। जंगल की प्रवृत्ति को परिभाषित करता 'बलशाली को ही अधिकार है' का सिद्धांत सभ्य समाज के शुरुआती दौर में ही मानव-समाज में अपनी जगह पक्की कर चुका था। 
शायद यही कारण था कि पुरुष ने स्त्री की तनिक सापेक्ष शारीरिक दुर्बलता को उसके आजीवन शोषण की गाथा बना डाला। पर आधुनिक सभ्य समाज में शारीरिक क्षमता के मुकाबले मानसिक प्रबलता, सृजनात्मक शक्ति और भावनात्मक परिपूर्णता ज्यादा मायने रखती है। सर्वविदित सत्य यही है कि आधुनिक सभ्यता के श्रेष्ठता के स्थापित मानकों पर महिलाएं पुरुषों से कहीं भी पीछे नहीं हैं। ऐसे में महिला सशक्तीकरण की चर्चा और अधिक सार्थक हो जाती है। 
प्रसिद्ध दार्शनिक मज्जिनी (1805-1872) ने कहा था कि पुरुष को अपने दिमाग से यह विचार निकाल देना चाहिए कि वह महिला से श्रेष्ठ होता है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन की पत्नी नैन्सी रेगन ने एक बार बताया था कि स्त्री चाय की पुड़िया (टी बैग) के समान होती है। और 'टी बैग' की गुणवत्ता का तब तक पता नहीं चलता, जब तक उसे गरम पानी में डाल कर परखा नहीं जाता। महिलाओं के संदर्भ में गरम पानी में डालने से उनका अभिप्राय था अवसरों की उपलब्धता। यानी महिलाओं की क्षमता का अंदाजा उन्हें उपलब्ध अवसरों के परिप्रेक्ष्य में ही लगाया जाना चाहिए। 
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों से महिलाओं को राष्ट्र और समाज के विकास में भागीदारी के उतने अवसर नहीं मिल पाए जिनकी वे हकदार थीं। धीरे-धीरे महिलाओं ने समाज में अपनी उस भूमिका को स्वीकार कर लिया जो पुरुष से कमतर आंकी जाती रही है। पुरुष द्वारा बनाए गए सामाजिक और राजनीतिक कानून जो पुरुष को केंद्र में रख कर बनाए गए थे, महिलाओं पर ज्यों के त्यों लागू होते चले गए। 
स्त्री घर की चारदीवारी के अंदर घरेलू परिस्थितियों की दासी बन गई और घर के बाहर उसकी भूमिका सीमित होती चली गई। घरेलू और सार्वजनिक गतिविधियां लिंग के आधार पर वर्गीकृत हो गर्इं। महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों ने अपने पास ही रखा। घर से बाहर की सारी भूमिकाएं पुरुषों ने हथिया लीं। इस लैंगिक भेदभाव ने महिलाओं को और कमजोर बना दिया और सर्वत्र पुरुष का वर्चस्व स्थापित होता चला गया।

समाज में पुरुष के वर्चस्व की कीमत सभी सभ्यताओं ने सदैव चुकाई है। जनसंख्या के आधे भाग के योगदान के अभाव में समाज की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रगति की दर उतनी नहीं बढ़ पाई, जितनी शायद संभव थी। वर्ष 2011 के इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार प्रदान करते समय भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि राष्ट्र की आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की उचित भागीदारी के बिना सामाजिक प्रगति की अपेक्षा रखना तर्कसंगत नहीं होगा।  
वर्ष 2009 में संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की सबसे बड़ी पांच सौ कंपनियों (फारचून 500) में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक सर्वेक्षण कराया था। निष्कर्ष यह निकला था कि जिन कंपनियों के प्रबंधन में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिला था उनमें निवेशकों को तिरपन प्रतिशत अधिक लाभांश और चौबीस प्रतिशत अधिक बिक्री का फायदा मिला था। जाहिर है, महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करके आर्थिक प्रगति की रफ्तार बढ़ाई जा सकती है।
भारत सरकार महिला सशक्तीकरण के प्रति सदैव सकारात्मक रही है। वर्ष 2001 में महिला सशक्तीकरण से संबंधित राष्ट्रीय नीति की घोषणा की गई थी। इस बहुआयामी नीति में महिलाओं के विकास का वातावरण तैयार करने, समानता के साथ राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक विकास में भागीदारी सुनिश्चित करने, भेदभाव समाप्त करने, महिलाओं के प्रति हिंसा को रोकने और सभी क्षेत्रों में विकास और भागीदारी के एक समान अवसर उपलब्ध कराने का आह्वान किया गया है। 
राष्ट्रीय नीति के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए वर्ष 2010 में महिला सशक्तीकरण राष्ट्रीय मिशन 'मिशन पूर्ण शक्ति' की स्थापना की गई थी। संयुक्त राष्ट्र ने भी महिला सशक्तीकरण के पांच-आयामी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन दिशा-निर्देशों में महिलाओं को राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्णायक भूमिका निभाने, विकास के समान अवसरों की उपलब्धता, व्यक्तित्व की महत्ता और स्वेच्छा से जीवन के फैसले करने के अधिकार को अधिमान दिया गया है। 
भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तीकरण के नियामकों को सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में निर्धारित करने की जरूरत है। दो तिहाई मजदूरी के कार्यों को करने के बाद भी महिलाएं केवल दस प्रतिशत संपत्ति और संसाधनों की मालिक हैं। भूमि पर मालिकाना हक से संबंधित अधिकारों में महिलाओं के हक को जमीनी सतह पर स्थापित करने की आवश्यकता है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधन करके पुश्तैनी जमीन में लड़कियों को लड़कों के बराबर अधिकार दे दिया गया है। पर लड़कियों को इस अधिकार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। इसके लिए एक सामाजिक क्रांति की जरूरत होगी।
महिलाएं समाज के हाशिये पर ढकेल दिया गया वर्ग हैं, इसमें मतभेद नहीं। भारतीय संविधान में पीड़ित और शोषित वर्गों के लिए समानता के अधिकार से ऊपर उठ कर उनके पक्ष में सकारात्मक भेदभाव करने की अवधारणा को स्थापित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के अनुसार शिक्षण संस्थाओं, सरकारी नौकरियों और प्रशासन में सभी उपेक्षित वर्गों की समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने की परिकल्पना की गई है। फिर यह समझ से बाहर है कि अभी तक किसी ने भी शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत आरक्षण की मांग क्यों नहीं की है? राजनीति में अब भी एक तिहाई भागीदारी की मांग की जा रही है, जबकि महिलाएं राजनीति में भी आधे हिस्से की हकदार हैं। 
अपनी जिंदगी के बारे में सभी प्रकार के फैसले, जिनमें जीवन-साथी और व्यवसाय चुनने के फैसले महत्त्वपूर्ण हैं, करने की मुहिम को और गति देने की आवश्यकता है। श्रम और सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लैंगिक वर्गीकरण की दीवार को गिराने से ही महिला सशक्तीकरण की अवधारणा को बल मिल सकता है।
संपूर्ण विश्व में परंपरागत पुरुष-प्रधान समाज में एक और कटु सत्य को आत्मसात करने की आवश्यकता है। स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के तीन सिद्धांतों पर टिकी वर्ष 1789 की 'फ्रांस की क्रांति' में महिलाओं की स्वतंत्रता और पुरुषों के साथ उनके बराबरी के अधिकार का कहीं भी जिक्र नहीं है। कार्ल मार्क्स का समानता का सिद्धांत भी पुरुष और स्त्री की बराबरी की जद्दोजहद का कभी साक्षी नहीं बन सका। आधुनिक युग में भी जब सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ों के अधिकारों की वकालत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर की गई तो औरत के अधिकारों की पूरी वकालत नहीं हो पाई। शायद पुरुष वर्चस्व का उद्घोष इसमें आड़े आता रहा। 
पर महिला सशक्तीकरण के आंदोलन को पुरुषों के अधिकार छीनने की कवायद नहीं समझा जाना चाहिए। न ही इसे पुरुष बनाम स्त्री मुद्दा बनने देना चाहिए। महिला सशक्तीकरण का हामीदार बनने के लिए पुरुष विरोधी बनना कतई जरूरी नहीं है। सशक्तीकरण अधिकारों का बंटवारा नहीं, बल्कि परिस्थितियों और मापदंडों के सुधार का पर्यायवाची है। अगर महिलाओं की स्थिति में सुधार होता है तो पुरुष की स्थिति में भी सुधार होना स्वाभाविक है। 
शर-शैया पर लेटे हुए भीष्म ने पांडवों को राजनीति के पाठ पढ़ाते हुए नसीहत दी थी कि किसी राजा की कुशलता इस तथ्य की मोहताज होती है कि उसके राज्य में महिलाओं का सम्मान होता है या अपमान। इसलिए महिला सशक्तीकरण किसी भी राज-सत्ता की उपलब्धियों का सार्थक मापदंड होना चाहिए। अंत में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में सभी को समर्पित उद्गार- 'मैं औरत हूं/ आकाश मेरी बैसाखियों पर टिका है/ इंद्रधनुष मेरी आंखों का काजल है/ सूरज की परिक्रमा मेरे गर्भ से गुजरती है/ बादलों में मेरे विचार घुमड़ते हैं/ पर अफसोस/ मेरी अभिव्यक्ति की बयार अभी आना बाकी है।'

महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कि आफ्स्पा खत्म करने की मांग

महिलाओं ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कि आफ्स्पा खत्म करने की मांग

Saturday, 09 March 2013 11:59

कटक (भाषा)। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आज सैंकड़ों महिलाओं ने जिला कलेक्टर कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया और सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून :आफ्स्पा: को खत्म किये जाने की मांग की। महिला संस्कृतिका संगठन और अखिल भारतीय लोकतांत्रिक युवा संगठन के बैनर तले इन महिलाओं ने प्रदर्शन किया और कहा कि आफ्स्पा को न्यायमूर्ति जे एस वर्मा द्वारा महिलाओं की सुरक्षा के लिये आपराधिक कानूनों में संशोधनों के लिये दी गई सिफारिशों के अनुरूप खत्म किया जाये । 

महिलाओं ने शराब की बड़े पैमाने पर बिक्री पर रोक लगाये जाने की मांग की ।


इराक के बाद सीरिया

इराक के बाद सीरिया

Saturday, 09 March 2013 14:27

अजेय कुमार 
जनसत्ता 9 मार्च, 2013: सीरिया में युद्ध के नगाड़े अब और जोर से बजने लगे हैं। अब साम्राज्यवादी मीडिया लगभग उसी तरह के झूठ प्रसारित करने में लग गया है जो इराक पर हमले से पहले 'जन-संहार के हथियार होने' के आरोप जैसे प्रतीत होते हैं। सरकार के बार-बार मना करने पर भी, और बिना किसी प्रमाण के, मीडिया ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया है कि सीरिया की सरकार 'अपने ही लोगों के विरुद्ध रासायनिक हथियार इस्तेमाल करने' की योजना बना रही है। पश्चिमी देशों की लगभग हरेक समाचार एजेंसी द्वारा इस मनगढंÞत खबर के प्रचार-प्रसार से उत्साहित होकर हिलेरी क्लिंटन ने भी घोषणा कर दी है कि रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करना तो सीरिया सरकार द्वारा हर तरह से लक्ष्मण रेखा (वे इसे लाल रेखा कहती हैं) पार करना है। यहां वे संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून की भी परवाह नहीं करतीं, जिनके अनुसार अभी यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि सीरिया की सरकार इन हथियारों का इस्तेमाल करने जा रही है।
कुछ ही सप्ताह पहले अमेरिकी सीनेट ने सीरिया की वायुसेना को तबाह करने और 'सीरिया में नागरिकों की हत्या रोकने और ऐसे हालात पैदा करने ताकि वहां एक जनतांत्रिक, बहुलतावादी राजनीतिक व्यवस्था कायम हो सके और इसके लिए राष्ट्रपति ओबामा के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने' के उद््देश्य से सैन्य-विकल्प को आजमाने का प्रस्ताव पारित किया है। इसी बीच नाटो ने तुर्की को हरी झंडी दिखा दी है कि वह सीरिया-तुर्की की नौ सौ किलोमीटर लंबी सीमा पर पैट्रियट मिसाइलें तैनात कर दे। ये मिसाइलें अमेरिका ने तुर्की को निर्यात की हैं।
पिछले वर्ष के आखिरी महीने के दूसरे सप्ताह में ओबामा ने सीरिया के सशस्त्र 'सीरियाई विपक्षी गठबंधन' को मान्यता दे दी है और अपने बयान में उसे 'असद सरकार के विरुद्ध न्यायोचित प्रतिनिधि' कहा है। इस फैसले तक पहुंचने से पहले अमेरिका लगभग दो साल से 'सीरिया के मित्र' नाम से बने लिजलिजे संगठन के जरिये भी सशस्त्र विपक्षी गठबंधन के लिए आर्थिक और सैन्य सहायता जुटाने का प्रयास करता रहा है। इन देशों में ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य पश्चिमी देशों के अलावा सऊदी अरब, इजराइल प्रमुख हैं। इस संगठन के सौ से ऊपर सदस्य-देशों की एक बैठक मोरक्को में बीते दिसंबर में हुई और उन्होंने अपना पूरा समर्थन सीरियन विपक्षी गठबंधन को देने का फैसला किया। इस तरह एक संप्रभु देश की आजादी पर खुल्लमखुल्ला हमला हो रहा है।
असद के शासन में सब कुछ ठीक है, ऐसा भी नहीं है। दमन, शोषण, लूट, भ्रष्टाचार, सब है वहां, जैसे हमारे देश और अन्य कई देशों में है। प्राय: यह देश की जनता तय करती है कि सत्ता किसके हाथ में दी जाए। थोड़ी देर के लिए मान लें कि एक लाख जेहादी भारत में घुस कर एलान कर दें कि जब तक मनमोहन सिंह सत्ता नहीं छोड़ेंगे, वे आतंकवादी गतिविधियां जारी रखेंगे, तो भारत सरकार क्या करेगी? और अगर उन जेहादियों को विश्व की सबसे प्रचंड सैन्य-शक्ति का समर्थन प्राप्त हो, तब क्या होगा? मध्य-पूर्व में असद के नेतृत्व में एकमात्र सरकार बची है जो अब भी धर्मनिरपेक्षता की राह पर चल रही है, जिसने इस्लाम को राज्य-धर्म घोषित नहीं किया है, जहां ईसाई, फिलस्तीनी, कुर्द, ड्रज, अलावाइट आदि अल्पसंख्यक सुरक्षित महसूस करते हैं। ऐसे में सशस्त्र सीरियाई विपक्षी गठबंधन को अमेरिका का सैन्य-समर्थन देना जेनेवा समझौते के भी विरुद्ध है। याद रहे, इस समझौते पर अमेरिका ने भी दस्तखत किए हैं। 
रूस ने और असद सरकार ने भी यह सुझाव दिया था कि सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत हो और मतभेदों को दूर किया जाए। असद ने तो सीरिया में अंतरराष्ट्रीय निगरानी के तहत चुनाव कराए जाने की पेशकश भी की है ताकि सीरियाई समाज के सभी वर्गों को सरकार में प्रतिनिधित्व मिल सके।
पर अमेरिका को यह मंजूर नहीं है। उसे तो अपनी पेंटागन की घोषित नीति, जो कि अब उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध है, को लागू करना है। और यह नीति है कि अगर विश्व में किसी देश की सरकार अमेरिकी हितों की अनदेखी करेगी तो पहले उसे समझा-बुझा कर पटरी पर लाने की कोशिश की जाएगी और अगर वह प्यार से न माने तो उसकी सत्ता पलट दी जाएगी।
इस हिसाब से देखा जाए तो सीरिया की गतिविधियां मध्य-पूर्व क्षेत्र में अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाने वाली रही हैं। 2003 में जब इराक पर अमेरिका ने कब्जा किया तो सीरिया ने अपनी सीमाएं इराक के शरणार्थियों और वहां साम्राज्यवादी कब्जे के विरुद्ध लड़ने वाले देशभक्तों के लिए खोल दी थीं और असद सरकार ने उनकी पूरी मदद की थी। फिलस्तीन के ग्यारह संगठनों के मुख्यालय सीरिया में सक्रिय रहे हैं। लगभग पांच लाख फिलस्तीनी आज सीरिया में रह रहे हैं। और उन्हें तमाम नागरिक अधिकार उपलब्ध हैं जो बाकी जनता को हैं, जैसे मुफ्त शिक्षा और मुफ्त चिकित्सा सेवा। अरब के किसी अन्य राष्ट्र ने फिलस्तीनियों को इस तरह बसने की इजाजत नहीं दी है। असद सरकार उनके हक की लड़ाई में उनके साथ है। लेबनान के हिजबुल्ला आंदोलन को असद सरकार मदद देती रही है। वह इजराइल की दादागिरी के खिलाफ है और इस तरह पश्चिमी देशों के हितों के विरुद्ध है। 
सत्ता पलटने के लिए ओबामा प्रशासन इस चीज को अहमियत नहीं देता कि विपक्षी दल का संबंध जेहादी गु्रपों से है या नहीं। एक संगठन अल-नुसरा, जिसे अमेरिका ने आतंकवादी संगठनों की सूची में रखा हुआ है और जिसके अल-कायदा से संबंध   जगजाहिर हैं, उस 'सीरियन विपक्षी गठबंधन' का भी हिस्सा है, जिसे ओबामा प्रशासन ने मान्यता दी है। जमात-अल-नुसरा ने पहला आत्मघाती हमला इसी साल छह जनवरी को किया था, जिसने दमिश्क में कई बसों को उड़ा दिया था। उसके बाद से, आत्मघाती बमबारियों या रिमोट से कराए जाने वाले कार-बम विस्फोटों की तादाद में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी हुई है। इन हमलों में साठ हजार नागरिकों की मौत हो चुकी है और लगभग पांच लाख लोग शरणार्थी बनने को विवश हुए हैं। इस तरह के हमलों की एक बहुत ही नृशंस मिसाल है, दमिश्क के निकट अल वफीदीन शिविर के स्कूल पर हुआ हमला, जिसमें एक कक्षा के उनतीस बच्चे मारे गए थे।

जमात-अल-नुसरा की हिंसा की भयावहता का मुख्य कारण यह है कि इसमें दूसरे देशों के कट््टरपंथी लड़ाके भर्ती किए गए हैं। इनमें लीबिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, इराक, लेबनान, तुर्कमेनिस्तान और चेचेन्या के आतंकवादी शामिल हैं। इनमें हर बीस आतंकवादियों में केवल एक सीरियाई मूल का है। इन्होंने सीरिया में सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ वहां इस्लामी व्यवस्था कायम करने को भी अपना लक्ष्य घोषित कर रखा है। जिन आतंकवादियों को अमेरिका कथित रूप से लीबिया से खदेड़ रहा है, वास्तव में वे अब सीरिया में हैं और वहां की जनता को आतंकित करने के नाटो के प्रयासों के साझेदार बने हुए हैं। 
एक ओर अमेरिकी उच्चाधिकारी इस तरह की ताकतों के अब भी बने होने पर चिंता का दिखावा करते हैं, और दूसरी ओर, उन्हीं ताकतों को अपने मंसूबे पूरे करने का औजार बनाने के लिए हथियार और साज-सामान मुहैया करा रहे हैं। इससे आतंकवाद के मुद््दे पर ओबामा प्रशासन के दोमुंहेपन का भी पता चलता है। अल-कायदा से संबंधित संगठन अल-नुसरा कल जब सऊदी अरब और बाद में अमेरिका को आंखें दिखाने लगेगा, तो क्या ओबामा एक बार फिर उसके नेता को अरब सागर में फेंकने की सोचेंगे?
इन हमलों से स्पष्ट हो जाता  है कि आज सीरिया अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का शिकार बना हुआ है। लेकिन नाटो के सदस्य-देश इस पहलू पर चुप्पी साधे हुए हैं। दूसरी ओर, ऐसे आतंकी हमलों के खिलाफ सीरियाई सरकार की कार्रवाइयों को ही 'जनता पर हमला' बताया जा रहा है। सीरिया के मामले में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के पैमाने ही बदल दिए गए हैं।
अमेरिका और उसके सहयोगी एक बार फिर उसी रणनीति का प्रयोग कर रहे हैं जिसे उन्होंने इससे पहले लीबिया में और 1999 में यूगोस्लाविया में आजमाया था। इन देशों में पश्चिमी ताकतों द्वारा प्रशिक्षित और उन्हीं के पैसे के बल पर संगठित हुए, उनके भाड़े के टट््टुओं ने पहले तो वहां की तत्कालीन सरकारों के खिलाफ गंभीर उकसावे की कारगुजारियां कीं और जब संबंधित देशों के प्रशासन ने जवाबी कार्रवाई की तो उसे 'जनसंहार' करार दे दिया गया और हिटलरी दुष्प्रचार के सहारे इन शासनों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जनमत बनाया गया।
चैनल-4 टीवी चैनल (जिसने प्रभाकरण के बारह वर्षीय बेटे बालचंद्रन प्रभाकरण की हत्या की खबर हाल ही में प्रसारित की थी) के पत्रकार एलेक्स थाम्पसन ने चौदह दिसंबर को अपने ब्लॉग पर चश्मदीद गवाहों की मदद से अकरब में अल्पसंख्यकों पर हुए आतंकवादी हमलों का ब्योरा दिया है, जिसमें कम से कम एक सौ पचीस लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे। इस ब्योरे के कुछ अंश इस प्रकार हैं:
हमने तीन चश्मदीद गवाहों से अलग-अलग बातचीत की और सभी ने एक ही बात कही कि फ्री सीरियन आर्मी के विद्रोहियों ने लगभग पांच सौ अलवाइट अल्पसंख्यकों को दोमंजिला इमारत में एकत्र किया, लगभग नौ दिन उन्हें भूखा-प्यासा रखाा। फिर एक दिन उन विद्रोहियों ने उनसे कहा कि हम तुम्हारे इस्लामी भाई हैं, हम अल-हाउला और अल-रसतान से आए हैं। उनका लक्ष्य उन पांच सौ लोगों में से औरतों और बच्चों को अपने साथ रखना था ताकि वे सरकारी फौजों के हमलों के वक्त उन्हें आगे कर दें। चार घंटे तक विद्रोहियों और अल्पसंख्यक नागरिकों के बीच बातचीत चली, जिसमें सभी नागरिकों ने औरतों और बच्चों को ले जाने के लिए मना कर दिया। तभी विद्रोहियों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। कई लोग मारे गए। घायल हुए लोगों में एक महिला और बच्चे को विद्रोहियों ने अपने कब्जा किए अस्पताल में मरहम-पट्टी करवाई और उनसे कैमरे के सामने कहलवाया कि सरकारी फौजों ने उन पर गोलीबारी की है।''
आज सीरिया में अमेरिका-समर्थित आतंकवादियों के चलते आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। आज वहां भूख का साम्राज्य है, जबकि कुछ वर्ष पहले खाद्य सामग्री के मामले में देश आत्मनिर्भर था। राज्य द्वारा संचालित कई फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं। आधे सार्वजनिक अस्पताल संकट में हैं, जीवनरक्षक दवाइयों और इंसुलिन जैसी आवश्यक दवाइयों की भयंकर कमी हो गई है। औषधियां बनाने वाली फैक्ट्रियां, जो पिछले वर्ष तक देश की नब्बे प्रतिशत मांग की पूर्ति करती थीं, अब केवल एक-तिहाई उत्पादन कर पा रही हैं। आज संकटग्रस्त अंतरराष्ट्रीय पूंजी सारी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों और विशेषकर मध्य-पूर्व क्षेत्र के तेल संसाधनों की लूट को तेज करने में लगी है। विडंबना यह है कि संप्रभु राष्ट्रों पर तबाही थोपने का काम 'लोकतंत्र की बहाली' के नाम पर हो रहा है।
http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/40491-2013-03-09-08-57-55

बामसेफच्या ऐक्याची बैठक वादळी ठरणार

Published: Saturday, March 2, 2013

एकेकाळी बहुजन समाज पक्षाला आर्थिक रसद आणि बुद्धिजीवी मनुष्यबळ पुरविणाऱ्या बामसेफ या सरकारी व निमसरकारी क्षेत्रातील मागासवर्गीय अधिकारी-कर्मचाऱ्यांच्या संघटनेत अनेक गट-तट पडल्याने निष्ठावंत कार्यकर्त्यांनीच आता प्रस्थापित नेतृत्वाविरुद्ध बंडाचा झेंडा फडकावत संघटनेच्या ऐक्यासाठी पुढाकार घेतला आहे. त्यासाठी उद्या शनिवारी व रविवारी विविध गटांतील प्रमुख कार्यकर्त्यांची बैठक बोलाविण्यात आली आहे. प्रस्थापित नेतृत्वालाच आव्हान दिले जाणार असल्याने ही बैठक काहीशी वादळी ठरण्याची शक्यता आहे. 
बसपचे संस्थापक कांशीराम यांच्या पुढाकारातूनच बामसेफ या संघटनेची स्थापना करण्यात आली. केंद्र व राज्य सरकारच्या सेवेतील मागासवर्गीय व अल्पसंख्याक समाजातील अधिकारी-कर्मचाऱ्यांना संघटित करण्याचा त्यांनी यशस्वी प्रयत्न केला. देशभर ही संघटना फोफावली. केडर बेस्ड या संघटनेचे देशभरात एक लाखाच्या वर सदस्य आहेत. त्यात आएएएस, आयपीएस अधिकाऱ्यांपासून ते चतुर्थश्रेणी कर्मचाऱ्यांपर्यंत सर्वांचा समावेश आहे. या संघटेच्या जिवावरच कांशीराम यांनी बसपची स्थापना केली. याच बसपने पुढे उत्तरेतील काही राज्यांमध्ये दमदार राजकीय वर्चस्व प्रस्थापित तर केलेच शिवाय उत्तर प्रदेशची सत्ताही हातात घेतली. बसपच्या सर्वेसर्वा आणि उत्तर प्रदेशच्या माजी मुख्यमंत्री मायावती यांनी मात्र या संघटनेकडे फारसे लक्ष्य दिले नाही. परिणामी संघटनेतही नेतृत्वाच्या वादातून अनेक गट-तट जन्माला आले. सध्या बामसेफ आठ ते दहा गटात विभागली आहे. त्यामुळे गेली वीस-पंचवीश वर्षांपासून संघटनेत निष्ठेने काम करणारे कार्यकर्ते अस्वस्थ झाले आहेत. अशा कार्यकर्त्यांनी आता प्रस्थापित नेतृत्वाला आव्हान देत संघटनेची पुनर्माडणी करण्याचे ठरविले आहे. 
दादर येथील डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर भवनमध्ये उद्या सकाळी दहापासून सायंकाळपर्यंत कार्यकर्त्यांची बैठक होणार आहे. या बैठकीला देशभरातून जवळपास ३५० ते ४०० कार्यकर्ते उपस्थित राहणार आहेत. या बैठकीत मूळ घटनेवर आधारीत संघटनेची फेररचना करण्याबाबत कार्यकर्त्यांची मनोगते जाणून घेतली जाणार आहेत. रविवारी दुसऱ्या दिवशीच्या बैठकीत नव्या स्वरुपातील संघटनेच्या स्थापनेला अंतिम स्वरुप दिले जाणार आहे, अशी माहिती बामसेफ समन्वय समितीच्या वतीने देण्यात आली.

http://www.loksatta.com/mumbai-news/stromy-bamcef-meeting-for-alliance-held-on-saturday-and-sunday-72548/


बामसेफमध्ये हुकूमशाहीमुळे फूट ; पुनर्रचनेचा निर्धार

बामसेफमध्ये हुकूमशाहीमुळे फूट ; 


पुनर्रचनेचा निर्धार


division in bamsef is due to autocracy; determination fir rearrangement

Published: Sunday, March 3, 2013

व्यवस्था परिवर्तनाचे उद्दिष्ट डोळ्यासमोर ठेवून स्थापन करण्यात आलेल्या बामसेफमध्ये हुकुमशाही प्रवृत्तीच्या नेतृत्वामुळे फूट पडल्याचा सूर संघटनेच्या निष्ठावंत कार्यकर्त्यांच्या बैठकीत लावण्यात आला. सामाजिक क्रांतीच्या उद्देशाला आणि संघटनेलाही मारक ठरणाऱ्या नेतृत्वाला दूर करुन बामसेफची नव्याने पुनर्रचना करण्याचा निर्धार या वेळी व्यक्त करण्यात आला. 
रिपब्लिकन पक्षाप्रमाणेच देशभर फोफावलेल्या बामसेफ या सरकारी-निमसरकारी क्षेत्रातील मागासवर्गीय अधिकारी-कर्मचाऱ्यांच्या संघटनेला फुटीने ग्रासले आहे. गेल्या चार-पाच वर्षांत आठ-दहा गट उदयास आले आहेत. त्यामुळे गेली वीस-पंचवीस वर्षे निष्ठेने काम करणाऱ्या कार्यकर्त्यांंमध्ये अस्वस्थता आहे. त्यातूनच काही निष्ठावंत कार्यकर्त्यांनी अंतर्गत गटबाजीला मूठमाती देऊन बामसेफच्या एकीकरणीसाठी पुढाकार घेतला आहे. 
बामसेफच्या एकीकरणाचाच एक भाग म्हणून शनिवारी दादर येथील आंबेडकर भवनमध्ये देशभरातील विविध गटातील निष्ठावंत कार्यकर्त्यांची बैठक आयोजित करण्यात आली होती. या बैठकीला १८ राज्यांतून २०० ते २५०  प्रमुख पदाधिकारी आले होते. त्यात बामसेफचे विविध गट चालविणाऱ्या चमनलाल (उत्तर प्रदेश), शिवाजी राय व ज्योतिनाथ (बिहार), अभिराम मलिक (ओरिसा), अब्दुल सुकुर (कर्नाटक), ताराराम मेहना ( राजस्थान), तसेच सुबच्चनराम आणि बामसेफचे माजी राष्ट्रीय अध्यक्ष बी. डी. बोरकर इत्यादी प्रमुख नेत्यांचा समावेश होता. मराठा सेवा संघाचे सल्लागार अ‍ॅड. अनंत दारवटकर हेही या बैठकीला उपस्थित होते. बामसेफच्या ऐक्याबरोबरच, मराठा सेवा संघ, संभाजी ब्रिगेड, अशा समविचारी संघटनांनाही बरोबर घ्यावे, असे आवाहन त्यांनी केले. 
व्यवस्था परिवर्तनासाठी बामसफेची स्थापना करण्यात आली होती. परंतु काही लोक हे उद्दिष्टच विसरले आणि संघटनेपेक्षा स्वतला मोठे समजू लागले, त्यातून संघटनेत फुटीची प्रक्रिया सुरु झाली असे विश्लेषण बैठकीत करण्यात आले. खास करुन एककल्ली व हुकुमशाही प्रवृत्तीच्या नेतृत्वामुळे संघटनेत फूट पडल्याची टीका बोरकर यांनी केली. उद्या पुन्हा बैठक होणार असून त्यात बामसफेचे एकीकरण, पुढील कार्यक्रम व आंदोलनाची दिशा ठरविली जाणार आहे.

http://www.loksatta.com/mumbai-news/division-in-bamsef-is-due-to-autocracy-determination-fir-rearrangement-73477/


Bamcef Unification Coference

BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE 4


Published on 8 Mar 2013

ALL INDIA BAMCEF UNIFICATION CONFERENCE HELD AT Dr.B.R. AMBEDKAR BHABAN,DADAR,MUMBAI ON 2ND AND 3RD MARCH 2013. Mr.TARARAM MEHANA (BAMCEF PRESIDENT) DELIVERING HIS SPEECH.


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