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Monday, February 20, 2012

कहीं चमक कहीं अंधेरा

कहीं चमक कहीं अंधेरा


Sunday, 19 February 2012 12:03

तवलीन सिंह 
जनसत्ता 19 फरवरी, 2012: इस सप्ताह उत्तर प्रदेश के देहातों से मैं कुछ अच्छी और कुछ बुरी खबर लेकर आई हूं। मेरा मानना है कि बुरी खबरें पहले देना बेहतर होता है। तो शुरुआत उन्हीं से करती हूं। इनमें सबसे बुरी खबर यह है कि भारत सरकार की महा-योजनाओं से अपने इस सबसे बड़े प्रदेश में नुकसान ज्यादा और लाभ कम हो रहा है। जो आज भी स्वास्थ्य अधिकारियों की हत्याएं हो रही हैं, इशारा करती हैं कि नुकसान गहरा और गंभीर है। उत्तर प्रदेश के देहातों में स्वास्थ्य सेवाएं उतनी ही रद्दी हैं जितनी पहले थीं, तो जाहिर है कि ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन विफल रहा है। लेकिन कुछ अधिकारियों को नाजायज फायदा जरूर हुआ है। 
सोनिया गांधी और उनके बच्चों ने अपने चुनाव प्रचार में बार-बार कहा है कि 'हमने' लाखों करोड़ रुपए भेजे हैं केंद्र से, जो लूट लिए गए हैं। पहली बार मैं उनकी बात से पूरी तरह सहमत हूं। सबक है तो यह कि इस तरह की बड़ी-बड़ी, दिल्ली में केंद्रित, योजनाएं सफल नहीं हो सकती हैं। जितना इनका विकेंद्रीकरण किया जा सकता है, होना चाहिए, लेकिन यहां भी एक समस्या है। उत्तर प्रदेश के गांवों में प्रधान खुद इतने गरीब हैं कि जब केंद्र सरकार रोजगार योजना के लिए उनके बैंक खातों में लाखों रुपए जमा करती है तो उनकी नीयत खराब होना स्वाभाविक है। दूसरा मैंने यह पाया कि जिन गांवों में मनरेगा थी, वहां सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी की अब भी है। तो अगर उसका कोई फायदा हुआ है तो सिर्फ यह कि इसको बेरोजगारी भत्ता समझ कर लोग ले रहे हैं। इससे बेहिसाब नुकसान हो सकता है। 
अब सुनिए कुछ अच्छी खबरें। अपने इस सबसे बड़े प्रदेश में, जहां गरीबी और पिछड़ेपन का एक मुख्य कारण है मतदाताओं का जाति और धर्म के नाम पर वोट डालना, इस बार सबसे बड़ा मुद्दा है विकास। मायावती अगर दोबारा जीत कर आती हैं तो इसका मतलब होगा कि लोगों ने अपने जीवन में परिवर्तन देखा है। अगर हारती हैं तो समझ लीजिए कि आम आदमी के जीवन में वह परिवर्तन नहीं आया, जिसकी उसको उम्मीद थी। 
जहां भी गई मैं, ऐसे लोग मिले, हिंदू भी मुसलिम भी, जिनकी मांगें थीं बिजली, सड़क, पानी, रोजगार, आवास। न किसी ने मंदिर-मस्जिद का मुद्दा उठाया और न ही किसी ने धर्म-जाति की बातें की। यहां पर यह कहना जरूरी है कि रायबरेली और अमेठी में मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले, जो गांधी परिवार के 'करिश्मा' के नाम पर अब भी वोट डालने को तैयार थे, लेकिन यहां भी तब्दीली आती दिख रही है। एक देहाती स्कूल के प्रिंसिपल के शब्दों में, 'वैसे तो हम यह कहते हुए गौरवान्वित होते हैं कि हम राहुल गांधी के चुनाव क्षेत्र के हैं, लेकिन जरा मेरे स्कूल का हाल देखिए। दीवारें नहीं बना पाया हूं मैं, क्योंकि बच्चे गरीब घरों के हैं तो फीस सिर्फ तीस रुपए महीना है और वह भी कई लोग इतने गरीब हैं कि कई-कई महीनों तक नहीं देते हैं। मुश्किल से अध्यापकों का वेतन दे पाता हूं। विधायक से मदद मांगी, राहुल गांधी से भी मिले हम, लेकिन कुछ नहीं हुआ।' 

रायबरेली और अमेठी जैसे अति-वीवीआईपी चुनाव क्षेत्रों में इतनी गरीबी क्यों है? यह रहस्य है मेरे लिए। इसका जवाब ढूंढ़ने पर नहीं मिलता। इन दोनों चुनाव क्षेत्रों के दायरे में फिर भी उन गांवों में, जिनको आंबेडकर गांव घोषित कर दिया गया है, परिवर्तन दिखता है। मायावती की आंबेडकर गांव योजना के तहत जिन गांवों में दलितों की आबादी पचहत्तर फीसद से अधिक है वहां प्रावधान है बिजली, पानी, सड़क और पक्के मकान (कॉलोनी) का। इन गांवों में मायावती का जिक्र बड़े प्यार से होता है। और लखनऊ शहर में मायावती आवास योजना के तहत झुग्गियों में रहने वालों को पक्के 'अपार्टमेंट' मिले हैं, वहीं जहां उनकी झुग्गियां होती थीं। 
लखनऊ के निवासी वैसे भी मुख्यमंत्री से इसलिए खुश हैं कि इस शहर को मायावती के दलित स्मारकों ने चमका दिया है। कुछ लोगों को शिकायत जरूर थी कि इन स्मारकों पर जरूरत से ज्यादा पैसा बरबाद किया गया है, लेकिन यह भी मानते हैं कि लखनऊ की पुरानी खूबसूरती वापस लौट रही है। 
इस शहर को मैं बचपन से जानती हूं, क्योंकि मेरी पढ़ाई उत्तर प्रदेश में हुई थी, सो मुझे याद है कि लखनऊ किसी जमाने में भारत के सबसे सुंदर शहरों में होता था। फिर आया समाजवाद का जमाना और लखनऊ में सिर्फ बने कई सारे बदसूरत सरकारी दफ्तर और सरकारी अफसरों के घर। नवाबों के बनाए गए इस शहर की खूबसूरती छिप गई इन बदसूरत इमारतों के पीछे। 
कितने मजे की बात है कि गरीब, दलित परिवार की एक महिला मुख्यमंत्री ने लखनऊ की पुरानी खूबसूरती लौटाने के लिए वह किया है, जो कभी नवाबों ने किया था। लखनऊ की नई इमारतों को देख कर, उसके पुराने बाजारों और इमामबाड़ों की सफाई देख कर उस पुराने शहर की यादें ताजा हुर्इं, जिसको मैंने बचपन में देखा था।


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